24.4.14

निर्लिप्त जननायक को भी नेपथ्य में ले जाने की क्षमता वाले लोग मौज़ूद हैं. : सुलभा बिल्लोरे

               
[इस आलेख में मेरे स्वम के विचार हैं ब्लाग के स्वामी से इस आलेख का कोई लेना देना नहीं है ]
                      आज़ ही किसी ने वाट्स-अप पर एक ज़बरदस्त कोटेशन भेजा ... " उच्च स्तरीय सोच वाले   नित नूतन रास्ते तलाशते हैं.. सफ़लता के लिये सहज  और और सरल पथ क्या हों.. मध्यम स्तर की सोच वाले घटनाओं के विन्यास में व्यस्त होते हैं जबकि सामान्य सोच वाले केवल किसी व्यक्ति की प्रसंशा अथवा निंदा में डूबे रहते हैं…!!"
  आज़कल तीसरी श्रेणी के लोगों की भरमार है. लोग एक दूसरे के छिद्रांवेषण में इतने मशगूल हो जाते हैं कि उनको अच्छा बुरा सब एक सा नज़र आता है. बोलते हैं तो इस तरह कि बोल नहीं रहे बल्कि जीभ से ज़हर बो रहे हैं.. और ये स्थितियां देश में सियासी मंचों पर बाक़ायदा आप हर अतरे-दूसरे दिन देख सुन रहें हैं. मित्रो जो दिमागों में होता है वो  दिलों के रास्ते दुनियां तक आसानी से संचरित हो जाता है.
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और फ़्रांस की   क्रांति ( French Revolution1789-1799)  सामंती आचरण के विरुद्ध उपजी  थी जबकि स्वातंत्र्योत्तर भारत की परिपक्व होती  प्रजातांत्रिक व्यवस्था में  भारत को ऐसी किसी नकारात्मक राजनैतिक विद्रूपता की आवश्यकता नहीं है जो हिंसा,घृणा तक  सत्ता के व्यामोह में फ़ंस कर किसी भी हद गिरा जावे . किंतु सत्ता का चिरयौवन किसे सम्मोहित न करेगा यही सम्मोहन चिंतन पर सहज़ ही विपरीत प्रभाव डालता है जिसकी परिणिती बेलग़ाम अभिव्यक्ति के रूप में अवतरित होती है. यहां यह कहना आवश्यक है कि  क्रियेशन के लिये आवश्यकतानुसार विध्वंस आवश्यक है.. यानि हर पुनर्रचना को विध्वंस की ज़रूरत नेहीं होती . 
     कल जब आज़ का दौर इतिहास होगा तब  अन्ना हज़ारे का अभ्युदय फ़िर अचानक नेपथ्य में जाना आकस्मिक दुर्घटना ही माना जावेगा . इसके तथ्यांवेषण में एक नहीं कई  नाम शामिल किये  जावेगें जो अन्ना की सामाजिक क्रांति को सियासत के छोर तक ले जाने के मोहपाश में आज़ नज़र आ रहे हैं.  यानी आज़ जन समुदाय की क्रांति को आधार देने वाले निर्लिप्त जननायक को भी नेपथ्य में ले जाने की क्षमता वाले लोग मौज़ूद हैं.   जहां तक सेक्यूलरिज़्म का सवाल है सेक्यूलर होने का दावा करने वाली पार्टियां खुद एक धर्म विशेष को अछूत बनाने में पीछे क़तई नहीं रहतीं . शाज़िया का ये कथन सुन के आप खुद ही फ़ैसला कीजिये कि क्या शाज़िया सही हैं..जो प्रोवोग करतीं नज़र आ रहीं हैं 

19.4.14

चावल के दानों पर हुए अत्याचार का प्रतिफ़ल: पोहा उर्फ़ पोया...

