शुक्रवार, अगस्त 30

हम भी पिटे थे जब रुपया गिरा था जेब से

वन इंडिया से साभार 
हम भी पिटे थे जब रुपया गिरा था जेब से
हमाए बाबूजी भी बड़े तेज़ तर्रार थे हम जैसे 50 साल के पार वालों के बाबूजीयों की  
हिटलरी सर्वव्यापी है. हुआ यूं कि हमारी लापरवाही की वज़ह से हम हमारी जेब का एक रुपया ट्प्प से गिरा घर आए हिसाब पूछा एक रुपिया कम मिला ... साहू जी ( किरानेवाले) कने गये 
हमने पूछा भैया हमारा रुपिया गिर गया इधर ! उनने भी खोजा न मिला ....वापस घर पहुंचे . 
     घर पहुंचते ही एक रुपिए के पीछे बाबूजी के चौड़े हाथ वाले दो झापड़ ने हमको रुपैये की कीमत समझा दी...
वैसे हमाये वित्त मंत्री जी भी पचास के पार के हैं.. उनके बाबूजी हमारे बाबूजी टाइप के न थे . .. हो सकता है हों पर हमारी तरह तमाचा न मिला हो जो भी हो भारत का रुपिया गिरा है तो उसका दोषी भारत के वित्तमंत्री तो हैं ही हम आप कम नहीं हैं.   यानी हमारी विदेशी आस्थाओं में इज़ाफ़ा हो रहा है.विदेशी  सोना खरीदो सेलफ़ोन खरीदो, पक्का है विदेशी मुद्रा में भुगतान करना होगा. हमारा खज़ाना खाली होना तय है. 
आभार sealifegifts
   मैं पूछता हूं  आर्थिक समझ कितने भारतियों को है..? शायद कुछ ही लोग हैं पर रुपया गिरा तो किसे गाली देना है ये सबको मालूम है. लोकप्रिय योजनाएं, विदेशी निवेशकों के प्रति हमारी सोच उत्पादन की बज़ाय अपने अनाधिकृत अधिकारों के प्रति हमारा रुझान अर्थ व्यवस्था के खिलाफ़ हैं. आयात नीति भी कहीं न कहीं हमारे प्रतिकूल है.. सब कुछ प्रतिकूल रहे तो भी आम आदमी चाहे तो क्षणिक वैभव प्रदर्शन को प्रदर्शित करने वाली विदेशी वस्तुओं के प्रति उदासीन हो जाए तो हम अपनी अर्थ-व्यवस्था स्वयमेव सुधार लेंगे. 
        अब राज्यों  को भी विदेशी निवेशकों में विश्वास जमाने की ज़रूरत है. सोशल साइटस पर डालर के मुक़ाबले  रुपए गिरने पर किसम किसम के संवाद जारी हैं. मुझे तो लगता है हम सब उन जाल में फ़ंसे तोतों की तरह  हैं जो जो ये रट चुके थे "शिकारी आता है दाने का लोभ दिखाता है लोभ में मत पड़ो ..!" 
 हम उन कबूतरों की तरह क्यों नहीं एक साथ उड़ते कि अगर जाल में फ़ंसे भी तो जाल सहित उड़ जाएं.. 

