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दिसंबर, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

2014 कल तुम आओगे तब मैं

2014   कल तुम आओगे तब मैं आधी रात से ही तुमको दुलारने लगूंगा पुकारने लगूंगा तुम्हारी राह बुहारने लगूंगा शुभकामनाओं के फ़ूल बिखेर बिखेर अपने तुपने संबंध को मेरे अनुकूलित करने किसी पंडित को बुला पत्री-बांचने दे दूंगा उसे ... या तुम्हारे कालपत्रक पंचांग को पाते ही पीछे छपे राशिफ़ल को बाचूंगा.. घर में बहुत हंगामा होगा बाहर भी . फ़िर कोई कहेगा अर्र ये क्या अपना नया तो "ये नहीं गुड़ी पड़वा" को आएगा . उसकी कही एक कान से सुन दूजे निका दूंगा . हर साल वो यही कहता है पर मै नहीं सुनता उसको    सु नूं भी क्यों किसी की क्यों .. एक भी न सुनूं ऐसे किसी की जो  गुड़ खाए गुलगुलों से परहेज़ी बताए .. !! अब भला सरकारी तनख्वाह अंग्रेजी कैलेंडर से ही महीना पूरा होते मिलती है.. है न .. कौन अमौस-पूनौ ले दे रहा है तनख्वाह  बताओ भला हमको तो खुश रहने का बहाना चाहिये. आप हो कि हमारी सोच पर ताला जड़ने की नाकामयाब कोशिश कर रहे हो .      अल्ल सुबह वर्मा जी, शर्मा जी वगैरा आए हैप्पी-न्यू ईयर बोले तो क्या उनसे झगड़ लूं बताओ भला .     चलो हटाओ सुनो पुराने में नया क्या खास हुआ  अखबार चैनल

तुम बिन माँ भावों ने सूनेपन के अर्थ बताए !!

  मां सव्यसाची प्रमिला देवी की पुण्यतिथि  28.12.2013  पर पुनर्पाठ  सव्यसाची स्व. मां         यूं तो तीसरी हिंदी दर्ज़े तक पढ़ी थीं मेरी मां जिनको हम सब सव्यसाची कहते हैं क्यों कहा हमने उनको सव्यसाची क्या वे अर्जुन थीं.. कृष्ण ने उसे ही तो सव्यसाची कहा था..? न वे अर्जुन न थीं.  तो क्या वे धनुर्धारी थीं जो कि दाएं हाथ से भी धनुष चला सकतीं थीं..?  न मां ये तो न थीं हमारी मां थीं सबसे अच्छी थीं मां हमारी..!  जी जैसी सबकी मां सबसे अच्छी होतीं हैं कभी दूर देश से अपनी मां को याद किया तो गांव में बसी मां आपको सबसे अच्छी लगती है न हां ठीक उतनी ही सबसे अच्छी मां थीं .. हां सवाल जहां के तहां है हमने उनको सव्यसाची   क्यों कहा..! तो याद कीजिये कृष्ण ने उस पवित्र अर्जुन को "सव्यसाची" तब कहा था जब उसने कहा -"प्रभू, इनमें मेरा शत्रु कोई नहीं कोई चाचा है.. कोई मामा है, कोई बाल सखा है सब किसी न किसी नाते से मेरे नातेदार हैं.." यानी अर्जुन में तब अदभुत अपनत्व भाव हिलोरें ले रहा था..तब कृष्ण ने अर्जुन को सव्यसाची सम्बोधित कर गीता का उपदेश दिया.अर्जुन से मां  की

हर मोड़ औ’ नुक्कड़ पे ग़ालिब चचा मिले

हर मोड़ औ ’ नुक्कड़ पे ग़ालिब चचा मिले ग़ालिब की शायरी का असर देखिये ज़नाब ************* कब से खड़ा हूं ज़ख्मी-ज़िगर हाथ में लिये सब आए तू न आया , मुलाक़ात के लिये ! तेरे दिये ज़ख्मों को तेरा इं तज़ार है – वो हैं हरे तुझसे सवालत के लिये ! ************* उजाले उनकी यादों के हमें सोने नहीं देते. सुर-उम्मीद के तकिये भिगोने भी नहीं देते. उनकी प्रीत में बदनाम गलियों में कूचों में- भीड़ में खोना नामुमकिन लोग खोने ही नहीं देते. ************* जेब से रेज़गारी जिस तरह गिरती है सड़कों पे तुमसे प्यार के चर्चे कुछ यूं ही खनकते हैं....!! कि बंधन तोड़कर अब आ भी जाओ हमसफ़र बनके   कितनी अंगुलियां उठतीं औ कितने हाथ उठते हैं.? **************** पूरे शहर को मेरी शिकायत सुना के आ मेरी हर ख़ता की अदावत निभा के आ ! हर शख़्स को मुंसिफ़ बना घरों को अदालतें – आ जब भी मेरे घर आ , रंजिश हटा के आ !!