गूगल बाबा के पास है पोहे का अकूत भंडार 
दिनेश को अपनी बारी का इंतज़ार है..
 हम  डिंडोरी जाते समय इसी महाप्रसाद 
यानि पोहेका सेवन करते हैं सुबह-सकारे..!!
 मित्रो पोएट्री जैसे मेरा प्रिय शगल है ठीक उसी तरह मेरे सहित बहुतेरे लोगों का शौक सुबह सकारे पोहा+ईट= पोहेट्री है.  पो्हे के बारे  गूगल बाबा की झोली  किसम किसम की रेसिपी और सूचनाएं अटी पड़ी है. पर एक जानकारी हमने खोजी है जो गूगल बाबा के दिमाग में आज़ तलक नईं आई होगी कि हम बहुत निर्दयी हैं.. क्योंकि  हम चावल Rice के दानों पर हुए अत्याचार के प्रतिफ़ल पोहे सेवन कितना मज़ा ले लेकर करतें हैं.  जैसे ही ये भाव मन में आया तो मन बैरागी सा हो गया. किंतु दूसरे ही क्षण लगा बिना अत्याचार के हम अन्नजीवी हो ही नहीं सकते सो मन का वैराग्य भाव तुरंत ऐसे गायब हुआ जैसे किसी सरकारी  के मन से ऊपरी आय से घृणा भाव तिरोहित होता है. अस्तु ..आगे बांचिये . पोहा जबलईपुर में खासकर करमचन्द चौक पर सुबह-सकारे मिलता है तो  इंदोर (इंदौर) में किसिम किसिम के पोए चौराए चौराए (चौराहे-चौराहे) मिलते हैं. हम अपनी मौसेरी बहन के घर पहुंचे तो हमको सेओं-पोया,कांदा-पोया,आलू-पोया, पोया विद ग्रीन-मैंगो, न जाने  कितने कितने  स्वाद भरे पोए (पोहे) खिलाए सुधा ताई ने. 

                अंतर्ज़ाल की सुप्रसिद्ध लेखिका अर्चना चावजी से हम अनुरोध करने वाले थे कि वे "पोहे के सर्वव्यापीकरण : विशेष संदर्भ इन्दोर "  पर एक ललित नि:बंध लिखें.. पर वे नानी बन गईं हैं अपनी इस पदोन्नति से वे अति व्यस्ततम स्थिति में हैं अतएव अधिक अपेक्षा ठीक नहीं सो सुधिजन जानें कि- हम अपने बेहतर अनुभव के आधार पर दावे के साथ यह तथ्य प्रतिपादित करतें हैं कि भारतीय वोटर और इंदोरी पोहा एक ही गुणधर्म वाले हैं.. जिसके साथ भी मिलते हैं ठीक उसी में समाविष्ट हो स्वादिष्टतम बनने की सफ़ल कोशिश कर ही लेते हैं. किंतु असर अपनी इच्छानुसार ही छोड़ते हैं. भाई समीरलाल जी- कित्ते बरस हो गए कनाडा गए ..  कनाडा से जबलपुर  तीन बरस आय थे न बड्डा  .. पर न तो करमचंद चौक वाले पोहे का ठेला लगना बंद हुआ न ही सुबह सवेरे मनमोहन टी स्टाल इंद्रा-मार्केट के समोसों का साइज़ ही कम हुआ. इतना ही नहीं गोपाल होटल वाला मिल्क-केक जो आप अंकल के लिये डाट न पड़े इस चक्कर में ले जाते थे उसका ही स्वाद बदला है.  भाई इंडिया में बदलाव आसानी से नहीं आते .. चीजे बदल भी जावें तो अचरज़ न कीजै.. बस होता यूं है कि "बाटल" बदल जाती है. हिस्ट्री उठा के देख लीजिये ... न तो जबलईपुर में कोई खास बदलाव आया न हीं इन्दोर के पोये में.. अब प्रदेश के इन दो महानगर (?) में खास बदलाव नहीं हुए तो जान लीजिये देश में भी ऐसा कुछ नया न हो जावेगा जैसा केज़रीकक्का खांस- खखार के कहते फ़िर रए हैं.  
              चोरी, डकैती, बदमासी, उल्लू-बनाविंग योजनाएं, आदि आदि सर्वत्र यथावत हैं. सबका एजेंडा एक ही है कि किसे किस तरह और कित्ता उल्लू बनाया जावे. 
       चलो सोया जावे........... फ़िज़ूल में कुछ भी अनाप-शनाप लिखा गया... आज़ पोहे से शुरू कथा का अंत किधर किया आप भी मुझ पर हंस रहे होंगे.. पर सुधि पाठको जब आप दिन भर खबरों में लोगें को अनाप-शनाप कहते -सुनते हैं तो इत्ता सा अनाप-शनाप मेरा पढ़ लिया तो कोई बुराई है क्या..... ??

