गुरुवार, मई 26

मूर्ति भंजक आक्रांताओं को दुशासन कहने का समय


*मूर्ति भंजक आक्रांताओं को दुशासन कहने का समय*
मूर्ति भंजक संस्कृति के ध्वजवाहक आक्रांताओं ने भारत में जो आज से पांच छह सौ साल पहले करना शुरू किया था उसका अर्थ था कि वे किसी भी तरह से भारतीय संस्कृति चित्र को समाज से दूर करने में सफल होंगे। यह सत्य ही है किसी भी शासक के आगे उस दौर में पराधीन भारतीय समाज की एक न चली। 15 अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता भी अधूरी थी। भारत अब 5 अगस्त 2019 को आंशिक रूप से पूर्ण स्वतंत्रता की ओर जाता हुआ प्रतीत होता है। 
   औरंगजेब और अन्य आताताई मुगलों की प्रदक्षिणा करते हुए मनुष्य वास्तव में भारतीय दर्शन के विरुद्ध 1947 के बाद से ही संगठित हो चुके हैं। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि एक आयातित विचारधारा वर्ग संघर्ष की सृजन की परिस्थितियों को सर्वोपरि रखती है।  स्वतंत्रता के बाद लगातार ऐसे चिंतन को समाज में निरंतर वैचारिक समर्थन मिलता रहा है। अगर हम संस्कृत भाषा की बात करते हैं तो वह उसे धर्म से जोड़ देते हैं। अब बताइए भला भाषा कभी किसी धर्म से जुड़ सकती है। रिचुअल्स को धर्म के एंगल से देखना भी गलत है। एथेनिकता को भी धर्म के अंदर से देखा जाता है? इसके अलावा आयातित विचारधारा के ध्वजवाहको ने जो मंतव्य स्थापित किए गए है उनमें जाति व्यवस्था को  चर्चा का विषय बना कर रखा। उसके पीछे जो लॉजिक था वह था वर्ग बनाओ और वर्ग विभेद को बनाकर रखो आपस में वर्ग संघर्ष पैदा करते रहो।
   इन दिनों में दिख रहा हूं कि पुष्यमित्र शुंग के बारे में एक अवधारणा सबके मन में मजबूती के साथ स्थापित कर दी गई की पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों के विरुद्ध कठोर कार्य किए उन्हें मारा और बौद्ध स्मारकों को समाप्त किया। यह भयंकर किस्म का झूठ संपूर्ण दुनिया को उसी तरह रटाया गया जैसे बच्चों को अक्षर और अंक का ज्ञान कराया जाता है। जबकि पुष्यमित्र शुंग ने केवल यूनानी घुसपैठियों के विरुद्ध कार्रवाई की थी। उनको मठों से निकालकर राजदंड दिया गया था। परंतु शेष बुद्धिस्ट के साथ आता ताई व्यवहार तो कभी नहीं किया। बौद्ध धर्म के मदावलंवियों के स्मारकों का संरक्षण ब्राम्हण राजा पुष्यमित्र शुंग ने कराया इसका प्रमाण सांची के स्तूप में नजर आता है।
दूसरी ओर मुस्लिम आक्रांता शासकों की कुछ एक सकारात्मक स्मृति गाथाओं को आज तक बढ़ा चढ़ाकर बताया जा रहा है। और उनके दुष्कर्म पर कलरफुल चादर डाली जाती है। वे प्रथम श्रेणी के मूर्ति भंजक सनातन से बैरभाव रखने वाले लोग थे। वास्तव में वर्षों से हृदय में समाई हुई भावनाएं उमड़ घुमड़ कर बाहर आ रही हैं। और आक्रांता वर्ग को दुशासन सिद्ध करने का समय आ चुका है। यद्यपि मेरा यह मानना है कि ऐसे लोग जो राष्ट्र के विरुद्ध कब क्या कह देते हैं उन्हें नहीं मालूम रहता क्योंकि उनका अध्ययन कम है वे बेचारे यह नहीं जानते के जो गलत है वह दीर्घकाल अवधि में समाप्त हो जाएगा। सनातन में स्वच्छता रूढ़ियों और गैर जरूरी परंपराओं समाप्त करने के गुण धर्म मौजूद है। तभी तो सनातन धर्म है ना कि सनातन कोई संप्रदाय पंथ या आक्रामक समूह। 

  

