सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

अप्रैल, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

काबुल की फर्खुन्दा

काबुल की फर्खुन्दा  मरने के बाद जी उठती है आती है मेरे ज़ेहन में अक्सर जब किसी बेटी के हाथों में किताब देखता हूँ डर जाता हूँ घबराता हूँ अकेले रो भी लेता हूँ अनजानी फर्खुन्दा के लिए तब आती है हौले से सिहाने मेरे माथे पे सव्यसाची की तरह हाथ फेरती है यकीन दिलाती है कि उसने किताब नहीं जलाई ............ सच वो बेगुनाह है .......... किताबें जो सेल्फ में सजी होती हैं किताबें जो पूजा घर में रखी होतीं हैं किसी ज़लज़ले में पुर्जा पुर्जा होती हैं किताबें जो दीमकें खा जातीं हैं किताबें जो रिसते हुए पानी में गल जातीं हैं किताबें जो बच्चे फाड़ देतें हैं उन का हिसाब रखते हो तुम ? न कभी नहीं ......... तो फिर फर्खुन्दा की जान लेना किस किताब के हिसाब से जायज़ था ... किताबें बनातीं हैं इंसान को इंसान बनातीं हैं फर्खुन्दा पर  पत्थर पटक कर उसे ज़लाकर तुमको क्या मिला .......... क्यों जलाते हो ज़ेहनों में कभी न बुझाने वाली आग .......... मरी फर्खुन्दा पर  बड़े बड़े पत्थर बरसा कर फिर सरे आम जलाकर उस किताब में ये तो लिक्खा ही न था Farkhunda was killed in Kabul on 19th of March 2015 in

मुहावरे से गायब होता घड़ियाल अब लोग बोलेंगे "आशुतोषी आंसू"

           हमारी  बुजुर्ग  मौसी जी   बेहद भावुक  हैं ज़रा सी बात हुई नहीं कि नगर पालिक निगम के बे टोंटीदार नालों के मानिंद   उनकी आँखों से टप्प टप्प टपा टप अश्रुधार निकल पड़ती है . आपके आंसू उनके आंसुओं में बहुत फर्क है . आपके आंसू निहायत  सियासी अभिनय का एक हिस्सा है जबकि उनके आंसुओं में स्नेह, भावात्मकता की तरलता है .             आप क्या जानें भावनाओं की तरलता को ........... आपकी सोच में कुंठा और दिखावे का अतिरेक साफ़ तौर पर झलकता है . हम सब मूर्ख नहीं हैं सबने उस सभा को देखा है  सब जानते हैं कि आपकी असहिष्णुता को कुमार के "लटक-गया" की गूँज दिलो दिमाग से हटाए नहीं हट पाएगी . आप मीडिया कर्मी थे उम्मीद थी कि आप में संवेदना होगी ही . किन्तु मंच से आप सभी  उस व्यक्ति को  मौत के पास जाता देख उतरे तक नहीं .............   न जाते तो कम से कम सभा को रोका जा सकता था . जहां तक कुमार का सवाल है वे तो वैचारिक हिंसक होने के प्रमाण अक्सर मंचों पर तब से देते आए हैं जब वे केवल निजी  कालेजों के बच्चों को ये बताते फिरते थे कि - भारत ही एक ऐसा देश है जहां ........... खैर छोडिये उस बेटी की आह

मध्यप्रदेश के बाल विवाह विरोधी लाडो अभियान को पी एम के हाथों मिला सम्मान

          मध्यप्रदेश शासन के महिला सशक्तिकरण विभाग ने 2013 से     लाडो अभियान चलाकर बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 को प्रभावी बनाने जो कदम उठाए उससे इस दिशा में अभियान के द्वितीय चरण अर्थात   लाडो अभियान 2015 के प्रभावी असर दिखाई डे रहे हैं . लाडो-अभियान एक मिशन मोड में चलाया जाने वाला कार्यक्रम है . इस कार्यक्रम की प्रणेता महिला सशक्तिकरण संचालनालय की आयुक्त  श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव का स्वप्न है  कि महिलाओं एवं बच्चों सशक्तिकरण के लिए सर्वांगीण पहल होनी चाहिए . आम जनता को यह महसूस हो कि  सामाजिक बदलाव लाने के लिए   सरकार के साथ साथ आम नागरिक की ज़िम्मेदारी भी है . इस हेतु योजनाएं अथवा कार्यक्रमों का जनजन तक पहुँचना आवश्यक होता है .. इसी क्रम में  महिला सशक्तिकरण संचालनालय की आयुक्त  श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव  की सोच लीक से हटकर नज़र आ रही है . उनकी सोच से  स्वागतम लक्ष्मी , लाडो-अभियान , शौर्यादल  जैसे  कार्यक्रम  समाज के सामने आए हैं जो महिलाओं एवं बच्चों के समग्र कल्याण  के लिए सामाजिक पहल की  दूरगामी आइडियोलोजी सूत्रपात करने में सक्षम हैं .  मध्य-प्रदेश का लाडो अभ

