संदेश

फ़रवरी, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मां यह चादर वापस ले ले...!

चित्र
माँ खादी की चादर ले ले माँ, कभी स्कूल में टीचर जी ने मुझे सिखाई थी मां खादी की चादर दे दे मैं गांधी बन जाऊंगा। उन दिनों यह कविता मुझे एक गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में सुनानी थी। शायद मैं  चौथी अथवा पांचवी क्लास में पढ़ता था कुछ अच्छे से याद नहीं है। बहुत दिनों बाद पता चला कि मुझे गांधी एक सीमा के बाद गांधी नहीं बनना है। गांधी जी के शरीर में एक पवित्र आत्मा का निवास था यह कौन नहीं जानता। बहुत दिनों तक खादी और चादर में उलझा रहा। चरखा तकली हाफ खाकी पेंट  वाली सफेद बुशर्ट गांधी बहुत दिन तक दिमाग पर इसी तरह हावी थे अभी भी हैं।      गांधी बनने के बाद बहुत दिनों तक मूर्ख बुद्धू बनकर शोषित होते रहना जिंदगी की गोया नियति बन गई हो।   जलियांवाला बाग सुभाष चंद्र बोस सरदार भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद यह सब तो बहुत बाद में मिले। उम्र की आधी शताब्दी बीत जाने के बाद उम्र के आखिरी पड़ाव में आकर यह सब मिल पाए हैं।      अहिंसा परम धर्म है इसे अस्वीकृत नहीं करता कोई भी। सभी इसे परम धर्म की प्रतिष्ठा देते हैं और जिंदगी भर देते रहेंगे यह सनातनी परंपरा है ।     परंतु हर दुर्योधनों को

धर्म को रिलीज़न मत कहो , डिक्शनरी में बदलाव ज़रूरी है !

चित्र
"धर्म की परिभाषा को आधिकारिक रूप से समझने  की ज़रूरत"            गिरीश बिल्लोरे मुकुल      girishbillore@gmail.com       भारत को धार्मिक होना चाहिए या आध्यात्मिक..? यह सवाल बहुत लोग करते हैं !   इन समस्त सवालों से पहले धर्म शब्द की परिभाषा तय होनी चाहिए । डिक्शनरी में तो सम्प्रदाय को धर्म कहा जाता है ।      परंतु एक तथ्य यह भी है कि भारत में मौजूद व्यापक विश्लेषण के साथ साथ धर्म की परिभाषा को उसके स्वरूप के माध्यम से  समझने के बावजूद ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में उसे रिलीजन ही लिखा है ! धर्म की परिभाषा महर्षि गौतम ने दी है.. जो धारण करने योग्य हो वह धर्म है !      क्या इस परिभाषा को समग्र रूप से स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए? अवश्य मिलनी चाहिए क्योंकि यह परिभाषा सुनिश्चित करने के लिए सुव्यवस्थित  तथा स्थापित  सत्य एवं तथ्य है।   मूल रूप से धर्म की परिभाषा  का और अधिक गहराई से  अध्ययन कर विश्लेषण किया जाए तो ज्ञात होता है कि [  ] भौतिक रूप से प्राप्त शरीर और उसको संचालित करने वाली ऊर्जा जिसे प्राण कहा जा सकता है के द्वारा... [  ] धारण करने योग्य को ही

गीत सरस्वती पूजन

चित्र
ज्ञान की अविरल प्रवाहिनी नमन है हे वीणा वादिनी ।। गीत स्वर ध्वनि सब अपूरण- बिन तेरे माँ हंस वाहिनी ।। मन के कागज़ पे लिखूँ क्या कृपा का यदि व्योम न हो ? कंठ  को माधुर्य कैसे मिले - शारदा का आह्वान न हो ।। हर कला अरु विधाओं की मातु तुम प्रतिपादिनी ।। *सरस्वती पूजन के अवसर पर शत-शत नमन* गिरीश बिल्लोरे मुकुल

नक़ारने के निराले अंदाज

चित्र
सत्य को नकारने के अपने-अपने निराले अंदाज हुआ करते हैं। और इन दिनों यह बीमारी तेजी से लोक व्यापी होती जा रही है। इसके पीछे कुछ अस्तुरे हैं जिनको न्यू मीडिया के वेरिएण्टस कह सकते हैं..!     न्यू मीडिया यानी सोशल मीडिया टि्वटर फेसबुक व्हाट्सएप आदि आदि ब्लॉग्स, माइक्रो ब्लॉगिंग,  ऑडियो और पॉडकास्ट वीडियो ब्लॉगिंग।   इन सब का प्रयोग पॉजिटिव होगा यह मान के इन्हें विकसित किया जाता रहा है। परंतु प्रचुर मात्रा में उपलब्ध संसाधनों का दुरुपयोग प्रचुरता से ही किया जाता है यह स्वयं सिद्ध सिद्धांत है। जब इंटरनेट नहीं था तब इनकी जरूरत भी नहीं थी और जब इंटरनेट आया तो इनके बिना जीवन की कल्पना भी मुश्किल है। नार्थ कोरिया में जनता को यह नहीं मालूम कि इंटरनेट का विश्व में किस तरह इस्तेमाल हो रहा है। चीन में भी लगभग ऐसा ही कुछ माहौल है। परंतु वहां सोसाइटी पर मनोरंजन के लिए किसी तरह का नकारात्मक प्रतिबंध नहीं है। परंतु इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि-"सत्य उजागर न हो..!"    पश्चिमी देश दक्षिण एशिया के देश इंटरनेट सर्विसेज का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। और इस बीच

