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मई, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नदियों के घाटों पर महिलाओं की सुरक्षा : कुछ सुझाव

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नदियों  के तटों पर  परिवार सहित भक्त जन  भक्ति भाव से   आते हैं अपने बेटे   बेटियों बहुओं महिलाओं के साथ . कल शाम ग्वारीघाट पर आध्यामिक भ्रमण के दौरान मैंने भी स्नान किया देखा जहां महिलाएं स्नान कर रहीं थीं वहां शोहदे टाइप के लोग अधिक सक्रीय थे . बाकायदा अपने सेलफोन से फोटोग्राफी में मशगूल भी थे.           कुछ परिवारों ने विरोध भी जताया जो जायज था . भद्र मीडिया जिताना समय और स्पेस सनी लियोनी को अथवा सियासत को दे रहा है उससे आधा समय भी दे दे तो महिलाओं के खिलाफ होते इस सामाजिक नज़रिए को  बदला जा सकता है.  मेरी तस्वीर को देखिये क्या मैंने ग़दर फिल्म में काम किया है ?           न्यू-मीडिया एरा  में सबसे फास्ट-इन्फार्मेशन स्प्रेड करने वाले सारे संसाधन मौजूद  हैं . पलक झपकते ही  आप की तस्वीर कहाँ जाएगी इस बात का आपको गुमान भी नहीं  हो पाता. फिर आपकी तस्वीर को सेलफोन पर मौजूद सॉफ्टवेयर के ज़रिये क्या से क्या बनाया जा सकता है इस बात का तो अंदाजा कोई भी नहीं लगा सकता . मेरी तस्वीर को देखिये क्या मैंने ग़दर फिल्म में काम किया है ... न फिर भी हीरो की ज़गह मेरी तस्वीर चस्पा है ... ये सॉफ्

हीट स्ट्रोक के मामलों में इज़ाफ़ा, एहतियात बरतने की सलाह :सरफ़राज़ ख़ान

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भीषण गर्मी के कारण देश में हीट स्ट्रोक के मामलों में इज़ाफ़ा हो रहा है. हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने गर्मी में मरीजों द्वारा की जाने वाली गलतियों और प्रबंध के बारे में दिशा-निर्देश जारी किए हैं. हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल   के मुताबिक़ हीट स्ट्रोक दो तरह के होते हैं। पहला , वे जो युवा काफ़ी समय तक गर्मी के दौरान मेहनत वाले काम में संलिप्त होते हैं , हीट स्ट्रोक के षिकार होते हैं. हालांकि नॉन एक्जरशनल हीट स्ट्रोक कम सक्रिय रहने वाले वृध्दों या ऐसे लोगों पर अधिक असर डालती है जो बीमार होते हैं या कम उम्र वाले बच्चों में होती हैं. अगर इस पर समय पर ध्यान नहीं दिया जाए तो सैकड़ों लोग 72 घंटों में जान गंवा सकते हैं. अगर उपचार में देरी हुई तो मृत्यु की संभावना 80 फ़ीसदी तक होती है , इसमें भी दस फ़ीसदी की कमी की जा सकती है अगर संभावित गलतियों से बचा जाए व जल्द ज़रूरी उपाय कर लिए जाएं। बीमारी का पता न लगा पाना : यह रेक्टल तापमान है जो कि एग्जिलरी या ओरल तापमान से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। व्यक्ति को हीट स्ट्रोक हो सकता है जिसमें उपचार न करा पाने की