15.4.14

मुझे ऐसा मोक्ष नहीं चाहिये

हां मां सोचता हूं 
मुझे भी मुक्ति चाहिये.. 
वेदों पुराणों ने 
जिसे मोक्ष  कहा है..!
कहते हैं कि 
सरिता में अस्थियों के प्रवाह से 
मुक्ति मिलती है.... 
औरों की तरह मेरी अस्थियां भी
सरिता में प्रवाहित होंगी..?
मां,
तुम्हारे पावन प्रवाह को मेरी अस्थियां 
दूषित करेंगी
न मुझे ऐसा मोक्ष नहीं चाहिये
बार बार जन्म लेना चाहता हूं
तुम्हारे तटों को बुहारने 
तुमको पावन सव्यसाची मां कह के पुकारने
मुझे जन्म लेना ही होगा.. 
मुक्ति मोक्ष न अब नहीं.. 
बस तेरे सुरम्य तटों पर 
जन्मता रहूं..
बारंबार ......
कोल-भील-किरात- मछुआ 
मछली- पक्षी- कछुआ 
कुछ भी बनूं सुना है....
तेरे तट में 
सब दिव्य हो जाते हैं... 
मां... रेवा.... सच यही मोक्ष है न........




बेलगाम वक्ता मुलायम सिंह जी उर्फ़ नेताजी


https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEglopmFyeOELOZABWW-kuwdCbHwbD-VTLqZLze_Jtt-64Xi7AxVL8IyW94kp6UDGRuac3BkDP0LNlLCPHF2GyMcN5Hze-1-hh-2w21UlddVwZy9HmbtRFKxgsF1QEPIFJ1TxNYTzg8cr-B_/s1600/1175483985.jpg
http://hindi.cri.cn/mmsource/images/2006/04/07/lunyi4.jpghttp://www.bbc.co.uk/hindi/images/pics/eunuch150.jpg                जो दु:खी है उसे पीड़ा देना सांस्कृतिक अपराध नहीं तो और क्या है. नारी के बारे में आम आदमी की सोच बदलने की कोशिशों  हर स्थिति में हताश करना ही होगा. क़ानून, सरकार, व्यवस्था इस समस्या से निज़ात दिलाए यह अपेक्षा हमारी सामाजिक एवम सांस्कृतिक विपन्नता के अलावा कुछ नहीं. आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति" ने अपने आलेख में इस समस्या को कई कोणों से समझने और समझाने की सफ़ल कोशिश की है. मुक्ति अपने आलेख में बतातीं हैं कि हर स्तर पर नारी के प्रति रवैया असहज है. आर्थिक और भौगोलिक दृष्टि से भी देखा जाए तो नारी की स्थिति में कोई खास सहज और सामान्य बात नज़र नहीं आती. मैं सहमत हूं कि सिर्फ़ नारी की देह पर आकर टिक जाती है बहसें जबकी नारी वादियों को नारी की सम्पूर्ण स्थिति का चिंतन करना ज़रूरी है. परन्तु सामाजिक कमज़ोरी ये है कि हिजड़ों पर हंसना, लंगड़े को लंगड़ा अंधे को अंधा  कहना औरत को सामग्री करार दिया जाना हमारी चेतना में बस गया है  जो सबसे बड़ा सामाजिक एवम सांस्कृतिक अपराध  है .
