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मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

फागुन के गुन प्रेमी जाने

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*होली पर हार्दिक शुभकामनाएं* फागुन के गुन प्रेमी जाने,  बेसुध तन अरु मन बौराना । या जोगी पहचाने फागुन,  हर गोपी संग दिखते कान्हा ।।  रात गये नजदीक जुनहैया,  दूर प्रिया इत मन अकुलाना । सोचे जोगीरा शशिधर आए,  भक्ति - भांग पिये मस्ताना ।।  प्रेम रसीला, भक्ति अमिय सी,  लख टेसू न फूला समाना । डाल झुकीं तरुणी के तन सी,  आम का बाग गया बौराना ।।  जीवन के दो पंथ निराले,  कृष्ण भक्ति अरु प्रिय को पाना । दोनों ही मस्ती के पथ हैं,  नित होवे है आना जाना...!!  चैत बैसाख की गर्म दोपहरिया –  सोच के मन लागा घबराना । छोर मिले न ओर मिले,  चिंतितमन किस पथ पे जाना ?  मन से व्याकुल तन से आकुल राधारमण का कौन ठिकाना । बेसुध बैठ गई सखि मैं तो- देख मेरा सखि तापस बाना ।। गोकुल छोड़ गए जब से तुम छूटा हमारा भी पानी-दाना । प्राण की राधा झुलसी झुलसी तुरतई अब किसन को होगा आना ।। 💐💐💐💐💐💐 *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

पॉक्सो एक्ट की जानकारी सर्वव्यापी हो''- रिजु बाफना आई ए एस

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  बच्चों के लिए पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा चलाए जा रहे प्रचारात्मक अभियानों को अंतर्विभागीय समन्वय से प्रभावशाली बनाया जा सकता है। आज ऐसे ही प्रयासों की नितांत आवश्यकता है। तदाशय के विचार जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी रिजु बाफना ने व्यक्त किये। होटल कल्चुरी में आयोजित शिक्षा विभाग के प्राचार्यों ,  बाल विकास परियोजना अधिकारियों एवं स्वयं सेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों के लिये महिला बाल विकास द्वारा आयोजित पॉक्सो एक्ट पर केन्द्रित कार्यशाला में व्यक्त किए। जिला विधिक प्राधिकरण के सदस्य सचिव ए.डी.जे. शरद भामकर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि  ' जन्म-प्रमाण-पत्र एवं आयु प्रमाण पत्र के संबंध में प्रत्येक अॅथारिटी को सजगता बरतनी चाहिए तथा इस एक्ट में अंतर्निहित प्रावधानों जैसे वैधानिक कार्यवाही प्रक्रिया और प्रभावित को सहायता प्राप्त करने हेतु सरकारी अमले को विशेष रूप से आम जनता को जानकारी देना अत्यावश्यक है। शिक्षा विभाग की ओर से जिला शिक्षा अधिकारी घनश्याम सोनी ने इस बात पर सहमति दी कि निकट भविष्य में महिला बाल विकास विभाग एवं श

चंद्रशेखर जी का वक्तव्य

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लोहिया जी चंद्रशेखर जी उन भारतीयों के आदर्श हैं जो मानवता के सबसे बड़े सरोकारी कहे जाते हैं। भारत की संसदीय व्यवस्था में इस व्यक्तित्व ने लगभग मोहित कर लिया था । उन दिनों हम डी एन जैन कालेज में स्नातक डिग्री लेने के छात्र थे नेतागिरी का वायरस भी घुस चुका था । घर के लोग नाखुश रहते थे । ज़ायज़ बात है पर युवावस्था में हम सियासत समाज विचारधारा आदि को समझ रहे थे । सब समझते थे कि हम नेतागिरी में सरोपा धंस गए हैं । 1980-81 की बात है । कालेज में ऊटपटांग हरकतों के लिए मशहूर थे मुकेश राठौर । समाजवादी विचारधारा को मानते थे लोहिया जी चंद्रशेखर जी उनके आदर्श थे । पर हम अलहदा सोचते थे ।       आपात काल के बाद चंद्रशेखर जी जबलपुर आए तो उनके सम्मान में हमारी यूनियन ने दादा को बुलाया । डी एन जैन कॉलेज के ओपन एयर थियेटर का लोकार्पण चन्द्रशेखर जी ने ही जिया था ।      उनके भाषण में भूमंडलीकरण भविष्य के भारत की स्थिति, बेरोजगारी पर खुलकर बोले । 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रध

सपेरों का देश भारत

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 तो अक्सर अजय भाई किताबें लेकर आते हैं..  पर आज मामला कुछ और था,  हमारा आपसी वादा था कि किसी दिन वह संवाद करने आएंगे। उन्होंने वादा निभाया और निश्चित समय पर आ भी गए। विमर्श प्रारंभ हुआ फटी हुई जींस,  भारतीय संस्कृति,  और डासना मंदिर पर भी चर्चा हुई। इसी क्रम में जब अंग्रेजों ने भारत को सांप सपेरा का देश कहने के बिंदु पर चर्चा हो हुई तो बहुत मुखर होकर इस विचारक ने कहा-" यह तो भारतीय ज्ञान-विज्ञान की पराकाष्ठा है, कि एक गली-गली घूमने वाला व्यक्ति पिटारी में सांप को लेकर अपने साथ न केवल घूम रहा है बल्कि उसके साथ जीवन भी व्यतीत कर लेता है ।"     उन्होंने आगे कहा-" एक व्यक्ति स्टेथ स्कोप की तरह सांप को अपनी गले में लपेट कर घूमता है। उससे बड़ा परम ज्ञानी महा विज्ञानी और कौन हो सकता है..?"      विज्ञान के इस दौर में सांप के साथ रहना सच में असंभव है। सांप सपेरों के देश में जीवों का मनोविज्ञान और उसके साथ रहने का विज्ञान का किसी और देश में असंभव है ।     मित्रों, हम सांप के साथ रहने के लिए भी योग्य है जो बिल्कुल विपरीत प्रकृति का है। आपको यह बात अच्छी लगी तो दोस्

मातृशक्ति दुर्गावती को नमन

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महिला दिवस के पूर्व माँ दुर्गावती का स्मरण 💐💐💐💐 पग में लोहा बांध के मस्तक  कील सजाय  करधन बाँकैं अस्तर सबै संग  कटार छिपाए ।। सरमन हौदा चढ़ गई सुत बांधे माँ पीठ । मरहुँ पै झुखिबो नहीं जा गौंड वंश की रीत । दक्कन के राजा कहें नहिं आवा सुल्तान ? कहे विदूषक नाच कै पकड़े दुर्गा नै कान ।। तपोभूमि जाबालि की तँह रेवा को खण्ड । शिव दीन्हें आसीरबचन दीनहुँ सुराज अखंड ।। रानी के समराज में- सुख वैभव चहुँ ओर । स्वर्ण मणि धनधान्य से हर घर कोष अछोर ।। फाग बरेदी ढिमरयाई कौ गांवन गांवन  शोर । न चोरी को भय कहूँ खुले द्वार चहुँ ओर ।। सुबह सुबह लमटेर से गुंजित रेवा के तीर । कहुँ रेवा शांत सरल कहुँ माँ व्यग्र अधीर ।। रेवा की अनुरागिनी  दुर्गा नित दें सुख दान। ज्ञानीजन के पूजे पगा कर ग्राम भूमि धन दान ।। चौंसठ जोगिन धाम को दुर्गा सदा सहाय । भाई आधार सिंह नित सत्कर्म सुझाय ।। बरगी के चानक्य नै गोंडन राज बिठाए । बामन गोंडन के प्रेम से दुनिया झुलसी जाय ।। ग्यारा सदी में सूर्य सम मदन शाह को राज । बावन गढ़ वनवाय कै बने मदन महाराज ।।  ग्राम्य कवि गावन लगे इक थो बहादुर बाज़ । दुर्गा नै पर कांट कय  छीनो

नोआखली : सीने की आग आज भी...!

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नोआखली - एक आपबीती वीरक वशिष्ठ जी ●●●●●●●●●●● This post is Viral on social media. But this is very clear noakhali was not safe Hindu in 1946 ●●●●●●●●●●● ये कथा मैं कभी साझा नहीं करना चाहता था। ऐसा नहीं कि इच्छा नहीं थी, अपितु यह कहूँ कि साहस नहीं कर पाया। इसी पटल पर कुछ अग्रजों के बहुत प्रेरित करने पर ही आज साहस कर पा रहा हूँ।      जब पहली बार बंदा सिंह बहादुर की कथा पढ़ी तो उसके बाद पूरे दिन अन्य ही लोक में विचरण करता रहा गया था, न भुख लगी न नींद ही आयी थी। कुछ यही अवस्था इस कथा को सुनकर हुई थी, जिसे एक कलकत्ता की मूलनिवासी दादी माँ ने मुझे सुनाया था, जब मैं दिल्ली से वाराणसी महामना ट्रेन से 2016 के 9 सितम्बर को वापस आ रहा था।    हुआ कुछ यूँ था कि एक सज्जन से सहिष्णुता पर बहस हो गयी थी, जिसमें अन्त में हम दोनों अपने अपने पक्ष को लिए ही एक दूसरे से मुँह फेर बैठ गए, क्योंकि किसीको को भी समाधान नहीं चाहिए था, बस स्वयं को सही सिद्ध कर विजय का मिथ्याभिमान पाना था।  मेरे पक्ष को सुनकर, हम दो सहयात्रियों के बीच के उस अघोषित शीतयुद्ध के उस सन्नाटे (जिसमें ट्