शनिवार, मई 26

एक वसीयत : अंतिम यात्रा में चुगलखोरों को मत आने देना

साभार in.com
एक बार दिन भर लोंगों की चुगलियों से त्रस्त होकर एक आदमी बहुत परेशान था. करता भी क्या किससे लड़ता झगड़ता उसने सोचा कि चलो इस तनाव से मुक्ति के लिये एक वसीयत लिखे देता हूं सोचते सोचते कागज़ कलम उठा भी ली कि बच्चों की फ़रमाइश के आगे नि:शब्द यंत्रवत मुस्कुराता हुआ निकल पड़ा बाज़ार से आइसक्रीम लेने . खा पी कर बिस्तर पर निढाल हुआ तो जाने कब आंख की पलकें एक दूसरे से कब लिपट-चिपट गईं उस मालूम न हो सका. गहरी नींद दिन भर की भली-बुरी स्मृतियों का चलचित्र दिखाती है जिसे आप स्वप्न कहते हैं .. है न..?
   आज  वह आदमी स्वप्न में खुद को अपनी वसीयत लिखता महसूस करता है. अपने स्वजनों को संबोधित करते हुये उसने अपनी वसीयत में लिखा
मेरे प्रिय आत्मिन
 सादर-हरि स्मरण एवम असीम स्नेह ,
                   आप तो जानते हो न कि मुझे कितने कौए कोस रहे हैं . कोसना उनका धर्म हैं .. और न मरना मेरा.. सच ही कहा है किसी ने कि -"कौए के कोसे ढोर मरता नहीं है..!"ढोर हूं तो मरना सहज सरल नहीं है. उमर पूरी होते ही मरूंगा.मरने के बाद अपने पीछे क्या छोड़ना है ये कई दिनौं से तय करने की कोशिश में था तय नहीं कर पा रहा था. पर अब तय कर लिया है कि एक वसीयत लिखूं उसे अपने पीछे छोड़ जाऊं . इस वसीयत के अंतिम भाग में  उन सबके नाम उजागर करूं जो दुनियां में चुगलखोरी के के क्षेत्र में  निष्णात हैं.
             प्रिय आत्मिनों..! ऐसे महान व्यक्तित्वों को मेरी शव-यात्रा में आने न देना.. चाहे चोरों को बुलाना, डाकूओं को भी गिरहकटों को हां उनको भी बुला लेना.. आएं तो रोकना मत . बेचारों ने क्या बिगाड़ा किसी का. अपने पापी पेट के कारण अवश्य अपराधी हैं ... इनमें से कोई बाल्मीकी बन सकता है पर चुगलखोर .. न उनको मेरी शव-यात्रा में न आने देना.
                                                                                                                          तुम्हारा ही
                                                                                                                            "मुकुल "
    इन पंक्तियों के लिखे जाने के बाद उस  स्वप्न दर्शी ने महसूस किया कि एक दैत्य उसके समक्ष खड़ा है. दैत्य को देख उसको अपने कई गहरे दोस्त याद आए.दैत्य से बचाव के लिये जिसे पुकारने भी  कोशिश करता तुरंत उसी मित्र का भयावह चेहरा स्वप्न-दर्शी को दैत्य में दिखाई देता.. अकुलाहट घबराहट में उसे महसूस हुआ कि वो मर गया ..
                        खुद के पार्थिव शरीर को देख रहा था. बहुतेरी रोने धोने की आवाज़ें महसूस भी कीं.. मर जो गया था किसी से कुछ न कह पा रहा था.किसी को ढांढस तक न बंधा सका.
        अपनी देह को अर्थी में कसा देखा उसने. परिजन दिख रहे थी. पर मित्र........ गायब थे.. अचानक उसके सामने वही दैत्य प्रगट हुआ. दैत्य ने पूछा-"क्या, मर कर भी चिंता मग्न हो..!"
स्वप्नदर्शी:-”हां, मेरे अभिन्न मित्र गायब हैं..?"
दैत्य :-"मैने सबको रोक दिया वे चुगलखोरी के अपराध में लिप्त थे न.. तुम्हारी वसीयत के मुताबिक़ वे तुम्हारी शव-यात्रा से वंचित ही रहेंगें.."
                     स्वपनदर्शी को अपनी वसीयत पर गहरा अफ़सोस हुआ.. रो पड़ा तभी पत्नी ने उसके मुंह से निकलती अजीबो-गरीब आवाज़ सुन कर जगाया.. क्या हुआ तुम्हैं ...?
 नींद से जागा वो वास्तव में जाग चुका था............ अपनी वसीयत लिखने की इच्छा खत्म कर दी.. दोस्तों ये ही आज़ की सच्चाई..
   सूचना 
इस आलेख के सभी पात्र एवम स्थान काल्पनिक हैं इनका किसी भी जीवित मृत व्यक्ति से कोई सम्बंध नहीं.. यदि ऐसा पाया जाता है तो एक संयोग मात्र होगा 
भवदीय:गिरीश बिल्लोरे मुकुल

सोमवार, मई 21

बिजली दफ़्तर वाला बाबू जो रोटी के अलावा गाली भी खाता है..

