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नाटक समीक्षा : बरी द डेड

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#बरी_द_डेड मंचन दिनांक 19 अक्टूबर 2019 स्थान- मानस-भवन, निर्देशक:- श्री सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ नीपा रंगमंडल,  लखनऊ  :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: निर्देशक द्वारा प्रिय अक्षय ठाकुर का विशेष रूप से उल्लेख करना मेरे लिए गौरव की बात थी क्योंकि आप जानते हैं कि अक्षय से मेरा रिश्ता बालभवन का है और उससे अधिक यह कि अक्षय में अद्भुत अभिनय एवं कला पक्ष की समझ है वह पढ़ता भी है हिस्ट्री भी पड़ता है वर्तमान को समझता भी है कुल मिलाकर थिएटर का #अक्षयपात्र भी बनेगा यह मेरा दावा है चिरंजीव अक्षय को आशीर्वाद और शुभकामना :::::::::::::::::::::::          नाटक का आमन्त्रण था Vinay Amber की ओर से ही नहीं Supriya Shrivastava Amber Amber की जानिब से भी आमंत्रण पूरे फैस्टिवल के लिए भी..... परन्तु Akshay Thakur के न्योते की वजह से समय से एक घंटे पहले पहुँच  गया . सेट डिजायनर श्री जोशी जी  की तारीफ़ अक्षय ने पहले ही कर दी थी सो था भी गजब.. !       जबलपुर नाटक के मामले में बता दूँ कि  अन्य शहरों के सापेक्ष यहां  अधिक अच्छे दर्शक देता है.. इस लिए हर निर्देशक को जो जबलपुर में नाटक पेश करने

नेत्रहीन बालिकाओं से मिलकर भावुक हुए अभिजीत भट्टाचार्य

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आप से सीखने आया हूं सीखकर जाऊंगा : अभिजीत भट्टाचार्य बेटियों मैं आप से सीखने आया हूं और सीखकर ही जाऊंगा । नेत्र दिव्यांग बच्चियां से मिलकर भावुक हुए सुप्रसिद्ध गायक अभिजीत भट्टाचार्य ने आगे कहा कि- बच्चियों की गायकी सुनकर मैं हतप्रभ हूं इनमें जो कम समय में इतना प्रभावी गायन प्रशिक्षण प्राप्त किया है उसके लिए मैं उनसे कुछ ना कुछ हासिल करके ही जा रहा हूं जो ईश्वर ने इन बालिकाओं को दिया है वह सहज उपलब्ध नहीं होता । आजकल गायन में सफलता बहुत से है जो हर आसानी से मिल जाती है तकनीकी इसे बहुत आसान बना देती है परंतु आप जिस तरह से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं वह अद्भुत है आजकल जो गाना भी नहीं जानता वह भी गाना गा लेता है और उसका गाना प्रसिद्ध भी हो जाता है तकनीकों के कारण संगीत में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है और आप सबको इससे प्रतिस्पर्धा करनी है । मैं आपके गायन से अभिभूत हुआ हूं तक आशय के विचार नेत्रहीन कन्या विद्यालय की संगीत छात्राओं के समक्ष व्यक्त करते हुए अभिजीत ने नगर निगम जबलपुर संभागीय बाल भवन जबलपुर एवं नेत्रहीन कन्या विद्यालय के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त की । श्री आशीष कुमार आयुक्त नगर निग

दफ्न जो सदियों तले है वो खज़ाना दे दे : मुज़फ्फर वारसी

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मुजफ्फर वारसी हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मशहूर शायर है यह जितने पाकिस्तान में मकबूल रहे उससे ज्यादा मां भारती  के  बेटों से इन्हें मोहब्बतें मिली हैं।  वारसी साहब का जन्म यूं तो हिंदुस्तान में हुआ 47 के बंटवारे में वे पाकिस्तान चले गए किंतु एक फिलॉस्फर पर की तौर पर पहचाने जाने लगे । वारसी साहब की आवाज और कलाम दोनों ही अव्वल दर्जे का होने से उनकी बात सीधे दिल में उतर आया करती थी और जिन शब्दों का इस्तेमाल वह अपनी पोएट्री में करते थे वह गुलजार जैसे शायरों के लिए एक रास्ता बन गए । साथियों उस देश में जहां ना तो शायरों की कदर है ना ही कलमकारों की उनका हिंदुस्तान से जाना मेरी नजर में ठीक ना था । यह बंदूक पकड़ने  वाले कमसिनों देश बनाने की जद्दोजहद पाकिस्तानी एडमिनिस्ट्रेशन ने की है जबकि वहां के बच्चे एक सर्वे के मुताबिक भारत के बच्चों की तरह ही बेहद बड़ी बौद्धिक क्षमता वाले हुआ करते हैं परंतु पाकिस्तानी एडमिनिस्ट्रेशन ने वहां के पॉलिटिकल चिंतन ने बच्चों को सही रास्ता दिखाया होता तो दोनों मुमालिक बौद्धिक प्रतिस्पर्धा में बहुत आगे होते परंतु वहां इल्म तालीम और बौद्धिक क्षमताओं के विकास के ल