अम्बेडकरनगर का संगीता दहेज हत्या प्रकरण: पुलिस ने मामले को ठण्डे बस्ते मे डाला : भूपेन्द्र सिंह

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी हम बहुत बड़े और काबिल लेखक/ समीक्षक/ टिप्पणीकार/ स्तम्भकार/ पत्रकार हैं- होते रहें। किसी की बला से। भला बताइए यह सब कुछ होते हुए भी मैं एक गरीब पीड़ित को पुलिस महकमें में न्याय न दिला सकूँ , तब मेरी उपयोगिता और कथित रूप से बड़ा होना उस पीड़ित के लिए क्या मायने रखेगा। कुछ दिनों पहले जी नहीं फरवरी 2015 के अन्तिम दिनों में हमारे गाँव का एक सीधा-सादा और गरीब 65 वर्षीय कहाँर जाति का टेकईराम मुझसे मिला था। उसको बड़ी आशा और अपेक्षाएँ थीं कि मैं उसकी 32 वर्षीया बेटी संगीता की दहेज हत्या में नाम जद आरोपियों को पुलिस में पैरवी करके सलाखों के पीछे करवा दूँगा। यहाँ बताना चाहूँगा कि संगीता की मौत का संवाद प्रमुखता से वेब/प्रिण्ट मीडिया में प्रकाशित भी हुआ , जिसकी रिपोर्टिंग रीता विश्वकर्मा जैसी धाकड़/ईमानदार और स्पष्टवादी पत्रकार ने की थी , लेकिन- 23 फरवरी 2015 से इस आलेख के प्रकाशन तक संगीता दहेज हत्याकाण्ड का पूरा प्रकरण ही पुलिस द्वारा ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। अब आप ही बताइए कि मेरा पत्रकारिता जगत में वरिष्ठ और बड़ा होना उन गरीब माँ-बाप और मृतक संगीता के अन्य परिज

वॉट्सएप में भी ज्ञान का अक्षय भण्डार है भाई

🔆🔆🔆🔆🔆🔆🔆🔆🔆🔆 ईश्वर का कार्य ................ एक बार श्री कृष्ण और अर्जुन भ्रमण पर निकले तो उन्होंने मार्ग में एक निर्धन ब्राहमण को भिक्षा मागते देखा.... अर्जुन को उस पर दया आ गयी और उन्होंने उस ब्राहमण को स्वर्ण मुद्राओ से भरी एक पोटली दे दी। जिसे पाकर ब्राहमण प्रसन्नता पूर्वक अपने सुखद भविष्य के सुन्दर स्वप्न देखता हुआ घर लौट चला। किन्तु उसका दुर्भाग्य उसके साथ चल रहा था, राह में एक लुटेरे ने उससे वो पोटली छीन ली। ब्राहमण दुखी होकर फिर से भिक्षावृत्ति में लग गया।अगले दिन फिर अर्जुन की दृष्टि जब उस ब्राहमण पर पड़ी तो उन्होंने उससे इसका कारण पूछा। ब्राहमण ने सारा विवरण अर्जुन को बता दिया, ब्राहमण की व्यथा सुनकर अर्जुन को फिर से उस पर दया आ गयी अर्जुन ने विचार किया और इस बार उन्होंने ब्राहमण को मूल्यवान एक माणिक दिया। ब्राहमण उसे लेकर घर पंहुचा उसके घर में एक पुराण घड़ा था जो बहुत समय से प्रयोग नहीं किया गया था,ब्राह्मण ने चोरी होने के भय से माणिक उस घड़े में छुपा दिया। किन्तु उसका दुर्भाग्य, दिन भर का थका मांदा होने के कारण उसे नींद आ गयी... इस बीच ब्राहमण की स्त

