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सोशल फ़ोर्स क्या है ...?

किसी ने मुझसे सवाल किया कि क्या सामाजिक बदलाव की भूमिका में न्यायपालिका व्यवस्थापिका कार्यपालिका प्रेस की भूमिका होती है क्या यदि हाँ तो कैसी   ? श्रीमान मुझे बताएं कि आप कैसे बदलाव की बात कर रहे हैं   ? मेरे प्रतिप्रश्न को अपनी ओर आया प्रहार समझ कर भाई साहब जरा सा तनावग्रस्त दिखे । मित्र को यह समझाना पड़ा कि भाई बदलाव बदलाव दो तरह के होते हैं.. सृजनात्मक    एवं विध्वंसक . मित्र जरा शीतल हुए.. उनने सृजनात्मक बदलाव को चुना . जो कुछ बात हुई    उसे अपनी शैली में आप सबसे बाँट रहा हूँ. सकारात्मक बदलाव    में प्रमुख भूमिका होती है सामाजिक-बल अर्थात   Social Force  की. जिसका प्रवाह एक खास तरह का वर्ग करता है...    जिसमें एक या दो अथवा अधिकतम पांच फीसदी लोग संलंग होते हैं. यही समूह   निर्माणकर्ता    है सोशल फ़ोर्स का . जिसमें विचारक चिंतक आध्यात्मिक विश्लेषक कलाकार साहित्यकार चित्रकार किस्सा बाज़ी करने वाले    लोग शामिल    हैं . इनके सतत सृजन से वैचारिक बदलाव आता है. जो प्रसारित होकर सामान्य दिनचर्या वाले लोगों की सोच में बदलाव लातें हैं.    वैचारिक बदलाव से ही एक प्रभावी    सा

Standing against the Taboos: Thoughts and Body

फ़रवरी 22, 2012 को ही अपने ब्लॉग मिसफिट  पर एक आलेख लिखा था कि हम वर्ज़नाओं के खिलाफ सोचऔर शरीर के साथ एक जुट हो गए थे लेख देखिये जिसे देख आप  आप यकीन अवश्य ही करेंगे लगभग 6 साल पूर्व लिखा गया आलेख आज की सच्चाई बयान कर  गया था जिसका अंदाजा मुझे भी न था कि  आज जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही   आर्काइव में पड़ा ये आलेख अचानक सम-सामयिक हो जावेगा   उक्त आलेख का अंग्रेज़ी तर्जुमा करने में मेरी मदद की श्री हेमंत बवानकर जी, पुणे एवं श्री विकास खंडेलवाल जी ने उनका हार्दिक आभार  Some changes in the lifestyle are being heard due to which a radical change in social order is inevitable. I thought that it would not be easy to change the traditional form of social setup. But due to the rapidly changing social thinking in the last ten years, it seems that the changes are very close, probably in the next five years ... maybe even before that. The main thought behind this is “how to live the life?” is not a question at this juncture. Now the question is" how to manage the life?". T

माओ के मवाद को साफ़ करना ही होगा

आतंकवादी   वृथा कल्पनाओ से डरे सहमे         बेतरतीब बेढंगे नकारात्मक विचारो का सैलाब     शुष्क पथरीली संवेदना कटीले विचारो से लहू-लुहान सूखी-बंज़र भावनाओ का निर्मम               " प्रहार " कोरी भावुकता रिश्ते रेत सामान हरियाली असमय वीरान उजड़ता घरोंदा बिखरते अरमान     टूटती-उखड़ती साँसे जीवन              "   बेज़ान  " स्वयं से डरी सहमी अंतरात्मा           औरो को डराती शुष्क पथरीली पिशाची आत्मा का           "   अठ्ठाहास  " वृथा कल्पनाओ से डरे सहमे बेतरतीब         बेढंगे आतंकवादी       सब के सब एक सामान           आतंकवादी.......     भगवानदास गुहा , रायपुर छत्तीसगढ़      मैं खामोश बस्तर हूँ , लेकिन आज बोल रहा हूँ। अपना एक-एक जख्म खोल रहा हूँ। मैं उड़ीसा , आंध्र , महाराष्ट्र की सीमा से टकराता हूँ। लेकिन कभी नहीं घबराता हूँ दरिन्दे सीमा पार करके मेरी छाती में आते हैं। लेकिन महुआ नहीं लहू पीकर जाते हैं। मैं अपनी खूबसूरत वादियों को टटोल रहा हूँ मैं खामोश बस्तर हूँ भाई साहब लेकिन आज बोल रहा  हूँ। गुंड

सोशल-मीडिया पर छील देते हैं मित्र सलिल समाधिया

              सलिल समाधिया    स्वभाव गत बेबाक ,     सलिल समाधिया    मेरी मित्रसूची में सर्वोपरी हैं. सोशल मीडिया के जबलपुरिया  लिक्खाड़ इन दिनों स्तब्ध नि:शब्द से जान पडतें हैं. सलिल फ़िज़ूल बातों से दूर अपनी मौज की रौ में बह रहे हैं.  आइये हम देखें एक ज़बरदस्त पोस्ट ..   कल एक मित्र ने पूछा , " आप , सामाजिक , राजनैतिक विषयों पर क्यों नहीं लिखते हो ? अब जवाब सुनिए ,          हाँ , मैं नहीं लिखता ..रेप पर , मॉब लिंचिंग पर , राजनीति पर , गरीबों की व्यथा पर , क्योंकिं... मैं नहीं चाहता की मैं अपनी पीड़ा और आक्रोश का लावा शब्दों के जाम में उडेलूं और उसे सोशल मीडिया पर शराब की तरह पिया जाए... क्योंकि ..बोल लेने से , बक लेने से बुझ जाती है ..आग चुक जाता है ..वीर्य कुंठित हो जाता है ..पुंसत्व ! इसीलिए तॊ ये देश , क्लीवों का देश हो गया है ! .. क्योंकि , चित्रों , नाटकों और कविताओं ने सोख ली है ...ज़ेहन की गर्मियां और कसी मुट्ठियों की आग ! हां , मैं प्रेम बांटता हूं , और आग संजो के रखता हूं , इस क़दर कि , काट सकूं , अस्मत पे बढ़ते हाथ ! रुदन बना सकूं , राक्षसी अट्टहास को ! प्रेम