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गुरुवार, मई 11, 2023
केदारनाथ मंदिर : अलौकिक स्थापत्य का नमूना लेखिका पूर्णिमा सनातनी
"महाराणा के स्व के लिए भीषण संग्राम और पूर्णाहुति : महाबली हाथी रामप्रसाद"
बुधवार, मई 10, 2023
स्मृतियों के गलियारों दैनिक पुलका महोत्सव
बुधवार, मार्च 29, 2023
बुधवार, मार्च 08, 2023
राजनेताओं के लिए गधे कम पड़ गए थे
जबलपुर में रसरंग बरात का अपना 30 साल पुराना इतिहास है। हम भी नए-नए युवा
होने का एहसास दिलाते थे। कार्यक्रमों में येन केन प्रकारेण उपस्थिति और उपस्थिति
के साथ अधकचरी कविताएं कभी-कभी सुनाने का जुगाड़ हो जाता था।
देखा देखी हमने भी राजनीति पर व्यंग करना शुरू कर दिया....
सफल नहीं रहे....कहां परसाई जी कहां हम.... कहाँ राजा-भोज कहाँ गंगू तेली,,,!
हमने अपनी कविताएं
जेब में रख ली और अभय तिवारी इरफान झांसी सुमित्र जी मोहन दादा यानी अपने मोहन शशि भैया की राह पकड़
ली। गीत लिखने लगे शशि जी के गीत गीत गीले नहीं होते बरसात में की तर्ज पर अपनी
हताशा दर्ज करती गीत मिले हुए अब के बरसात में और ठिठुरते रहे सावनी रात में..!
अथवा सुमित्र जी का गीत “मैं पाधा का राज कुंवर हूं...!”
पूर्णिमा दीदी के गीत अमर दीदी के गीत गहरा असर छोड़ते थे
और अभी भी भुलाए नहीं भूलते। बड़े गजब के गीत लिखते हैं सुकुमार से कवि चौरसिया
बंधु हमारे अग्रज उस दौर की कविताएं बिल्कुल घटिया न थी।
छंद मर्मज्ञ भाई आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने तो गीत रचना
में छंद की प्रतिष्ठा को रेखांकित कर दिया था।
जी हां 30-35 बरस पुराना साहित्यिक एनवायरमेंट जबलपुर में
वापस नहीं लौटेगा, कारण क्या है, मुझे
नहीं मालूम पर यूनुस अदीब, पथिक जी रसिक
जी कमाल के गीतकार हैं।
आज आप जिनको पत्रकार कहते हैं वह पत्रकार नहीं कवि और
गीतकार भी थे जी हां मैं जिक्र कर रहा हूं गंगा पाठक जी का। फैक्ट्री से लौटकर
मानसेवी पत्रकार के रूप में गंगा भैया की कविता प्रभावित करने के लिए काफी हुआ
करती थी।
पूज्य रामनाथ अग्रवाल जी के घर की गोष्ठी हो या सुमित्र जी
के ठिकाने पर आनंद का अनुभव होता था भले ही घर देर से लौटने पर यानी लगभग रात 3 बजे तक लौटने पर कितनी फटकार न मिली हो।
दूसरे दिन अखबारों में अपने नाम को तलाशना हमारा शौक बन गया
था। शशि जी ने खूब छापा कवि बना दिया। एक गोष्ठी में शायद वह गोष्टी सुमित्र जी के
जन्मदिन पर थी। मेडिकल निवासी गेंदालाल जी सुमित्रा जी को जरी शॉपी उपहार स्वरूप।
और कहने लगे माला काहे से बनती है जरी से और फूल से - तो गेंदा हम हैं जा जरी लै
लो कमरा उन्मुक्त खिलखिला हट से गूंज गया। तभी
पूज्य मां गायत्री ने खीर खिला दी। सुमित्र
जी और शशि जी ने बताया था कि-" कवि गोष्ठियों को कार्यशाला समझा जाना
चाहिए।"
सच में अब कार्यशालाएं नहीं होती। अनेकांत को छोड़कर कोई भी संस्था निरंतर कवि
गोष्ठी नहीं करती। मध्यप्रदेश लेखक संघ ने कुछ दिन तक मोर्चा संभाला पर कवियों में
भी राजनेता के गुण आ ही जाते हैं कोई बात नहीं मध्य प्रदेश लेखिका संघ ने बहुत
दिनों तक इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
सूरज भैया का पढ़ने का तरीका और मानवीय संवेदना ओं को उभार
कर लिखने की प्रवृत्ति अद्भुत है अद्वितीय है।
गणेश नामदेव जी का डायरी खोलने का स्टाइल अभी तक आंखों के
सामने घूमता है। कुछ दिनों बाद तो यह लगने लगा था कि जबलपुर में पुष्प वर्षा करो
