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रविवार, जुलाई 16

पाकिस्तान के कितने टुकड़े होंगे...?

गिलगित - बालित्स्तान की सांस्कृतिक समारोह की तस्वीर 
पाकिस्तान के कितने टुकड़े  होंगे ये तो आने वाला समय बताएगा किन्तु ये तयशुदा है जम्हूरियत पसंदगी आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत है और आम नागरिक को प्रजातंत्र के लिए अधिक आकर्षण समूचे विश्व के चप्पे चप्पे में पसंद आ रहा है. और यही भावना आने वाले दौर को और अधिक सशक्त बनाएगी. इसी जम्हूरियत पसंदगी के चलते वे सारे राष्ट्र जहां जम्हूरियत का नामोंनिशान नहीं है उन देशों के राष्ट्र प्रमुखों को खासतौर पर सोचना ज़रूरी है जो धर्माधारित राष्ट्र के प्रमुख हैं अथवा किसी धार्मिक राष्ट्र की संस्थापना के चिन्तन में हैं.वे सभी भी जो सभी धर्मों को उपेक्षा भाव से देखते हुए केवल ख़ास विचारधारा को जनता पर लादते हैं. अर्थात प्रजातंत्र जहां धर्म संस्कृतियों को सहज स्वीकारने और अपने तरीके से जीने का अधिकार जो राज्य देता है जनता उस राज्य की नागरिकता अधिक पसंद करेंगे . और विश्व में भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के अधिकाँश अध्याय जुड़ेंगे . लोग उसे सहर्ष स्वीकारेंगे .
भारत में हिंदुत्व नामक कोई अवधारणा या विचारधारा नहीं है बल्कि सनातन सामाजिक व्यवस्था है. जो इतनी व्यवस्थित एवं स्वचालित है कि उसमें किसी प्रकार की ऐसी कठोरता हो जो जनता को अस्वीकार्य हो. इसकी पुष्टि कुम्भों के आयोजन से होती है. जहां भारत के सभी ऋषि, मुनि, संत, विद्वत समाज, आस्तिक एकत्र होकर विगत 12 वर्षों में अपेक्षित व्यवस्थाओं की समीक्षा कर सनातन  सामाजिक व्यवस्था को समयानुकूलित करने के लिए नवीन बिन्दुओं का समावेश करते रहें हैं. यह परम्परा संसदीय थी सम्राट, रियासतों के राजाओं एवं अन्य प्रशासनिकों को लागू करवाना होता था.
सनातन सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन न होता तो सनातन कठोर होता जड़ता युक्त होता .. और यही जड़ता उसे क्षतिग्रस्त करती . और सनातन आज हम नहीं स्वीकारते. क्योंकि नागरिक सदैव सहज जीवन जीना पसंद करते हैं. राजशाही / सामंत शाही में धर्माचरण के निर्देश थे. बदलावों को सदैव ग्राह्य किया गया . पश्चिमी और सनातन व्यवस्था में लचीलापन उसको स्थाईत्व देता है. मत भिन्नता को ग्राह्य करते हुए सभी धर्मों का सम्प्रदायों में बंटना स्वाभाविक प्रक्रिया है जो धर्म की स्थापना के बाद कालान्तर में होती है . एक ब्रह्म एकेश्वरवाद , द्वैत, अद्वैत, निरंकार , साकार, शैव, शाक्त, वैष्णव, ट्रिनिटी , और अन्य सभी विचारधाराएं जो मनुष्य की दिमागी उपज है उसी का अनुशरण राष्ट्र की जनता करती है जो उसे अधिक सहज लगता है.
स्वामी शुद्धानंदनाथ ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था कि- “देश-काल-परिस्थिति” के अनुकूल व्यवस्था ही धर्म है . उदाहरण के लिए यदि आप सफर में और आप त्रिसंध्या के नियम का पालन नहीं कर सकते हैं तो आप मानस-पूजा के ज़रिये अपने आराध्य की वंदना कीजिये. सनातन का यही लचीलापन उसे सर्वग्राह्य बनाता है. सनातन व्यवस्था  में बाह्य-आचरण की व्यवस्थाएं दीं हैं . किन्तु आतंरिक आध्यात्मिक विकास के लिए अध्ययन, तप, योग, ध्यान, चिंतन के बिन्दुओं का समावेश धर्म गुरु करते हैं. सनातनी धर्मगुरु मेकअप कराकर मनमोहक वातावरण बनाकर भाषण नहीं देते थे . बल्कि समाज के छोटे छोटे समूह को आध्यात्मिक एवं सनातनी सामाजिक व्यवस्था का शिक्षा देते रहे हैं . आज भी भारत में धर्म और उसका आतंरिक तत्व अर्थात अध्यात्म बहुसंख्यक रूप से स्वीकार्य है. सनातन सामाजिक व्यवस्था सत्ताभिमुख होने की बजाय राष्ट्रधर्म के पालन को बढ़ावा देती है . 