गुरुवार, अगस्त 29

स्वातंत्र्यवीर श्री मांगीलाल गुहे दिवंगत



श्रीयुत मांगीलाल जी गुहे दिवंगत


90 वर्षीय क्रांतिकारी स्वतन्त्रता संग्राम

सेनानी श्रीयुत गुहे जी का दु:खद निधन

आज प्रात: जबलपुर में हो गया। अंतिम 

यात्रा 

 दिनांक 30.9.2013





 ( प्रात: 10 बजे) को उनके निवास 

गौरैया प्लाट मदन महल जबलपुर से 

ग्वारीघाट

मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान करेगी . नार्मदीय 

ब्राह्मण समाज एवं

परिजन - क्रांतिवीर श्रीयुत गुहे जी को 

विनत 

श्रद्धांजलि एवं 


शोकाकुल परिवार को दुःख सहने की शक्ति हेतु 

माँ नर्मदा से प्रार्थना रत हैं

बुधवार, अगस्त 28

सुर्खियों से दूर रहे स्वातंत्र्यवीर : श्री मांगीलाल गुहे

श्रीयुत गुहे ने गांधी जी के निर्देशों पर सदा अमल किया 1942 में महा. गांधी के “करो या मरो” नारे से प्रभावित होकर अंग्रेज सरकार की पत्राचार व्यवस्था को खत्म करने हरदा के लेटर बाक्सों को बम से नेस्तनाबूत किया,साथ ही डाक गाड़ी के दो डब्बों के बीच यात्रा करते हुए रस्सी में हंसिया बांध कर रेल लाइन के किनारे के टेलीफ़ोन तारों को काटा ताकि टेलीफ़ोनिक एवम टेलीग्राफ़िक संचार व्यवस्था छिन्न भिन्न हो हुआ यही .उनकी ज़रा सी चूक जान लेवा हो सकती थी. पर युक्तियों और सतर्क व्यक्तित्ववान श्री गुहे ऐसा कर साफ़ बच निकले. श्री गुहे बताते हैं कि मुझसे लोग दूरी बनाते थे . ऐसा स्वभाविक था. लोग क्यों अग्रेजों के कोप का शिकार होना चाहते.
श्रीयुत गुहे हमेशा कुछ ऐसा कर गुज़रते जो विलायती कानून की खिलाफ़त और बगावत की मिसाल होता पर हमेशा वे सरकारी की पकड़ में नहीं आ पाते .कई बार ये हुआ कि अल्ल सुबह हरदा की सरकारी बिल्डिंग्स पर यूनियन जैक की जगह तिरंगा दिखाई देता था. ये करामात उसी क्रांतिवीर की थी जिसे तब उनकी मित्र मंडली मंगूभाई के नाम से सम्बोधित पुकारती थी.उनका एक ऐसा मित्र भी था जो सरकारी रिश्वत की गिरफ़्त में आ गया उसने श्री गुहे को बंदी बनवा दिया. जब मैने मित्र के नाम का उल्लेख करने की अनुमति चाही तो दादाजी ने कहा-”मुझमें किसी से कोई रागद्वेष के भाव नहीं मैं तो देश को आज़ाद हवा दिलाना चाहता था मेरा उद्देश्य पूर्ण हुआ.मै उसे आज भी मित्र मानता हूं हो सकता है कि उसका परिवार मेरी गिरफ़्तारी के धन से भोजन कर सका हो.अथवा उसकी ज़रूरते पूरी हुईं हों. .!”
ऐसे महान विचारक श्रीयुत गुहे जी पर हमें गर्व है.
बरतानिवी सरकार की टेलीग्राफ़िक संचार व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने हंसिये को रस्सी से बांधकर हावड़ा मेल में बैठकर रेलवे लाइन के किनारे वाले टेलीफ़ोन के तार घात लगाके काटे जो एक दुस्साहसिक कार्य था. श्री गुहे जी को उनके एक सहयोगी आंदोलनकारी ने अंग्रेज सरकार से रिश्वत लेकर जेल भिजवाया. वे 21 माह तक जेल में रहे ….
सदा ही हौसलों से संकटों समस्याओं को चुनौती देने वाले श्री गुहे जी का जन्म 10 अक्टूबर 1924 को हरदा में हुआ. आपके पिता श्री शिवचरण गुहे कृषक थे.ये दौर भारतीय कृषकों के लिये अभाव एवम संघर्ष का दौर था. एक ओर अभाव दूसरी ओर सामाजिक अंग्रेज़ सरकार की दमनकारी नीतियों से किशोरावस्था में ही विद्रोही हो गये थे.वे विद्रोही अवश्य थे किंतु विध्वंसक नहीं. ऐसे कई अवसर भी आए जब उनका आक्रोश झलकता साफ़ दिखता था पर आक्रोश सदा विसंगतियों के खिलाफ़ होता था. उनके व्यक्तित्व में बालसुलभ भोले पन की आभा उनके जानने वालों ने अक्सर देखी. पर सत्य तक पंहुचते ही वे गले लगाना भी नहीं भूले. गांधीजी के आह्वानों का असर उनके किशोर मन पर अवश्य पड़ता था. हमसे उनकी हुई कई वार्ताओं में अक्सर हमें महसूस हुआ कि कभी भी अन्याय को सहन न करने वाले दादा जी का सेनानी होना स्वभाविक ही रहा होगा.उनके संवादों में सादगी, लोगों के प्रति विश्वास का भाव उनकी गुणात्मक विशेषता थी. स्वभाव से घुमक्कड़ श्री गुहे ने सारे देश का भ्रमण किया तीर्थ यात्राएं तो एकाधिक बार कर चुके थे. अगर यह कहा जावे कि जबलपुर में गुहे जी के समकालीन नार्मदीय बुज़ुर्गों में शक्ति का संचार अगर हुआ तो गुहे जी की वज़ह से ही हुआ ये तय है.
मंगू भैया की गली स मत जाजे रे........!! 
मंगू भैया अपने दो मंज़िला पैत्रक आवास पर अक्सर थैली में पत्थर लेकर बैठा करते थे. निशाना उन पर साधा जाता था जो फ़िरंगीयों की नौकरी करते या फ़िरंगी होते. चोट किसी को नहीं लगती पर इस बात का संदेश अवश्य पहुंचता होगा हरदा वासियों को कि फ़िरंगियों की गुलामी करना ठीक नहीं.
अगर उस दौर को महसूस करें तो आप ये आवाज़ भी महसूस करेंगे जो कदाचित कोई माता पिता अपने नौकरी शुदा बच्चों के लिये होती होगी जिसमें ये कहा जा रहा हो-“ मंगू भैया की गली स मत जाजे रे...मंगू भैयो पत्थर मारच “
जेल में हुए अत्याचार...............!!
 विश्व को मानवाधिकार के मुद्दे पे घेरने वाले यूरोपीय देश शेष देशों की जेलों के बारे में खूब नसीहतें देतीं हैं पर ब्रिटिश उपनिवेशों की जेलों में क्रूरता पूर्ण यातनाओं के किस्से स्वाधीनता सेनानियों के परिजन जानते हैं . आप क्रिमिनल्स से अधिक कष्ट दी जाती थी. दादा जी ने जैसा बताया कि होशंगाबाद की जेल में उनको घास की साग और रेतीले आटे से बनी रोटियां दी जाती थीं.. !!
सबसे मित्रवत व्यवहार...!!
बच्चे,बूढ़े,युवा, सबके साथ मैत्री पूर्ण व्यवहार गुहे जी के व्यक्तित्व को अधिक आकर्षक बनाने में सहायक सिद्ध हुआ.
दुबेजी ने पहचान लिया था... .
हरदा के मजिस्ट्रेट श्री दुबे जी ने श्रीयुत गुहे जी को आंदोलन के कारण कारागार में भेजा था.. आज़ाद भारत में सन 1948 में उनको आर्डिनेन्स फ़ैक्ट्री जबलपुर में नियुक्ति पत्र देते वक्त पहचाना और बड़े आत्मीयता और सम्मान से नियुक्ति पत्र दिया
प्रमोशन के साथ क्लर्क भी दिया.
 अच्छे कार्यों की वज़ह से गुहे जी को दो बार विशिष्ट सेवा पदक मिले. विशेष पदोन्नति के पूर्व रिकार्ड लिखने में गुहे जी ने जब असमर्थता व्यक्त की तो फ़ैक्ट्री प्रशासन ने उनको एक लिपिक की सुविधा भी मुहैया कराई. श्री गुहे सेवानिवृत्ति के समय चार्जमैन के पद पर थे .
साहित्यकार भौंचक रह गये थे :-
आज़ादी की पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री जी ने ताम्रपत्र से समादरित किया था गुहे जी को . इसी क्रम में संस्कारधानी की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था “मिलन” ने दादाजी को “शौर्य-चक्र” प्रदान किया . मातृज्योति भवन में शहर के सारे साहित्यकार थे मूर्धन्य वक्ताओं की कमी भी न थी उस हाल में. दादाजी बहुत मान मनुहार के बाद मंच पर बमुश्किल राजी हुए थे. पर मुझ पर बंधन लगाया कि मैं उनको भाषण के लिये न बुलवाऊं. मैने विश्वास दिलाया पर सदन ने उनसे वक्तव्य का आग्रह किया तो गुहे जी इंकार न कर सके . और स्वतंत्रता के पूर्व एवम बाद के सामाजिक राजनैतिक आर्थिक साहित्यिक घटनाक्रम एवम वातावरण पर ऐसे प्रहार किये कि जबलपुर के साहित्यकार भौंचक रह गये. अंतत: सारे उत्तरवर्ती वक्ताओं ने अपने भाषण में एक एक कर गुहे जी वक्तव्य के अंश शामिल किये . पूरा कार्यक्रम गुहे दादाजी पर केंद्रित हो गया था.
·         श्रीयुत पं. मांगीलाल गुहे 
·         पिता स्व.शिवकरण गुहा “रायली वाले बाबूजी” ( गोदड़ी वाले)
·         माता   : गं. तु. सोना बाई
·         पत्नि    : ग. तु. गायत्री देवी सुपुत्रि स्व. जागेश्वर पटवारी सन्यासा  
·         जन्म :- 10.10.1924,
·         जन्म स्थान :- हरदा
·         विचारधारा :- गांधीवादी
·         पुत्र :- इंजि. श्री गोविंद गुहा,( भोपाल ), श्री भगवान दास जी गुहा ( रायपुर ), अनिल दत्त गुहा, सुनील दत्त गुहा,
सुपुत्री दामाद  :- श्रीमति आशा पाराशर, श्री दिनेश पाराशर छिपावड़,   
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मंगलवार, अगस्त 27

