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अगस्त, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हम भी पिटे थे जब रुपया गिरा था जेब से

वन इंडिया से साभार  हम भी पिटे थे जब रुपया गिरा था जेब से हमाए बाबूजी भी बड़े तेज़ तर्रार थे हम जैसे 50 साल के पार वालों के बाबूजीयों की   हिटलरी सर्वव्यापी है. हुआ यूं कि हमारी लापरवाही की वज़ह से हम हमारी जेब का एक रुपया ट्प्प से गिरा घर आए हिसाब पूछा एक रुपिया  कम मिला ... साहू जी ( किरानेवाले) कने गये  हमने पूछा भैया हमारा रुपिया गिर गया इधर ! उनने भी खोजा न मिला ....वापस घर पहुंचे .       घर पहुंचते ही एक रुपिए के पीछे बाबूजी के चौड़े हाथ वाले दो झापड़ ने हमको रुपैये की कीमत समझा दी... वैसे हमाये वित्त मंत्री जी भी पचास के पार के हैं.. उनके बाबूजी हमारे बाबूजी टाइप के न थे . .. हो सकता है हों पर हमारी तरह तमाचा न मिला हो जो भी हो भारत का रुपिया गिरा है तो उसका दोषी भारत के वित्तमंत्री तो हैं ही हम आप कम नहीं हैं.   यानी हमारी विदेशी आस्थाओं में इज़ाफ़ा हो रहा है.विदेशी  सोना खरीदो सेलफ़ोन खरीदो, पक्का है विदेशी मुद्रा में भुगतान करना होगा. हमारा खज़ाना खाली होना तय है.  आभार  sealifegifts    मैं पूछता हूं  आर्थिक समझ कितने भारतियों को है..? शायद कुछ ही लोग हैं

स्वातंत्र्यवीर श्री मांगीलाल गुहे दिवंगत

श्रीयुत मांगीलाल जी गुहे दिवंगत 90 वर्षीय क्रांतिकारी स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी श्रीयुत गुहे जी का दु:खद निधन आज प्रात: जबलपुर में हो गया। अंतिम  यात्रा   दिनांक 30.9.2013  ( प्रात: 10 बजे) को उनके निवास  गौरैया प्लाट मदन महल जबलपुर से  ग्वा रीघाट मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान करेगी . नार्मदीय  ब्राह्मण समाज एवं परिजन - क्रांतिवीर श्रीयुत गुहे जी को  विनत  श्रद्धांजलि एवं  शोकाकुल परिवार को दुःख सहने की शक्ति हेतु  माँ नर्मदा से प्रार्थना  रत हैं

सुर्खियों से दूर रहे स्वातंत्र्यवीर : श्री मांगीलाल गुहे

श्रीयुत गुहे ने गांधी जी के निर्देशों पर सदा अमल किया 1942 में महा. गांधी के “करो या मरो” नारे से प्रभावित होकर अंग्रेज सरकार की पत्राचार व्यवस्था को खत्म करने हरदा के लेटर बाक्सों को बम से नेस्तनाबूत किया,साथ ही डाक गाड़ी के दो डब्बों के बीच यात्रा करते हुए रस्सी में हंसिया बांध कर रेल लाइन के किनारे के टेलीफ़ोन तारों को काटा ताकि टेलीफ़ोनिक एवम टेलीग्राफ़िक संचार व्यवस्था छिन्न भिन्न हो हुआ यही .उनकी ज़रा सी चूक जान लेवा हो सकती थी. पर युक्तियों और सतर्क व्यक्तित्ववान श्री गुहे ऐसा कर साफ़ बच निकले. श्री गुहे बताते हैं कि मुझसे लोग दूरी बनाते थे . ऐसा स्वभाविक था. लोग क्यों अग्रेजों के कोप का शिकार होना चाहते. श्रीयुत गुहे हमेशा कुछ ऐसा कर गुज़रते जो विलायती कानून की खिलाफ़त और बगावत की मिसाल होता पर हमेशा वे सरकारी की पकड़ में नहीं आ पाते .कई बार ये हुआ कि अल्ल सुबह हरदा की सरकारी बिल्डिंग्स पर यूनियन जैक की जगह तिरंगा दिखाई देता था. ये करामात उसी क्रांतिवीर की थी जिसे तब उनकी मित्र मंडली मंगूभाई के नाम से सम्बोधित पुकारती थी.उनका एक ऐसा मित्र भी था जो सरकारी रिश्वत की गिरफ़्त

