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जुलाई, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक सदी का अवसान

कलाम साहब ने कहा था - मेरी मृत्यु पर अवकाश घोषित न हो आप उस दिन अधिक कार्य करें . मानवता के पुजारी एवं शताब्दी के युगयोगी ने साबित किया कि कितना सहज है धारा से शिखर की यात्रा मगर उससे भी सहज और सरल है "सहज और सरल" होना । मेरे देश के बच्चे जो उनसे मिले हैं निसंदेह भाग्यशाली थे । हमारे कानों में बस मिसाइल मैं के सन्देश अनवरत जारी रहेंगे । हम घंटो सोचते रहें तो भी शब्द नहीं मिल रहे । सदियों लिखेंगे तो भी अनोखा व्यक्तित्व  के बारे में लिख न पाएंगे । समंदर की स्याही से कल्पतरु की कलम से अनंत आकाश पर लिखी जाती रहेगी उनकी अमरगाथा तब भी हम पूर्ण न लिख पाएंगे । भला आकाश जैसे महान के बारे में लिखने की शक्ति मुझ में तो नहीं

अभिव्यक्ति के अधिकार का पुनरावलोकन ज़रूरी है ?

संचार माध्यमों से  ज्ञात हो रहा है कि  कुछ हस्तियों ने  याकूब मेनन की फांसी पर दया का अनुरोध आपको प्रेषित किया है . साथ ही कुछ लोग माननीय सर्वोच्च  न्यायालय के निर्णय पर टिप्पणी तक की है . माननीय सर्वोच्च  न्यायालय के निर्णय पर टिप्पणीयाँ एक नकारात्मक स्थिति निर्मित करतीं हैं .  इस देश की अस्मिता अखंडता को चुनौती देना न्याय व्यवस्था के तहत जारी निर्णयों को सार्वजनिक फोरम पर उठाना सर्वथा न्यायिक-व्यवस्था एवं संवैधानिक व्यवस्था को निरुत्साहित करने की कोशिश है .         किसी भी राष्ट्रद्रोह में शामिल किसी भी हिस्से के अपराध को उतना ही जघन्य माना जाना चाहिए जितना की मुख्य षडयंत्रकारी माना जाना चाहिए  . स्पष्ट है कि देशद्रोह के मैकैनिज़म में शामिल हो कोई भी पुर्जा चाहे तो अपराध को कारित होने से रोक सकता है . याकूब अगर प्रथम दिन से ही चाहता तो वह इस जघन्य अपराध को रोक सकता था . लिहाजा वो टाइगर मेनन के सामान ही दोषी है . जैसा पूरे मुकदमें  में प्रस्तुत एवं  साबित हुआ . अत: प्रोसीज़रल चूकों को आधार पर अथवा किसी भी अन्य कारण प्रस्तुत समस्त दया याचिकाएं स्वीकार्य योग्य नहीं हैं .      

अंतस में खौलता लावा

चेहरे पर मुस्कान का ढक्कन धैर्य की सरेस से चिपका तुम से मिलता हूँ ....!! तब जब तुम्हारी बातों की सुई मेरे भाव मनकों के छेदती तब रिसने लगती है अंतस पीर   भीतर की आग  – तब पीढ़ा का ईंधन पाकर तब युवा हो जाता है यकायक “लावा” तब अचानक ज़ेहन में या सच में सामने आते हो तब चेहरे पर मुस्कान का ढक्कन धैर्य की सरेस से चिपका तुम से मिलता हूँ ....!! मुस्कुराकर ....... अक्सर ......... मुझे ग़मगीन न देख तुम धधकते हो अंतस से पर तुम्हें नहीं आता – चेहरे पर मुस्कान का ढक्कन धैर्य की सरेस से चिपकाना ....!! तुममें –मुझसे बस यही अलहदा है . तुम आक्रामक होते हो मैं मूर्खों की तरह  टकटकी लगा    अपलक तुमको निहारता हूँ ... और तुम तुम हो वही करते हो जो मैं चाहता हूँ ...... धधक- धधक कर खुद राख हो जाते हो फूंक कर मैं ........ फिर उड़ा देता हूँ ......... अपने दिलो-दिमाग से तुम्हारी देह-भस्म जो काबिल नहीं होती भस्म आरती के ...                        #गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”

खुद ही रंगरेज़ हूँ खुद का मैं रंग हूँ ...!

