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जनवरी, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हिन्दयुग्म "आवाज" ओल्ड इज़ गोल्ड वार्षिक संगीतमाला २०१०--भाग 7

वार्षिक गीतमाला १ से ४ तक सुनिये यहाँ  वार्षिक गीतमाला ५ सुनें यहाँ वार्षिक गीतमाला ६ सुनें यहाँ सुनिये वार्षिक गीतमाला २०१० ओल्ड इज़ गोल्ड ----- हिन्दयुग्म "आवाज" पर प्रकाशित श्रंखला का भाग ७----

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्‍जी-धज्‍जी रात मिली

रेडियोवाणी पर मिली इस प्रस्तुति के लिये भाई युनुस का आभार ही कहूंगा मीना  कुमारी के सुर  खैयाम साहब के संगीत संयोजना में टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्‍जी-धज्‍जी रात मिली जिसका जितना आंचल था, उतनी ही सौग़ात मिली । जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज़ सुनी जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली । मातें कैसी, घातें क्‍या, चलते रहना आठ पहर दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी फिर साथ मिली । और अब एक पेशक़श यहां भी  खैयाम साहब  आज़ शाम खैयाम साहब को सुनने जाना है तरंग हाल में बिखरेंगी सुर लहरियां हम भी होंगे तरंगित तरंग में और फ़िर देर रात आपसे मुलाक़ात कराना है रात दस बजे प्रोफ़ेसर मटुकनाथ से

जी यशवंत सोनवाने को व्यवस्था ने मारा है

       आत्म केंद्रित सोच स्वार्थ और आतंक का साम्राज्य है.चारों ओर छा चुका है  अब तो वो सब घट रहा है जो  इस जनतंत्र में कभी नहीं घटना था.  कभी चुनाव के दौरान अधिकारी/कर्मचारी  की हत्या तो कभी कर्तव्य परायण होने पर . भारतीय प्रजातंत्र में निष्ठुर एवम दमनकारी तत्व की ज़हरीली लक़ीरें साफ़ तौर पर नज़र आ रहीं हैं.. ब्यूरोक्रेसी की लाचार स्थिति, हिंसक होती मानसिकता, हम किस ओर ले जा रहे हैं विकास का रथ. कभी आप गांवों में गये हैं. ज़रूर गये होंगे   जनता की भावनाओं से कितना खिलवाड़ होता है देखा ही होगा. लोगों की नज़र में सरकारी-तंत्र को भ्रष्ट माना जाता है यह सामान्य दृष्टिकोण है.किंतु सभी को एक सा साबित करना गलत है. सामान्य रूप से सफ़ल अधिकारी उसे मानतें हैं जो येन केन प्रकारेण नियमों को ताक़ पर रख जनता के उन लोगों का काम करे जो स्वम के हित साधने अथवा बिचौलिए के पेशे में संलग्न है. यदि अधिकारी यह नही करे तो उसके चरित्र हनन ,मानसिक हिंसा, प्रताड़ना और हत्या तक पर उतारू होते हैं.     खबर ये है कि "मालेगांव के एडीएम यशवंत सोवानणे को तेल माफिआओं ने जिंदा जला दिया है। एडीएम का कसूर सिर्फ इतना था कि वो प

बदल दो व्यवस्था की बयार फिर मनाओ हर बरस ये त्यौहार

  अर्चना जी के स्वर में  प्रेरक गीत  =>                                                                भारतीय जन तुम प्रभावों से हटकर                                                            अभावों से  डटकर करो  मुक़ाबला. उन्हैं लगाने दो मेले करने दो व्यक्ति पूजा ये उनका पेशा है तुमने कभी कोई ज़िन्दा-इन्सान देखा है ? मैं तुमको इस पर्व की शुभ कामनाएं कैसे दूं मुर्दों से संवादों  की ज़ादूगरी से अनभिज्ञ पर यह जानता हूं कि तुम इनके नहीं शहीदों के ऋणी हो ये भिक्षुक तुम इनसे धनी हो बदल दो व्यवस्था की बयार फिर मनाओ हर बरस ये त्यौहार इनके पीछे मत भागो जागो समय आ गया है जागने का जगाने का  ज़िंदा हो इस बात का आभास दिलाओ      मैं शुभकामना की मंजूषा लिए  खड़ा शायद तुमको ही दे दूं  " शुभकामनाएं" अभी तो शोक मना लूं यशवंत सोनवाने का