यूक्रेन में भारतीय डायस्पोरा को सम्मान मिलता है - अलीशा नैयर


  ट्विटर के एक स्पेस पर मेरी मुलाकात यूक्रेन से दिनांक 24 मई 2022 को वापस आई पत्रकार अलीशा नैयर से  हुई। अलीशा ने बताया कि यूक्रेन एवं रूस के बीच हो रहे इस युद्ध में भारत के प्रति यूक्रेन के नागरिकों का दृष्टिकोण बेहद सकारात्मक है। अलीशा का मानना है कि भारत द्वारा यूक्रेन को की गई मानवीय सहायता के परिपेक्ष में वहां की जनता जो प्रतिपल मृत्यु को अपने नजदीक आता देख रही है कृतज्ञता व्यक्त करने से नहीं चूकती। अलीशा ने यह भी बताया कि-" यूक्रेन के मेट्रो स्टेशन की स्थिति खचाखच भीड़ से भरी हुई है। यूक्रेन में लोग इतने कष्ट के बावजूद स्वयं को खुश रखने का कोई अवसर नहीं छोड़ते।"
   उन्होंने यह भी बताया कि-" अगले पल में क्या होगा कौन जाने? परंतु वह वर्तमान की परिस्थितियों का हम एकजुटता के साथ सामना कर रहे हैं और करते रहेंगे!
    अलीशा बताती हैं कि -" सुरक्षित स्थान पर निवास कर रहे लोगों ने आराम करने का समय भी सुनिश्चित कर दिया है। जिसकी नींद पूरी हो जाती है वह अन्य किसी को विश्राम के लिए जगह दे देता है। एक भारतीय रेस्टोरेंट संचालक का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि-" रेस्टोरेंट संचालक ने रेस्टोरेंट बंद कर दिया है। अपने परिजनों को दुबई भेज दिया है। और अपनी समूची कमाई वहां बेघर लोगों को मुफ्त में भोजन बांटने में खर्च कर रहे हैं। रेस्टोरेंट संचालक का कहना है- जिस भूमि से मैंने धन कमाया उस भूमि को संकट के समय छोड़कर निकलना हमारे धर्म में नहीं है । मानवता के प्रति भारतीय लोगों का यह भाव निसंदेह सराहनीय और अनुकरणीय भी है।
    सामूहिक चर्चा में सम्मिलित लोगों में श्री समीर शर्मा ने पूछा कि क्या असुरक्षा की भावना आपस में द्वंद और तनाव को जन्म दे रही है?
   नहीं ऐसा नहीं है संकट के समय में एकजुटता और एकात्म भाव तीव्रता से यूक्रेन में दिखाई दे रहा है।
   युद्ध कब खत्म होगा इस प्रश्न के जवाब में अलीशा ने बताया कि-" यूक्रेन के लोग कहते हैं युद्ध कभी भी खत्म हो इसकी अब कोई चिंता नहीं है आखरी सांस तक हम इस युद्ध में अपना योगदान देते रहेंगे।"
   चर्चा के दौरान यह भी ज्ञात हुआ कि यूक्रेन की सेना के सैनिक अपने परिवार से मिलने आते हैं उनके साथ प्यार बांटते हैं और फिर चले जाते हैं। यह बहुत मार्मिक दृश्य होता है।
युद्ध की भयावह विभीषिका का कष्ट सबसे ज्यादा महिलाओं और बच्चों को होता है। युद्ध चाहे 1 दिन का हो या 18 दिन का या लगातार चलते रहने वाला हो युद्ध जीवन में गहरा असर करता है और यह असर पीढ़ियों तक स्थाई रहता है।
  अलीशा सहित उन सभी साहसी और आत्मविश्वास से लबरेज भारतीय पत्रकारों को नमन करना आप भी चाहेंगे जिनके आत्मविश्वास ने भारत को गौरव प्रदान किया है।

गुरुवार, मई 19

जोगी जी वाह जोगी जी

जोगी जी वाह जोगी जी
जोगी जी की कैबिनेट ने दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं
[  ] नए मदरसों को अनुदान नहीं मिलेगा - परंतु पुरानी अनुदानित मदरसों को अनुदान निरंतर दिया जाता रहेगा। यह एक अच्छी पहल है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में 7000 से अधिक ऐसे मदरसे हैं जिन्हें भारत सरकार से बाकायदा उन्नयन का कार्य करने के लिए सहायता प्राप्त होती रही है और 500 से अधिक मदरसों को वर्तमान में करोड़ों रुपए की राशि अनुदान स्वरूप दी जाती है।
[  ] दूसरा निर्णय बीपीएल और अंत्योदय कार्ड का खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत पुनरीक्षण प्रस्ताव। अकेले गाजियाबाद में ऐसे दो हजार से अधिक कार्ड सरेंडर करने में लोग स्वयं आगे आए। गोंडा में भी 5000 का सरेंडर किए गए। सब कुछ खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत किया जा रहा है। अब आप सोचेंगे कि लोग इतनी बड़ी संख्या में बीपीएल कार्ड क्यों सरेंडर कर रहे हैं। इसकी वास्तविकता का परीक्षण करने पर पाया कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत रुपए दो लाख वार्षिक आय यदि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले की है अथवा रुपए तीन लाख वार्षिक आमदनी वाले को बीपीएल की श्रेणी में नहीं माना जा सकता। दो पहिया वाहन 100 वर्ग मीटर का प्लॉट कंस्ट्रक्टेड एरिया एसी अथवा कीमती मशीन रखने वालों को बीपीएल की श्रेणी में अथवा अंत्योदय की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। इस अधिनियम में अन्य पैरामीटर को देखते हुए योगी कैबिनेट ने जो निर्णय लिया है उससे वास्तविक हितग्राहियों को लाभ मिलेगा किंतु ऐसे हितग्राहियों को वंचित किया जाएगा जिन्होंने ऐसे कार्ड अपने पास अब तक रखे हैं जो बीपीएल या अंत्योदय श्रेणी में आते हैं परंतु मापदंड के अनुरूप व्यक्ति अर्थात राशन कार्ड धारक अपात्र है। इस क्रम में उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने यह निर्णय लिया कि-" स्वेच्छा से बीपीएल कार्ड या अंत्योदय कार्ड जमा करने वाले पात्र हितग्राहियों पर किसी भी तरह की कार्यवाही नहीं होगी किंतु जो लोग अपात्र होने के बावजूद कार्ड अवैध रूप से लाभ लेंगे उनसे बाकायदा वसूली बाजार दर पर की जावेगी।
          सरकार के उपरोक्त आदेश बकायदा गांव गांव मुनादी करा कर कार्ड वापस करने की सूचना प्राप्त होते ही आपात हितग्राहियों ने खाद्य विभाग के ऑफिस में लाइन लगाकर कार्ड सरेंडर किए। उधर सरकार ने लगभग इस श्रेणी के 160000 नए राशन कार्ड सुपात्र हितग्राहियों के लिए जारी किए हैं। प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर 90% लोगों ने प्रसन्नता से अपने कार्ड जमा कर दिए। परंतु एक विशेष वर्ग के व्यक्ति ने इसका कारण यह बताया। अब तो आप कहेंगे जोगी जी वाह जोगी जी

