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अक्तूबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भस्म आरती

अंतस में खौलता लावा चेहरे पर मुस्कान का ढक्कन धैर्य की सरेस से चिपका तुम से मिलता हूँ ....!! तब जब तुम्हारी बातों की सुई मेरे भाव मनकों के छेदती तब रिसने लगती है अंतस पीर भीतर की आग – तब पीढ़ा का ईंधन पाकर तब युवा हो जाता है यकायक “लावा” तब अचानक ज़ेहन में या सच में सामने आते हो तब चेहरे पर मुस्कान का ढक्कन धैर्य की सरेस से चिपका तुम से मिलता हूँ ....!! मुस्कुराकर ....... अक्सर ......... मुझे ग़मगीन न देख तुम धधकते हो अंतस से पर तुम्हें नहीं आता – चेहरे पर मुस्कान का ढक्कन धैर्य की सरेस से चिपकाना ....!! तुममें –मुझसे बस यही अलहदा है . तुम आक्रामक होते हो मैं मूर्खों की तरह टकटकी लगा अपलक तुमको निहारता हूँ ... और तुम तुम हो वही करते हो जो मैं चाहता हूँ ...... धधक- धधक कर खुद राख हो जाते हो फूंक कर मैं ........ फिर उड़ा देता हूँ ......... तुम्हारी राख को अपने दिलो-दिमाग से हटा देता हूँ तुम्हारी देह-भस्म जो काबिल नहीं होती गिरीश की भस्म आरती के ... ‪#‎ गिरीश‬  बिल्लोरे “मुकुल”

“सूक्ष्म-पूंजी निर्माण में विफलताएं :कुछ कारण कुछ निदान ”

 विकासशीलता का सबसे बड़ा संकट “आय अर्जक का उत्पादकता में सहभाग न करना सकना ” है . अर्थात औसत आय अर्जित करने वाला कोई भी व्यक्ति अपने धन को पूंजी का स्वरुप देकर स्वयं के स्वामित्व में रखने असमर्थ है. जबकि भारतीय मान्यताओं के प्रभाव से उसकी अपेक्षा बचत के लिए प्रेरित तो करती है परन्तु परिस्थितियाँ आय-अर्जक के सर्वथा विपरीत होती है .      “ भारतीय वैदिक जीवन प्रणाली में जीवन में “अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष” का भौतिक अर्थ !” अर्थ को सर्वोपरी रखते हुए जीवन के प्रारम्भ में ही नागरिक को अर्जन करने का संकेत स्पष्ट रूप से दिया गया है ... कि आप अपनी युक्तियों, साधनों, एवं पराक्रम (क्षमताओं  एवं स्किल ) से धन अर्जन कीजिये . जो आपके धर्म अर्थात सामाजिक-दायित्वों के निर्वहन जैसे परिवार-पोषण, सामाजिक दायित्वों के निर्वहन – दान, राजकीय लेनदारियों जैसे कर (टेक्स) , लगान  आदि का निपटान कीजिये . काम अर्थात अपनी आकांक्षाओं एवं ज़रूरतों  की प्रतिपूर्ति पर व्यय कीजिये, शेष धन को संग्रहीत कीजिये भविष्य की आसन्न ज़रूरतों के लिए और मुक्त रहिये किसी भी ऐसे भय से मोक्ष का भौतिक तात्पर्य सिर्फ यही  है. यहाँ अध्य