                       दीक्षित जी के लबों पर मातृभग्नि अलंकरण यूं बसते हैं गोया किसी सर्वग्य विप्र के मुंह में वेद मंत्र. दीक्षित जी एकता नगर के निवासी श्रीमन दीक्षित जी के रहते मुहल्ले की एकता कभी भंग नहीं होती. आठ-दस आवारा किस्म के लौंडे-लपाड़ियों का झुण्ड विप्रवर के इर्द-गिर्द हुआ करता है. कारण कि कभी कभार भाई "अद्धा-पौआ" की भेंट दे देते हैं. अब बताएं... इन लड़कों को अगर मुफ़्त में वो मिल जाए जिसकी वज़ह से ग़ालिब मशहूर शायर हुए. अब इन मुस्टण्डों को दीक्षित साहब को बकौल ग़ालिब 
"एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब .देना ही है न . तो क्या देंगे  ?" लिहाज़ा हज़ूर का जिस वक़्त आदेश हुआ सेना कूच कर देती. मुए इतनी बात अपने मां-बाप की मानते तो यक़ीनन अब तक किसी रईसजादे के दामाद होते. अब आप इन मयकशों को बुरा न कहिये चचा ग़ालिब कह ही चुके हैं 
""ग़ालिब" बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहें जिसे"
    मेरी नज़र से देखिये इनकी हैसियत मालवीय-चौक पे घूमते उस सांड़ से कमतर नहीं जिसके जिस्म के दक्षिणावर्त्य में त्रिशूल का निशान नज़र आता है. ऐसी ही फ़ौज़ लेकर घूमते अपने दीक्षित जी सुरा के नशे में जब घर पहुंचे तो बीवी बच्चों को बिना बिजली के अधजगे पाया बस जाग उठा इनका पौरुष .
पूछा ही होगा-"कम्लैंट कर दी "
हां,
कब ..?
दस बजे
अच्छा सालों ने अभी तक नहीं सुधारी और बस फ़िर क्या था खूते की तलाश थी ही मुसटंडों को गुहारा जा पहुंचे बिजली दफ़्तर 
       हां तो भाईयो रात 1:22 बजे हमे भी बंद बिजली चालू कराने बिजली दफ़्तर में  फ़ोन लगाया था. उधर से  आवाज़ आई जी साहब बताएं..
इधर से हम बोले-"भाई, पोल नम्बर X-35.."
उधर से वो बोला-"सा’ब, स्टाफ़ निकल चुका है, अंसारी साब को भी बता दिया है "
इधर से हम-"अंसारी कौन है बिजली दुरुस्त करेगा क्या..?"
उधर से वो बोला-"सा’ब हमारा अफ़सर है उसका नम्बर लीजिये.."
इधर से हम-"हम क्या करेंगें..!"
उधर से वो-  "तो साब जितना मेरा काम था कर दिया बाक़ी अंसारी साब जाने "
          अच्छा फ़ोन नम्बर दो देखूं तुम्हारे अंसारी क्या जानते हैं. खुशी खुशी नम्बर देकर मुझसे पिंड छुड़ा ही रहा था कि एक दानवी आवाज़ जिसका हर दूसरा शब्द बिजली वालों की मां-बहन के खिलाफ़ था . बहुत बुरा लग रहा था मुझे सो मैने पूछा- ये कौन है..?
उधर से वो बोला एक उपभोक्ताजी हैं इनकी बिजली बंद है सो यहां गाली-गलौच कर रहें हैं. हमारी मां-बहन ... दूसरी ओर से आवाज़ आई.. "तेरी.. तो..चौबे  किससे बतिया रहा है ला मुझसे बात करा.. "
       छीन ही लिया होगा उसने फ़ोन और फ़िर  फ़ोन पर चीख चीख के बिजली उस बिजली दफ़्तर से लेकर मुख्यालय तक को ये सोच के गरिया रहा था गोया कि दूसरी ओर से फ़ोन सुनने वाले हम यानी इस लेख के लेखक बिजली कम्पनी के प्रवक़्ता हों.
इधर से हम बोले-"भाई हम भी शिकायत ही दर्ज़ करा रहें हैं "
उधर से वो-"स्साले तुम जैसे आराम तलब लोगों की वज़ह से ही बिजली वाले गर्राए हैं  आओ मिल के इनकी.?"
         उसने फ़ोन फ़टाक से रख दिया बहुत देर तक बिजली न आने की वज़ह से हमने फ़िर से फ़ोन लगाया अब हमको मालूम था चौबे बाबू फ़ोन उठाएंगे .
निहायत अफ़सराना अंदाज़ में हम बोले-"चौबे........... क्या हुआ   पोल नम्बर X-35 का..
उधर से चौबे- ”सर, टीम वापस आ गई है, बता रहें हैं केबिल बर्स्ट हुआ है दिन में ही लगेगा”
इधर से हम-भई, तुम लोग पुलिस को क्यों नही बुलाते कौन था वो गंदी गंदी गालियां दे रहा था..?
 हवलदार: साब बिजली दफ़्तर से अब स्टाफ़ फ़ोन नहीं करता
  इंस्पेक्टर :  काहे करेगा- हम समझा आएं हैं..हमको बुलवाया 
तो फ़िर पिटोगे बेहतर है कि गाली से उत्तेजित न होना 
साभार :JNI सुल्तानपुर

