गुरुवार, मई 26

मूर्ति भंजक आक्रांताओं को दुशासन कहने का समय


*मूर्ति भंजक आक्रांताओं को दुशासन कहने का समय*
मूर्ति भंजक संस्कृति के ध्वजवाहक आक्रांताओं ने भारत में जो आज से पांच छह सौ साल पहले करना शुरू किया था उसका अर्थ था कि वे किसी भी तरह से भारतीय संस्कृति चित्र को समाज से दूर करने में सफल होंगे। यह सत्य ही है किसी भी शासक के आगे उस दौर में पराधीन भारतीय समाज की एक न चली। 15 अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता भी अधूरी थी। भारत अब 5 अगस्त 2019 को आंशिक रूप से पूर्ण स्वतंत्रता की ओर जाता हुआ प्रतीत होता है। 
   औरंगजेब और अन्य आताताई मुगलों की प्रदक्षिणा करते हुए मनुष्य वास्तव में भारतीय दर्शन के विरुद्ध 1947 के बाद से ही संगठित हो चुके हैं। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि एक आयातित विचारधारा वर्ग संघर्ष की सृजन की परिस्थितियों को सर्वोपरि रखती है।  स्वतंत्रता के बाद लगातार ऐसे चिंतन को समाज में निरंतर वैचारिक समर्थन मिलता रहा है। अगर हम संस्कृत भाषा की बात करते हैं तो वह उसे धर्म से जोड़ देते हैं। अब बताइए भला भाषा कभी किसी धर्म से जुड़ सकती है। रिचुअल्स को धर्म के एंगल से देखना भी गलत है। एथेनिकता को भी धर्म के अंदर से देखा जाता है? इसके अलावा आयातित विचारधारा के ध्वजवाहको ने जो मंतव्य स्थापित किए गए है उनमें जाति व्यवस्था को  चर्चा का विषय बना कर रखा। उसके पीछे जो लॉजिक था वह था वर्ग बनाओ और वर्ग विभेद को बनाकर रखो आपस में वर्ग संघर्ष पैदा करते रहो।
   इन दिनों में दिख रहा हूं कि पुष्यमित्र शुंग के बारे में एक अवधारणा सबके मन में मजबूती के साथ स्थापित कर दी गई की पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों के विरुद्ध कठोर कार्य किए उन्हें मारा और बौद्ध स्मारकों को समाप्त किया। यह भयंकर किस्म का झूठ संपूर्ण दुनिया को उसी तरह रटाया गया जैसे बच्चों को अक्षर और अंक का ज्ञान कराया जाता है। जबकि पुष्यमित्र शुंग ने केवल यूनानी घुसपैठियों के विरुद्ध कार्रवाई की थी। उनको मठों से निकालकर राजदंड दिया गया था। परंतु शेष बुद्धिस्ट के साथ आता ताई व्यवहार तो कभी नहीं किया। बौद्ध धर्म के मदावलंवियों के स्मारकों का संरक्षण ब्राम्हण राजा पुष्यमित्र शुंग ने कराया इसका प्रमाण सांची के स्तूप में नजर आता है।
दूसरी ओर मुस्लिम आक्रांता शासकों की कुछ एक सकारात्मक स्मृति गाथाओं को आज तक बढ़ा चढ़ाकर बताया जा रहा है। और उनके दुष्कर्म पर कलरफुल चादर डाली जाती है। वे प्रथम श्रेणी के मूर्ति भंजक सनातन से बैरभाव रखने वाले लोग थे। वास्तव में वर्षों से हृदय में समाई हुई भावनाएं उमड़ घुमड़ कर बाहर आ रही हैं। और आक्रांता वर्ग को दुशासन सिद्ध करने का समय आ चुका है। यद्यपि मेरा यह मानना है कि ऐसे लोग जो राष्ट्र के विरुद्ध कब क्या कह देते हैं उन्हें नहीं मालूम रहता क्योंकि उनका अध्ययन कम है वे बेचारे यह नहीं जानते के जो गलत है वह दीर्घकाल अवधि में समाप्त हो जाएगा। सनातन में स्वच्छता रूढ़ियों और गैर जरूरी परंपराओं समाप्त करने के गुण धर्म मौजूद है। तभी तो सनातन धर्म है ना कि सनातन कोई संप्रदाय पंथ या आक्रामक समूह। 

  

कोई टिप्पणी नहीं:

Wow.....New

सनातनी अस्थि पूजन न करें..?

सनातन धर्म मानने वालों को अस्थि पूजन से बचना चाहिए..?    बहुत दिनों से यह सवाल मेरे मित्र मुझसे पूछते थे। सनातन में अस्थि कलश व...

मिसफिट : हिंदी के श्रेष्ठ ब्लॉगस में