यमुनाघाट चित्रकला : अभिव्यक्ति पर

अभिव्यक्ति : सुरुचि की - भारतीय साहित्य, संस्कृति, कला और दर्शन पर आधारित।

बंदऊं गुरु पद कंज
पूर्णिमा वर्मन जी 
अंतरजाल पर    पूर्णिमा वर्मन अपने  साहित्यिक  दायित्व का निर्वहन करते जो भी कुछ दे रहीं हैं उससे उनकी कर्मशील प्रतिबद्धता  उज़ागर होती है. अगर मैं नेट पर हूं तो पूर्णिमा वर्मन, बहन श्रृद्धा जैन और भाई समीरलाल की वज़ह से इनका कर्ज़ उतार पाना मेरे लिये इस जन्म में असम्भव है...
हिंदी विकी पर उनका परिचय कुछ इस तरह है
"पूर्णिमा वर्मन (जन्म २७ जून, १९५५, पीलीभीत , उत्तर प्रदेश)[1], जाल-पत्रिका अभिव्यक्ति और अनुभूति की संपादक है। पत्रकार के रूप में अपना कार्यजीवन प्रारंभ करने वाली पूर्णिमा का नाम वेब पर हिंदी की स्थापना करने वालों में अग्रगण्य है। उन्होंने प्रवासी तथा विदेशी हिंदी लेखकों को प्रकाशित करने तथा अभिव्यक्ति में उन्हें एक साझा मंच प्रदान करने का महत्वपूर्ण काम किया है। माइक्रोसॉफ़्ट का यूनिकोडित हिंदी फॉण्ट आने से बहुत पहले हर्ष कुमार द्वारा निर्मित सुशा फॉण्ट द्वारा उनकी जाल पत्रिकाएँ अभिव्यक्ति तथा अनुभूति अंतर्जाल पर प्रतिष्ठित होकर लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी थीं।
वेब पर हिंदी को लोकप्रिय बनाने के अपने प्रयत्नों के लिए उन्हें २००६ में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद,साहित्य अकादमी तथा अक्षरम के संयुक्त अलंकरण अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान, २००८ में रायपुर छत्तीसगढ़की संस्था सृजन सम्मान द्वारा हिंदी गौरव सम्मान[2], दिल्ली की संस्था जयजयवंती द्वारा जयजयवंती सम्मानतथा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पद्मभूषण डॉ॰ मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार [3]से विभूषित किया जा चुका है।[4]उनका एक कविता संग्रह "वक्त के साथ" नाम से प्रकाशित हुआ है।[5] संप्रति शारजाह, संयुक्त अरब इमारात में निवास करने वाली पूर्णिमा वर्मन हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय विकास के अनेक कार्यों से जुड़ी हुई हैं।[6]"
साभार :- विकी पीडिया
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भारत की समृद्ध कला परंपरा में लोक कलाओं का गहरा रंग है। काश्मीर से कन्या कुमारी तक इस कला की अमरबेल फैली हुई है। कला दीर्घा के इस स्तंभ में हम आपको लोककला के विभिन्न रूपों की जानकारी देते हैं। अभिव्यक्ति के ताज़ा   अंक में प्रस्तुत है यमुनाघाट चित्रकला  के विषय में -
यमुना नदी के दोनों किनारों पर बसा वृंदावन, मथुरा जिले में एक छोटा सा रमणीक नगर है। महाभारत महाकाव्य के नायक श्रीकृष्ण की लीला स्थली यह नगर तीर्थों में प्रमुख है। चम्पक वनों में विहार करते, माखन चुराते और बृजबालाओं से रास रचाते श्रीकृष्ण की अनेक कथाओं और वर्णनों में आने वाला यह नगर कृष्ण के अनेक भक्त कवियों और कलाकारों की कार्यस्थली है। साथ ही यह नगर अपनी कला परंपरा के लिये भी विश्व विख्यात है।

मंदिरों की दीवारों पर बनाई गयी चित्रकला और पत्थरों पर उत्कीर्ण कलाकारी हजारों वर्षों पुरानी है। अनेक राजा आए और गये लेकिन यह लोक कला आज भी कलाकारों के बीच परंपरागत रूप में यमुनाघाट चित्रकला के रूप में जीवित है। समय के साथ मुगल काल में कुछ चित्रकारों ने इसे लघुचित्र शैली में विकसित किया और १९ वीं शती में अमूर्त के युग में इसने भी आधुनिकता का जामा पहना लेकिन लोक कला के प्रेमियों और कलाकारों के बीच इसका मूल स्वरूप सदा जीवित रहा।

यमुनाघाट कलाकृतियों का प्रमुख विषय श्रीकृष्ण की लीलाएँ हैं। बाल लीलाएँ, माखन चोरी, राधाकृष्ण की प्रेम लीलाएँ, गोपियों के साथ महारास, राक्षस वध, गीता का उपदेश आदि महाकाव्य की अनेक प्रमुख घटनाओं को इस लोक कला में स्थान मिला है फिर भी अधिकता नदी और उसके आसपास के दृष्यों तथा बाललीलाओं की ही है। इसका कारण यह है कि कृष्ण का बचपन यहाँ व्यतीत हुआ था।

इन चित्रों की मुद्राएँ अत्यंत लुभावनी और आकर्षक होती हैं। बड़ी बड़ी बोलती हुई आँखें और मोहन की मनोहर मुस्कान बरबस आपको अपनी ओर आकर्षित करती है। पुरुष और स्त्री दोनों के ही शारीरिक गठन और अनुपात का सुन्दर ध्यान रखा जाता है। साथ ही वस्त्रों और आभूषणों को बारीकी से चित्रित करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

कागज के कपड़े और दीवार पर बनाई जाने वाली इस कला ने मुगल काल में जब मिनियेचर शैली को अपनाया तो कलाकृतियों में रंग के साथ सोने का काम भी होने लगा। वृंदावन के कन्हाई चित्रकार ने इस शैली को और अधिक विकसित किया और इसमे सच्चे रत्न आभूषणों को टाँकने का काम प्रारंभ कर के इस लोक कला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचा दिया। उन्हें इस प्राचीन लोक कला में नवीन प्रयोग के लिये पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

वृंदावन लोक कला के चित्र और नमूने वृंदावन और मथुरा में किसी भी पर्यटन केन्द्र से हर आकार और मूल्य में खरीदे जा सकते हैं। लेकिन जो लोग चालीस या पचास हज़ार यू एस डालर खर्च करना चाहते हैं उनको निश्चय ही वृंदावन के कन्हाई चित्रकार की वातानुकूलित कलादीर्घा तक जाना होगा जो अपने आप में एक दर्शनीय स्थल हैं।

गुरुवार, अगस्त 22

तुम परसाई जी के शहर से हो..?