फास्ट एरा बनाम फेसबुक, टिवटर और व्हाट्सएप : डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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समीक्षक का काम टिप्पणी करना होता है। उसकी समझ से वह जो भी कर रहा है , ठीक ही है। मैं यह कत्तई नहीं मान सकता , क्योंकि टिप्पणियाँ कई तरह की होती हैं। कुछेक लोग उसे पसन्द करते हैं , बहुतेरे नकार देते हैं। पसन्द और नापसन्द करना यह समीक्षकों की टिप्पणियाँ पढ़ने वालों पर निर्भर हैं। बहरहाल कुछ भी हो आजकल स्वतंत्र पत्रकार बनकर टिप्पणियाँ करने वालों की संख्या में वृद्धि हुई हैं , जिनमें कुछ नए हैं तो बहुत से वरिष्ठ (उम्र के लिहाज से) होते हैं। 21 वीं सदी फास्ट एरा कही जाती है , इस जमाने में सतही लेखन को बड़े चाव से पढ़ा जाता हैं। बेहतर यह है कि वही लिखा जाये जो पाठको को पसन्द हो! आकरण अपनी विद्वता कर परिचय देना सर्वथा उपयुक्त नहीं हैं। चार दशक से ऊपर की अवधि में मैने भी सामयिकी लिखने में अनेकों बार रूचि दिखाई , परिणाम यह होता रहा कि पाठकों के पत्र आ जाते थे , वे लोग स्पष्ट कहते थे कि मैं अपनी मौलिकता न खोऊँ। तात्पर्य यह कि वही लिखूँ जिसे हर वर्ग का पाठक सहज ग्रहण कर ले। जब जब लेखक साहित्यकार बनने की कोशिश करता है , वह नकार दिया जाता है। जिसे साहित्य ही पढ़ना होगा , वह अखबार/पोर्टल क्यों सब्

रेवा तट के बच्चे

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माँ रेवा देती है इनको नारियल चुनरी .. फोटो:- तिलवाराघाट , जबलपुर  भेडाघाट के धुआंधार पर यूं तो बरसों से सुनाई देती आवाज़ कि     सा ' ब चौअन्नी मैको हम निकाल हैं. . .!!  अब फ़र्क ये है कि बच्चे अब दस रूपए की मांग करते हैं भगत लोग बड़े दिलदार हैं दस का तो क्या पचार रूपए का सिक्का धुंआधार में फैंकने में आनाकानी  नहीं करते करें भी क्यों परसाई दद्दा वाली अफीम जो दबा रखी है . टुन्न हैं टुन्न और टुन्नी में (ठेठ जबलईपुरी मेंकहूं तो ये कहूंगा ..सा'ब... सब चलत है वोट.... रेप.... लड़ाई....... झगड़ा .... हओ...! सब कछु  ....!!  गलत तौ है मनो चलत है .   हमारा नज़रिया गरीबों के लिए साफ़ तौर पर सामाजिक कम धार्मिक अधिक होता है . जिसके चलते बच्चे दस-पांच रुपयों के पीछे दिन भर नर्मदा तटों पर लहरों से गलबहियां करते हुए गोताखोरी किया करते हैं . चाहे ग्वारीघाट वाले ढीमर-कहारों के बच्चे हों या तिलवारा के पटेलों के ... सब जन्म के बाद बड़े होते हैं फिर नदी को पढ़ते हैं तट पर खेलते हैं . अनुशासित पाठ्यक्रम से दूर  का नाम है....? गुलाब..... स्कूल ........ छुट्टी चल रई है ... स्कूल में नाम लिखो ह

