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मई, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक वसीयत : अंतिम यात्रा में चुगलखोरों को मत आने देना

साभार in.com एक बार दिन भर लोंगों की चुगलियों से त्रस्त होकर एक आदमी बहुत परेशान था. करता भी क्या किससे लड़ता झगड़ता उसने सोचा कि चलो इस तनाव से मुक्ति के लिये एक वसीयत लिखे देता हूं सोचते सोचते कागज़ कलम उठा भी ली कि बच्चों की फ़रमाइश के आगे नि:शब्द यंत्रवत मुस्कुराता हुआ निकल पड़ा बाज़ार से आइसक्रीम लेने . खा पी कर बिस्तर पर निढाल हुआ तो जाने कब आंख की पलकें एक दूसरे से कब लिपट-चिपट गईं उस मालूम न हो सका. गहरी नींद दिन भर की भली-बुरी स्मृतियों का चलचित्र दिखाती है जिसे आप स्वप्न कहते हैं .. है न..?    आज  वह आदमी स्वप्न में खुद को अपनी वसीयत लिखता महसूस करता है. अपने स्वजनों को संबोधित करते हुये उसने अपनी वसीयत में लिखा मेरे प्रिय आत्मिन  सादर-हरि स्मरण एवम असीम स्नेह ,                    आप तो जानते हो न कि मुझे कितने कौए कोस रहे हैं . कोसना उनका धर्म हैं .. और न मरना मेरा.. सच ही कहा है किसी ने कि -"कौए के कोसे ढोर मरता नहीं है..!"ढोर हूं तो मरना सहज सरल नहीं है. उमर पूरी होते ही मरूंगा.मरने के बाद अपने पीछे क्या छोड़ना है ये कई दिनौं से तय करने की कोशिश में था त

बिजली दफ़्तर वाला बाबू जो रोटी के अलावा गाली भी खाता है..

                       दीक्षित जी के लबों पर मातृभग्नि अलंकरण यूं बसते हैं गोया किसी सर्वग्य विप्र के मुंह में वेद मंत्र. दीक्षित जी एकता नगर के निवासी श्रीमन दीक्षित जी के रहते मुहल्ले की एकता कभी भंग नहीं होती. आठ-दस आवारा किस्म के लौंडे-लपाड़ियों का झुण्ड विप्रवर के इर्द-गिर्द हुआ करता है. कारण कि कभी कभार भाई "अद्धा-पौआ" की भेंट दे देते हैं. अब बताएं... इन लड़कों को अगर मुफ़्त में वो मिल जाए जिसकी वज़ह से ग़ालिब मशहूर शायर हुए. अब इन मुस्टण्डों को दीक्षित साहब को बकौल ग़ालिब  " एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब .देना ही है न . तो क्या देंगे  ? " लिहाज़ा हज़ूर का जिस वक़्त आदेश हुआ सेना कूच कर देती. मुए इतनी बात अपने मां-बाप की मानते तो यक़ीनन अब तक किसी रईसजादे के दामाद होते. अब आप इन मयकशों को बुरा न कहिये चचा ग़ालिब कह ही चुके हैं  " "ग़ालिब" बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहें जिसे "     मेरी नज़र से देखिये इनकी हैसियत मालवीय-चौक पे घूमते उस सांड़ से कमतर नहीं जिसके जिस्म के दक्षिणावर्त्य में त्रिशूल क

रवींद्र प्रभात वार्ता से वार्ता : मिसफ़िट : सीधीबात पर

एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य , संस्कृति और सरोकार से  एकसाथ रूबरू होते हैं .  जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां  मिलती है.  जो आपकी सृजनात्कता को  पूरे विश्व की सृजनात्मकता  से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.               Free live streaming by Ustream

एक हैलो से हिलते लोग..!!

छवि साभार : समय लाइव        उस वाले  मुहल्ले में अकेला रहने वाला वह बूढ़ा रिटायर्ड अफ़सर .मुझे सुना दिया करता था.अपना अतीत..बेचारा मारे ईमानदारी सबसे खुल्लम-खुला पंगे लेता रहा ईमानदार होने के कई नुकसान होते हैं.   फ़ूला यानी उसकी  सतफ़ेरी बीवी कई बार उसे समझा चुकी थी कि -”अब, क्या करूं तुम पे ईमानदारी का भूत सवार है बच्चों का क्या होगा गिनी-घुटी पगार में कुछ किया करो...!  पर बीवी का भी कहा न माना .  बार बार के तबादलों से हैरान था. एक पोस्ट  पे बैठा बैठा रिटायर हो गया. भगवान के द्वारे पर न्याय का विश्वासी  उसे अपने जीवन काल में कभी न्याय मिला हो उसे याद नहीं भगवान की अदालत का इंतज़ार करता वो वाक़ई कितना धैर्यवान दिखता है अब जो बात बात पे उलझा करता था .                                 सात बच्चों का बाप आज़ औलादों से कोसा जा रहा है-"वर्मा जी भी तो बाप हैं उनके भी तो आपसे ज़्यादा औलादें थीं सब एक से बढ़कर एक ओहदेदार हैं..एक तुम थे कि ढंग से हायरसेकंड्री भी न पढ़ा पाए..वो तो नाना जी न होते तो .!" फ़ूला के मरने के बाद एक एक कर औलादों ने  बाप से विदा ली. वार त्यौहार बच्

छिपाती थी बुखारों को जो मेहमां कोई आ जाए : मातृ दिवस पर एक गीत

मां सव्यसाची स्वर्गीया प्रमिला देवी ही क्यों कर सुलगती है वही क्यों कर झुलसती है ? रात - दिन काम कर खटती , फ़िर भी नित हुलसती है . न खुल के रो सके न हंस सके पल -- पल पे बंदिश है   हमारे देश की नारी , लिहाफ़ों में सुबगती है !                                                                                       वही तुम हो कि जिसने नाम उसको आग दे डाला वही हम हैं कि जिनने उसको हर इक काम दे डाला सदा शीतल ही रहती है भीतर से सुलगती वो ..! कभी पूछो ज़रा खुद से वही क्यों कर झुलसती है .? मुझे है याद मेरी मां ने मरते दम सम्हाला है . ये घर , ये द्वार , ये बैठक और ये जो देवाला है ! छिपाती थी बुखारों को जो मेहमां कोई आ जाए कभी इक बार सोचा था कि " मां " ही क्यों झुलसती है ? तपी वो और कुंदन की चमक हम सबको पहना दी पास उसके न थे - गहने मेरी मां , खुद ही गहना थी ! तापसी थी मेरी मां , नेह की सरिता थी वो अविरल उसी की याद मे