तुम परसाई जी के शहर से हो..?
न ...!
जबईपुर से हो न....?
हां....!
तो उनका ही शहर है न...!
न पत्थरों का है...!
हा हा समझा तुम उनके शहर के ही हो..
न...
उनके मुहल्ले का हूं.. राइट टाउन में ही रहते थे. उनके हाथ की गटागट वाली गोली भी खाई है. बचपने में. कालेज के दिनों में तो उनका कद समझ पाया था. सो बस उनके चरणों की तरफ़ बैठने की इच्छा हुआ करती थी.
   परसाई जी पर बतियाते बतियाते जबलपुर प्लेट फ़ार्म पर गाड़ी आ टिकी... चाय बोलो चाय गरम. के अलावा और भी कुहराम सुनाई पड़ा भाई.. आपका स्टेशन आ गया.. आप तो घर पहुंच जाओगे मुझे तो कटनी से   उत्कल पकड़नी है. राम जुहार के बाद सज्जन से बिदा ली अपन भी निकल लिये. आधे घंटे बाद बीना एक्सप्रेस भी  निकल गई होगी.
 शहर परसाई का ही तय है... पर केवल परसाई का.. न उनको उनके समय नकारने वालों का भी है. अक्सर ऐसा ही होता है... जीवन काल में किसी को जो नहीं भाता उसे बाद में खटकता है..
ओशो परसाई के बीच तत्समय जो शिखर वार्ताएं हुआ करती थीं एक सकारात्मक साहित्य के रूप में उसे देखा समझा जा सकता है. परसाई जी और ओशो के जन्मस्थली  बीच कोई खास अंतर न था . होशंगाबाद के आस-पास की पैदाईश दौनो महर्षियों की थी. दौनों का व्यक्तित्व  सम्मोहक और अपनी अपनी खासियतों से लबरेज़ कहा जा सकता है. कल्पना वश दौनों की विचारशैलियों का सम्मिश्रण करना भी चाहो तो भी नर्मदा के दौनो तीर का मिलना सम्भव नहीं. पर क्रांतिकारी दौनों ही थे . एक ने परा को नकारने की कोशिश की तो दूसरे ने वर्तमान पर तीक्ष्ण वार करने में कोई कोताही नहीं बरती. टार्च तो दौनों ने बांटे . हां तो परसाई जी ने जो भी देखा लिक्खा अपनी स्टाइल में ओशो ने कहा अपनी स्टाइल में. पर आपसी वैचारिक संवादों से साहित्य-सृजन हुआ यह सच है.
                      परसाई जी का व्यंग्य करने का तरीका देखिये  "तस्करी सामान की भी होती है – और आध्यात्मिक तस्करी भी होती है. कोई आदमी दाढ़ी बढ़ाकर एक चेले को लेकर अमेरिका जाए और कहे, “मेरी उम्र एक हज़ार साल है. मैं हज़ार सालों से हिमालय में तपस्या कर रहा था. ईश्वर से मेरी तीन बार बातचीत हो चुकी है.” विश्वासी पर साथ ही शंकालु अमेरिकी चेले से पूछेगा – क्या तुम्हारे गुरु सच बोलते हैं? क्या इनकी उम्र सचमुच हज़ार साल है? तब चेला कहेगा, “मैं निश्चित नहीं कह सकता, क्यों कि मैं तो इनके साथ सिर्फ़ पाँच सौ सालों से हूँ.” " यहां समकालीन परिस्थिति पर प्रस्तुत वक्तव्य सार्वकालिक नज़र आ रहा है.
हां तो मित्रो मेरी मिसफ़िट बातों के बीच एक हक़ीक़त बताए देता हूं कि -
                             "परसाई के बाद कईयों की खूब चल निकली कई ने परसाई को ओढ़ा कई ने सिराहने रखा बस बिछा न पाये.. बिछा तो उनको जीते जी दिया था जबलपुर वालों नें.. बस छाती पे मूंग न दल पाए वैसे तो मूंग भी दल लेते पर मूंग क्या उनके मुंह मसूर के लायक न थे.. खैर छोड़ो परसाई की छाती पे दलहन दलने के जुगाड़ करने वालों में कई देवलोक वासी हो गए प उनका क्या जो परसाई को ओढ़ रहे हैं या सिराने रखे हैं.. अब इन महानुभावों पे क्या लिखूं.. इनका स्मरण कर उनके पुण्य स्मरण को आभासी नहीं बनाना चाहता हूं. एक प्रोफ़ेसर हैं बुंदेलखंड के न हरदा गये न टिमरनी ऐसा लिखा परसाई पे कि जैसे बस आज़ के वेद व्यास  वे ही हैं. किधर से का जोड़ा उनकी किताब में बांचते ही माथा पीट लिया.. परसाई जी का डी एन ए टेस्ट करने पे आमादा नज़र आए वो किताब में. आप तो जानते हो कि "गंज और नाखून" संग साथ होवें तो कितनी विषम स्थिति होती है  जी हां उतनी  ही मुश्किल जितना एक अधज्ञानी को कलम पकड़ा देने से होता है.
      ये कहना गलत है की परसाई किसी कुंठा का शिकार थे ऐसा मुझे नही लग रहा . आपकी आप जानें.  आपको लगे तो लगे.  समकालीन स्थितियां क्या थीं तब कमसिन न होता तो बयां अवश्य कर पाता पर जितना श्रुत हुआ उस आधार पर कह सकता हूं कि न तो परसाई जी की जमीन ओशो ने अपने नाम कराई थी न ही परसाई जी ने ओशो की दूकान से उधारी पे टार्च वगैरा ले गये थे.  पाज़िटिव नज़रिये से देखा जाए तो चेष्टा दौनों की सकारात्मक ही रही   परसाई जी और ओशो ऐसे चित्रक थे जो अपने अपने कैनवस पर रंग भरने में अपने अपने तरीके से तल्लीन रहे. पर फ़क्कड़ होने की वज़ह से मुझे सबसे क़रीब परसाई जी ही लगते हैं. सचाई को नज़दीक से महसूस कर  लिखने वाले परसाई जी ने भोलाराम के जीव देख कर व्यवस्था को जो तमाचा जड़ा उसकी गूंज आज भी सुनाई देती है.  पर मुए सरकारी लोग आज भी जस के तस हैं..
    बड़े साब छोटे साब,  बड़े बाबू छोटे बाबू आधारित व्यवस्था को बदलने की कोशिश परसाई जी ने तब कर  डाली थी जब  व्यवस्था में लचर पचर तत्व प्रारम्भ ही हुए थे.. अब उफ़्फ़ अब तो अर्रा सी रही है व्यवस्था..
   श्री लाल शुक्ल के रागदरबारी वाले  लंगड़ को नकल मिली तब जब कि वो चुक गया... उधर दबाव इतना बढ़ गया कि आप व्यवस्था को सुधार नहीं सकते व्यवस्था सुधारने के लिए आपको दायां बांया देखना होगा . न देखा तो दुर्गा शक्ति की मानिंद दबा दिये जाओगे. मीडिया की अपनी मज़बूरी है उसे भी नये विषय चाहिये.. नहीं तो कल आप खुद कहोगे क्या वही पुरानी चटाई बिछा देता है मीडिया... हम लेखकों की अपनी मज़बूरी हैं कित्ता लिखें हमारा लिखा कित्ते लोग बांचते हैं.. जो पढ़ते हैं वो केवल टाइम पास करते हैं.. यानी केवल चल रही है गाड़ी सब के सब फ़िल्म सियासत और स्टेटस से हट के कुछ सोचने समझने के लिये तैयार ही नहीं हैं ऐसे दौर में परसाई जी जैसा व्यक्तित्व अधिक आवश्यक है...परसाई के साहित्य में तलाश कीजिये परसाई जी को जो केवल मेरे जबलईपुर का नहीं पूरे देश का है.. बिहार के भी जहां मिड डे मील वाले बच्चों के जीव तड़प रहे हैं एक अदद न्याय के लिये...           

बुधवार, अगस्त 21

हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन : फ़िरदौस खान

[मेरी छोटी बहन  फ़िरदौस एक सामाजिक चिंतक एवम मेरी पसंदीदा लेखिका हैं. आज़ तक फ़िरदौस से मिलने का मौका मुझे नही मिला पर लगता है कि वो मेरे साथ है... राखी पर छोटी बहन को असीम स्नेह के साथ उनका आलेख प्रस्तुत है... firadous की लेखनी के तेवर उनके ब्लाग मौज़ूद है "मेरी-डायरी"  ]

हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. हालत यह है कि बेटे के लिए दुल्हन तलाशने वाले मुस्लिम अभिभावक लड़की के गुणों से ज़्यादा दहेज को तरजीह दे रहे हैं. एक तऱफ जहां बहुसंख्यक तबक़ा दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहा है, वहीं मुस्लिम समाज में दहेज का दानव महिलाओं को निग़ल रहा है. दहेज के लिए महिलाओं के साथ मारपीट करने, उन्हें घर से निकालने और जलाकर मारने तक के संगीन मामले सामने आ रहे हैं. बीती एक जुलाई को हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के गांव गुआवा निवासी नसीमा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. करनाल ज़िले के गांव मुरादनगर निवासी नज़ीर की बेटी नसीमा का विवाह क़रीब छह साल पहले गांव गुआवा के सुल्तान के साथ हुआ था. 26 वर्षीय नसीमा की तीन बेटियां हुईं. उसके परिवार के लोगों का आरोप है कि नसीमा को दहेज के लिए परेशान किया जाता था. इतना ही नहीं, बेटियों को लेकर भी उसे दिन-रात ताने सुनने को मिलते थे. उनका यह भी कहना है कि उसके पति सुल्तान ने दहेज न मिलने की वजह से उसे फांसी दे दी. पुलिस ने सुल्तान के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी के तहत दहेज हत्या का मामला दर्ज किया है.