भारत की आत्मा धर्म में बसती है ..तॊ आप ग़लत हैं ! : Salil Samadhiya

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लेखक : सलिल  अगर आप सोचते हैं कि भारत की आत्मा धर्म में बसती है ..तॊ आप ग़लत हैं ! वह अध्यात्म , तप और  त्याग में भी नही बसती !   वह उत्सव, तीज , त्योहारों में भी नही बसती !! वह सिर्फ़ एक ही चीज़ में बसती  है .. और वह है   "दिखावा "  !! ....इसे आप ध्यान से समझ लें! पूरे भारत की  आत्मा में जो तत्व गहरे समाया है,   वह 'सत्य' या 'परमात्मा' नही है!  वह है -  "मैं क्या चीज़ हूं !" यहां हर व्यक्ति इस जुगत लगा है कि,   किसी भी तरह से , किसी भी क्षेत्र में सफ़ल होकर,  दूसरों को बता सके कि  "देख , मैं क्या चीज हूं " यही दिखाने के लिए वह पैसा कमा रहा हैं , यही दिखाने के लिए वह  नेतागिरी कर रहा है , यही दिखाने के लिए वह अधिकारी बना है , यही दिखाने के लिऐ वह कविता कर रहा है, लिख रहा है ! यह महज़ जीविकोपार्जन का मामला नही है ! यह नुमाईश का मामला है ! अपनी हैसियत के प्रदर्शन का मामला है !  यही दिखाने के लिए वह नाच रहा है ..गा रहा है  या ..अन्य उद्यम कर रहा है  !! जब तक ये  "दिखावावाद" जिंदा हैं भारत में , आप भूल जाईये 

औसतन सब ठीक है सर तप रहा पग बर्फ पर

न रखूंगा रिक्त मैं .. हिय के   समंदर को कभी । जाने कब किस को .. मंथन की ज़रूरत आ पड़े ? औसतन सब ठीक है सर तप रहा पग बर्फ पर – रोज़ छपते हैं अब   कुछ इस तरह के आंकड़े !! धुंध की रोगन वज़ह है दूर तक दिखता नहीं पाँव भी उनके सुनहरी बेड़ियों से हैं बंधे.....!!

और बापू मुस्कुराए : भाग 2

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# और बापू_मुस्कुराए : भाग 1 के बाद  कला अनुदेशक डॉ रेणु पांडेय के निर्देशन नें बच्चों ने बनाई प्रतिमा मिट्टी से..! गांधी जी के इस बस्ट को बनाकर बच्चे आज मेरे पास दिखाने लाए.! मन को प्रभावित करने के लिए इतना काफी था...प्रयोगवादी महात्मा ने देश को जो दिया वह कोई आसानी से नहीं दिया जाता अगर दिया भी जाए तो आसानी से ग्रहण करना मुश्किल है....लेकिन कमाल है.... #कृषकाय_काया का जिनने जो भी समाज को दिया समाज में हूबहू ग्रहण किया । करते भी क्यों ना क्योंकि उस समय की जनता में अपने नेता के प्रति सम्मान और विश्वास दोनों की कमी ना थी अटूट श्रद्धा विश्वास और सम्मान के साथ मेरी स्वर्गीया नानी गांधी बाबा की जय कहकर अपनी पूजा समाप्त करती थी । ब्रिटिश भारत के दौर में जब शिक्षा का आंकड़ा बहुत कमजोर था तब जबकि समाज बेहद जटिल समस्याओं से भी जूझ रहा था पर गांधी ने चरखी और तकलीफ पर कते सूत से पूरे देश को एक करने की कोशिश की । गांधी जी पर बहुत सारे सवाल उठते हैं उनसे आज के दौर को कोई लेना देना नहीं क्योंकि गांधी अंतरराष्ट्रीय चेहरा बन चुके हैं । ज़िद्दी तो प्रिटोरिया में भी थे महात्मा जब उन्हें फर्

और बापू मुस्कुराए : भाग 1

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और बापू मुस्कुराए आलेख का प्रथम भाग आपके समक्ष पेश है स्वर्गीय महात्मा गांधी के जीवन से जो मुझे हासिल हुआ उसे लिखने की कोशिश कर रहा हूं *और बापू मुस्कुराए* बापू तुमने बरसों पहले कहा होगा पिछली शताब्दी में मैंने उसे अपनी विचारों की गठरी में रख लिया था .... रखता भी क्यों ना ? गठरी खाली थी और रखता भी क्या खाली जगह में अच्छी चीजें ही अच्छी लगती है ना ? अब बताओ क्या बंदूके रखता चाकू छुरी रखता बम पटाखे रखता नहीं यह मुझसे नहीं होता माँ ने रखवाईं... थीं...बहुत सारी कहानियां कुछ हरिश्चंद्र की कुछ बालक ध्रुव की,  राम की कहानी कृष्ण की भी तो रखवाईं थीं कहानियाँ और तुम्हारी बातें भी बापू जी ।     उन सबको मैंने संभाल कर रख लिया ।     अजीब हो तुम किसी से लड़ने भी नहीं देते क्यों करूं गाल उसके सामने जो मुझे मार रहा है...? उस दिन की घटना याद है जब मुझे मेरी एक बदतमीज साथी ने अपमानित किया था ?        सच बताऊं उस दिन सोचा था कि मैं अपनी गठरी से पत्थर निकालूं और मार दूँ..!                पर यह ना हो सका शिव समझकर मैंने उसे अपनी गठरी में जो रखा था अब जब शिव समझ ही लिया है तो फिर उसे जाने क्यों