गीत हूँ कि छंद हूँ  मधुप या  मकरंद हूँ एक हर्फ़ हूँ कहो या कि पूरा ग्रंथ हूँ ...? .............. सृष्टि के श्रृंगार को सृष्टि ने मुझे रचा जन्मते ही प्रश्न था – माँ कहो मैं क्यूं रचा ? आँचरा बिखेर के  – अमिय कलश लगा दिया प्रश्न करते होंठों को – माँ ने चुप करा लिया .     तब जाना देह नहीं अंतर्संबंध हूँ ...! .............. जो चाहा मिल गया अनचाहा छोड़ के नाते कुछ नवल बने हर अगले मोड़ पे . जो छूटा जाने दो, नया कुछ तो साथ है आगे तक लाने में विगत का ही हाथ है     बाहर शांत सही अंतस से द्वंद्व हूँ...! .............. अभिनय मैं अभिनेता कथा भी कथानक हूँ गीतों का शब्द कभी शब्द का नियामक हूँ संग साथ चलो मेरे हाथ राह में छोडो ...? जैसी तुम चाहो, वैसी ही धुन जोड़ो   ... ?     खुद ही रंगरेज़ हूँ  खुद का मैं रंग हूँ ...! ..............      

सियासी का वो चिलमची है सोचिये उसकी आबरू क्या है

दैनिक ट्रिब्यून से साभार  कौन गुस्ताख पूछने आया तेरा रास्ता और तू क्या है   जो हो न पाए कभी पूरी वो आरज़ू आरज़ू क्या है सियासी का वो चिलमची है   सोचिये उसकी आबरू क्या है मुकुल सच बयान करता है शोर होता है बता तू क्या है Girish Billore Mukul

चंद शेर : गिरीश"मुकुल"

बदला ? कोई सवाल   नहीं   क्या लेके करूंगा दिल जीतने निकला हूँ, दिल जीत ही लूंगा ..!! ::::::::::: मेरे तुम्हारे बीच में क्या रफ़्तार का नाता ? तुम तेज़ी से आ रहे हो मैं पर्वत सा खडा हूँ :::::::::::: आओ कहीं मिल बैठ के बचपन को पुकारें आएगा क्या हम जैसा ही छिप जाएगा कहीं :::::::::::: मेरी ख़ाक बिखेर देना  हरियाली ही मिलेगी   फसले - बहार हूँ, कोई  सेहरा नहीं हूँ मैं  !! :::::::::::: दामन पे मेरे दाग ! ज़रा बच के निकलना षडयंत्र तुम्हें तुम्हारे  कहीं याद न आएं  ? :::::::::::: आँखों में मेरी  झौंक गया किरकिरी सी रेत फिर आके पूछता है ज़रा रास्ता बताइये ?   :::::::::::: आँखों की किरकिरी हूँ वज़ह कोई तो होगी  जा गुलबकावली का अर्क खोज के ले आ !

संजीव कुमार : ख़्वाबों से हक़ीक़त तक : फिरदौस खान

 एक ज़माने से देश के कोने-कोने से युवा हिंदी सिनेमा में छा जाने का ख़्वाब लिए मुंबई आते रहे हैं. इनमें से कई खु़शक़िस्मत तो सिनेमा के आसमान पर रौशन सितारा बनकर चमकने लगते हैं , तो कई नाकामी के अंधेरे में खो जाते हैं. लेकिन युवाओं के मुंबई आने का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है. एक ऐसे ही युवा थे संजीव कुमार , जो फ़िल्मों में नायक बनने का ख़्वाब देखा करते थे. और इसी ख़्वाब को पूरा करने के लिए वह चल पड़े एक ऐसी राह पर , जहां उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना था. मगर अपने ख़्वाब को पूरा करने के लिए वह मुश्किल से मुश्किल इम्तिहान देने को तैयार थे. उनकी इसी लगन और मेहनत ने उन्हें हिंदी सिनेमा का ऐसा अभिनेता बना दिया , जो ख़ुद ही अपनी मिसाल है. संजीव कुमार का जन्म 9 जुलाई , 1938 को मुंबई में हुआ था. उनका असली नाम हरि भाई ज़रीवाला था. उनका पैतृक निवास सूरत में था. बाद में उनका परिवार मुंबई आ गया. उन्हें बचपन से फ़िल्मों का काफ़ी शौक़ था. वह फ़िल्मों में नायक बनना चाहते थे. अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने रंगमंच का सहारा लिया. इसके बाद उन्होंने फ़िल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाख़िला ले लिया और