                    आप सभी जानते हैं कि  औरतों, अपाहिजों,हिज़ड़ों को हर बार अपने आपको  को साबित करना होता है. कि वे देश के विकास का हिस्सा हैं.. अगर इस वर्ग को देखा जाता है तो तुरंत मन में संदेह का भाव जन्म ले लेता है कि "अरे..! इससे ये काम कैसे सम्भव होगा.....?" सारे विश्व में कमोबेश ऐसी ही स्थिति है.. .. सब अष्टावक्र रूज़वेल्ट को नहीं जानते, सबने मैत्रेयी गार्गी को समझने की कोशिश कहां की. यानी कुल मिला कर सामाजिक सांस्कृतिक अज्ञानता और इससे विकास को कैसे दिशा मिलेगी चिंतन का विषय है.
                       इससे आगे मुलायम सिंह जी उर्फ़ नेताजी  का चिंतन आज़ के दौर में एक  दोयम दर्ज़े का घटिया और गलीच चिंतन है. गुंडों को (कदाचित चुनाव जीतने के यंत्रों को) बचाने नेताजी का बयान दुख:द घटना है. पर उनके इस चिंतन पर गोया उनका भूत तारी है. शायद उनके पिता ने यही कह उनको माफ़ी दे दी होगी.
                      किसी मूर्ख अधिकारी के मुंह से सुना-"कमज़ोर पेदा होता ही मर जाने के लिये..!" यानी दमन के लिये प्रेरक ऐसी अवधारणाओं को लेकर मुलायम सिंह जैसे कठोर एवम  कुत्सित विचारक अगर बोलते हैं तो सामंती दौर का अहसास किया जा सकता है. सच कितना कढ़वा बोलते हैं लोग इतना सोच लें कि उनके  घरों में नारीयां भी हैं तो शायद गलीच वाक्य न बोल पाते . आने वाले कल को किसने देखा न जाने उनकी आने वाली पीढ़ी जब अपने ऐसे दुराग्रही पूर्वज़ों के बारे में सोचेगी तो क्या सोचेगी .......
 खैर..... सब मुलायम की तरह कठोर और कुंठित  नहीं होते... चलिये आप हम अपनी सोच को पावन बनाएं रखें.. हिज़ड़ों से शुभकामनाएं लें....अपाहिज़ों के अंतस में उर्ज़ा का संचरण करें.. औरतों का सम्मान करें      
(चित्र साभार : लखनऊ ब्लागर एसोसिएशन ,CRI एवम BBC  से )

14.4.14

सक्षम चिरंजीवी भव:

इन दिनों हमारे नेता सक्षम जी खूब मज़े ले रहे हैं सियासत के भी सियासियों के भी पेशे से तो सक्षम जी मस्ती के थोक व्यापारी हैं.. पए इनका बिज़नस  अन्य से अलहदा है.कल की ही बात है... माइक मिला तो बस लगे हाथ में लेके कुछ कुछ बोलने .. मानो बोल रहे हों -" प्यार कैसे किया जा सकता है इस अंटी से पूछो ...!" बेचारे सक्षम जी क्या जाने ये क्या सभी ऐसेइच्च तो करतीं हैं.. हम सारे पति टाइप के लोगों की औक़ात इससे ज़्यादा कहां..? बताओ भला .. आप पार्टी के बाद ऐसा असर हुआ कि झाड़ू इकदम स्टार बन गई.. आव देखा देखा न ताव वो तो एक दिन हम पे ही तन गई. 
  फ़िर एकाएक चुप हो गये वे टी.वी. देख देख के जान चुके हैं कि - हिंदुस्तान में सारे फ़साद की जड़ में माइक का बड़ा भारी योगदान है.. ! अस्तु सक्षम जी माइक को कच्चा चबा जाने के गुंताड़े में लग गये एन वक़्त पे सामाजिक संस्था के कर्ताधर्ता ने सक्षम जी को समझाया-"न बेटे ऐसा नहीं करते लो सौंफ़ खाओ.. !!"