मंगलवार, मई 17

उपासना अधिनियम विशेष उपबंध 1991 बनाम स्मारक एवं पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम 1958


    उपासना अधिनियम 1991 जो 18 सितंबर 1991 को लागू हो गया है , किस अधिनियम में केवल उपासना स्थल की 15 अगस्त 1947 के पूर्व पश्चात की स्थिति संबंध में विचार विमर्श किया गया है ।
इस अधिनियम के औचित्य पर अब तक विमर्श नहीं किया गया। यह अधिनियम गंभीर चिंतन एवं पुनरीक्षण के लिए आज भी तत्पर है।
    यह अधिनियम केवल उपासना स्थलों पर प्रभावी है न कि उन स्थलों के लिए जो ऐतिहासिक महत्व के हैं। इसे समझने के लिए हमें प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 को पढ़ना चाहिए। पुरावशेषों के संरक्षण के लिए पूरा उसे  अवशेषों को  नियंत्रित करना या हटाया जाना केंद्रीय सरकार की शक्ति में सन्निहित है केंद्र सरकार चाहे तो पूरा अवशेष और को संरक्षित  है। इतना ही नहीं इस अधिनियम की धारा यह भी कहती है कि ऐसे पुरावशेषों के नुकसान और हानि के लिए प्रतिकार का निर्धारण भी किया जा सकता है।
     मोटे तौर पर देखा जाए तो उपासना अधिनियम 1991 ना तो ऊपर वर्णित अधिनियम को अधिक्रमित करता है और ना ही उसे रोकने का कोई प्रावधान इस अधिनियम में किया गया  है। पुरावशेष क्या हो सकते हैं पुरावशेष के रूप में ऐसे या ऐसा सिक्का रूपकृति हस्तलेख,पुरालेख, अथवा अन्य कलाकृति या कारीगरी का काम कोई वस्तु पदार्थ या चीज जो किसी निर्माण या गुफा से विलन है कोई वस्तु पदार्थ चीज या गति युगों  के विज्ञान कला कारीगरियों, साहित्य धर्म रूढ़ियों नैतिक आचार या राजनीतिक दृष्टांत स्वरूप है, अथवा ऐतिहासिक रूचि की कोई वस्तु पदार्थ या चीज तथा कोई वस्तु पदार्थ चीज जिसका इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए पुरावशेष जिसका इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए पुरावशेष होना केंद्रीय सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित किया गया है।
पुरावशेष के संबंध में उल्लिखित उपरोक्त समस्त की परिधि में जो भी संरचना मूर्त अमूर्त रूप में उपलब्ध है 1991 के अधिनियम की सीमा में नहीं आता।
    संरक्षित स्मारक की भी परिभाषा इस अधिनियम में स्पष्ट रूप से वर्णित है। ऐसे स्मारकों का अनुरक्षण अभी रक्षा के संदर्भ में यह अधिनियम पठनीय रही है ताकि आप स्पष्ट रूप से एएसआई के कार्यों और कर्तव्य को समझ सके। 1991 का अधिनियम के अध्ययन में मुझे ऐसी कोई बात दृष्टिगोचर नहीं हुई जो किसी ऐतिहासिक विवरण के आधार पर चिन्हित पुरावशेष के लिए किसी को भी ऐसा अधिकार नहीं देता कि वह 100 वर्ष पूर्व के पुरावशेष के महत्व को और उस पर किए जाने वाले परीक्षण के लिए बाधा उत्पन्न करता हो।
    आप अगर विगत 100 वर्षों से अब तक की परिस्थितियों का अध्ययन करें तो आप वस्तुतः भारतीय सांस्कृतिक पुरातात्विक विरासतों को की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की परीक्षा करना चाहते हैं तो उसमें कोई भी कानूनी बाधा नहीं प्रतीत होती। ऐसी मेरी धारणा है हो सकता है कि इस अभिव्यक्ति का लीगल नजरिया कुछ और हो यह विधिवेत्ताओं का विषय होगा ।


 

सोमवार, मई 16

पूजा स्थल ( विशेष उपबंध ) अधिनियम 1991 पुनरीक्षण योग्य क्यों..?

    इस  अधिनियम को पुनरीक्षित करने की जरूरत है क्योंकि इसमें सेक्युलरिज्म का कोई घटक नजर नहीं आता . इसके हमें हमारे ऐतिहासिक  महत्व के स्मृति-चिन्हों का भी संरक्षण करना चाहिए. 