किसान आंदोलन का आयतन

चित्र
चिंता मत कीजिए किसान आंदोलन को लेकर । हठ का अर्थ क्या होता है यह आप बेहतर तरीके से समझ सकते हैं, शायद अब तक समझ भी चुके होंगे। अगर आप आंदोलन के स्तर की ओर जाएं तो आप पाएंगे की प्रारंभिक दिनों में यह आंदोलन कैनेडियन सपोर्ट से चलता रहा।  इससे इंकार इसलिए कोई नहीं कर सकता क्योंकि 26 जनवरी तक उन्होंनेे जो तथा वह उनकी द्वारा कर लिया गया। तिरंगे के साथ  पंथ का झंडा लगाकर  सरकार को कुछ ऐसा करने आंदोलनकारियों के मुख्य रणनीतिकार का मुख्य उद्देश्य था कि - भारत सरकार ऐसा कोई कठोर कदम उठा ले जोो गणतंत्र के लिए एक धब्बा बन जाए और उसे ना केवल भारतीय बल्कि विश्व स्तर पर प्रचारित किया जा सके।  लेेेेकिन उस दिन अर्थात 26 जनवरी 2021 को दिल्ली पुलिस के जवानों ने अद्भुत धैर्य रखा और अपने आप को चोटिल भी करवा लिया  लेकिन  प्रतिक्रिया स्वरूप  कोई भी ऐसी कार्यवाही नहीं की जिससे कि रणनीतिकार सफल हो जाएं।   अंततोगत्वा स्थिति यह बनी की अब किस तरह की टूल का इस्तेमाल किया जाए? मेरी राय में आप उस दृश्य की कल्पना कीजिए जो वीडियो के रूप में मौजूद है। एक इनोसेंट आंदोलन कर्ता

रामराज साम्यवाद और भारत

चित्र
मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता के बीच एक चेतना है जो दर्शन का मूलाधार है । चेतना वर्ग विहीनता का आधार है । चेतना की पृष्ठभूमि के घनत्व में जो चिंतन होता है वह स्वाधिकार  के साथ समष्टि के अधिकारों की मौजूदगी का आभास कराता है ।        किसी पर कुछ भी मत लादो पंथ वर्ग में मत बांधों । जो जैसा है उसे वैसा ही रहने दो उसके अधिकारों पर अतिक्रमण मत कौए की तुलना कोयल से मत करो । कोयल को काग के अनुकरण एवम अनुशरण की सलाह देना चाहते तो निरे मूर्ख हो। गाय का दूध बकरी के दूध का समानार्थी हो सकता है विकल्प भी है पर वो गाय के स्तन से निकला गाय का दूध नहीं है । उसे जो है वह रहने दो । अगर बलात बदलाव करोगे तो मूर्खता होगी । कुल मिलाकर किसी को बदलने की ज़रुरत क्या है। अतएव दर्शन का मूल तत्व  है कि मानव जीवन आत्मोन्नति के लिए है ।         वामपंथ कहता है पदार्थ श्रेष्ठ है, सनातन की व्याख्या है... पुरुषार्थ से अर्जित पदार्थ के साथ उपभोक्ता को आत्मोन्नति का अभ्यास करना ही होगा । वाम ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार करता है । दैहिक संपृक्ति के साथ आत्मज्ञान के सहारे  सनातन ईश्वर से अंतिम मिलन का पथ  स्वीकार क

अगर कुंठित है तो क्या आप आध्यात्मिक हैं? कदापि नहीं,

चित्र
अगर कुंठित है तो क्या आप आध्यात्मिक हैं? कदापि नहीं, धर्म अध्यात्म दर्शन सब कुछ वस्तु वाद को प्रवर्तित नहीं करता। ना ही वस्तु वाद से सनातन का कोई लेना देना है। सनातन इस बात की अनुमति देता है कि- हम आप वसुधैव कुटुंबकम की विराट कांसेप्ट को अंतर्निहित करें। किसी का भी गलत स्केच बनाना यानी उसको गलत तरीके से पोट्रेट करना मलिनता की निशानी है।  कार्ल मार्क्स बहुत बड़े विद्वान थे। हम सब जानते हैं। सर्वहारा के लिए बहुत बड़ा चिंतन सामने लेकर आए। उनके सिद्धांतों से ठीक वैसे ही विरक्ति आ सकती थी जैसा कि गीता के  अध्याय को पढ़कर आती है ।  परंतु उनका चिंतन रियलिस्टिक साइंटिफिक मैटेरियल को लेकर आगे बढ़ता है। कार्ल मार्क्स कहते हैं कि दुनिया में साम्य की स्थापना हो।   सर्वहारा यानी मजदूर वर्ग सुखी हो। यहां तक सबको स्वीकार्य है कार्ल मार्क्स लेकिन उनके बाद अनुयाईयों ने खूनी संघर्ष शुरू कर दिया और स्टालिन तक आते-आते लाल झंडे का रंग गहराता चला गया। *जब सत्ता का स्वाद जीभ पर लग जाता है तब वसुधैव कुटुंबकम अर्थात हम सब की परिकल्पना उसी घातक स्वरूप में बदल जाती है जहां से कार्ल मार्क्स बचा कर ले