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अक्तूबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रौशनी की तिज़ारत वो करने लगा

घर के दीवट के दीपक जगाए नहीं रोशनी की तिज़ारत वो करने लगा । ये मुसलसल करिश्मों भरा दौर है - वक़्त-बेवक्त सूरज है ढलने लगा ।। खुद ने, खुदको जो देखा डर ही गया आईने अपने घर के,वो बदलने लगा ।। खोलीं उसकी गिरह, हमने फिर कभी पागलों की तरह वो, मचलने लगा ।। दौर ऐसा कि सब हैं तमाशाई से हरेक दिल में क्या रावण, पलने लगा । *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

निकिता तुम एक सवाल हो.!

*निकिता तुम एक सवाल हो.!* जिसे कोई हल कैसे करेगा ? सब एर्दोगान से  थर थर काँपते हैं..! वो सब के सब  तुम्हारी आख़िरी कराह का और अपनी चाह का  मीज़ान मापते हैं..! तुम्हारी आखिरी सांसें  धीमे धीमे बन्द होती आंखें  अब किसी इंकलाब को जन्म न दे सकेंगी । आने वाली तिथियां तुम्हारे ही हलफनामें को सामने रखेंगी । तुम तब तक  ज़ेहन से सबके मन से  हो चुकी होगी ओझल । तुम्हारी सखि माँ बापू भाई को याद रहेगा वो पल ।। इन चैनल्स पर नहीं आओगी कभी किसी को भी  सत्ताईस अक्टूबर के दिन  याद नहीं आओगी.. ! तुम इस दुनियाँ में  अफसर भी बन जाती तो  क्या होता..? क्या खाक बदलता ये समाज ये हमेशा समझौता करेगा  डर से आक्रांता से  सामाज में बचे सम्मान से डर कर  । समझौते जारी रहेंगे  इस देश में  मृत्यु तुल्य कष्ट  सहकर ...!  निकिता कल भी  तुम ही हारोगी..! सोचता हूँ आकाश ताकते हुए तुम कब पलट कर मरोगी ..!! सुनो अब जब आना  हाथ में आयुध लेकर इन रसूखदारों का  इन बलात समझौताकारों का इन आयातित विचारों के  पैरोकारों का ... मुँह जो नोंचना है । *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

क्या सोचते हैं विस्तारवादी

      बख्तावर खिलजी से लेकर तालिबान तक सभी  सभी के मस्तिष्क में एक ही बात चलती है अगर किसी राष्ट्र का अंत करना है तो उसके पहले उसकी संस्कृति अंत कर दो। पोल पॉट की जिंदगी का लक्ष्य  भी यही था । 1975 से लेकर 1979 तक  कंबोडिया के सांस्कृतिक वैभव को समाप्त करने के लिए पोलपॉट अपना एक लक्ष्य सुनिश्चित किया । उसने जैसे ही खमेररूज की की मदद से कंबोडिया पर कम्युनिस्ट शासन की स्थापना की सब से पहले कंबोडिया के 50 मुस्लिम आराधना स्थलों का सर्वनाश किया। क्योंकि नास्तिकों के मस्तिष्क में  आस्था के लिए कोई जगह नहीं है अतः पोल पॉट की सेना ने उसके स्थान पर कुछ दूसरा धार्मिक स्थल नहीं बनाया। किंतु बाबर इससे कुछ  अलग ही था । भारत में आक्रमणकारी  विदेशी  ने सांस्कृतिक हमला भी बाकायदा सामाजिक परिस्थितियों को बदलने के लिए किया। तालिबान इससे पीछे नहीं रहे । स्वात से बुद्ध के वैभवशाली इतिहास को खत्म करना हो या कश्मीर के सनातनी सांस्कृतिक वैभव को नेस्तनाबूद करना हो ... विदेशी आक्रांता इस कार्य को सबसे प्राथमिकता के आधार पर किया करते थे।      ऐसा अक्सर हुआ है इसमें कोई दो मत नहीं। अब कुछ इससे ज्यादा हटकर हो रह