तो हर तीसरा फूल किसी ना किसी कवि के माथे पर ही लगता है। फिर धीरे-धीरे कहानी मंच
मिलन मित्र संघ की यादें ताजा हो रही है।
हिंदी मंच भारती ने भी नए स्वर नए गीत कार्यक्रमों का
सिलसिला जारी रखा था। अखंड कवि सम्मेलन इसी जबलपुर में हुआ है। गजब की बात है कि
कवियों का टोटा नहीं पड़ा।
उस दौर में समाचार पत्र भी गजब काम करते थे। तब साहित्यकार
पत्रकार भी हुआ करते थे अब यदा-कदा अरुण श्रीवास्तव जैसे साहित्यकार पत्रकार की
तरह नजर आते हैं।
माटी की गागरिया जैसी कविता लिखने वाले भवानी दादा को कौन
भूलेगा। पूजनीय सुभद्रा जी केशव पाठक पन्नालाल श्रीवास्तव नूर के इस शहर में कविता
अब कराह रही है ।
ऐसा नहीं है कि बसंत मिश्रा यशोवर्धन पाठक विनोद नयन कोई
कोशिश नहीं कर रहे हैं या राजेश पाठक प्रवीण ने कोर कसर छोड़ रखी हो। पर पता नहीं
क्या हो गया है वह कार्यशाला नहीं होती जिसे हम गोष्ठी कहते थे। मणि मुकुल जी को
भूलना गलत होगा। साधारण सा व्यक्तित्व साधारण सी कविता मणि मुकुल के अलावा बहन
गीता गीत भी लिखती हैं तो डॉ संध्या जैन श्रुति ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
विनीता पैगवार, रजनी कोठारी
राजनेताओं के लिए गधे कम पड़ गए थे के लिए इंतज़ार कीजिये
बुधवार, मार्च 01, 2023
सामरिक ताकत बनने से पहले मानव संसाधन का विकास जरूरी है
कॉलेज के दिनों में बढ़-चढ़कर हम अक्सर निशस्त्रीकरण पर बेहद प्रभावशाली ढंग से अपने विचार रखा करते थे। उस दौर में हमारे मस्तिष्क में भी शस्त्र विहीन राष्ट्र की कल्पना अत्यधिक आदर्शवादी ताकि चलते हावी रहा करती थी।
उन दिनों सैन्य शक्ति के संदर्भ में भरत किसी भी गिनती में नहीं आता था। परंतु हमारे मस्तिष्क में हमेशा ही विश्व की भारत के लिए की जाने वाली चैरिटी का ख्याल बना रहता था। आर्थिक दृष्टि से भारत की विकास दर इतनी धीमी थी जितनी थी चीटियां भी धीमी गति से नहीं चलती। तब हम चिंतित जरूर थे परंतु हताश नहीं । तब भारत कई मोर्चों पर युद्ध रत रहा है। सीमा पर हमेशा चीन और पाकिस्तान की हरकतें देश कौन उत्साह विहीन करने की कोशिश करती रही हैं। दूसरा मुद्दा भारतीय जनता की स्वास्थ्य शिक्षा से संबंधित समस्याएं।
एक और कुपोषण रक्त अल्पता औसत आयु में कमी तथा सामाजिक स्वास्थ्य के गिरते हुए समंक हमारे मस्तिष्क को जब जोड़ देते थे वहीं दूसरी ओर शिक्षा का स्तर भी बेहद शर्मनाक था। सोचिए जब हम अपने जॉब में आए तब भी शिक्षा का स्तर और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों में कोई उत्साहवर्धक परिणाम नजर नहीं आते थे।
खेतों में उपस्थित का अनाज अपर्याप्त था। केयर जैसे संस्थान अमेरिका से प्राप्त खाद्यान्न सहायता के परिवहन का कार्य करती थी। तब यूनिसेफ टीके लगाने के लिए अभी प्रेरक और प्रमुख सहायक एजेंसी के रूप में हमारी के लिए तत्पर हुआ करती थी।
मेरा चिंतन हमेशा से ही समाज में कुछ धनात्मक देखना चाहता था। इसके पीछे एक कारण है वह कारण जानेंगे तो आप समझ जाएंगे कि मैंने एक खास विभाग में नौकरी करना क्यों पसंद किया। ऐसा नहीं कि मेरे पास विकल्प न रही हों। बहुत सारे विकल्प थे पत्रकारिता वकालत और ढेरों सरकारी नौकरियां। पत्रकारिता में मेरे मित्र आज कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं तो वकालत करने वाले साथियों ने तो हाई कोर्टस में न्यायाधीश का रुतबा हासिल कर दिया है। मुझसे मेरे इंटरव्यू में पूछा गया कि-"आपने यह जॉब क्यों पसंद की?"