प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष, अधिनियम, 1958

 का महत्व कम न हो इस वास्ते हम सदा प्रयास करें . आज़ादी के पूर्व या बाद की स्थिति का आधार देकर हमें तुष्टि के प्रयासों से बचना चाहिए. यदि समस्या का निदान जड़ से न किया तो भविष्य में हम दोषी साबित होंगे. पूजा स्थल अधिनियम भयातुर होकर बनवाया या बनाया अधिनियम है. इसे गंभीरता से विचार कर पुनरीक्षित करना संसद का दायित्व है . 
       विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग सनातन शास्त्रों /साहित्य में वर्णित है. सनातन साहित्य कल्प नहीं उनमें घनीभूत तथ्यों को  नकारना मूर्खता है. ग्रंथों में  लिखे हुए तथ्य वास्तविकता से मेल खाएं तो प्राचीन इतिहास की सत्यता को जानने के लिए अन्य किसी  प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती. . 

    
                             



मंगलवार, मई 10

ब्राह्मणों ...?

भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से
दोनों कुरुक्षेत्र वासनी
सरस्वती नदी के तट
पर गये और कण् व चतुर्वेदमय
सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे
एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें
वरदान दिया ।
वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका
क्रमानुसार नाम था -
उपाध्याय,
दीक्षित,
पाठक,
शुक्ला,
मिश्रा,
अग्निहोत्री,
दुबे,
तिवारी,
पाण्डेय,
और
चतुर्वेदी ।
इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने
अपनी कन्याए प्रदान की।
वे क्रमशः
उपाध्यायी,
दीक्षिता,
पाठकी,
शुक्लिका,
मिश्राणी,
अग्निहोत्रिधी,
द्विवेदिनी,
तिवेदिनी
पाण्ड्यायनी,
और
चतुर्वेदिनी कहलायीं।
फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं
वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -
कष्यप,
भरद्वाज,
विश्वामित्र,
गौतम,
जमदग्रि,
वसिष्ठ,
वत्स,
गौतम,
पराशर,
गर्ग,
अत्रि,
भृगडत्र,
अंगिरा,
श्रंगी,
कात्याय,
और
याज्ञवल्क्य।
इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।
मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-
(1) तैलंगा,
(2) महार्राष्ट्रा,
(3) गुर्जर,
(4) द्रविड,
(5) कर्णटिका,
यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाये जाते हैं|
तथा
विंध्यांचल के उत्तर में पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण
(1) सारस्वत,
(2) कान्यकुब्ज,
(3) गौड़,
(4) मैथिल,
(5) उत्कलये,
उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं।
वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।
ऐसी संख्या मुख्य 115 की है।
शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है ।
यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं।
जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,
फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के
लगभग है |
तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है।
उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है
81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -
(1) गौड़ ब्राम्हण,
(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)
(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,
(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,
(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,
(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,
(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,
(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,
(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,
(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,
(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),
(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,
(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,
(14) रायकवाल ब्राम्हण,
(15) गोमित्र ब्राम्हण,
(16) दायमा ब्राम्हण,
(17) सारस्वत ब्राम्हण,
(18) मैथल ब्राम्हण,
(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,
(20) उत्कल ब्राम्हण,
(21) सरयुपारी ब्राम्हण,
(22) पराशर ब्राम्हण,
(23) सनोडिया या सनाड्य,
(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,
(25) कपिल ब्राम्हण,
(26) तलाजिये ब्राम्हण,
(27) खेटुवे ब्राम्हण,
(28) नारदी ब्राम्हण,
(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,
(30)वलादरे ब्राम्हण,
(31) गयावाल ब्राम्हण,
(32) ओडये ब्राम्हण,
(33) आभीर ब्राम्हण,
(34) पल्लीवास ब्राम्हण,
(35) लेटवास ब्राम्हण,
(36) सोमपुरा ब्राम्हण,
(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,
(38) नदोर्या ब्राम्हण,
(39) भारती ब्राम्हण,
(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,
(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,
(42) भार्गव ब्राम्हण,
(43) नार्मदीय ब्राम्हण,
(44) नन्दवाण ब्राम्हण,
(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,
(46) अभिल्ल ब्राम्हण,
(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,
(48) टोलक ब्राम्हण,
(49) श्रीमाली ब्राम्हण,
(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,
(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण
(52) तांगड़ ब्राम्हण,
(53) सिंध ब्राम्हण,
(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,
(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,
(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,
(57) गौभुज ब्राम्हण,
(58) अट्टालजर ब्राम्हण,
(59) मधुकर ब्राम्हण,
(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,
(61) खड़ायते ब्राम्हण,
(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,
(64) लाढवनिये ब्राम्हण,
(65) झारोला ब्राम्हण,
(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,
(67) गालव ब्राम्हण,
(68) गिरनारे ब्राम्हण
सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में शेयर करे हम क्या है
इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये।
ब्राह्मण बिना धरती की कल्पना ही नहीं की जा सकती इसलिए ब्राह्मण होने पर गर्व करो और अपने कर्म और धर्म का पालन कर सनातन संस्कृति की रक्षा करें।
नोट:आप सभी बंधुओं से अनुरोध है कि सभी ब्राह्मणों को भेजें और यथासम्भव अपनी वंशावली का प्रसार करने में सहयोग करें . 
हिन्दू ब्राह्मण अपनी धारणाओं से अधिक धर्माचरण को महत्व देते हैं। यह धार्मिक पन्थों की विशेषता है। धर्माचरण में मुख्यतः है यज्ञ करना। दिनचर्या इस प्रकार है - स्नान, सन्ध्यावन्दनम्जपउपासना, तथा अग्निहोत्र। अन्तिम दो यज्ञ अब केवल कुछ ही परिवारों में होते हैं। ब्रह्मचारी अग्निहोत्र यज्ञ के स्थान पर अग्निकार्यम् करते हैं। अन्य रीतियाँ हैं अमावस्य तर्पण तथा श्राद्ध