ओबामा जी भारत विश्व के सापेक्ष अधिक सहिष्णु राष्ट्र है : श्रीमती सुलभा बिल्लोरे

बराक ओबामा के भारत दौरे के बाद बराक ने अमेरिका में भारत में  धार्मिक असहिष्णुता के इजाफे की चिंता सताई . बराक साहेब की ही नहीं वरन हम  सबकी चिंता यही है किन्तु  जो बोलना जानते हैं वो ..! जो लिखना जानते हैं वो .... एक मत होकर  सेक्यूलर विचारधारा के परदे की ओट से सदाचारी आवाजों को पागल तक कहने में नहीं हिचकते . क्या यही सैक्यूलरिज्म है ? हम यदि भारत पर नज़र डालें तो पाते हैं कि विश्व के सापेक्ष भारत अधिक धार्मिक रूप से सहिष्णु देश है . सनातन न तो उपनिवेश के ज़रिये विस्तारित हुआ है न ही बंदूकों और तलवारों के ज़रिये . इस  बीच यदि हम ये समझाने के लिए  यत्नरत हैं कि भाई हम सदियों से साथ साथ रह सकते हैं ... तो क्या गलत कह रहें हैं . हम न तो आतंक के ज़रिये विचारधारा विस्तारित करते हैं और न ही उपनिवेश के ज़रिये . राम अथवा  कृष्ण को आप ने “मिथकीय पात्र” साबित किया है तो उसके पीछे आपकी यह भावना थी कि इतिहास केवल उतना अंकित हो जितना कि आप चाहें . इतिहास में न तो राम को दर्ज किया जावे न ही कृष्ण को ताकि कभी आप साबित कर सकें कि मिथक-किसी धर्म के प्रणेता नहीं हो सकते . चलिए मान  भी लिया कि न राम थे

अशिक्षित एवं नशेड़ी पुरूषों को महिलाओं की आबरू से कोई सरोकार नहीं :रीता विश्वकर्मा

रीता विश्वकर्मा लेखिका  शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा की कमी के कारण लोगों  को खुले में शौच जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। निश्चय ही यह देश और समाज के लिए एक बड़ी समस्या है। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश भर में 53 प्रतिशत घरों में आज भी शौचालय नही है। ग्रामीण इलाकों के 69.3 प्रतिशत घरों में शौचालय नही है। महात्मा गांधी शैाचालय को सामाजिक बदलाव के रूप में देखते थे। गांधी जी ने हमेशा स्वच्छता पर जोर दिया उनका कहना था कि स्वच्छता स्वतन्त्रता से ज्यादा जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साफ सफाई को लेकर स्वच्छ भारत अभियान पर काफी जोर देते रहे है। सरकार का ऐलान इस दिशा में एक सार्थक कदम माना जा रहा है।   गांधी जी को एक प्रेरणा मानते हुए गत् 2 अक्टूबर 2014 से स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया गया। ढलती शाम और घूंघट से मुँह ढके बहू-बेटियाँ गांव से दूर खेतों की तरफ जाती हुई जब दिखती हैं तो हर संवेदनशील व्यक्ति का सिर शर्म से झुक जाता है। तमाम लड़कियाँ और महिलाएँ शौच जाने के लिए सांझ गहराने का इंतजार करती है , ताकि शौच के लिए जा सके। यही नहीं सुबह होने से पहले और शाम ढलने के बाद ही ये अंधेरे

हां हिमांशु जी मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है ...........

फेसबुक पर मैंने   एक पोस्ट डाली है   " खुले शब्दों में साफ़ साफ़ कह रहा हूँ ............... जवाब हो तो देना ............ दे न पाओगे ..... मुझे मालूम है .................                         भारतीय आराध्यों के खिलाफत करने प्रगतिशीलों की कलम जितने फर्राटे से दौड़ती है एक हर्फ़ न लिख पाए आतंक के खिलाफ आज भी सिर्फ   # परसाई ओढ़ बिछा रए हैं .   इनके लिए विषय चुक गए हैं .   इन बुद्धजीवी कीट पतंगों की अब कहीं न तो कोई ज़मीन  बची  है न   आसमान  एकाध  मुआ  आईएसआईएस  के  पास  जाए  तो   पता   चलेगा   हकीकत   में  जिस  थाली   में   खाते   हैं   उसे   गरियाने    का    अर्थ   क्या  होता है  .  ससुरे    कलम    नहीं   हिला  रहे    आतंक  पे.." ये सब मैंने ज्ञानदत्त पांडे जी द्वारा शेयर इस लिंक से उद्वेलि होकर लिखा था  जो कि आजतक चैनल पर प्रकाशित एक  समाचार में प्रकाशित है  समाचार का विवरण ये रहा :-  बिकिनी पहनी गोपियों से घिरे हुए हैं. अकरम हुसैन द्वारा बनाई गई इस पेंटिंग की सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हो रही है और इसे अश्लील करार दिया जा रहा है. जैसे ही पेंटिंग कोलका