यमुनाघाट चित्रकला : अभिव्यक्ति पर

अभिव्यक्ति : सुरुचि की - भारतीय साहित्य, संस्कृति, कला और दर्शन पर आधारित। बंदऊं गुरु पद कंज पूर्णिमा वर्मन जी  अंतरजाल पर    पूर्णिमा वर्मन अपने  साहित्यिक  दायित्व का निर्वहन करते जो भी कुछ दे रहीं हैं उससे उनकी कर्मशील प्रतिबद्धता  उज़ागर होती है. अगर मैं नेट पर हूं तो पूर्णिमा वर्मन, बहन श्रृद्धा जैन और भाई समीरलाल की वज़ह से इनका कर्ज़ उतार पाना मेरे लिये इस जन्म में असम्भव है... हिंदी विकी पर उनका परिचय कुछ इस तरह है " पूर्णिमा वर्मन   (जन्म २७ जून, १९५५,   पीलीभीत   ,   उत्तर प्रदेश ) [1] , जाल-पत्रिका   अभिव्यक्ति   और   अनुभूति   की संपादक है।   पत्रकार   के रूप में अपना कार्यजीवन प्रारंभ करने वाली पूर्णिमा का नाम   वेब   पर   हिंदी   की स्थापना करने वालों में अग्रगण्य है। उन्होंने प्रवासी तथा विदेशी हिंदी लेखकों को प्रकाशित करने तथा अभिव्यक्ति में उन्हें एक साझा मंच प्रदान करने का महत्वपूर्ण काम किया है।   माइक्रोसॉफ़्ट   का यूनिकोडित हिंदी   फॉण्ट   आने से बहुत पहले   हर्ष कुमार   द्वारा निर्मित   सुशा फॉण्ट   द्वारा उनकी जाल पत्रिकाएँ अभिव्यक्ति तथा अनुभूत

तुम परसाई जी के शहर से हो..?

तुम परसाई जी के शहर से हो..? न ...! जबईपुर से हो न....? हां....! तो उनका ही शहर है न...! न पत्थरों का है...! हा हा समझा तुम उनके शहर के ही हो.. न... उनके मुहल्ले का हूं.. राइट टाउन में ही रहते थे. उनके हाथ की गटागट वाली गोली भी खाई है. बचपने में. कालेज के दिनों में तो उनका कद समझ पाया था. सो बस उनके चरणों की तरफ़ बैठने की इच्छा हुआ करती थी.    परसाई जी पर बतियाते बतियाते जबलपुर प्लेट फ़ार्म पर गाड़ी आ टिकी... चाय बोलो चाय गरम. के अलावा और भी कुहराम सुनाई पड़ा भाई.. आपका स्टेशन आ गया.. आप तो घर पहुंच जाओगे मुझे तो कटनी से   उत्कल पकड़नी है. राम जुहार के बाद सज्जन से बिदा ली अपन भी निकल लिये. आधे घंटे बाद बीना एक्सप्रेस भी  निकल गई होगी.  शहर परसाई का ही तय है... पर केवल  परसाई  का.. न उनको उनके समय नकारने वालों का भी है. अक्सर ऐसा ही होता है... जीवन काल में किसी को जो नहीं भाता उसे बाद में खटकता है.. ओशो परसाई के बीच तत्समय जो शिखर वार्ताएं हुआ करती थीं एक सकारात्मक साहित्य के रूप में उसे देखा समझा जा सकता है. परसाई जी और ओशो के जन्मस्थली  बीच कोई खास अंतर न था . होशंगाबा

हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन : फ़िरदौस खान

[मेरी छोटी बहन  फ़िरदौस एक सामाजिक चिंतक एवम मेरी पसंदीदा लेखिका हैं. आज़ तक फ़िरदौस से मिलने का मौका मुझे नही मिला पर लगता है कि वो मेरे साथ है... राखी पर छोटी बहन को असीम स्नेह के साथ उनका आलेख प्रस्तुत है... firadous की लेखनी के तेवर उनके ब्लाग मौज़ूद है " मेरी-डायरी "  ] हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. हालत यह है कि बेटे के लिए दुल्हन तलाशने वाले मुस्लिम अभिभावक लड़की के गुणों से ज़्यादा दहेज को तरजीह दे रहे हैं. एक तऱफ जहां बहुसंख्यक तबक़ा दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहा है, वहीं मुस्लिम समाज में दहेज का दानव महिलाओं को निग़ल रहा है. दहेज के लिए महिलाओं के साथ मारपीट करने, उन्हें घर से निकालने और जलाकर मारने तक के संगीन मामले सामने आ रहे हैं. बीती एक जुलाई को हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के गांव गुआवा निवासी नसीमा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. करनाल ज़िले के गांव मुरादनगर निवासी नज़ीर की बेटी नसीमा का विवाह क़रीब छह साल पहले गांव गुआवा के सुल्तान के साथ हुआ था. 26 वर्षीय नसीमा की तीन बेटियां हुईं. उसके परिवार के लोगों का आरोप

वर्जनाओं के विरुद्ध एकजुट : सोच और शरीर

लाइफ़-स्टाइल में बदलाव से ज़िंदगियों में सबसे पहले आधार-भूत परिवर्तन की आहट के साथ कुछ ऐसे बदलावों की आहट सुनाई दे रही है जिससे सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन अवश्यंभावी है. कभी लगता था मुझे भी कि सामाजिक-तानेबाने के परम्परागत स्वरूप को आसानी से बदल न सकेगा . किंतु पिछले दस बरसों में जिस तेजी से सामाजिक सोच में बदलाव आ रहे हैं उससे तो लग रहा कि बदलाव बेहद निकट हैं शायद अगले पांच बरस में... कदाचित उससे भी पहले .कारण यह कि अब "जीवन को कैसे जियें ?" सवाल नहीं हैं अब तो सवाल यह है कि जीवन का प्रबंधन कैसे किया जाए. कैसे जियें के सवाल का हल सामाजिक-वर्जनाओं को ध्यान रखते हुए खोजा जाता है जबकि जीवन के प्रबंधन के लिये वर्जनाओं का ध्यान रखा जाना तार्किक नज़रिये से आवश्यक नहीं की श्रेणी में रखा जाता है.जीवन के जीने के तौर तरीके में आ रहे बदलाव का सबसे पहला असर पारिवारिक व्यवस्थापर खास कर यौन संबंधों पड़ता नज़र आ रहा है. बेशक विवाह नर-मादा के व्यक्तिगत अधिकार का विषय है पर अब पुरुष अथवा महिला के जीवन की व्यस्तताओं के चलते उभरतीं दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन क

सुभद्राकुमारी चौहान जी को नमन

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी , बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी , गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी , दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में , वह तलवार पुरानी थी , बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी , खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। कानपूर के नाना की , मुँहबोली बहन छबीली थी , लक्ष्मीबाई नाम , पिता की वह संतान अकेली थी , नाना के सँग पढ़ती थी वह , नाना के सँग खेली थी , बरछी ढाल , कृपाण , कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी , बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी , खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार , देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार , नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार , सैन्य घेरना , दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार। महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी , बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी , खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। हुई वीरता की वैभव के साथ