अब बॉलीवुड की तैयारी में नंदा

मॉडल और खादी के प्रमोटर के रूप में अलग पहचान बना चुकीं जानी मानी मॉडल नंदा यादव अब बॉलीवुड फिल्मों में खुद को आजमाने जा रही हैं। उन्हें इस दिशा में अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। भोपाल यात्रा पर आईं नंदा यादव ने बताया कि वे फिलहाल सिर्फ इतना बता सकती हैं कि एक फिल्म में वे लीड रोल कर रही हैं। उन्होंने कहा कि फिल्म की आधिकारिक घोषणा और स्टार कास्ट के बारे में जल्द ही मुंबई में प्रेस कॉफ्रेंस होगी। उन्होंने कहा कि इस समय का बहुत दिनों से इंतजार था। इसके लिए उन्होंने डांस, एक्टिंग और डॉयलॉग डिलेवरी पर बहुत काम किया है। कई तरह की अन्य ट्रेनिंग भी ली है। नंदा यादव ऐसे तो दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं जहां उन्होंने स्पेनिश सहित भाषाओं में डिग्री हासिल की, लेकिन कुछ सालों से वे मॉडलिंग कर रही हैं। देश और विदेश में कई शोज कर चुकीं नंदा ने अपनी कंपनी ‘रेड सिस्टर ब्लू’ के जरिए खादी को कई शहरों में प्रमोट किया है। उन्होंने अपने खास इंटरव्यू में कहा कि अब उनका फोकस बॉलीवुड फिल्में हैं। इससे पहले वे कई फैशन शोज, टीवी सीरियल और इवेंट्स में हिस्सा ले चुकी हैं। सुमित वर्मा 

“ भारतीय बौद्धिक संपदा को छीनने की कोशिश रावण के अंत की मुख्य वज़ह थी...? ”

एक  था   रावण   बहुत बड़ा प्रतापी यशस्वी राज़ा , विश्व को ही नहीं अन्य ग्रहों तक विस्तारित उसका साम्राज्य   वयं-रक्षाम   का उदघोष करता . यह तथ्य किशोरावस्था में मैंने   आचार्य चतुरसेन शास्त्री   के ज़रिये  जाना था .  रावण के पराक्रम उसकी साम्राज्य व्यवस्था को. ये अलग बात है कि उन दिनों मुझमें उतनी सियासी व्यवस्था की समझ न थी. पर एक सवाल सदा खुद  पूछता रहा-   क्या वज़ह थी कि राम ने रावण को मारा ?  राम   को हम भारतीय जो  आध्यात्मिक धार्मिक भाव से देखते हैं    राम को मैने कभी भी एक राजा के रूप में आम भारतीय की तरह मन में नहीं बसाया. मुझे उनका करुणानिधान स्वरूप ही पसंद है. किंतु जो अधिसंख्यक आबादी के लिये करुणानिधान हो वो किसी को मार कैसे सकता है ? और जब एक सम्राठ के रूप में राम को देखा तो सहज दृष्टिगोचर होती गईं सारी रामायण कालीन स्थितियां राजा रामचंद्र की रघुवीर तस्वीर साफ़ होने लगी                                            रामायण-कालीन वैश्विक व्यवस्था का दृश्य   रावण के संदर्भ में   हिंदी विकीपीडिया     में दर्ज़ विवरण को देखें जहां बाल्मीकि के हवाले से (श्लोक सहित ) विवरण द

वेदप्रकाश वैदिक ने कहा -"लेखकों का नपुंसक गुस्सा "

भारतीय साहित्यजगत इन दिनों जिस उहापोह की स्थिति में है मैंने अपनी इस उम्र में ऐसे अवसर कभी नहीं देखे . भयंकरतम नरसंहार अथवा अमानवीय परिस्थितियों में सदा साहित्यकार रोया है .उसकी लेखनी रोई .उसने  लिखा है बदलाव के लिए कुंठा के विस्तार के लिए नहीं साथ ही अपने गरिमामय सम्मान को सदैव बरकरार रखा है . 50 वर्षों से देश ऐसा समय हमेशा आता रहा होगा जब पुरस्कार भी मिलें हों अपराध भी कारित हुए हों . चलिए . आपातकाल में संवैधानिक-अधिकार क्या थे .... तब सम्मान करीने से सजे रखे थे शो-केसों  में इस बात को बड़े सलीके से उठाते हुए डा. वैदिक ने इस गुस्से को नपुंसक बताया है .      समय समय पर विश्व में हुई क्रांतियाँ चाहे वे आज़ादी के लिए हों अथवा सामाजिक-समरसता लाने के लिए साहित्य ने अपना दायित्व बखूबी निबाहा है . उसमें बहुधा हिंसा न थी . न ही व्यक्तिगत द्वेषराग सभी लोग एक दूसरे के सिद्धांतों से असहमत हुए किसी दूसरे को अस्पृश्य साबित करने की कोशिश कभी न हुई . मामला अखलाक की निर्मम हत्या, मेरे पसंदीदा सिंगर गुलाम साहब को न आने देना, या कालिख पोतने को एक व्यक्ति के सर मढ़ना न केवल प्रोवोग करने की कोशिशों