शनिवार, अप्रैल 16

"भारतीय मानव सभ्यता एवं संस्कृति के प्रवेशद्वार 16000 ईसा-पूर्व" .......... क्यों लिखी गई


 

1.      प्राचीन इतिहास केवल मिथक हो गया तथा मध्यकाल और उसके बाद का इतिहास तो मुगलिया इतिहास बन के रहा गया। अतएव आत्मप्रेरणा से यह कृति लिखने का प्रयास किया है। इस कृति की सफलता पूर्वक पूर्णता के लिए गणनायक बुद्धि दाता श्री गणेश को सर्वप्रथम नमन करता हूं:

2.      तीर्थंकरों का उल्लेख अवश्य है पर यहाँ दो तीर्थंकरों का उल्लेख नहीं किया जो महाभारत कालीन श्रीकृष्ण के समकालीन थे। ऋषभदेव एवं अरिष्टनेमि या नेमिनाथ के नामों का उल्लेख 'ऋग्वेद' में मिलता है। अरिष्टनेमि को भगवान श्रीकृष्ण का निकट संबंधी माना जाता है। उपरोक्त विवरण से श्रीकृष्ण को इतिहास से  विलोपित रखे जाने के उद्देश्य से नेमीनाथ जी का विस्तृत विवरण विलुप्त किया गया।

3.      महात्मा बुद्ध एक श्रमण थे जिनकी शिक्षाओं पर बौद्ध धर्म का प्रचलन हुआ। इनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं, फिर भी इतिहास वेत्ताओं ने उसी कुलवंश इक्ष्वाकु वंश के बुद्ध के पूर्वज को काल्पनिक निरूपित किया है .... है न हास्यास्पद तथ्य !

4.      अजीवात जीवोतपत्ति: जीवन का अस्तित्व में लाने में भौतिकरासायनिक-बायोलाजिकल तीन तरह की प्रक्रिया शामिल हैं. परन्तु जीवन का प्राथमिक निर्माण केवल स्वचालित-रासायनिक-प्रक्रिया (Auto-Cemical-Process)” से ही हुई है।

5.      मध्य प्रदेश में भीमबेटका के अवशेष साबित करते हैं कि भारतीय मानव-सभ्यता संस्कृति का अस्तित्व 2.6 लाख साल प्राचीन है.

6.      विश्व में मानव प्रजाति के वर्गीकरण से निम्नानुसार Race को चिन्हित किया गया है... मानव की प्रमुख प्रजातियाँ Principal Races Man निग्रिटो Negrito, नीग्रो Negro आस्ट्रेलॉयड Australoid, भूमध्यसागरीय Mediterranean, नॉर्डिक Nordic, अल्पाइन Alpine, मंगोलियन Mongoion,एस्किमो Eskimo बुशमैन Bushmen, खिरगीज Khirghiz, पिग्मी Pigmy, बद्दू Bedouins, सकाई Sakai, सेमांग Semang, मसाई Masai.यहाँ एक चर्चित विवादित रेस का ज़िक्र करते हैं जिसका उल्लेख ऊपर नहीं हुआ अर्थात कहीं भी आर्य प्रजाति Aryan-Race का ज़िक्र नहीं है. जो यह सिद्ध करता है कि आर्य कोई प्रजाति नहीं है।

7.      रामायण और महाभारत काल काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविकता से परिपूर्ण है। इस कृति की सह लेखिका के रूप में डॉक्टर हंसा व्यास ( शिष्या प्रोफेसर वाकणकर जी ) जिन बिंदुओं पर प्रमुख रूप से आगे चर्चा करेंगी उनमें से एक है नर्मदा तट पर मौजूद रामायण एवं महाभारत ग्रंथों में मौजूद तत समकालीन स्थावर अवशेष राम के वन मार्ग के का निर्धारण आदि के संदर्भ में लेखन कार्य कर रहे हैं। राम केवल करुणानिधान राम नहीं है कृष्ण केवल कर्म योगी कृष्ण नहीं है हमें ऐतिहासिक संदर्भों को प्रस्तुत करते हुए उनके अस्तित्व और काल्पनिक संदर्भों से उनको दूर करने की जरूरत है। आने वाली पीढ़ी को यह बताना भी आवश्यक है कि राम और कृष्ण किसी भी स्थिति में मिथक नहीं है।