.संदीप आचार्य को श्रद्धांजली : श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’

गौरा रंगा, लम्बा कद, हंसमुख चेहरा, सुन्दर व सौम्य मुस्कान के साथ सरल स्वभाव जी  संदीप आचार्य जिसने इंडियन आइडल सीजन 2 में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी धमाकेदार एंट्री 2006 में करी आज वह हमारे बीच नहीं रहा। राजस्थान की मरूनगरी बीकानेर के इस चहेते व लाडले को आज अंतिम विदाई देने जैसे सारा शहर ही उमड़ पड़ा था। काल के क्रूर हाथों ने संदीप को हमारे से छीन लिया लेकिन मानो किसी को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि संदीप हमारे बीच नहीं रहा। संदीप जब किसी से भी मिलता तो अपने से बड़ों के पैर छूने नहीं भूलता था और बच्चों से उसका खास लगाव था और बच्चों के साथ खेलना उनकी बाल सुलभ हरकतों में शामिल होकर बच्चा बन जाता संदीप की आदत में था। बच्चों के लिए संदीप हमेशा चाचा और मामा रहा और संदीप हर बच्चे को अपनी ओर से चाॅकलेट देना या केाई गिफ्ट देना नहीं भूलता था। मेरे से संदीप का जुड़ाव वैसे तो संदीप के बचपन से ही था। मेरे मामाजी मोटूलाल जी हर्ष ’मोटू महाराज’ और संदीप के पिताजी विजय कुमार जी आचार्य ‘गट्टू महाराज’ शुरू से ही मित्र हैं और उनका काम धंधा भी किसी समय साथ रहा है। इसलिए मेरे लिए संदीप के पिताजी

16 दिसम्बर क्या तुमने कभी सोचा था कि तुम इस तरह याद किये जाओगे

            पिंड दान कराने गये एक पंडित जी ने कहा - "तुम्हारे पिता को सरिता के मध्य में छोड़ना है ..वहां से सीधे स्वर्ग का रास्ता मिलेगा !" नाविक ने कहा- "पंडिज्जी.. पिंड का चावल तो मछलियां खुद तट पर आ के खा लेंगी आप नाहक मध्य-में जाने को आमादा हैं. मध्य में तो भंवर है.. कुछ हुआ तो .." पंडिज्जी- हे नास्तिक नाविक, तुम जन्म और कर्म दौनो से अभागे इसी कारण से हो क्योंकि तुमको न तो धर्म का ज्ञान है न ही जन्म जन्मांतर का बोध.. यजमान बोलो सच है कि नहीं.. शोकमग्न यजमान क्या कहता शांत था कुछ कहा न गया उससे .. नाविक ऐसे वक़्त में उस पर  अपनी राय थोंप कर मानसिक हिंसा नहीं करना चाहता था . चला दिया चप्पू उसने सरिता के मध्य की ओर.. मध्य भाग में वही हुआ जिसका भय था नाविक को नाव लड़खड़ाई.. जैसे-तैसे नाविक ने नाव को साधा वापस मोड़ ली नाव और कहा -  पंडिज्जी, यदि मेरी वज़ह से आप दौनों अकाल मृत्यु का शिकार होते तो मुझे घोर पाप लगता.. अस्तु मैं सुरक्षित स्थान पर पिंडप्रवाह करा देता हूं.  पंडिज्जी मौन थे... सारे  ज्ञान चक्षु खुल गये थे उनके........ किसी के लिये मुक्ति का मार्ग कोई द

भैया बहुतई अच्छे हैं इसई लिये तो....

                 भैया बहुतई अच्छे हैं इसई लिये तो....बस भैया की अच्छाईयों का डिंडोरा जो बरसों से पिट रहा था लोग बेसुध गोपियों के मानिंद मोहित से  भैया की बंसी के पीछे दीवाने से झूम उठते हैं . हमने पूछा भैया की अच्छाईयां गिनाओ तो मौन साध गए कुछ और कुछेक तो दूसरों की निंदा का पिटारा खोल बैठे. लोग बाग भी अजीब हैं हो सकता है कि मेरी सोच ही मिसफ़िट हो.. ? अरे भाई मिसफ़िट हो क्या है ही.... मिसफ़िट मेरी विचार शैली .                   मुझमें वो दिव्य दृष्टि लगाई ही नहीं है भगवान ने जिससे में भैया को आईकान मान सकूं. ये मेरा मैन्यूफ़ेक्चरिंग डिफ़ेक्ट है. मुझे ऐसा एहसास हुआ . सो बस    शेव कराते वक्त ज्यों ही भैया की याद आई कि मेरे बाल भर जाड़े में कांटे से खड़े हो गये . कर्तनालय मंत्री को दाढ़ी साफ़ करने में कम मुश्किल पेश आई.              बाल कटवाते समय मुझे बुद्ध की तरह ज्ञान हुआ कि हिंदुस्तान में  के पास बात करने के विषय तय शुदा हैं.… सियासत, और निंदा  . जहां तक सियासत का सवाल है लोग खबरिया चैनल पर जारी बहसों को भी पीछे छोड़ देते हैं. और निंदा बाप रे बाप  जिसे वो जानते भी नहीं उसमें

प्रदेश के तीसवें जननायक से उम्मीदें

क्रमांक नाम अवधि 1 श्री रविशंकर शुक्ल 01.11.1956 to 31.12.1956 2 श्री भगवन्त राव मण्डलोई 01.01.1957 to 30.01.1957 3 श्री कैलाश नाथ काटजु 31.01.1957 to 14.04.1957 4 श्री कैलाश नाथ काटजु 15.04.1957 to 11.03.1962 5 श्री भगवन्त राव मण्डलोई 12.03.1962 to 29.09.1963 6 श्री द्वारका प्रसाद मिश्रा 30.09.1963 to 08.03.1967 7 श्री द्वारका प्रसाद मिश्रा 09.03.1967 to 29.07.1967 8 श्री गोविन्द नारायण सिंह 30.07.1967 to 12.03.1969 9 श्री राजा नरेशचन्द्र सिंह 13.03.1969 to 25.03.1969 10 श्री श्यामाचरण शुक्ल 26.03.1969 to 28.01.1972 11 श्री प्रकाश चन्द्र सेठी 29.01.1972 to 22.03.1972 12 श्री प्रकाश चन्द्र सेठी 23.03.1972 to 22.12.1975 13 श्री श्यामाचरण शुक्ल 23.12.1975 to 29.04.1977 राष्ट्रपति   शासन 30.04.1977 to 25.06.1977 14