 उधर से चौबे-सा’ब वो एकता नगर वाले दीक्षित जी हैं कुछ लड़कों के साथ आए थे. पुलिस भी क्या करेगी हमको तो रोज़ ड्यूटी पे आना है.
रात भर गर्मी से निज़ात पाने जागता जागता सोच रहा था कितने स्वार्थी हैं हम जो किसी निरीह को गरियाते हैं हैं उसकी मां-बहन के खिलाफ़ अश्लील सम्बोधन करते हैं कहां गया हमारा विप्रत्व क्या इसी दिन के लिये हम आज़ाद हुए थे . मन तो करता है तुम्हारे साथ वही सलूक किया जाए पर न न मुझे तुम्हारी मां-बहन के प्रति उतनी ही श्रद्धा है दीक्षित जी जितनी अपनी . एक बार सोचो कि बिजली दफ़्तर के मज़बूर बाबू की जगह तुम होते और कोई तुम्हारे साथ ऐसा हादसा घटित करता तब.. ?



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भवदीय:गिरीश बिल्लोरे मुकुल

रविवार, मई 20

रवींद्र प्रभात वार्ता से वार्ता : मिसफ़िट : सीधीबात पर








एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,
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 जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है.
 जो आपकी सृजनात्कता को 
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बुधवार, मई 16

एक हैलो से हिलते लोग..!!

छवि साभार : समय लाइव
    उस वाले  मुहल्ले में अकेला रहने वाला वह बूढ़ा रिटायर्ड अफ़सर .मुझे सुना दिया करता था.अपना अतीत..बेचारा मारे ईमानदारी सबसे खुल्लम-खुला पंगे लेता रहा ईमानदार होने के कई नुकसान होते हैं.  
फ़ूला यानी उसकी  सतफ़ेरी बीवी कई बार उसे समझा चुकी थी कि -”अब, क्या करूं तुम पे ईमानदारी का भूत सवार है बच्चों का क्या होगा गिनी-घुटी पगार में कुछ किया करो...!  पर बीवी का भी कहा न माना . बार बार के तबादलों से हैरान था. एक पोस्ट  पे बैठा बैठा रिटायर हो गया. भगवान के द्वारे पर न्याय का विश्वासी  उसे अपने जीवन काल में कभी न्याय मिला हो उसे याद नहीं भगवान की अदालत का इंतज़ार करता वो वाक़ई कितना धैर्यवान दिखता है अब जो बात बात पे उलझा करता था .                