हरियाणा के करनाल ज़िले के गांव जैनपुर के मुस्लिम परिवार की सुनीता के साथ की गई दरिंदगी को देखकर रूह कांप उठती है. उसका निकाह 23 फ़रवरी, 2003 को हरियाणा के ही जींद ज़िले के गांव शंबो निवासी शेर सिंह के साथ हुआ था. उसने अपनी ज़िंदगी को लेकर कई इंद्रधनुषी सपने देखे थे, लेकिन उसके पति शेर सिंह की दहेज की मांग ने उसके सारे सपने बिखेर दिए. उसका पति बार-बार उससे अपने मायके से मोटरसाइकिल लाने की मांग करता. इस बात को लेकर उनके बीच लड़ाई-झगड़े होते. उसके पिता की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह दहेज में अपनी बेटी को मोटरसाइकिल दे सकें. सुनीता की एक बेटी हुई, जिसका नाम सोनिया रखा गया. उसने सोचा कि औलाद होने के बाद शायद शेर सिंह सुधर जाए, लेकिन दहेज की मांग को लेकर उसने पत्नी को और ज़्यादा प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. 5 नवंबर, 2005 को शाम तक़रीबन सात बजे जब सुनीता खाना बना रही थी, तब शेर सिंह आया और उससे मोटरसाइकिल की बात करने लगा. सुनीता ने मायके से मोटरसाइकिल लाने से इंकार कर दिया. इस पर शेर सिंह ने जलती लालटेन उस पर फेंक दी, जिससे उसके कपड़ों में आग लग गई. वह बुरी तरह झुलस चुकी थी. उसे अस्पताल में दाख़िल कराया गया. शेर सिंह के ख़िलाफ़ पत्नी की हत्या की कोशिश के आरोप में धारा-307 के तहत मामला दर्ज किया गया. जींद के अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश जे एस जांग़डा ने 8 अगस्त, 2007 को शेर सिंह को पांच साल की सज़ा सुनाई. सुनीता को इंसाफ़ तो मिल गया, लेकिन उसके पूरे जिस्म पर आग से झुलस जाने के दाग़ हैं, जो उसके ज़ख़्म को ताज़ा बनाए रखते हैं. ऐसे मामले आए दिन सामने आ रहे हैं. इंडियन स्कूल ऑफ़ वुमेंस स्टडीज एंड डेवलपमेंट के सर्वे के मुताबिक़, शादी के सात साल के भीतर मुस्लिम महिलाओं की अप्राकृतिक मौतें सबसे ज़्यादा गुजरात में हुईं. उनमें से ज़्यादातर महिलाओं की मौत का कारण दहेज उत्पीड़न रहा.

क़ाबिले-ग़ौर है कि दहेज की वजह से लड़कियों को पैतृक संपत्ति के हिस्से से भी अलग रखा जा रहा है. इसके लिए तर्क दिया जा रहा है कि उनके विवाह और दहेज में काफ़ी रक़म ख़र्च की गई है, इसलिए अब जायदाद में उनका कोई हिस्सा नहीं रह जाता. ख़ास बात यह भी है कि लड़की के मेहर की रक़म तय करते वक़्त सैकड़ों साल पुरानी रिवायतों का वास्ता दिया जाता है, जबकि दहेज लेने के लिए शरीयत को ताख़ पर रखकर बेशर्मी से मुंह खोला जाता है. हालत यह है कि शादी की बातचीत शुरू होने के साथ ही लड़की के परिजनों की जेब कटनी शुरू हो जाती है. जब लड़के वाले लड़की के घर जाते हैं तो सबसे पहले यह देखा जाता है कि नाश्ते में कितनी प्लेटें रखी गई हैं यानी कितने तरह की मिठाई, सूखे मेवे और फल रखे गए हैं. इतना ही नहीं, दावतें भी मुर्ग़े की ही चल रही हैं यानी चिकन बिरयानी, चिकन क़ोरमा वग़ैरह. फ़िलहाल 15 से लेकर 20 प्लेटें रखना आम हो गया है और यह सिलसिला शादी तक जारी रहता है. शादी में दहेज के तौर पर ज़ेवरात, फ़र्नीचर, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, क़ीमती कपड़े और ताम्बे-पीतल के भारी बर्तन दिए जा रहे हैं. इसके बावजूद दहेज में कारें और मोटरसाइकिलें भी मांगी जा रही हैं, भले ही लड़के की इतनी हैसियत न हो कि वह इन वाहनों के तेल का ख़र्च भी उठा सके. जो अभिभावक अपनी बेटी को दहेज देने की हैसियत नहीं रखते, उनकी बेटियां कुंवारी बैठी हैं. मुरादाबाद की किश्वरी जीवन के 47 बसंत देख चुकी हैं, लेकिन अभी तक उनकी हथेलियों पर सुहाग की मेहंदी नहीं सजी. वह कहती हैं कि मुसलमानों में लड़के वाले ही रिश्ता लेकर आते हैं, इसलिए उनके अभिभावक रिश्ते का इंतज़ार करते रहे. वे बेहद ग़रीब हैं, इसलिए रिश्तेदार भी बाहर से ही दुल्हनें लाए. अगर उनके अभिभावक दहेज देने की हैसियत रखते, तो शायद आज वह अपनी ससुराल में होतीं और उनका अपना घर-परिवार होता. उनके अब्बू कई साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गए. घर में तीन शादीशुदा भाई, उनकी बीवियां और उनके बच्चे हैं. सबकी अपनी ख़ुशहाल ज़िंदगी है. किश्वरी दिन भर बीड़ियां बनाती हैं और घर का कामकाज करती हैं. अब बस यही उनकी ज़िंदगी है. उनकी अम्मी को हर वक़्त यही फ़िक्र सताती है कि उनके बाद बेटी का क्या होगा? यह अकेली किश्वरी का क़िस्सा नहीं है. मुस्लिम समाज में ऐसी हज़ारों लड़कियां हैं, जिनकी खु़शियां दहेज रूपी लालच निग़ल चुका है.