8.      इंडस वैली सिविलाइजेशन जिस पर अभी मात्र 10% से 15% तक कार्य हो सका है। खुदाई से प्राप्त अवशेषों से यह पुष्टि हो रही है कि वे अवशेष 3500 वर्ष प्राचीन न होकर लगभग 4500 वर्ष पुराने हैं। मोहनजोदड़ो हड़प्पा धौलावीरा आदि क्षेत्रों की खुदाई तथा उससे मिलने वाले अवशेषों को ईसा के 4500 से 5000 वर्ष पूर्व का माना है जो कि सभ्यता के अंत के हैं तो सभ्यता का प्रारम्भ कब का होगा आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। भारतीय भूभाग में यद्यपि नदी घाटी सभ्यता के संदर्भों में पर अभी बहुत सारा काम होना शेष है।

9.      हमारे दो प्रतिष्ठित साहित्यकारों क्रमश: श्रीयुत राहुल सांकृत्यायन की कृति वोल्गा से गंगा तक एवं श्रीयुत रामधारी सिंह जी दिनकर की कृति संस्कृति के चार अध्याय साहित्यानुरागी/विद्यार्थी/एवं मानव समाज भी भ्रमित हुआ हैं। तथा भारतीय जन-मानस में वे इस मंतव्य को स्थापित करने में सफल भी हो गए कि जो तथ्य साहित्यिक कृति में अंकित हैं वे ऐतिहासिक भी हैं। भले ही वे अपनी-अपनी कृतियों को साहित्यिक कृति का रहे थे।

10.    डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर (उपाख्य : हरिभाऊ वाकणकर ; 4 मई 1919 – 3 अप्रैल 1988) भारत के एक प्रमुख पुरातत्वविद् थे। उन्होंने भोपाल के निकट भीमबेटका के प्राचीन शिलाचित्रों का अन्वेषण किया। अनुमान है कि यह चित्र 175000 वर्ष पुराने हैं। इन चित्रों का परीक्षण कार्बन-डेटिंग पद्धति से किया गया, परिणामस्वरूप इन चित्रों के काल-खंड का ज्ञान होता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि उस समय रायसेन जिले में स्थित भीम बैठका गुफाओं में मनुष्य रहता था और वो चित्र बनाता था। सन 1975 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

11.    श्री वेदवीर आर्य अध्यावसाई विद्वान हैं । श्री आर्य रक्षालेखा विभाग के में उच्च पद पर आसीन हैं। संस्कृत, आंग्ल, पर समान अधिकार रखने वाले श्री आर्य का रुझान भारत के प्राचीन-इतिहास में है। वे तथ्यात्मक एवं एस्ट्रोनोमी एवं वैज्ञानिक आधार पर इतिहास की पुष्टि करने के पक्षधर हैं। उनकी अब तक दो कृतियाँ क्रमश: THE CHRONOLOGY OF INDIA from Manu to Mahabharata, तथा THE CHRONOLOGY OF INDIA From Mahabharata to Medieval Era, वो कृतियाँ हैं जिनके आधार पर हम भारत के वास्तविक इतिहास तक आसानी से पहुँच सकते हैं। यह कथन इस लिए कह सकने की हिम्मत कर पा रहा हूँ क्योंकि श्री आर्य ने इतिहास को मौजूद वेद, वैदिक-साहित्य में अंकित/उल्लेखित विवरणों, घटनाओं को नक्षत्रीय गणना के आधार पर अभिप्रमाणित करते हुये सम्यक साक्ष्य रखे  हैं। इस कृति का आधार भी श्री वेदवीर आर्य की कृति The chronology of India from Manu To Mahabharata ही है।

12.    यहां अन्य और दो कृतियों का पुन: उल्लेख आवश्यक हैंजिनमे एक श्री राहुल सांकृत्यायन - वोल्गा से गंगा, दूसरे श्री रामधारी सिंह दिनकर जी संस्कृति के चार अध्याय । दोनों ही कृतियों में क्रमशः तक तथा में भारतीय संस्कृति को केवल ईसा-पूर्व, 1800-1500 वर्ष पूर्व तक सीमित कर देते हैं।दिनकर जी तो चार कदम आगे आ गए और उनने यहाँ तक कह दिया –“”

13.    मान॰ राहुल सांकृत्यायन अपनी किताब वोल्गा से गंगा तक में कथाओं का विस्तार देते हुए मूल वैदिक चरित्रों और वंश का उल्लेख करते हैं तथा उन्हें 6000 से 3500 साल की अवधि तक सीमित करने की कोशिश करते हैं। वे अपनी प्रथम कहानी निशा में 6000 ईसा पूर्व दर्शाते हैं। दूसरी कथा निशा शीर्षक से है जिसमें 3500 वर्ष पूर्व का विवरण दर्ज है।

14.    वेदांग ज्योतिष आदियुग को इस प्रकार से चिन्हांकित किया –“जब सूर्य, चंद्रमा, वसव, एक साथ श्रविष्ठा-नक्षत्र में थे तब आदियुग का प्रारंभ हुआ था।इस तथ्य की पुष्टि करते हुए वेदवीर आर्य ने साफ्टवेयर से गणना करके पहचाना कि – 15962 ईसा-पूर्व अर्थात आज से 15962+2021= 17,983 साल पहले हुआ था।

15.    ब्रह्मा प्रथम नक्षत्र-विज्ञानी हैं जिन्हौने 28 नक्षत्र, 7 राशि, की अवधारणा को स्थापित किया था आदिपितामह ब्रह्मा ने ही पितामह-सिद्धान्त की स्थापना की। धनिष्ठादि- नक्षत्र के नाम इस प्रकार हैं : धनिष्ठा, अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य,अश्लेषा, माघ, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, अभिजितश्रवण, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती।

