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सूचना का अधिकार कहीं ब्लैक-मेलिंग का साधन तो नहीं

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सूचना के अधिकार को लेकर लोग जिनको जागरूकता होनी चाहिये वे जागरूक हैं या नहीं ये एक चिंतन का विषय है किंतु कितने लोग सूचना के अधिकार का अनुप्रयोग किसी को ब्लैक-मेल करने के लिये करे इस बात पर विचार करना ज़रूरी है. हालिया दिनों में आर टी आई के बेजा स्तेमाल के मामला सामने आया जिसमें एक व्यक्ति ने एक महिला सह कर्मी के विवाह को लेकर सवाल पूछा था. बिजनेस-स्टैण्डर्ड  में प्रकाशित एम जे एंटनी के आलेख में दिये उदाहरण से पुष्टि होती कि दुरुपयोग होने लगा है-"  न्यायालय ने एक ऐसी अपील खारिज कर दी थी जिसमें आवेदक सभी निचली अदालतों में संपत्ति का एक मुकदमा हार जाने के बाद यह जानना चाहता था कि आखिर किस वजह से न्यायधीशों ने उसके खिलाफ फैसला सुनाया। खानपुरम और प्रशासनिक अधिकारी के इस मामले में दिए गए फैसले में कहा गया, 'कोई न्यायधीश यह बताने के लिए मजबूर नहीं है कि आखिर किस वजह से वह किसी निष्कर्ष पर पहुंचा।"  (संदर्भ:- बिजनेस-स्टैण्डर्ड )                              बेहतरीन कानून का दुरुपयोग होना भारत के लिये कितना घातक होगा  इस बात का अंदाज़ा भी होना चाहिये. अरविंद केजरीवाल   खु

2 अक्तूबर ....

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2 अक्तूबर  1869  ....                 गांधी  एक चिंतन के   सागर  थे  गांधी जी  को  केवल  समझाया  जाना हमारे लिए एक कष्ट कारक विषय है सच तो यह है की "मोहन दास करम चंद गांधी को " समझाने का साधन बनाने वालों से युग अब अपेक्षा कर रहा है की  वे पहले  खुद  बापू को समझें और फिर लोगों को समझाने की कोशिश करें.   महात्मा गाँधी की  आत्मकथा  के अलावा  उनको किसी के सहारे समझने की कोशिश भी केवल बुद्धि का व्यापार माना जा सकता है.इस बात को भी नकारना गलत होगा    गांधीजी - व्यक्ति नहीं, विचार  यही उनके बारे में कहा सर्वोच्च सत्य है . 140 बरस बाद भी गांधी जी का महान व्यक्तित्व सब पर हावी है क्या खूबी थी उनमे दृढ़ता की मूर्ती थे बाबू किन्तु अल्पग्य  उनका नाम "मज़बूरी" के साथ जोड़ते तो लगता है की हम कितने कृतघ्न हो गए .  बापू अब एक ऐसे दीप स्तम्भ होकर रह गए हैं जिसके तले  घुप्प तिमिर  में पल रहा है विद्रूप भारत . उसका कारण है कि बापू को जानते तो सब हैं पहचानने वाले कम हीं है.  बापू की यह तस्वीर  मुझे सबसे ज़्यादा आकृष्ट करती है कि बापू के साथ केवल सत्य है जो एक बच्चा बना

मन ही मन

 मन ही मन --- अर्पिता से एक रचना --सीमा ’सदा’ लाड़ली

बेटी बचाओ अभियान :एक ज़रूरी अभियान

मध्य-प्रदेश में 5 अक्टूबर 2011 से बेटी बचाओ अभियान का शुभारम्भ जनचेतना को जगाने का एक महत्वपूर्ण कदम है. यह बेहद ज़रूरी भी है. कारण है पिछले दस वर्षों में सम्पूर्ण भारत का   लिंगानुपात 933 से बढ़कर 940 हो गया साथ ही बच्चो का लिंगानुपात स्वतंत्र भारत के सबसे निचले स्तर पर जो एक नकारात्मक   सूचना है. एक और ज़रूरी तथ्य जो समाज का बेर्टियों के बारे में दृष्टिकोण उज़ागर करता है वो है नवजात शिशुओं की मृत्यु दर    वर्ष 1990 , 1995,2000,2005 तथा   2009   तक हमेशा बालिकाओं की मृत्यु का आंकड़ा सदैव अधिक ही रहा. ये अलग बात है कि नवजात शिशु मृत्यु की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है. किंतु बालिका मृत्यु दर सदा ही प्रथम दो वर्षों क्रमश: 90,95 में तीन, 2000 में 2, 2005 में 5, तथा 2009 में पुन : 3 देखी गई. यानी प्रदेश की स्थिति देखें तो सकल शिशु मृत्यु दर 67 मध्य-प्रदेश में तथा 12 प्रति हज़ार केरल में आंकलित की गई. यानी प्रति हजार जीवित जन्मों में से 67 बच्चों का पहला जन्मदिन न मना पाना दु:खद स्थिति है. बालिकाओं के संदर्भ में सोचा जाए तो लगता है कि वास्तव में हम बेटियों के उपरांत उनकी बेहतर

‎"बेटी-बचाओ अभियान" हमारे चिंतित मन को चिंतन की राह देगा

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                                                      (  चार्ट अ )                     क्रम भारत एवम मध्य-प्रदेश 1991 2001 2011 01 भारत 927 933 940 02 मध्य-प्रदेश 912 920 930 मध्य-प्रदेश में   05     अक्टूबर से बेटी बचाओ अभियान का शुभारम्भ जनचेतना को जगाने का एक महत्वपूर्ण कदम है. यह बेहद ज़रूरी भी है. कारण है   पिछले दस वर्षों में सम्पूर्ण भारत का     लिंगानुपात   933   से बढ़कर   940   हो गया जो भले ही एक उत्तम स्थिति कही जा सकती है किंतु     बच्चो का लिंगानुपात स्वतंत्र भारत के सबसे निचले स्तर पर जो एक नकारात्मक     सूचना है. एक और ज़रूरी तथ्य जो समाज का बेटियों के बारे में दृष्टिकोण उज़ागर करता है वो है नवजात शिशुओं की मृत्यु दर     ( भारत की स्थिति   )    वर्ष   1990 , 1995,2000,2005  तथा    2009    तक हमेशा बालिकाओं की मृत्यु का आंकड़ा सदैव अधिक ही रहा. ये अलग बात है कि नवजात शिशु मृत्यु की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है. किंतु बालिका मृत्यु दर सदा ही कुल शिशु मृत्यु के प्रकरणों का तुलनात्मक परीक्षण पर ग्यात होता