राजस्थान के बाड़मेर निवासी आमना के शौहर की मौत के बाद 15 नवंबर, 2009 को उसका दूसरा निकाह बीकानेर के शादीशुदा उस्मान के साथ हुआ था, जिसके पहली पत्नी से तीन बच्चे भी हैं. आमना का कहना है कि उसके अभिभावकों ने दहेज के तौर पर उस्मान को 10 तोला सोना, एक किलो चांदी के ज़ेवर, कपड़े और घरेलू सामान दिया था. निकाह के कुछ दिनों बाद ही उसके शौहर और उसकी दूसरी बीवी ज़ेबुन्निसा कम दहेज के लिए उसे तंग करने लगे. यहां तक कि उसके साथ मारपीट भी की जाने लगी. वे उससे एक स्कॉर्पियो गाड़ी और दो लाख रुपये मांग रहे थे. आमना कहती हैं कि उनके अभिभावक इतनी महंगी गाड़ी और इतनी बड़ी रक़म देने के क़ाबिल नहीं हैं. आख़िर ज़ुल्मो-सितम से तंग आकर आमना को पुलिस की शरण लेनी पड़ी. राजस्थान के गोटन की रहने वाली गुड्डी का क़रीब तीन साल पहले सद्दाम से निकाह हुआ था. शादी के वक़्त दहेज भी दिया गया था. इसके बावजूद शौहर और ससुराल के अन्य सदस्य दहेज के लिए उसे तंग करने लगे. उसके साथ मारपीट की जाती. जब उसने और दहेज लाने से इंकार कर दिया तो 18 अक्टूबर, 2009 को ससुराल वालों ने मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया. अब वह अपने मायके में है. मुस्लिम समाज में आमना और गुड्डी जैसी हज़ारों महिलाएं हैं, जिनका परिवार दहेज की मांग की वजह से उजड़ चुका है. यूनिसेफ़ के सहयोग से जनवादी महिला समिति द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दहेज के बढ़ रहे मामलों की वजह से मध्य प्रदेश में 60 फ़ीसद, गुजरात में 50 फ़ीसद और आंध्र प्रदेश में 40 फ़ीसद लड़कियों ने माना कि दहेज के बिना उनकी शादी होना मुश्किल हो गया है. दिल्ली की छात्रा परवीन का कहना है कि दहेज बहुत ज़रूरी है, क्योंकि लड़की जितना ज़्यादा दहेज लेकर जाती है, ससुराल में उसे उतनी ही ज़्यादा इज्ज़त मिलती है. वह कहती हैं कि उसके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं है और अभिभावक उसे ज़्यादा दहेज नहीं दे पाएंगे, इसलिए वह खु़द ही नौकरी करके अपने दहेज के लिए रक़म इकट्ठा करना चाहती है. ऐसी लड़कियों की भी कमी नहीं है, जो दहेज लेना चाहती हैं. इन लड़कियों का मानना है कि इस तरह उन्हें उनकी पुश्तैनी जायदाद से कुछ हिस्सा मिल जाता है. उनका कहना है कि इस्लाम में बेटियों को उनके पिता की जायदाद में से कुछ हिस्सा देने की बात कही गई है, लेकिन कितने अभिभावक ऐसा करते हैं? अगर दहेज के बहाने लड़कियों को कुछ मिल जाता है तो इसमें ग़लत क्या है? मगर जो माता-पिता ग़रीब हैं, वे अपनी बेटियों के लिए दहेज कहां से लाएंगे, इसका जवाब इन लड़कियों के पास नहीं है.

दहेज को लेकर मुसलमान एकमत नहीं हैं. जहां कुछ मुसलमान दहेज को ग़ैर इस्लामी क़रार देते हैं, वहीं कुछ मुसलमान दहेज को जायज़ मानते हैं. उनका तर्क है कि हज़रत मुहम्मद साहब ने भी तो अपनी बेटी फ़ातिमा को दहेज दिया था. ख़ास बात यह है कि दहेज की हिमायत करने वाले मुसलमान भूल जाते हैं कि पैग़ंबर ने अपनी बेटी को विवाह में बेशक़ीमती चीज़ें नहीं दी थीं. इसलिए उन चीज़ों की दहेज से तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि उनकी मांग नहीं की गई थी. अब तो लड़के वाले मुंह खोलकर दहेज मांगते हैं और लड़की के अभिभावक अपनी बेटी का घर बसाने के लिए हैसियत से बढ़कर दहेज देते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कितनी ही परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े. अमरोहा के परवेज़ आलम बताते हैं कि उन्होंने अपनी पुश्तैनी जायदाद में मिले घर के आधे हिस्से को बेचकर बड़ी बेटी की शादी कर दी थी, लेकिन यह देखकर दिल रो प़डता है कि वह अब भी सुखी नहीं है. उसके ससुराल वाले दहेज की मांग करते हैं. अगर बाक़ी बचा घर बेचकर उसे दहेज दे दूं तो अपने अन्य बच्चों को लेकर कहां जाऊंगा. छोटी बेटी के भी हाथ पीले करने हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं. अगर अल्लाह बेटियां दे तो उनके नसीब भी अच्छे करे और उनके माता-पिता को दौलत भी दे, साथ ही दहेज के लालचियों को तौफ़ीक़ दे कि वे ऐसी नाजायज़ मांगें न रखें. हैरत की बात यह भी है कि बात-बात पर फ़तवे जारी करने वाले मज़हब के नुमाइंदों को समाज में फैल रही दहेज जैसी बुराइयां दिखाई नहीं देतीं. शायद उनका मक़सद सिर्फ़ बेतुके फ़तवे जारी कर सुर्ख़ियां बटोरना या फिर मुस्लिम महिलाओं के दायरों को और मज़बूत करना होता है. इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले काफ़ी अरसे से आ रहे ज़्यादातर फ़तवे महज़ मनोरंजन का साधन साबित हो रहे हैं, वह चाहे मिस्र में जारी मुस्लिम महिलाओं द्वारा कुंवारे पुरुष सहकर्मियों को अपना दूध पिलाने का फ़तवा हो या फिर महिलाओं के नौकरी करने के ख़िलाफ़ जारी फ़तवा. अफ़सोस इस बात का है कि मज़हब की नुमाइंदगी करने वाले लोग समाज से जुड़ी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते. हालांकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम समाज में बढ़ती दहेज की कुप्रथा पर चिंता ज़ाहिर करते हुए इसे रोकने के लिए मुहिम शुरू करने की बात कही थी. बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य ज़फ़रयाब जिलानी के मुताबिक़, मुस्लिम समाज में शादियों में फ़िज़ूलख़र्ची रोकने के लिए इस बात पर भी सहमति जताई गई थी कि निकाह सिर्फ़ मस्जिदों में ही कराया जाए और लड़के वाले अपनी हैसियत के हिसाब से वलीमें करें. साथ ही इस बात का भी ख़्याल रखा जाए कि लड़की वालों पर ख़र्च का ज़्यादा बोझ न पड़े, जिससे ग़रीब परिवारों की लड़कियों की शादी आसानी से हो सके. इस्लाह-ए-मुआशिरा (समाज सुधार) की मुहिम पर चर्चा के दौरान बोर्ड की बैठक में यह भी कहा गया कि निकाह पढ़ाने से पहले उलेमा वहां मौजूद लोगों को बताएं कि निकाह का सुन्नत तरीक़ा क्या है और इस्लाम में यह कहा गया है कि सबसे अच्छा निकाह वही है, जिसमें सबसे कम ख़र्च हो. साथ ही इस मामले में मस्जिदों के इमामों को भी प्रशिक्षित किए जाने पर ज़ोर दिया गया था.

हरियाणा ख़िदमत सभा के मुख्य संयोजक मोहम्मद रफ़ीक़ चौहान का कहना है कि दहेज लेना ग़ैर इस्लामी है. यह एक सामाजिक बुराई है, जो धीरे-धीरे समाज को खोखला कर रही है. अभिभावकों को चाहिए कि वे दहेज मांगने वाले परिवार में अपनी बेटी की शादी न करें और ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज कराएं, क्योंकि लालच की कोई सीमा नहीं होती. साथ ही वे ऐसे व्यक्ति के साथ भी अपनी बेटी की शादी न करें, जिसकी पत्नी की दहेज की वजह से मौत हुई हो या उसे तलाक़ दे दिया गया हो. तभी इस बुराई को बढ़ने से रोका जा सकता है. सरकार ने क़ानून बनाया है, पीड़ितों को उसका इस्तेमाल करना चाहिए.