16.    वेदवीर आर्य जी ने ऋग्वेद के कालखंड को 14500 BCE से 11800 BCE तक कालखंड निर्धारित किया है। ऋग्वेद निर्माण के मध्यकाल को 11800 BCE से 11000 BCE तथा उत्तर ऋग वैदिक काल को 11000 BCE से 10,500 BCE (ईसा पूर्व) चिन्हित किया। अनुसंधानकर्ता श्री वेद वीर ने उन समस्त ऋषियों का भी सूचीकरण किया है जो वेद निर्माण में प्रमुख भूमिका में थे जिसमें लोपामुद्रा का नाम भी सम्मिलित है। ऋग्वेद के उपरांत यजुर्वेद अथर्ववेद सामवेद के निर्माण कालखंड को 14000 से 10500 BCE मानते हैं।

17.    वैदिक संहिताओं, और अन्य ग्रंथों उपनिषदों के लेखन का समय अर्थात कालखंड 10,500 ईसा पूर्व से 6777 ईसा सुनिश्चित करते हैं।

18.    भारत-भूमि पर ईसा पूर्व कम से कम 2.5 लाख से 2 लाख वर्ष पूर्व की कालाअवधि में मानव प्रजाति का जन्म हो चुका था, परंतु 72 हज़ार साल पूर्व के टोबा ज्वालामुखी के प्रभाव से होने वाली धूल मिट्टी इत्यादि के प्रभाव से बचने का केवल एक तरीका था कि लोग किसी कठोर संरचना जैसे गुफा, आदि के भीतर निवास करें। ऐसी स्थिति में पर्वतों जैसी विंध्याचल सतपुड़ा हिमालय तथा आदि की गुफाओं से श्रेष्ठ आश्रय स्थल और कौन सा हो सकता था। इसकी पुष्टि वनों में निवास करने वाले वनवासियों द्वारा बनाए गए शैल चित्रों से होती है जिनका निर्माण डेढ़ लाख वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के सतपुड़ा पर्वत माला में वाकणकर जी ने किया है। ऐसी स्थिति में यह तथ्य पूर्णता है स्पष्ट है कि.....

19.    इससे यह सिद्ध होता है कि जन-मानस में कहानियों के माध्यम से त्रुटिपूर्ण जानकारी को प्रविष्ट कराया जा रहा है। कहानी तो एक था राजा एक थी रानी के तरीके से सुनाई जा सकती थी परंतु गंगा से वोल्गा तक के सफर में ऐसा प्रतीत होता है कि बलात एक मंतव्य अर्थात नैरेटिव स्थापित करने की प्रक्रिया पूज्यनीय राहुल सांकृतायन ने करने का प्रयास किया है ।

20.    स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी ने भी आर्य सभ्यता एवं संस्कृति और भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को पृथक पृथक रूप से वर्गीकृत कर समाज का वर्गीकरण करने में कोई कोताही नहीं बरती है। इतना ही नहीं वे कहते हैं कि महाभारत का युद्ध पहले हुआ तदुपरांत उपनिषदों का जन्म हुआ। यह तथ्यों की जानकारी अथवा साहित्यिक कृति के रूप में लिखी गई किताब अथवा लिखवाई गई किताब में संभव है कि ऐसा लिखवाया  जाए। वास्तव में तथ्य एवं सत्य यह है कि – “महाभारत ईसा के 3162 वर्ष पूर्व हुआ और संहिता ब्राह्मण आरण्यक एवं उपनिषदों की रचना का काल 10,500 से 6677 ईसा पूर्व माना गया है।

21.    साहित्य अकादमी से पुरस्कृत संस्कृति के चार अध्याय नामक कृति के प्रारंभ में ही ऐसी त्रुटियां क्यों की गई इसका उत्तर मिलना भले ही मुश्किल हो लेकिन इस कृति का उद्देश्य बहुत ही स्पष्ट रूप से समझ में आ रहा है कि पश्चिमी विद्वानों के दबाव में किसी राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते इस कृति का निर्माण किया गया। हतप्रभ हूं कि महाकवि पूज्य रामधारी सिंह दिनकर ने इसे क्यों स्वीकारा ?

22.    कालानुक्रम का बोध न होने के कारण पूज्य दिनकर जी ने एक स्थान पर लिखा है –“ कथा-किंवदंतियों का जो विशाल भंडार हिंदू पुराणों में जमा है उसका भी बहुत बड़ा अंश आग्नेय सभ्यता से आया है। किसी किसी पंडित का यह भी अनुमान है कि - रामकथा की रचना करने में आग्नेय जाति के बीच प्रचलित कथाओं से सहायता ली गई है तथा पंपापुर के वानरों और लंका के राक्षसों के संबंध में विचित्र कल्पनाएं रामायण मिलती हैं, उनका आधार आग्नेय लोगों की ही लोक कथाएं रही होंगी । किंवदंतियाँ और लोक कथाएं पहले देहाती लोगों के बीच फैलती हैं और बाद में चलकर साहित्य में भी उनका प्रवेश हो जाता है।