TANYA SHARMA ON VIJAYADASHAMI PRAV

*विजयादशमी पर हार्दिक बधाई* 🙏🙏🙏🙏 Tanya Sharma (D/O Mr. Sunil Sharma & Mrs Archana Sharma Bhopal)  presents Mahishasura Mardini Stotram. Tanya Sharma is winner of award 2019 organised by National Bal Bhawan Delhi. Tanya Sharma lost her vision but not her confidence and capability she has scored more then 90%  in her 10th board school examination. https://youtu.be/4i3n4NVl5v4 Please Click "JAY JAY HE"

Koyaliya Boli Re | FolkLok ~ Sounds of the soil | Pratidhwani Art Studios

वीरांगना रानी चेन्नम्मा आलेख :- आनंद राणा जबलपुर

"जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूंद है,कित्तूर को कोई नहीं ले सकता" - वीरांगना रानी चेन्नम्मा🙏"आईये अवतरण दिवस पर गर्व के साथ नमन करें.. भारत की प्रथम वीरांगना कित्तूर की रानी - चेन्नम्मा को जिन्होंने 11 दिन लगातार अंग्रेजों को पराजित किया और 12 वें अपने लोगों के ही धोखा देने से वो पराजित हुईं ..आईये जानते हैं कि वीरांगना रानी चेन्नम्मा का गौरवशाली इतिहास 🙏🙏 1. रानी चेन्नम्मा का परिचय- रानी चेन्नम्मा भारत की स्वतंत्रता हेतु सक्रिय होनेवाली पहली वीरांगना थीं । सर्वथा अकेली होते हुए भी उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य पर दहशत जमाए रखी। अंग्रेंजों को भगाने में रानी चेन्नम्मा को सफलता तो नहीं मिली, किंतु ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध खड़ा होने हेतु रानी चेन्नम्मा ने अनेक स्त्रियों को प्रेरित किया। कर्नाटक के कित्तूर रियासत की वह वीरांगना चेन्नम्मा रानी थी। आज वह कित्तूर की रानी चेन्नम्मा के नामसे जानी जाती है।  2.रानी चेन्नम्मा का बचपन- रानी चेन्नम्मा का जन्म काकती गांव में (कर्नाटक के उत्तर बेलगांव के एक देहात में )23 अक्टूबर 1778

कोविड के बाद का भारत

 कोविड19 के बाद का भारत..!   रोजगार के लिए प्रवास स्वाभाविक प्रक्रिया है। इतिहास में भी यह सब कुछ दर्ज है...और यहां  रोजगार के लिए प्रवास के बाद कोविड19 के बाद घर और गांव के महत्व को महसूस किया होगा आपने भी गांघी जी भी याद आए होंगे न ?  जो कुटीर उद्योगों के प्रबल समर्थक थे । बापू के उसी मार्ग को आत्मनिर्भरता कही जा सकती है । जिसे वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने अंगीकार किया है ।  परन्तु कोविड संकट जूझ रहे भारत को सम्हलना अभी एकाएक ज़रा कठिन है । परन्तु वैक्सीन आने के बाद अर्थात लगभग 6 माह बाद केंद्र सरकार एवम राज्य सरकारों को तेज़ी से काम करना होगा । उसे यहाँ एक ट्रष्टी एवम प्रमुख प्रबंधक के रूप सक्रिय होने की ज़रूरत होगी ।     सरकार छोटे से छोटे उत्पादन के लिए स्थानीय पृष्ठभूमि को देखते हुए उत्पादन को प्रमोट करें और बाजार उपलब्ध कराएं तो निश्चित तौर पर रोजगार की संभावना सुदूर क्षेत्रों में बढ़ेगी !    मजदूरों का गांव से पलायन अधिकतम 500 वर्ग किलोमीटर के आसपास होना चाहिए ताकि एक या 2 दिन के अंदर पूरा का पूरा परिवार वापस घर पहुंच सके। अब आप सवाल करेंगे कि क्या भारत सरकार की औद्योगिक