इससे पाकिस्तान में सत्ता का आधार ही कठोर है लोकप्रशासन भी बेहद लचर है  . वहां कोई भी बदलाव राज्य को ही अस्वीकार्य है तो जनता के मन में सदैव आशंका होती है . राज्य का प्रबंधन की समझ रखने वाले प्रोग्रेसिव विद्वानों को वहाँ स्थान नहीं मिला इसी वज़ह से प्रजातंत्र की रक्षा के तरीके न खोज सका पाकिस्तान और इसी के चलते 1971 यानी मेरे जन्म के आठ वर्ष बाद उस देश को दो खंड में विभक्त होना पड़ा . 48 साल बाद  उसे छल से छीनी भूमि  बलोचस्तान, के साथ साथ गिलगित-बल्तिस्तान, सिंध, आदि को खोना पड़ सकता है. पाकिस्तान का जन्म कायदे आज़म  कुंठा और भ्रम से हुआ. कुंठा और भ्रम में निर्मित कोई रचना दीर्घायु भला कैसे हो सकती है. पाकिस्तान का पंजाब सूबा देश का सबसे कम आय-अर्जक है पर वहाँ (पंजाब में) शोषण करने वालों की संख्या अधिक है, पाकिस्तान की  जो भी विकास की  नीतियाँ हैं उनका सीधा और सबसे अधिक लाभ केवल पंजाब को हासिल है. शेष जैसे बलोचिस्तान, सिंध, गिलगित-बल्तिस्तान आदि की उपेक्षा हुई है. 48 सालों में इन्हीं गलत एवं गैर-समानता वाली व्यवस्था के चलते पाकिस्तान की फैडरल-व्यवस्था फिर से  चरमराने लगी है . जिससे आम शहरी बेहद घायल महसूस करता है . यहीं से रास्ते बनतें हैं जनक्रांति के जो भौगोलिक सीमाओं में तक परिवर्तन ला सकती हैं. एक सत्य भी पाकिस्तानी सदर यानी वहाँ के वजीर-ए-आज़म विश्व फॉर्म पर उजागर करते हैं हैं कि पाकिस्तान को आतंकवाद सबसे अधिक क्षतिग्रस्त करता है . सत्य भी है पर इसके तीन कारण हैं ..
एक कि वो ऐसा कहकर वो विश्व समुदाय से सिम्पैथी हासिल करना चाहता है जिससे उसकी करतूतों पर पर्दा डाला रहे
दूसरे उसको देश चलाने के लिए अमेरिकी डालर मिलते रहें . जिससे उसके पंजाब सूबे की जनता का जीवन सामान्य हो सके.  
तीसरा और सबसे अहम कारण है उसके पास अब इतना भी धन नहीं है जिससे वो अपने पाले आतंकवादी संगठनों का खर्च भी उठा सके.
अक्सर भारत के कुछ विचारक भारत को कम आंककर अनाप-शनाप आरोप लगाकर हमारी विदेशनीति पर सवाल खड़े करते हैं . लेकिन दिनांक 16 जुलाई 17 को आतंक के खिलाफ दृढ़ता से आवाज़ उठाने वाले मनिंदर सिंह बिट्टा के संकल्प को समझाने की ज़रूरत है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग को धार्मिक साँचें में ढालकर पेश न किया जाए.
अधिकाँश आयातित विचारधारा के पोषक सदा वर्गीकरण करतें हैं ताकि व्यवस्था में उन्माद का प्रवेश हो तथा अंतर्कलह की स्थिति उत्पन्न हो . किन्तु भारत ने विश्व को अपने मज़बूत कूटनीति से जिस तरह पाकिस्तान और उसके आका चीन को पोट्रेट किया है उससे विश्व का भारत के प्रति झुकाव भी बढ़ा है . और हमारी वैश्विक साख में इजाफा हुआ है.
जहां तक भारत के अल्पसंख्यकों का प्रश्न है वे चाहे यहूदी हों बौद्ध, सिख, पारसी, ज्यूस्थ, जैन, अथवा मुसलिम हों उनको बहुसंख्यकों से भयातुर होने की ज़रूरत कदापि नहीं . भारत सर्वधर्म समभाव का स्वप्रमाणित राष्ट्र है. बावजूद इसके कि पश्चिम बंगाल सहित कई प्रान्तों में सनातनियों की स्थिति सामान्य न हो .