23.    रामधारी सिंह दिनकर जी ने पुराण में वर्णित सीता का उल्लेख किया है वह मान्य है किंतु यह कैसे मान लें कि दिनकर जी को इस तथ्य का स्मरण में नहीं रहा था कि ऋग्वेद में ज्ञान देवी सरस्वती और वेद निर्माण क्षेत्र की गुमशुदा नदी सरस्वती एक ही नाम थे परंतु एक देवी के रूप में और दूसरी नदी के रूप में भौतिक रूप में उपलब्ध थी। जिनका स्वरूप अलग अलग था। यह स्वाभाविक है कि एक ही नाम किन्ही दो व्यक्तियों के हो सकते हैं ।

24. दिनकर जी ने इस तरह है तो रामायण एवं महाभारत के संदर्भ में कृष्ण की व्याख्या नहीं थी और ना ही कोई तकनीकी साक्ष्य प्रस्तुत किए है जो यह साबित कर सके कि राम और कृष्ण इतिहास पुरुष है। इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि वह इस तथ्य को तो स्वीकारते हैं कि राम और कृष्ण हमारे शाश्वत पुरुष हैं जिनकी चर्चा आज भी होती है किंतु वे उन्हें ऐतिहासिक रूप से संस्कृति के चार अध्याय में सम्मिलित नहीं करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि दिनकर जी द्वारा जिन्होंने रश्मि रथी जैसी कृति का लेखन किया उनने जाने किन कारणों से इतिहास की शक्ल में एक कल्प-कथ्य लिखा होगा...?

25. एक और प्रश्न मस्तिष्क पर बोझ की तरह लगा हुआ था ... "ईसा के पंद्रह सौ साल पहले ईसा मसीह के जन्म काल तक क्या चार वेद 18 पुराण ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद, ज्योतिष भाषा विकास मोहनजोदड़ो हड़प्पा धौलावीरा, नर्मदा-घाटी के आसपास के अतिरिक्त  सभी नदियों के आसपास ) सभ्यता एवं संस्कृति का विकास कैसे हो गया था ?

             भाषा बनने में ही कम से कम 100 वर्ष  लग जाते हैं भाषा के विकास में कम से कम 500 साल फिर उन ग्रंथों को रचना इतना आसान तो नहीं ..?

26. समाज का तत्समय चार नहीं 5 खंड में विभाजन किया गया था न कि 4 खंडों में। ब्राह्मण क्षत्रि वैश्य एवं छुद्र (शूद्र ) एवं चांडाल। यह वर्गीकरण पेशे के आधार पर था। पांचों वर्णों का क्रमश: ब्राह्मण क्षत्रि वैश्य एवं छुद्र (शूद्र ) एवं चांडाल का कार्याधारित वर्गीकरण किया गया था न कि जाति के आधार पर।

1.                शूद्र: शूद्र शब्द केवल छुद्र शब्द का अपभ्रंश है। चीनी यात्रियों के द्वारा लिखित विवरण अनुसार उपरोक्त तथ्य प्रमाणित हैं। छुद्र अस्पृश्य नहीं होते। न ही उनको दलित या महा दलित जैसे विशेषणों से संबोधित करना चाहिए । केवल तत्कालीन समय में चांडाल स्वयंभू अस्पृश्य थे।

2.                वणिक या वैश्य: इस वर्ण का कार्य व्यवसाय से अर्थोपार्जन करना था। राज्य की वित्तीय व्यवस्था का के भुगतान एवं राजा को आवश्यकतानुसार धन उपलबढ़ा कराने का दायित्व प्रमुख-रूप से इसी वर्ग का था। ताकि राज्य में क्ल्यानकारी कार्यों, सामरिक, रक्षा, आदि की व्यवस्था के लिए धन का प्रवाह हो सके। इसे रामायण काल कृष्ण के काल, तदुपरान्त नन्द वंश के विवरण एवं अन्य राजाओं के इतिहास के सूक्ष्म विश्लेषण से समझा जा सकता है।

3.                क्षत्री: राज्य की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा व्यवस्था, का भार सम्हालने का दायित्व इसी वर्ण का था

4.                ब्राह्मण: शास्त्र अर्थात- अध्यात्म, दर्शन, कला, शिल्प, युद्ध की नीति, राज्य की नीति, एवं अन्य मानवोपयोगी ज्ञान जैसे आयुर्वेद् वास्तु-कला करना

चांडाल: मानवीय एवं पशुओं के शवों के निपटान शमशान की व्यवस्था, जैविक-कचरे का निपटान कर स्वच्छता का उत्तर-दायित्व। समाज में उनको उनके राजा के अधीन किया था। काशी में यह परंपरा आज भी देखी जा सकती है। केवल तत्कालीन समय में चांडाल स्वयंभू अस्पृश्य थे। वे बहुसंख्यक शाकाहारी समुदाय को स्पर्श नहीं करने देना चाहते थे। क्योंकि वे कायिक-कचरे के निपटान में शामिल होते थे अत: आयुर्वेदिक अनुदेशों का पालन करते हुए लोक-स्वास्थ्य-गत कारणों से गाँव में प्रविष्ट होते समय ढ़ोल पीटते शोर मचाते थे। शमशान घाटों पर भी किसी को भी न छूने की परंपरा का पालन कराते थे ।

 

 

 

 







पुस्तक प्राप्ति : अमेजान, फ्लिप-कार्ट, गूगल बुक्स 

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