बहरहाल, मुस्लिम समाज में बढ़ती दहेज की कुप्रथा रोकने के लिए कारगर क़दम उठाने की ज़रूरत है. इस मामले में मस्जिदों के इमाम अहम किरदार अदा कर सकते हैं. वे नमाज़ के बाद लोगों से दहेज न लेने की अपील करें और उन्हें बताएं कि यह कुप्रथा किस तरह समाज के लिए नासूर बनती जा रही है. इसके अलावा महिलाओं को भी जागरूक करने की ज़रूरत है, क्योंकि देखने में आया है कि दहेज का लालच पुरुषों से ज़्यादा महिलाओं को होता है. अफ़सोस की बात यह भी है कि मुस्लिम समाज अनेक फ़िरक़ों में बंट गया है. अमूमन सभी तबक़े ख़ुद को असली मुसलमान साबित करने में जुटे रहते हैं और मौजूदा समस्याओं पर उनका ध्यान नहीं जाता है. जब तक सामाजिक बुराइयों पर खुलकर चर्चा नहीं होगी, तब तक उनके उन्मूलन के लिए भी माहौल तैयार नहीं किया जा सकता है. इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि समाज में फैली दहेज प्रथा जैसी बुराइयों के विरुद्ध विभिन्न मंचों से ज़ोरदार आवाज़ उठाई जाए.
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स्टार-व्यूज़-एजेंसी,

मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं

मेरे अल्फ़ाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख्यालात की तर्जुमानी करते हैं...क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं...फ़िरदौस ख़ान
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शनिवार, अगस्त 17

वर्जनाओं के विरुद्ध एकजुट : सोच और शरीर



लाइफ़-स्टाइल में बदलाव से ज़िंदगियों में सबसे पहले आधार-भूत परिवर्तन की आहट के साथ कुछ ऐसे बदलावों की आहट सुनाई दे रही है जिससे सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन अवश्यंभावी है. कभी लगता था मुझे भी कि सामाजिक-तानेबाने के परम्परागत स्वरूप को आसानी से बदल न सकेगा . किंतु पिछले दस बरसों में जिस तेजी से सामाजिक सोच में बदलाव आ रहे हैं उससे तो लग रहा कि बदलाव बेहद निकट हैं शायद अगले पांच बरस में... कदाचित उससे भी पहले .कारण यह कि अब "जीवन को कैसे जियें ?" सवाल नहीं हैं अब तो सवाल यह है कि जीवन का प्रबंधन कैसे किया जाए. कैसे जियें के सवाल का हल सामाजिक-वर्जनाओं को ध्यान रखते हुए खोजा जाता है जबकि जीवन के प्रबंधन के लिये वर्जनाओं का ध्यान रखा जाना तार्किक नज़रिये से आवश्यक नहीं की श्रेणी में रखा जाता है.जीवन के जीने के तौर तरीके में आ रहे बदलाव का सबसे पहला असर पारिवारिक व्यवस्थापर खास कर यौन संबंधों पड़ता नज़र आ रहा है. बेशक विवाह नर-मादा के व्यक्तिगत अधिकार का विषय है पर अब पुरुष अथवा महिला के जीवन की व्यस्तताओं के चलते उभरतीं दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन का अधिकार भी मांगा जावेगा कहना कोई बड़ी बात नहीं. वास्तव में ऐसी स्थिति को मज़बूरी का नाम दिया जा रहा है.फ़िलहाल तो लव-स्टोरी को हेट स्टोरी में बदलते देर नहीं लगती पर अब मुझे जहां तक आने वाले कल का आभास हो रहा है वो ऐसा समय होगा जो " दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन" को एक अधिकार के रूप में स्वीकारेगा. दूसरा पक्ष ऐसे अधिकार की मांग के प्रति सकारात्मक रुख अपनाएगा. उसका मूल कारण "सर्वथा दूरियां एवम व्यस्तता जो अर्थोपार्जक कारण जनित होगी"
यह कोई भविष्यवक़्तव्य नहीं है.. वरन तेजी से आ रहे बदलाव से परिलक्षित हो रही स्थिति का अनुमान है. जिसे कोई बल-पूर्वक नहीं रोक सकता.
सामाजिक व्यवस्था द्वारा जनित परम्परागत वर्जनाओं के विरुद्ध सोच और शरीर का खड़ा होना भारतीय परिवेश में महानगरों, के बाद नगरों से ग्राम्य जीवन तक असर डाल सकता है. 
आप हम भौंचक इस विकास को देखते रह जाएंगें. सेक्स एक बायोलाजिकल ज़रूरत है उसी तरह अपने पारिवारिक "समुच्चय में रहना" सामाजिक ज़रूरत है. आर्थिक कार्य का दबाव सबसे पहले इन्ही बातों को प्रभावित करेगा. तब दम्पत्ति बायोलाजिकल ज़रूरत को पूरा करते हुए पारिवारिक समुच्चय को भी बनाए रखने के लिये एक समझौता वादी नीति अपनाएंगें. हमारा समाज संस्कृति की बलात रक्षा करते हुए भी असफ़ल हो सकता है ऐसा नहीं है कि इसके उदाहरण अभी मौज़ूद नहीं हैं.बस लोग इस से मुंह फ़ेर रहे हैं.
पाश्चात्य व्यवस्था इस क़दर हावी होती नज़र आ रही है कि किसी को भी इस आसन्न ब्लैक होल से बचा पाना सम्भव नज़र नहीं आ रहा. हो सकता है मैं चाहता हूं कि मेरा पूरा आलेख झूठा साबित हो जाए जी हां परंतु ऐसा तब होगा जबकि जीवनों में स्थायित्व का प्रवेश हो ... ट्रक ड्रायवरों सा यायावर जीवन जीते लोग (महिला-पुरुष) फ़्रायड को तभी झुठलाएंगे जबकि उनका आत्म-बल सामाजिक-आध्यात्मिक चिंतन से परिपक्व हो पर ऐसा है ही नहीं. लोग न तो आध्यात्मिक सूत्रों को छू ही पाते हैं और न ही सामाजिक व्यवस्था में सन्निहित वर्जनाओं को. आध्यात्म एवम सामाजिक व्यवस्था के तहत बहुल सेक्स अवसरों के उपभोग को रोकने नैतिकता का ज्ञान कराते हुए संयम का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि एक और सामाजिक नैतिकता बनी रहे दूसरी ओर यौन जनित बीमारियों का संकट भी जीवनों से दूर रहे, जबकि विज्ञान कंडोम के प्रयोग से एस.टी.डी.(सेक्सुअली-ट्रांसमीटेड-डिसीज़) को रोकने का परामर्श मात्र देता है. 
आपको अंदाज़ा भी नहीं होगा कि दो दशक पहले बच्चे ये न जानते थे कि माता-पिता नामक युग्म उनकी उत्पत्ति का कारण है. किंतु अब सात-आठ बरस की उम्र का बच्चा सब कुछ जान चुका है. यह भी कि नर क्या है..? मादा किसे कहते हैं.. ? जब वे प्यार करते हैं तब “जन्म”-की घटना होती है. दूसरे शब्दों में कहें तो वे शारिरिक संपर्क को प्यार मानते हैं. 
सामाजिक व्यवस्था पाप-पुण्य की स्थितियों का खुलासा करतीं हैं तथा भय का दर्शन कराते हुए संयम का आदेश देतीं हैं वहीं दूसरी ओर अत्यधिक अधिकाराकांक्षा तर्क के आधार पर जीवन जीने वाले इस आदेश को पिछड़ेपन का सिंबाल मानते हुए नकार रहे हैं .. देखें क्या होता है वैसे सभी चिंतक मानस मेरी अनुभूति से अंशत: ही सही सहमत होंगे..........