परन्तु एक बाद सबको समझनी आवश्यक है कि पाकिस्तान को सर्वाधिक क्षति चीन और उसके अपने बलोचस्तान, गिलगित-बल्तिस्तान, सिंध, के नागरिक ही दे सकतें हैं.         

बुधवार, अगस्त 24

पाकिस्तान 69 बरस का एक नासमझ बच्चा राष्ट्र :01


1948 तक मुक्त बलोचस्तान के मसले पर लालकिले से भारत के प्रधानमंत्री  श्री नरेंद्र मोदी की अभिव्यक्ति से पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि आयातित विचारकों के ज़ेहन में खलबली देखी जा रही है. भारत का बलोच लोगों के हित में बोलना एक लुहारी हथौड़ा साबित हुआ है. प्रधानमंत्री जी का बयान दक्षेश ही नहीं विश्व के लिए एक खुला और बड़ा बयान साबित हुआ है. उनका यह बयान बांगला देश विभाजन की याद दिला रहा है जब इंदिरा जी ने पूरी दृढ़ता के साथ न केवल शाब्दिक सपोर्ट किया बल्कि सामरिक सपोर्ट भी दिया.
मोदी जी की अभिव्यक्ति एक प्रधानमंत्री के रूप में बड़ी और ज़वाबदारी भरी बात है. बलोच नागरिक इस अभिव्यक्ति पर बेहद अभिभूत हैं. अभिभूत तो हम भी हैं और होना ही चाहिए वज़ह साफ़ है कि खुद पाकिस्तान लाल शासन का अनुगामी  बन अपने बलात काबिज़ हिस्से के साथ जो कर रहा है उसे कम से कम भारत जैसे राष्ट्र का कोई भी व्यक्ति जो मानवता का हिमायती हो बर्दाश्त नहीं करेगा . मेरे विचार से श्री नरेन्द्र दामोदर मोदी के खिलाफ आयातित विचारधाराएं जो भी सोचें आम राय बलोच आवाम के साथ है.
यहाँ अपनी समझ से जो देख पा रहा हूँ कि आयातित विचारधाराएं कभी भी लाल-राज्य के खिलाफ बयान को स्वीकार्य नहीं करतीं .  बहरहाल साल 48 से  मौजूदा वक्त तक बलोच कौम के समर्थन में खुलकर न आना मानवाधिकार मूल्यों की रक्षा की कोशिशों की सबसे बड़ी कमजोरी का सबूत है .  वज़ह जो भी हो देश का वास्तविक हिस्सा पूरा काश्मीर है जिस पर पाक का हक न तो  था न ही हो सकेगा . तो फिर पाकिस्तान की काश्मीर पर तथाकथित भाई बंदी की वज़ह क्या है ...?
इस मसले की पड़ताल में आपको जो सूत्र लगेंगे उनका मकसद पाक की पञ्चशील पर पंच मारने वाली  लाल-सरकार से नज़दीकियाँ . चीन – पाक आर्थिक कोरिडोर और ग्वादर पोर्ट के ज़रिये पाकिस्तान को चीनी सामरिक सपोर्ट मिलता है. जहां तक विकास की बात है पाकिस्तानी सरकार   बलोचस्तान को छोड़ कर शेष सम्पूर्ण पाक में कर पा रहा है बलोचस्तान उसकी दुधारू बकरी है. इतना ही नहीं इस आलेख लिखने तक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 22 हज़ार अधिक लोगों को बड़ी बेहरमी से  मौत के घाट उतारा है. हज़ारों हज़ार युवा गायब कर दिए गए ..  बलोचों के  कत्लो-गारद की हिमायती पाकिस्तानी सरकार फौज से ज़्यादा आतंकवादियों के इशारों पर काम करती .
पाकिस्तान 69 बरस का  एक नासमझ  बच्चा राष्ट्र है . जिसे उसके नागरिकों से अधिक बाहरी विवाद पसंद है. कुंठा की बुनियाद पर बने देश पाकिस्तान धर्माधारित विचारधारा और कट्टरता की वज़ह से  रियाया के अनुकूल नहीं है . पाकिस्तान की वर्तमान दुर्दशा की जिम्मेदारी  विभाजन के लिए षडयंत्र करने वाले तत्वों खासकर नवाबों, पाक की  सेना  और सियासियों की दुरभि संधि  उस पर ततसमकालीन अमेरिका की पाकिस्तान के प्रति सकारात्मक नीतियां हैं. जबकि भारत ने कमियों / अभावों  के बावजूद  अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु एवं सकारात्मक रवैया रखा साथ ही भारतीय आवाम ने विकास को सर्वोच्च माना तभी हम दक्षेस की बड़ी ताकत हैं . अब तो भारत का जादू हर ओर छाया है. वज़ह सियासत, कूटनीति, और भारतीय स्वयं है. भारतीय युवा विश्व के लिए  महत्त्वहीन कतई नहीं है . 1985  के बाद जन्मी पौध ने तो विश्व से लोहा मनवा ही लिया है .
आयातित विचारधारा अपने अस्तित्व को बचाए रखने जो कर रही है उसके उदाहरण जेएनयू जैसी जगहों पर मिल जाएंगें . इसका कदापि अर्थ न लगाएं कि सामाजिक साम्य से असहमति है.. वरन हम  कुंठित साम्य को खारिज करते हुए “समरससाम्य” की ललक में हैं .
भारत की नीती कभी भी सीमाओं के विस्तार की न थी.. पर नवाबों के जेनेटिक असर की वज़ह से पाकिस्तान ने इरान और कदाचित क्राउन शह पर बलोचों की आज़ादी पर डाका डाला है. तो बलोच गुरिल्ले क्यों खामोश रहेंगे. इतना ही नही गिलगित तथा पाक द्वारा कब्जाए कश्मीर की जनता भी अविश्वास से भरी है.
भारत ने अपने कानूनों में आमूलचूल प्रावधान रखें हैं दमित जातियों  के लिए .. पर वे खुद सिया सुन्नी पंजाबी सिंधी, गैर पंजाबी आदि आदि फिरका परस्ती के लिए कोई कारगर प्रबंध न कर सके. जब बलोच को सपोर्ट की बात की तो सनाका सा खिंच गया पाक में       
बदलते हालातों पर पाक के प्रायोजित  वार्ताकार बोडो, असम , सिख , यहाँ तक की नक्सलवादियों तक के लिए रुदालियों की  भूमिका निबाह रहे हैं . जबकि पाक में छोटे से इलाज़ के लिए न चिकित्सकीय इंतजामात हैं न ही बेहतर एजुकेशन सिस्टम. आला हाकिमों और हुक्मरानों और आतंकियों की औलादें ब्रिटेन एवं अमेरिका में पढ़ लिख रहीं हैं. जबकि आम आवाम के पास न्यूनतम सुविधाएं भी न के बराबर है.      