पोट्रेट्स

  अक्सर उसे किसी न किसी को अपमानित करते अथवा किसी की चुगली करते देखना लोंगों का अभ्यास सा बन गया था .   सुबह दोपहर शाम निंदा और चुगलियाँ करना   उसके जीवन का मौलिक उद्देश्य था . कई लोगों ने कई बार सोचा कि उसे नसीहत दी जावे पर इस प्रकार का काम करने का लोग जोखिम इस वज़ह से नहीं उठाना चाहते क्योंकि वे जानते हैं कि अति के दुःखद परिणामों का आना निश्चित ही होता है .   संस्थानों में ऐसे दुश्चरित्रों से लोग बाकायदा सुविधाजनक अंतराल स्थापित कर ही लेते हैं . करना भी चाहिए नगर निगम की नालियों से बहने वाली गन्दगी में कोई पत्थर फैंक कर अपने वस्त्र क्यों खराब करे ..भला  !   समय के साथ साथ फतेहचंद का चेहरा  गुणानुरूप विकृत सा दिखाई देने लगा था सामने से टूटे हुए दांत ये साबित कर रहे थे कि बाह्य शारीरिक बल के प्रयोग से यह बदलाव आया है . ये लग बात है कि उसे किस रूप में परिभाषित किया जा रहा था किन्तु ज्ञान सभी को था . फिर भी बुद्धि चातुर्य के सहारे फ़तेह अक्सर अपनी मजिल फतह कर ही लेता था . मित्रो किसी ने उसे सुझाया कि वो एक बेहतरीन विश्लेषक है तो क्यों नहीं चित्रकारी करे लोगों को पोट्रेट करे

अपाहिजों के सापेक्ष नहीं है समाज एवम् व्यवस्था

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विश्व में अपाहिज आबादी के लिए जितने प्रयास किये जा रहे हैं उन सब को देख के लगता है कि वैश्विक समाज और  सरकारें विकलांगता को उत्पादकता का भाग न मानकर व्ययभार मानतीं है । इस परिपेक्ष्य में अन्य वीकर सैगमेंट की अपेक्षा कम तरज़ीह दी जा रही है । भारत उपमहाद्वीप में स्थिति सामाजिक एवम् पारिवारिक संरचना में धार्मिक दबावों के चलते इस वीकर सैगमेंट को सामाजिक तौर पर नकारा तो नहीं जाता पर पारिवारिक महत्व भी उतना नहीं है जितना कि सर्वांग सदस्य को है ।   सरकार ही भूमिका :- अपाहिज जीवन के लिए सरकारी स्तर पर दी जाने वाली सुविधा में पुनर्विचारण की ज़रुरत है । हालिया प्राप्त हो रही खबरों से स्पष्ट हो रहा है कि इस वर्ग के लोगों को मेडिकल प्रमाण पत्र प्राप्त करना सहज नहीं । इस बात की पुष्टि किसी भी सरकारी अस्पताल के बोर्ड के कामकाज से लगाईं जा सकती है । सरकार के संज्ञान में कमोबेश ये बिंदु अवश्य ही होगा कि यहाँ  भ्रष्टाचार गहरी जड़ें जमा चुका है । सहकर्मियों का नजरिया :- सहकर्मियों का नज़रिया बेहद अजीब सा हुआ करता है । हालिया दिनों में इसके कई उदाहरण सामने आए हैं किन्तु इन पर त्वरित दंडात्मक कार्रवाई न

माँ अरुणा तुम कब कब कहाँ कहाँ

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27 नवंबर , 1973 को अस्पताल के स्वीपर के हाथों यौन हिंसा की शिकार होने के बाद से ही माँ अरुणा कोमा में थी आज वे हमें छोड़ गईं सैकड़ों सवालों के साथ .... पर माँ के लिए केवल अश्रु बहाना चर्चा करा लेना कविता लिख देना श्रृद्धांजलि  तो है पर सच्ची- श्रृद्धांजलि शायद नहीं इस श्रृद्धांजलि में सुनिए कल का भयावह स्वरुप ............   माँ अरुणा  तुम कब कब कहाँ कहाँ कैसे कैसे छली जाती रही  हो बोलो न....? बोलती क्यों नहीं ४२ साल तक मौन व्रत..? नि:शब्द रहने का तप.....? तापसी माँ तुम चुप क्यों थी ... तुम्हारे लिए मोमबत्तियां जलीं थीं या नहीं इससे मुझे कोई सरोकार नहीं पर तुम्हारा अस्तित्व वो अनाचारी जला गया आज भी जलाता है ...... रोज़िन्ना जलाता है माँ .... तुमको .......... अस्पतालों में तबेलों में घुड़सालों में रेल बस स्कूल कॉलेज़ में हर कहीं ....... जिधर देखो वहीं फ्रायडी-नज़र लिए घूमते भेड़िए को आज भी बेखौफ़ घूमता... न क़ानून बांध सका कोई कृष्ण शस्त्रसंधान न सका क़ानून व्यवस्था समाज सबको अब जान लेना चाहिए आने वाली धीमी ध्वनियाँ जो नि:शब्द जीवन के  शस्त्र