सियासी हलकों में पूजने लगा है . दिया अदब का अब बुझने लगा है

सियासी हलकों में पुजने  लगा है . दिया अदब का अब बुझने लगा है . ################ कटा सर आया था तो चुप था वो, इक लफ्ज़ न बोला वापस करने को  सितारों  से भरा  झोला न खोला...!               भरोसा अपना जुगनुओं से उठने लगा है ..!! ################ सैकड़ों पुलिस वाले मारे, मरे मज़लूम पटवारी सुकमा में साबित हुए हो कई बार अपचारी....!             तबका सोया हुआ तबका अब उठने लगा है ..!! ################ तुम्हारी गोलबंदी अब न  चलेगी  जानते हो तुम अपने हालात को अच्छी तरह पहचानते हो तुम ......!             तुम्हारी हर हकीकत से जो पर्दा  उठने लगा है ..!!                            @ गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”

सोनिया जी “फसल” तो आप की भी खराब हुई है

::::::::::::::::::::::: अवर्षा से किसान परेशान .. सरकार को आया ध्यान हुआ मुआवज़े का ऐलान गाँव में आया तहसीलदार किसी को दिए तीन तो किसी को पांच हज़ार ... हमारा दुखियारा रहमदिल किसान मुआवजा पाकर हो गए हैरान ? देर शाम बिछी पीपल के नीचे बिछायत निभाई गई हुक्का-पान-बीढ़ी रिवायत सबने सिरपंच के आदेश पे सौ सौ रूपए किए जमा फिर सोचने लगे “बड्डा- जा है खरचहैं कहाँ ..?” एक बोला यहाँ .. दूसरा बोला न बब्बू .. वहां सरपंच बोला – कल्लू जा रहो है राजधानी बाहै लग है खर्चा-पानी ...... गाँव वालों ने जमा रूपए कल्लू के किये हवाले ले कल्लू दान कर या खाले ... कल्लू दिल्ली पहुंचा – रास्ते में सोनिया जी के हुए दर्शन भरे रुंधे गले से किया भक्ति भाव का प्रदर्शन ... सोनिया जी ने पास बुलाया ... उसे अच्छे दिन का भरोसा दिलाया सोनिया जी , ये लीजिये हमारे गाँव में मुआवजा बटा  है सबने इकट्ठा कर मुझे दिया है ..... मैं आपको दे रहा हूँ ... फसल खराब होने का दर्द किसान ही जानते हैं ....... सह दुखिया के दर्द को हम पहचानते हैं ...... “फसल” तो आप की भी खराब हुई है हम क्या सारी दुनि

क्रांतिकारी लेखक थे मुंशी प्रेमचंद : फ़िरदौस ख़ान

मुंशी प्रेमचंद क्रांतिकारी रचनाकर थे. वह समाज सुधारक और विचारक भी थे. उनके लेखन का मक़सद सिर्फ़ मनोरंजन कराना ही नहीं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों की ओर ध्यान आकर्षित कराना भी था. वह सामाजिक क्रांति में विश्वास करते थे. वह कहते थे कि समाज में ज़िंदा रहने में जितनी मुश्किलों का सामना लोग करेंगे, उतना ही वहां गुनाह होगा. अगर समाज में लोग खु़शहाल होंगे, तो समाज में अच्छाई ज़्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा. मुंशी प्रेमचंद ने शोषित वर्ग के लोगों को उठाने की हर मुमकिन कोशिश की. उन्होंने आवाज़ लगाई- ऐ लोगों, जब तुम्हें संसार में रहना है, तो ज़िंदा लोगों की तरह रहो, मुर्दों की तरह रहने से क्या फ़ायदा. मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था. उनका जन्म 31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले के गांव लमही में हुआ था. उनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल और माता का नाम आनंदी देवी था. उनका बचपन गांव में बीता. उन्होंने एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी की शिक्षा हासिल की. 1818 में उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी. वह एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापन का कार्य करने लगे और कई पदोन्नतियो