(आगे भी जारी........ प्रतीक्षा कीजिये )        

शनिवार, मई 17

“मोदी विजय : पाकिस्तानी मीडिया की टिप्पणियां”

भारतीय सियासी तस्वीर बदलते ही पड़ौसी देशों में हलचल स्वभाविक थी. हुई भी... बीबीसी की मानें तो पाकिस्तानी अखबारों ने उछलकूद मचानी शुरू कर दी है. मोदी को कट्टरपंथी बताते हुए कट्टरपंथी राष्ट्र पाकिस्तान का मीडिया आधी रोटी में दाल लेकर कूदता फ़ांदता नज़र आ रहा है. मोदी विजय पर पाकिस्तानी मीडिया बेचैन ही है.. अखबारों को चिंता है कि –“ कहीं मोदी सरकार 370,राम मंदिर निर्माण, कामन सिविल कोड पर क़दम न उठाए ”
 अखबार अपने आलेखों में सूचित करते नज़र आते हैं कि “मोदी ने  विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा है..!” यानी सिर्फ़ विकास की बात करें ... तो ठीक ही है.. !
            पाकिस्तान जो भारत जैसे वास्तविक प्रजातंत्र से कोसों दूर की चिंता बेमानी और अर्थहीन प्रतीत होती है. उम्मत अखबार ने तो सीमा पार करते हुए मोदी को कसाई का दर्ज़ा दे रहा है. इसे पाक़िस्तानी प्रिंट मीडिया की कुंठा-ग्रस्तता एवम हीनभावना से ग्रस्तता के पक़्क़े सबूत मिल रहे हैं.
            नवाए-वक़्त को कश्मीर मुद्दे पर चचा चीन की याद आ रही है. भारत इस मुद्दे पर न तो कभी सहमत था न ही होगा.
       पाक़िस्तानी मीडिया को भारत में मुस्लिमों की सही दशा का अंदाज़ा नहीं है. तभी तो आधी अधूरी सूचनाओं पर आलेख रच देते हैं. भारत के मुसलमान पाकिस्तान की तुलना में अधिक खुश एवम खुशहाल हैं. किसी भी देश को भारतीय जनता के निर्णय पर अंगुली उठाने का न तो हक़ है न ही उनके मीडिया को . ज़रूरत तो अब इस बात की है कि भारत में विकास को देखें उसका अनुसरण करें.. और अपने अपनी आवाम को खुश रखें.
सहअस्तित्व की अवधारणा पडौसी का सर्वश्रेष्ठ धर्म है ...!!पाकिस्तान को ये मानना ही होगा.