               सात बच्चों का बाप आज़ औलादों से कोसा जा रहा है-"वर्मा जी भी तो बाप हैं उनके भी तो आपसे ज़्यादा औलादें थीं सब एक से बढ़कर एक ओहदेदार हैं..एक तुम थे कि ढंग से हायरसेकंड्री भी न पढ़ा पाए..वो तो नाना जी न होते तो .!" फ़ूला के मरने के बाद एक एक कर औलादों ने  बाप से विदा ली. वार त्यौहार बच्चों की आमद होती तो है ऐसी आमद जिसके पीछे  बच्चों का लोकाचार छिपा होता है. बूढ़े को लगता है कि घर में उसके औलादें नहीं बल्कि औलादों की मज़बूरियां आतीं हैं.
           अस्सी बरस की देह ज़रा अवस्था की वज़ह से ज़र्ज़र ज़रूर थी पर चेहरा वाह अदभुत आभा मय सच कितना अच्छा दीप्तिमान चेहरा चोरों के चेहरे चमकते नहीं वो चोर न था लुटेरा भी नहीं एथिक्स और सीमाओं की परवाह करने वाला रिटायर्ड बूढ़ा आदमी दुनियां से नाराज़ भी नहीं दिखा कभी होता भी किस वज़ह से उसकी ज़िंदगी को जीने की एक वज़ह थी हर ऊलज़लूल स्थिति से समझौता न करने की प्रवृत्ति . और यही बात इंसान को पुख्ता बनाती है. दफ़्तर से बच्चों के लिये स्टेशनरी न चुराने वाला हर हस्ताक्षर की क़ीमत न वसूलने वाला व्यवस्था से लगातार जूझता रहा. किसी भी हैल्लो पर न हिलने वाले बुज़ुर्ग ने बताया था – क्या बताएं.. एक बार आला अफ़सर से उसके तुगलक़ी फ़रमान को मानने इंकार करने की सज़ा भोगी सड़ता चला गया एक ही ओहदे पर वरना आज मैं “….” होता…!
मैने पूछा-’दादा, क्या हुआ था..?’
वो-“कुछ नहीं मैनें उसे कह दिया था.. बेवज़ह न दबाओ साहब, मैं मैं हूं आप नहीं हूं जो एक हैलो से हिल जाऊं..!
-मैं-“फ़िर..?”
वो-“फ़िर क्या, बस नतीज़ा मेरा रास्ते लगातार बंद होने लगे कुछ दिन बिना नौकरी के रहा फ़िर आया तो माथे पे कलंक का टीका कि ये.. अपचारी है..?”
 आज़ वो बूढ़ा मुझे अखबार के निधन वाले कालम में मिला “श्री.. का दु:खद दिनांक .. को हो गया है. उनकी अंतिम-यात्रा उनके निवास से प्रात: साढ़े दस बजे ग्वारीघाट के लिये प्रस्थान करेगी-शोकाकुल- अमुक, अमुक, तमुक तमुक.. ..कुल मिला कर पूरी खानदान लिस्ट ..”
 ड्रायवर चलो आज़ आफ़िस बाद में जाएंगें पहले ग्वारीघाट चलें. रास्ते से एक माला खरीदी . शव ट्रक से उतारा गया मैने माला चढ़ाई चरण-स्पर्श किया बिना इस क़ानून की परवाह किये लौट आया कि दाह-संस्कार के बाद वापस आना है. सीधे दफ़्तर आ गया .
  ड्रायवर बार बार मुझे देख रहा था कि मैं आज़ स्नान के लिये घर क्यों नहीं जा रहा हूं…अब आप ही  बताएं किसी पवित्र निष्प्राण को स्पर्श कर क्या नहाना ज़रूरी है..?

शनिवार, मई 12

छिपाती थी बुखारों को जो मेहमां कोई आ जाए : मातृ दिवस पर एक गीत



मां सव्यसाची स्वर्गीया प्रमिला देवी




ही क्यों कर सुलगती है वही क्यों कर झुलसती है ?
रात-दिन काम कर खटती, फ़िर भी नित हुलसती है .
खुल के रो सके हंस सके पल --पल पे बंदिश है  
हमारे देश की नारी, लिहाफ़ों में सुबगती है !              
                                                                       
वही तुम हो कि जिसने नाम उसको आग दे डाला
वही हम हैं कि जिनने उसको हर इक काम दे डाला
सदा शीतल ही रहती है भीतर से सुलगती वो..!
कभी पूछो ज़रा खुद से वही क्यों कर झुलसती है.?

मुझे है याद मेरी मां ने मरते दम सम्हाला है.
ये घर,ये द्वार,ये बैठक और ये जो देवाला है !
छिपाती थी बुखारों को जो मेहमां कोई जाए
कभी इक बार सोचा था कि "मां " ही क्यों झुलसती है ?

तपी वो और कुंदन की चमक हम सबको पहना दी
पास उसके थे-गहने मेरी मां , खुद ही गहना थी !
तापसी थी मेरी मां ,नेह की सरिता थी वो अविरल
उसी की याद मे अक्सर मेरी आंखैं छलकतीं हैं.

विदा के वक्त बहनों ने पूजी कोख माता की
छांह आंचल की पाने जन्म लेता विधाता भी
मेरी जननी तेरा कान्हा तड़पता याद में तेरी
तेरी ही दी हुई धड़कन मेरे दिल में धड़कती है.

आज़ की रात फ़िर जागा उसी की याद में लोगो-
तुम्हारी मां तुम्हारे साथ तो होगी इधर सोचो
कहीं उसको जो छोड़ा हो तो वापस घर में ले आना
वही तेरी ज़मीं है और उजला सा फ़लक भी है ! *

 गिरीश बिल्लोरे मुकुल,जबलपुर
            यही गीत youtube par सुनिये