सनातन धर्म के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

    गणमण्डल आश्रम अमदरा जिला        मध्यप्रदेश में साधनारत साधक  सनातन धर्म के संदर्भ में आज व्हाट्सएप पर घूमता  एक मैसेज बहुत प्रासंगिक यानी रेलीवेंट लगा आपके बीच शेयर कर रहा हूं नमन..🙏 भाइयों इस पोस्ट को समय निकाल कर एक बार जरूर पढ़ें, ऐसी जानकारी व्हाट्सएप पर बार-बार नहीं आती, और आगे भेजें, ताकि लोगों को सनातन धर्म की जानकारी हो  सके आपका आभार धन्यवाद होगा 1-अष्टाध्यायी               पाणिनी 2-रामायण                  वाल्मीकि 3-महाभारत                 वेदव्यास 4-अर्थशास्त्र                  चाणक्य 5-महाभाष्य                  पतंजलि 6-सत्सहसारिका सूत्र     नागार्जुन 7-बुद्धचरित                  अश्वघोष 8-सौंदरानन्द                 अश्वघोष 9-महाविभाषाशास्त्र        वसुमित्र 10- स्वप्नवासवदत्ता        भास 11-कामसूत्र              वात्स्यायन 12-कुमारसंभवम्       कालिदास 13-अभिज्ञानशकुंतलम् कालिदास   14-विक्रमोउर्वशियां     कालिदास 15-मेघदूत                 कालिदास 16-रघुवंशम्               कालिदास 17-मालविकाग्निमित्रम्   कालिदास 18-नाट्यशास्त्र            भरतमुनि 19-देवीचंद्र

आने वाले 10 से 15 सालों में पाकिस्तान से भारत में आएंगे शरणार्थी.. (भाग 02 )

आने वाले 10 से 15 सालों ... शेष भाग सेंगे शेरिंग के हवाले से गिलगित बाल्टिस्तान      गिलगित बालटिस्तान भारत का अभिन्न हिस्सा है इसके संबंध में हालिया दिनों में सेंगे सेरिंग जो वर्तमान में वाशिंगटन में रह रहे हैं साफ तौर पर बताया है । भारतीय उपमहाद्वीप के साथ 1947 के बाद हुआ है वह भारत के लिए एक बहुत दुखद स्थिति है। मुझे अच्छी तरह याद है तब जब भारत के जीवन समंकों  खास तौर पर जन्म दर मृत्यु दर और होती रही है तब दक्षिण एशियाई क्षेत्र के अन्य  देशों के सापेक्ष भारत को सबसे ज्यादा नेगेटिव प्रोजेक्ट किया जाता था । उस दौर का एनजीओ कल्चर जो आमतौर पर विदेशी फंडों से संचालित था के जरिए भारतीय कल्चर को समाप्त कर देने की भयंकर  कोशिशें हुई है। पता नहीं कौन सी बात है जो कि हमारी कल्चर को क्षतिग्रस्त होने से बचाती रही है। धारा 370 और 35 बी के समापन के उपरांत गिलगित बालटिस्तान जी के लोग भारतीय डेमोक्रेसी का सुख लेना चाहते हैं । गिलगित बालटिस्तान पिछले लेख में वर्णित 7 जिले और दो डिवीजन की 15 लाख लोगों की आबादी भारत की ओर देख रही है ।   वहां के एक लीडर बाबा जान और उनके 4 साथी पाकिस्तान की

आने वाले 10-15 सालों में पाकिस्तान से भारत में शरणार्थी आना तय है..? (भाग 01)