शुक्रवार, अगस्त 16

सुभद्राकुमारी चौहान जी को नमन




सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में
, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की
, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम
, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह
, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल
, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार
,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
,
सैन्य घेरना
, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में
,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में
,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में
,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में
,
चित्रा ने अर्जुन को पाया
, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य
, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई
,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई
,
रानी विधवा हुई
, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया
,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है
, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
,
डलहौज़ी ने पैर पसारे
, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी
, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की
, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में
, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर
, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध
, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले
, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में
, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना
, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग
, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी
,
झाँसी चेती
, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ
, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर
, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
,
नाना धुंधूपंत
, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी
, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़
, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा
, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली
, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा
, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई
, कर सौ मील निरंतर पार, 
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार
,
विजयी रानी आगे चल दी
, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली
, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था
, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया
, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
,
किन्तु सामने नाला आया
, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा
, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक
, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
,
मिला तेज से तेज
, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी
, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी
,
दिखा गई पथ
, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी
,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी
,
होवे चुप इतिहास
, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय
, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी
, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।



मंगलवार, अगस्त 13

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी :फ़िरदौस ख़ान


फ़िरदौस ख़ान

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी… यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है. हम ख़ुशनसीब हैं कि आज हम आज़ाद देश में रह रहे हैं. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत क़ुर्बानियां दी हैं. उस वक़्त देश प्रेम के गीतों ने लोगों में जोश भरने का काम किया. बच्चों से लेकर नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों तक की ज़ुबान पर देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर गीत किसी मंत्र की तरह रहते थे. क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की नज़्म ने तो अवाम में फ़िरंगियों की बंदूक़ों और तोपों का सामने करने की हिम्मत पैदा कर दी थी.

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

देश प्रेम के गीतों का ज़िक्र मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के बिना अधूरा है. उनके गीत सारे जहां से अच्छा के बग़ैर हमारा कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं होता. हर मौक़े पर यह गीत गाया और बजाया जाता है. देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर यह गीत दिलों में जोश भर देता है.

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशां हमारा...

जयशंकर प्रसाद का गीत यह अरुण देश हमारा, भारत के नैसर्गिक सौंदर्य का बहुत ही मनोहरी तरीक़े से चित्रण करता है.
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जा पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा...

हिंदी फ़िल्मों में भी देश प्रेम के गीतों ने लोगों में राष्ट्र प्रेम की गंगा प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आज़ादी से पहले इन गीतों ने हिंदुस्तानियों में ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़कर मुल्क को आज़ाद कराने का जज़्बा पैदा किया और आज़ादी के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार करने में अहम किरदार अदा किया है. फ़िल्मों का ज़िक्र किया जाए तो देश प्रेम के गीत रचने में कवि प्रदीप आगे रहे. उन्होंने 1962 की भारत-चीन जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी, गीत लिखा. लता मंगेशकर द्वारा गाये इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में 26 जनवरी, 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया. गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आई थीं. 1943 बनी फिल्म क़िस्मत के गीत दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है, ने उन्हें अमर कर दिया. इस गीत से ग़ुस्साई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए थे, जिसकी वजह से प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था. उनके लिखे फिल्म जागृति (1954) के गीत आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की और दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल, आज भी लोग गुनगुना उठते हैं. शकील बदायूंनी का लिखा फ़िल्म सन ऑफ इंडिया का गीत नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं, बच्चों में बेहद लोकप्रिय है. कैफ़ी आज़मी के लिखे और मोहम्मद रफ़ी के गाये फ़िल्म हक़ीक़त के गीत कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, को सुनकर आंखें नम हो जाती हैं और शहीदों के लिए दिल श्रद्धा से भर जाता है. फिल्म लीडर का शकील बदायूंनी का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और नौशाद के संगीत से सजा गीत अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं, बेहद लोकप्रिय हुआ. प्रेम धवन द्वारा रचित फ़िल्म हम हिंदुस्तानी का गीत छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नये दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी, आज भी इतना ही मीठा लगता है. उनका फिल्म क़ाबुली वाला का गीत भी रोम-रोम में देश प्रेम का जज़्बा भर देता है.

ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल क़ुर्बान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान...

राजेंद्र कृष्ण द्वारा रचित फिल्म सिकंदर-ए-आज़म का गीत भारत देश के गौरवशाली इतिहास का मनोहारी बखान करता है.
जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा
जहां सत्य अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा...

इसी तरह गुलशन बावरा द्वारा रचित फिल्म उपकार का गीत देश के प्राकृतिक खनिजों के भंडारों और खेतीबा़डी और जनमानस से जुड़ी भावनाओं को बख़ूबी प्रदर्शित करता है.
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती
मेरी देश की धरती
बैलों के गले में जब घुंघरू
जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोसों दूर हो जाता है
जब ख़ुशियों के कमल मुस्काते हैं...

इसके अलावा फ़िल्म अब दिल्ली दूर नहीं, अमन, अमर शहीद, अपना घर, अपना देश, अनोखा, आंखें, आदमी और इंसान, आंदोलन, आर्मी, इंसानियत, ऊंची हवेली, एक ही रास्ता, क्लर्क, क्रांति, कुंदन, गोल्ड मेडल, गंगा जमुना, गंगा तेरा पानी अमृत, गंगा मान रही बलिदान, गंवार, चंद्रशेखर आज़ाद, चलो सिपाही चलो, चार दिल चार रास्ते, छोटे बाबू, जय चित्तौ़ड, जय भारत, जल परी, जियो और जीने दो, जिस देश में गंगा बहती है, जीवन संग्राम, जुर्म और सज़ा, जौहर इन कश्मीर, जौहर महमूद इन गोवा, ठाकुर दिलेर सिंह, डाकू और महात्मा, तलाक़, तू़फान और दीया, दीदी, दीप जलता रहे, देशप्रेमी, धर्मपुत्र, धरती की गोद में, धूल का फूल, नई इमारत, नई मां, नवरंग, नया दौर, नया संसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, प्यासा, परदेस, पूरब और पश्चिम, प्रेम पुजारी, पैग़ाम, फरिश्ता और क़ातिल, अंगारे, फ़ौजी, बड़ा भाई, बंदिनी, बाज़ार, बालक, बापू की अमर कहानी, बैजू बावरा, भारत के शहीद, मदर इंडिया, माटी मेरे देश की, मां बाप, मासूम, मेरा देश मेरा धर्म, जीने दो, रानी रूपमति, लंबे हाथ, शहीद, आबरू, वीर छत्रसाल, दुर्गादास, शहीदे-आज़म भगत सिंह, समाज को बदल डालो, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, हम एक हैं, कर्मा, हिमालय से ऊंचा, नाम और बॉर्डर आदि फिल्मों के देश प्रेम के गीत भी लोगों में जोश भरते हैं. मगर अफ़सोस कि अमूमन ये गीत स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या फिर गांधी जयंती जैसे मौक़ों पर ही सुनने को मिलते हैं, ख़ासकर ऑल इंडिया रेडियो पर.

बहरहाल, यह हमारे देश की ख़ासियत है कि जब राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवय या इसी तरह के अन्य दिवस आते हैं तो रेडियो पर देश प्रेम के गीत सुनाई देने लगते हैं. बाक़ी दिनों में इन गीतों को सहेजकर रख दिया जाता है. शहीदों की याद और देश प्रेम को कुछ विशेष दिनों तक ही सीमित करके रख दिया गया है. इन्हीं ख़ास दिनों में शहीदों को याद करके उनके प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है. कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी के शब्दों में यही कहा जा सकता है-
शहीदों की चिताओं लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा…