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सितंबर, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरा डाक टिकट

                    इस स्टैम्प के रचयिता हैं  ब्ला० गिरीश के अभिन्न मित्र राजीव तनेजा वो दिन आ ही गया जब मैं हवा में उड़ते हुए अपना जीवन-वृत देख रहा था..                 से मन में इस बात की ख्वाहिश रही कि अपने को जानने वालों की तादात कल्लू को जानने वालों से ज़्यादा हो और जब मैं उस दुनियां में जाऊं तब लोग मेरा पोर्ट्फ़ोलिओ देख देख के आहें भरें मेरी स्मृति में विशेष दिवस का आयोजन हो. यानी कुल मिला कर जो भी हो मेरे लिये हो सब लोग मेरे कर्मों कुकर्मों को सुकर्मों की ज़िल्द में सज़ा कर बढ़ा चढ़ा कर,मेरी तारीफ़ करें मेरी याद में लोग आंखें सुजा सुजा कर रोयें.. सरकार मेरे नाम से गली,कुलिया,चबूतरा, आदी जो भी चाहे बनवाए.  जैसे....? जैसे ! क्या जैसे..! अरे भैये ऐसे "सैकड़ों" उदाहरण हैं दुनियां में , सच्ची में .बस भाइये तुम इत्ता ध्यान रखना कि.. किसी नाले-नाली को मेरा नाम न दिया जाये.         और वो शुभ घड़ी आ ही गई.उधर जैसे ही किराने-परचून की दूकानों का ठेका मल्टी नेशन को मिला और   गैस सिलेंडर के दाम बढ़े इधर अपना बी.पी. और अपन न चाह के भी चटक गए. घर में कुहराम,

बंगला सांप और मैं..!!

फ़ोटो : उदंति.काम ब्लाग से साभार                   सरकारी जीव को तबादले से डरना किसी की नज़र में भले ही कायरता हो अदद सरकारी मुलाज़िम होने के नाते अपन को असलियत की जानकारी है. तबादला सरकारी जीव की नियति है होता है होना भी चाहिये न होगा तो जीव कुएं का दादुर होवेगा अपना भी हुआ कई बार उनका नहीं हुआ तो हो जाएगा कब तक किसे पटा के रखेंगें बताओ भला.. आज़ पटी तो इधर न पटी तो उधर झट बोरिया बिस्तरा बंध जाएगा ..इधर. अपने राम को बदली का आर्डर मिला उधर सा’ब जी ने रवानगी का रम्मन्ना पकड़ाया अपन तुरत फ़ुर्र. लोग गणित-गुंताड़ा लगाएं उसके पहले हमारी रवानगी ने साबित कर दिया कि "ये दुनियां ये महफ़िल मेरे काम की... "हा हा हा          कुछ मित्र मरहम लगाने की अदा से आए हमें मालूम था कि पादरी फ़ूट फ़ूट के रोएगा हरिया झूठा टसुए बहाएगा, जूली मैम बिदाई के वक़्त जो बोल रही होगी ठीक उससे उलट सोच रही होगी .. अच्छा टला खूब डांटता था. अरे हां अपन ने मरहम न लगवाया तो उनको बुरा अवश्य लगा जो बड़े जतन से मरहम में नमक मिला के लाए थे.  नसीरुद्दीन पालिशड बातें करता हुआ अपनी क़मीनगी का इज़हार कर रहा था कुल म

सत्य

ओह सत्य जब जब तुम  बन जाते लकीर  तब बेड़ियों से जकड़ लेते हैं तुमको... जकड़ने वाले...!! हां सच.. जब तुम गीत बन के  गूंजते हो तब हां.. तब भी  लोग  कानों में फ़ाहे  ठूंसकर खुर्द-बुर्द होने के गुंताड़े में  लग जाते हैं. हां सत्य  जब भी तुमने मुखर होना चाहा तब तब  ये  बिखरने से भयातुर  दैत्याकार  नाक़ाम कोशिशें करतें  जब जब तुम प्रखर होते तब तब ये  अपने अपने आकाशों से  से आ रही तेजस्वी धूप को  टेंट-कनातों से रोकते  कितने मूर्ख लगते है न .. सत्य ..!!  

गुरप्रीत पाबला नहीं रहे

श्री बी.एस.पाबला जी  के सुपुत्र चिंरंजीव गुरप्रीत सिंह पाबला का आकस्मिक नि:धन के समाचार से जबलपुर के ब्लागर्स बेहद दुखी है .........स्तब्ध हैं ..................               दिवंगत आत्मा की शांति के लिये ईश्वर से विनत प्रार्थना के साथ पाबला परिवार को इस अपूरणीय क्षति से व्युत्पन्न पीढ़ा को सहने की शक्ति प्रार्थना है.  

स्वतंत्रता और हिंदी : आयुषि असंगे

                      स्वतंत्रता और हिंदी विषय स्वयमेव एक सवाल सा बन गया है.  15 अगस्त 1947 के बाद हिंदी का विकास तो हुआ है किंतु हिंदी उच्च स्तरीय रोजगारीय भाषा की श्रेणी में आज तक स्थापित नहीं हो सकी. जबकि तेज गति से अन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं का विकास हुआ है उतनी ही तेजी से  स्वतंत्रता के पश्चात  हिंदी भाषा की उपेक्षा की स्थिति सामने आई है. जिसका मूल कारण है हिंदी को रोजगार की भाषा के रूप में आम स्वीकृति न मिलना. विकाशशील राष्ट्रों में उनके सर्वागीण विकास के लिये  भाषा के विकास को प्राथमिकता न देना एक समस्या है. हिन्दी ने आज जितनी भी तरक्की की है उसमें सरकारी प्रयासों विशेष रूप से आज़ादी के बाद की सभी भारत की केन्द्रीय सरकारों का योगदान नगण्य है. आज जहाँ विश्व की सभी बड़ी भाषायें अपनी सरकारों और लोगों के प्यार के चलते तरक्की कर रहीं है वहीं विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा हिन्दी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. 26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान लागू हुआ तब हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया. पहले 15 साल तक हिन्दी के साथ साथ अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा दिया गया, यह तय