         सौंफ़ के शौकीन भाई सक्षम ने सौंफ़ मुट्ठी भरी और मुंह में दस पच्चीस दाने मुंह में गये होंगे बाक़ी केज़री कक्का वाली दिल्ली सरकार सरीखे बिखर गए ज़मीन पर . और कोई होता तो ज़मीन से उठा के खाने लगता पर अपने सक्षम जी सरकार ओह सारी सौंफ़ का एक भी दाना ज़मीन से उठाया नहीं फ़िर डब्बे में हाथ घुसेड़ा और एक मुट्ठी फ़िर .. फ़िर वही हुआ तब तक किसी ने उनको ढोलक दिखा दी.. भाई ने पास पड़े काडलैस माइक से बज़ाने का असफ़ल प्रयास किया किसी ने टोका-"बेटे, हाथ से बजाओ.."
            ढोलक बजी पर उत्ती तेज़ नहीं.. बच्चे का हाथ बच्चे का ही होता है.. आप रोजिन्ना अखबारों समाचारों में देख ही रहे हैं .. राहुल बाबा के हाल.. ढुलकिया बज़ा ही नईं पा रए .. बताओ.. भला बच्चों से ढोलक बजी है कभी. 
  अर्र ये क्या कहानी बताते बताते हम राहुल बाबा तक आ गए .. माफ़ करना भाई ग़लती से गलती हो गई.. कोई सियासी लेख थोड़े न लिख रहे हैं हम पर आज़ कल उपमाओं  की तलाश में हमने खबरिया उर्फ़ ज़बरिया चैनल’स पर खबरों की बौछार की वज़ह से मिली निकटतम उपमाओं का स्तेमाल कर लिया माफ़ करना सुधि पाठको.. 
हां तो हम कह रए थे कि-" अर्र, भूल गये क्या कह रए थे.. ?".. हां याद आया सक्षम जी ने ढोलक बजाई.. फ़िर क्या हुआ... किस्सा गो... अरे भाई फ़िर क्या कुछ नहीं हम सब वापस आ गए ... अपने अपने घर मस्तीखोरी के होलसेल डीलर सक्षम से मिल के .. अभी तक उसकी शैतानियां याद आ रहीं हैं.. सक्षम मेरे भांजे अमित जोशी का बेटा है.. चिरंजीवी भव:  

12.4.14

महिला वोटर्स में 12.21% की बढ़त जबकि मात्र 7.31% पुरुष वोटर्स बढ़े

भारतीय जनतांत्रिक व्यवस्था अब एक रोचक नुक्कड़ तक जा पहुंची है.. जहां से एक रास्ता जाता दिखाई देता है प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था के शिखर पर पहुंचने का तो दूसरा आत्मविश्वास से लबालब जनतंत्र के मुख्य बिंदू यानी "वोटर" की "आत्मविश्वासी-पहल" तक जाने का. दौनों ही रास्ते पाज़िटिविटी से लबालब हैं ... ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अब मतदाता आत्मशक्ति से भरा पूरा नज़र आ रहा है.
         वोट अब कीमती इस लिये भी है कि वोटर ने उसकी ताक़त को पहचान लिया. इस पहचान से परिचित कराने का श्रेय भारत के शक्तिवान निर्वाचन आयोग को देना भी गलत फ़ैसला नहीं है. मध्य-प्रदेश के आंकड़ों को देखिये पिछले लोकसभा चुनाव के सापेक्ष 09.71% वोटों का इज़ाफ़ा हुआ . और महिलाओं ने अपना पोलिंग परसेंट बढ़ाकर 12.21% जबकि पुरुष वोटर्स मात्र 7.31%  की वृद्धि दर्ज कर पाए. 
प्रथम चरण में ग्रीन ज़ोन में जिन ज़िलों को रखा जाता है वो बेशक सराहना के पात्र हैं
छिन्दवाड़ा
81.08
76.89
79.05
होशंगाबाद
71.11
59.65
65.76
मण्डला
69.21
64.08
66.68
बालाघाट
69.14
67.04
68.1

