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शुक्रवार, अक्तूबर 31

अल्पसंख्यकों की दुर्दशा करते चरमपंथी

 यज़ीदी अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ होते धर्मांध 
आई एस आई एस की दरिंदगी उफ़्फ़ !!उनके द्वारा  यज़ीदी समुदाय की औरतों एवम बच्चों के खिलाफ़ हो रहे जुल्मो-सितम की खबरें विश्व के लिये एक चिंता का विषय है.परंतु इस पर विश्व के अगुआओं की नज़रफ़ेरी से बेहद दुख:द स्थिति जन्म ले रही है.   उधर यज़ीदीयों का धर्म उनको अल्प संख्यक के रूप में स्थापित रखता है. वे  विश्व में मात्र सात लाख रह गए हैं. उनका दोष मात्र इतना है वे "शैतान को मान्यता " देते हैं.
        नवभारत टाइम्स के अनुसार "पुरातन काल से यजीदी इराक के अल्पसंख्यक हैं। ये लोग शुरू से ही शैतान को पूजते आ रहे हैं। इनके धार्मिक सूत्रों में शैतान ईश्वर के बनाए सात फरिश्तों में से एक है और उसका दूसरा नाम मेलक तव्वस है। माना जाता है कि आदम को सिजदा न करने पर मेलक को ईश्वर ने न सिर्फ माफ कर दिया बल्कि उसके स्वाभिमान से काफी प्रभावित हुए।
18वीं और 19वीं सदी में यजीदियों को शैतान पूजक बताकर जातिगत द्वेष के चलते बड़ी तादाद में मारा गया। इससे मिलती-जुलती घटना उनके साथ 2007 में भी घटी। धमकियों के चलते यजीदियों के धर्मगुरु बाबा शेख ने वह सालाना उत्सव भी बंद करा दिया जो लालेश टैंपल में हुआ करता था। यजीदियों अपनी अलग मान्यताओं के लिए फांसी तक मिलती रही है, लेकिन इन्होंने अपना धार्मिक विश्वास नहीं बदला"
    विश्व के महान धर्मों का सारभूत तत्व सभी जानते हैं किंतु धर्मांधता के चलते  मानवता का अंत नज़दीक आ रहा है. भारत में रावण की पूजा करने वाले मौज़ूद हैं, नास्तिक भी मौज़ूद हैं किंतु भारतीय उनसे वैचारिक रूप से, भले अलग हों पर उनके "जीने के अधिकार को छीनने से क़तई सहमत नहीं " किंतु ISIS के इस्लामिक चरमपंथियों की अवधारणा ये नहीं हैं. वे आज़ भी आदिम धूर्तता को अंगीकृत किये हुए हैं .
चरमपंथियों की ज़ंज़ीर में यज़ीदी मतावलम्बी औरतें 
     अब विश्व के सभी नागरिकों को या तो आग्रह से अथवा बलात ये सिखाने की ज़रूरत आन पड़ी है कि    धर्म के पालन का अधिकार जीवनाधिकार के तुल्य है. धर्म के अधिकार को यदि कोई भी लोभ लालच दिखाकर  अथवा से छीनने की कोशिश करता है तो उसे जीवनाधिकार से वंचित रखा जावेगा.. विश्व का हर देश ये क़ानून बनाए तो तय है कि शायद कुछ हद तक धार्मिक उन्माद रुकेंगे. यह भी कि विश्व समुदाय द्वारा एक जुट होकर धर्मांध चरमपंथियों दबाव बनाना ही होगा. देखना है कि इस सोच पर कौन क्या सोचता है..
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बुधवार, सितंबर 8

"दुश्मनों के लिये आज़ दिल से दुआ करता हूं....!"


सोचता हूं कि अब लिखूं ज़्यादा और उससे से भी ज़्यादा सोचूं .....? 
सच कितना अच्छा लगता है जब किसी को धीरज से सुनता हूं. आत्मबल बढ़ता है. और जब किसी को पढ़्ता हूं तो लगता है खुद को गढ़ता हूं. एक  पकवान के पकने की महक सा लगता है तब ....और जब  किसी के चिंतन से रास्ता सूझता है...तब उगता है साहस का ...दृढ़ता का सूरज मन के कोने में से और फ़िर यकायक  छा जाता है प्रकाश मन के भीतर वाले गहन तिमिर युक्त बयाबान में.... ? 
ऐसा एहसास किया है आपने कभी ..!
किया तो ज़रूर होगा जैसा मैं सोच रहा हूं उससे भी उम्दा आप  सोचते हो है न........?
यानी अच्छे से भी अच्छा ही होना चाहिये सदा.अच्छे से भी अच्छा क्या हो यह चिंतन ज़रूरी है.
वे पांव वक़्त के नमाज़ी है, ये त्रिसंध्या के लिये प्रतिबद्ध हैं, वो कठोर तपस्वी हैं इन धर्माचरणों का क्या अर्थ निकलता है तब जब हम केवल स्वयम के बारे में सोचते हैं. उसने पूरा दिन दिलों को छलनी करने में गुज़ारा... और तीस दिनी रोज़ेदारी की भी तो किस तरह और क्यों अल्लाह कुबूल करेंगें सदा षड़यंत्र करने वाला मेरे उस मित्र को अगले रमज़ान तक पाक़ीज़गी से सराबोर कर देना या रब .ताकि उसके रोज़े अगली रमज़ान कुबूल हों...!
ईश्वर उस आदमी को  सबुद्धि देना जो मुझे जाने बगैर मेरी नकारात्मक-छवि चारों ओर बनाए जा रहा है उसकी त्रिकाल संध्या ईश्वर स्वीकारे यही प्रार्थना करता हूं. 
वो इन्सान जो सन डे के सन डे गिरजे में जाकर प्रभू के सामने प्रेयर करता है पूरे हफ़्ते मेरे दुर्दिन के लिये प्रयास करता है उसे माफ़ कर देना उसे पवित्र बना देना ताकि उसकी भी साप्ताहिक प्रेयर स्वीकार सकें आप .
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 दोस्तों शक्ल में मिले इन दुश्मनों के उजले कल के लिये याचना का अर्थ उनके बेहतर कल के लिये है न कि उनको अपमानित करने अपमानित करना होता तो सच नाम सहित उल्लेख करता. मुझमें इस बात का साहस है किंतु किसी को आहत करके उसे बदलने से बेहतर है ..... एक सदाचारी की तरह दुश्मन के लिये भी सदभावना रखना.
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 कल देखिये:-” जीवन में सब कुछ करो झूठी चुगलियों को छोड़ कर"