ज़रा सोचें ये सब आजकल कहाँ नहीं है ?

वाटसएप  महाराज के ज़रिये मिली कहानी के लेखक जहां भीं हों उनको मेरा नमन वास्तव में विचार सम्प्रेषण में इन नए संचार माध्यमों का बड़ा अवदान है . ये कथा मुझे बेहद प्रभावित कर गई अतएव पेश कर हूं उन अज्ञात लेखक मौन सहमति माँ कर जिनको मैं जानता भी नहीं........ एक नन्हीं चींटी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम अपना काम समय पर करती थी..... वे जरूरत से ज्यादा काम करके भी खूब खुश थी.......ज्ंगल के राजा शेर नें एक दिन चींटी को काम करते हुए देखा , और आश्चर्यचकित हुआ कि चींटी बिना किसी निरीक्षण के काम कर रही थी........ उसने सोचा कि अगर चींटी बिना किसी सुपरवाईजर के इतना काम , कर रही थी तो जरूर सुपरवाईजर के साथ वो अधिक काम कर सकती थी. उसनें काक्रोच को नियुक्त किया जिसे सुपर्वाईजरी का 10 साल का अनुभव था ,   और वो रिपोर्टों का बढ़िया अनुसंधान करता था . काक्रोच नें आते ही साथ सुबह आने का टाइम , लंच टाईम और जाने का टाईम निर्धारित किया , और अटेंडेंस रजिस्टर बनाया. उसनें अपनी रिपोर्टें टाईप करने के लिये , सेकेट्री भी रखी.... उसनें मकड़ी को नियुक्त किया जो सारे फोनों का जवाब देता था और सारे रिकार्ड

100 वर्ग मीटर का वर्चुअल राष्ट्र "द किंगडम ऑफ़ एनक्लाव"

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निर्माण हो रहा है एक ऐसे राष्ट्र का  जिसका क्षेत्र फल मात्र 100 वर्ग मीटर है आभासी दुनिया में तो स्थापित हो ही गया है . नाम प्यॉत्र वारजेंकीविज को जब पता लगा स्लोवेनिया के मेटलिका शहर के पास और क्रोएश्या की राजधानी जागरेब से करीब 50 किलोमीटर दूर एक ऐसी जगह के बारे में पता चला , जिस पर किसी का अधिकार नहीं है... बस फिर क्या था उस नो मैंस लैंड घोषित ज़मीन पर अधिकार घोषित कर दिया . हुआ कुछ यूं कि 1991 में यूगोस्लाविया का विघटन हुआ के दौरान विवादित भूमि को सर्वामतेन नो मैंस लैंड घोषित किया गया . बस फिर क्या था एक विचार बना कि बिना टेक्स देकर, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ विश्व के किसी व्यक्ति को किसी ऐसे देश में रखा जावे जहां  जिसमें रंग , जाति , धर्म , का भेदभाव किये बगैर किसी को भी रखा जा सकता है . मुफ्त अद्ध्ययन , मुक्त अभिव्यक्ति , टेक्स भी न हो ..... इस निर्माणाधीन राष्ट्र का बाकायदा फेसबुक पेज भी है . जिसका यू आर एल है : https://www.facebook.com/TheKingdomOfEnclava इस यूं आर एल के ज़रिये विश्व का कोई भी नागरिक  इस देश के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकता हैं .इतना ही नहीं