फ़त्ते जी को तलाक की राह मिल गई

शीला जी फत्ते जी मेरे अभिन्न मित्र हैं कई दिनों के बाद मुलाक़ात हुई सो बस चुहल की गरज से अपने राम ने छेड़ दिया उनको . पूछ लिया उनकी नई प्रेमिका के बारे में. पूछा क्या बता कि मिस शीला सच बहुत प्यार करतीं हैं आपसे !  '' जी सच है उनको मुझसे बहुत प्रेम है हो भी क्यों न हम भी तो उनसे बहुत प्रेम करते है , विपरीत के बीच आकर्षण तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया अब आप ही बताएं. कोई झूठ तो नहीं होगी मेरी बात ? जी सही है ....! आप झूठ बोलते ही कहाँ हैं ? तो अब बताएं ज़नाब कब मिले थे उनसे ? ''क्या बताऊँ भाई, बीबी से अनबन क्या हुई हमने बहाना किया कि सरकारी टूर पे जाना है और बस चले गए उनके नशेमन में '' फ़त्ते जी का स्वप्न कल रात से उनके पास ही थे हम . ? खूब आदर सत्कार हुआ होगा ? जी, बहुत.. मेरा ख़ास ख़याल रखा उनने . खूब बातें हुईं . ग़ज़ल शायरी सब कुछ सुनी सुनाएँ हमने उनको और उनने हमको. जी ये तो हुआ ही होगा. बताएं कुछ खिला-पिलाया के बस भूखे टल्ला रहे हो..? ''अरे मुकुल भाई , क्या बात करते हो, लज़ीज़ खाना था और हाँ मालूम है डिनर पर लंच में,सुबह शाम के नाश्ते के दौरान वे ह

सबने कहा ज़िगरे वाले इंसान हैं समीर लाल

पूरब का जात्री पश्चिम की रात्री ’देख लूँ तो चलूँ’ के विमोचन समारोह : दिनांक 18/01/२०११ आधिकारिक रपट  (देर के लिये माफ़ी नामा सहित )              उस दिन किसी ने कहा   देश विदेश में ख्याति अर्जित करेगी किताब , तो किसी ने माना जिगरा है समीर में ज़मीन से जुड़े रहने का , तो कोई कह रहा था वाह अपनी तरह का अनोखा प्रवाह है . किसी को किताब बनाम उपन्यासिका - ’ ट्रेवलाग ’ लगी तो किसी को रपट का औपन्यासिक स्वरूप किंतु एक बात सभी ने स्वीकारी है कि : ’ समीरलाल एक ज़िगरे वाला यानि करेज़ियस व्यक्ति तो है ही लेखक भी उतना ही ज़िगरा वाला है …!’        जी हां , यही तो हुआ समीरलाल की कृति ’देख लूँ तो चलूँ’ के विमोचन समारोह के दौरान  दिनांक 18/01/2011 के दिन कार्यक्रम के औपचारिक शुभारम्भ में अथितियों स्वागत पुष्पमालाओं से किया गया फ़िर शुरु हुआ क्रमश : अभिव्यक्तियों का सिलसिला सबसे पहले आहूत किये गये समीर जी के पिता श्रीयुत पी०के०लाल जिन्हौंने बता दिया कि -’ हां पूत के पांव पालने में नज़र आ गये थे जब बालपन में समीर ने इंजिनियर्स पर एक तंज लिखा था . श्रीमति साधना लाल को जब आहूत किया तो पता चला कि वे इस बात के