गिलगित बालटिस्तान की आबादी लगभग 15 लाख के आसपास पहुंच रही है। प्राकृतिक सौंदर्य का धनी हिंदूकुश पहाड़ी और अमीर पहाड़ी पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा  यह क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है। किंतु 1947 की विभाजन में ब्रिटिश सरकार की  सियासी चालों   के कारण  पीओके का भाग बन गया । सिंध बलोच पश्चिमी पाकिस्तान जो वर्तमान में बांग्लादेश है की तरह ही सांस्कृतिक तौर पर स्वयं पाकिस्तान को अमान्य रहा है।  पाकिस्तान की मिलिट्री डेमोक्रेसी ने इन स्थानों का जमकर सियासी मामलों में इस्तेमाल किया। पाकिस्तानी प्रशासन कभी भी इन क्षेत्रों के संपूर्ण विकास के लिए प्रतिबद्ध नहीं रहा इसके कई पुख्ता प्रमाण आज भी संपूर्ण विश्व के सामने आते  हैं ।  वर्तमान परिस्थितियों में धारा 370 हटने के बाद की परिस्थितियों में गिलगित बालटिस्तान की आवाम जिसकी संख्या अब लगभग 1500000 है , की जनता बहुत ही जागरूक हो गई है। उनकी जागरूकता का कारण उनका एक लोकप्रिय नेता अपने चार क्रांतिकारी साथियों के साथ पिछले कई सालों से जेल में बंद है। लगभग 10 से 11 सालों से जेल में बंद नेता का नाम है बाबा जान । गिलगित बालटिस्तान की जनत

कोविड19 टोटल लॉक डाउन संस्मरण भाग 01

न दैन्यं न पलायनम् आग्नेय परीक्षा की इस घड़ी में — आइए, अर्जुन की तरह उद्घोष करें : ‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’ महात्मा अटल की यह कविता मन से भय का अंत कर देती है ।      महासंकट का दौर जिसे हम अज़नबी शत्रु कह सकते हैं कोविड19 का दौर है। इसके पहले हम बहुत सामान्य जीवन में  थे । सामान्यता इतनी कि समझ ही नहीं पा रहे थे कि जीवन क्या है ?  वास्तव में जिसे हम अपना अधिकार समझने की भूल कर बैठे थे वह प्रकृति का उपहार था। एक सुबह अचानक 4:17 पर नींद खुलती है खुली हुई खिड़की शरीर को तुरंत ताजगी का एहसास कराती है। ब्रह्ममुहूर्त कि इस अवधि में सुबह का आनंद कुछ इस तरह मिला... अचानक संपूर्ण वातावरण चिर परिचित सा लग रहा था जिसका एहसास हमने कभी  किया फिर अचानक उस प्रकार की सुहानी सुबहों के एहसासों का याद आने लगा जिसे हम भूल गए थे रात देर तक सोना स्वाभाविक रूप से नींद सूर्योदय के उपरांत खुलने का अभ्यास सा हो गया था कोविड के पहले ।   लाला रामस्वरूप पंचांग के अनुसार निश्चित  समय पर पूर्व दिशा का आकाश लालिमा लेने लगता था। घर के सामने से खड़खड़ करती हुई साइकिल पर सवार पेपर वाला हर घर के आंगन में पेपर

सुग्गा और नीलकंठ

पता नहीं कब आएगा सुग्गा..?चिंतामग्न बैठा नीलकंठ बाट जोहता । दूर से एक तोतों के झुंड को आता देख खुश हुआ सुग्गा आ जाएगा । पर झुंड आगे वाले आम के पेड़ पर जमा हो गया । कुछ आगे बढ़ने लगे । नीलकंठ घबराया डरा भी तभी उसने तय कर लिया कि सुग्गा को खोजेगा । एक उड़ान भरी । कुछ दूर जाकर देखा सुग्गा एक पतंग की डोर में उलझकर बार बार उड़ना चाह रहा था पर  पंख डोर में फंस कर उड़ नही पा रहा था ।     नीलकंठ को देखते ही सुग्गे को यकायक मुक्तिबोध सा हुआ। होना ही था सहृदयता के दूत जब भी आते हैं तो मुक्तिबोध होना वाज़िब है । अपनी चोंच से नीलकंठ ने धागे निकाले ।   फिर दौनों एक डाल पर बैठकर एक दूसरे को देख कर आत्मीयता अभिव्यक्ति में व्यस्त हो गए ।           फोटो :- रजनीश  सिंह