शहडोल, सतना और जबलपुर, जिलों को पीले ज़ोन में रखा जा सकता है... 
शहडोल
65.6
58.57
62.2
सतना
64.82
60.28
62.68
जबलपुर
62.2
54.48
58.53

सबसे पीछे रहने वाले ज़िलों में रीवा, सीधी जिले रहे जिनको लाल क्षेत्र में वर्गीकृत किया है
रीवा
55.84
51.58
53.84
सीधी
59.72
53.67
56.86

जिन जिलों में महिलाओं ने पोलिंग में कम हिस्सेदारी दिखाई उनका वोटिंग प्रतिशत भी कम ही रहा. 

क्यों बढ़ा मतदान का प्रतिशत ?

           वोटिंग के बाद अचानक सभी आश्चर्य चकित हैं कि क्या हुआ कि अचानक मतदान के प्रतिशत में एकाएक वृद्धि हो गई. बात दरअसल ये थी कि निर्वाचन आयोग का लक्ष्य था कि कम से कम दस फ़ीसदी इज़ाफ़ा हो. इस लक्ष्य को लेकर 

नीरो नै पीरो न लाल रंग ले अपनई रंग में ..!!


नीरो नै पीरो न लाल
रंग ले अपनई रंग में ..!!
*********
प्रीत भरी पिचकारी नैनन सें मारी
मन भओ गुलाबी, सूखी रही सारी.
हो गए गुलाबी से गाल
रंग ले अपनई रंग में ..!!
*********

कपड़न खौं रंग हौ तो रंग   छूट  जाहै

तन को रंग पानी से तुरतई मिट जाहै
सखियां फ़िर करहैं सवाल-
रंग ले अपनई रंग में..!!
*********




प्रीत की नरबदा मैं लोरत हूं तरपत हूं
तोरे काजे खुद  सै
रोजिन्ना  झगरत हूं
मैंक दे नरबदा में जाल –
रंग ले अपनई रंग में..!!
********


मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
जन्म- 29नवंबर 1963 सालिचौका नरसिंहपुर म०प्र० में। शिक्षा- एम० कॉम०, एल एल बी छात्रसंघ मे विभिन्न पदों पर रहकर छात्रों के बीच सांस्कृतिक साहित्यिक आंदोलन को बढ़ावा मिला और वादविवाद प्रतियोगिताओं में सक्रियता व सफलता प्राप्त की। संस्कार शिक्षा के दौर मे सान्निध्य मिला स्व हरिशंकर परसाई, प्रो हनुमान वर्मा, प्रो हरिकृष्ण त्रिपाठी, प्रो अनिल जैन व प्रो अनिल धगट जैसे लोगों का। गीत कविता गद्य और कहानी विधाओं में लेखन तथा पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन। म०प्र० लेखक संघ मिलन कहानीमंच से संबद्ध। मेलोडी ऑफ लाइफ़ का संपादन, नर्मदा अमृतवाणी, बावरे फ़कीरा, लाडो-मेरी-लाडो, (ऑडियो- कैसेट व सी डी), महिला सशक्तिकरण गीत लाड़ो पलकें झुकाना नहीं आडियो-विजुअल सीडी का प्रकाशन सम्प्रति : संचालक, (सहायक-संचालक स्तर ) बालभवन जबलपुर

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