मैं जानता नहीं जानता था कि प्रश्न किस उद्देश्य से किया गया? शायद वह समझ रहे होंगे कि- इससे बेहतर अपॉर्चुनिटी मुझे मिल सकती है। मैंने अपनी बैसाखियों की ओर इशारा करते हुए कहा-" मैडम अगर उस वक्त जब मेरा जन्म हुआ था पल्स पोलियो अभियान चलाया गया होता तो शायद मैं इन बैसाखियों के सहारे नहीं चलता । मैंने सोचा नहीं था कि ऐसा मैं कह पाऊंगा।
पर यही वाक्य शायद उनके हृदय पर गहराई से अंकित हो गया था।
अपनी नौकरी के साथ-साथ लोग सोशियो इकोनामिक डेवलपमेंट के लिए अगर चिंता करने लगेंगे तो तय है कि किसी ना किसी दिन भर आदर्श स्थिति में नजर आएगा ऐसा उस वक्त भी मेरा मानना था और आज भी यही सोचता हूं।
काम करते-करते समझ में आता था कि महिलाओं का प्रसूति के दौरान मरना स्वाभाविक प्रक्रिया है आंकड़े रोके नहीं रुक रहे हैं। कई बच्चे तो पहला जन्मदिन भी नहीं बना पा रहे। जब फैमिली प्लानिंग पर किसी को समझा रहा था तब भीड़ में से एक महिला ने ठेठ देहाती भाषा में मुझे डपकते हुए कहा-" बेकार की बातें मत कीजिए साहब, हमारे परिवार में हम यह सब नहीं कर सकते। परिवार में अब तक कोई भी बच्चा 6 महीने या 1 साल से ज्यादा जिंदा नहीं रहा है हम अगर परिवार कल्याण अपना लेंगे तो शायद हमें मुक्ति भी ना मिल पाए?"
मेरा प्रति प्रश्न था कि क्या आपने घर परिवार में बच्चों के जन्म को लेकर केवल ईश्वर पर भरोसा किया है? उत्तर होना स्वाभाविक था। तब मैंने कहा माताजी अगर आप मुझ पर भरोसा करें आंगनवाड़ी पर भरोसा करें तो शायद इस बार ऐसा ना हो? फिर आप जैसा कहोगी मैं मान लूंगा और यहां तक कह डाला कि-" तुम्हारे साथ चलूंगा सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देने के लिए"
बात का पूरा पूरा असर हुआ आखिर बुजुर्ग महिला अपने कुल के लिए इससे बेहतर और क्या सोच सकती है। इस परिवार पर मेरी विशेष नजर थी। परिवार में हर गर्भवती के रजिस्ट्रेशन और टाइमली टीकाकरण के साथ-साथ आयरन की गोलियां उपलब्ध कराई जाती थी और उसे नियमित रूप से प्रेगनेंसी पीरियड में खाने की मॉनिटरिंग भी सुनिश्चित कर ली थी ।
यहां आइए 30 से 35 वर्ष पुराने भारत की तस्वीर है जो मैंने आपको दिखाई। आप देख नहीं पाते क्योंकि विकास केवल ढांचागत आकृतियों में नजर आता है। विकास को देखने का नजरिया सबसे पुख्ता तौर पर किसी भी देश की वाइटल स्टैटिसटिक्स को देखने का नजरिया ही होता है। जन्म दर मृत्यु दर मातृ मृत्यु दर एनीमिया स्कूल ड्रॉपआउट रेट से लेकर कम्युनिटी मेडिसिन और प्रैक्टिसेज देखने वाला मुद्दा है। मेरे मित्र स्वर्गीय डॉक्टर संजय श्रीवास्तव कहा करते थे कि- 10 परसेंट मरीज मेरे हैं 90% आपके ही आप चाहे तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।"
हुआ भी वही परंतु मुझे महसूस हो रहा था कि तस्वीर बदलने में शिक्षा आड़े आती है उन पर पारिवारिक परंपराएं हावी रहती हैं और इस बात का भय भी कि 4 लोग क्या कहेंगे।
यह चार लोग कौन हैं मैंने तो आज तक नहीं देखा आपने देखा हो तो बताइए। इसका भय हर मन से हटना जरूरी है। बहुत मेहनत मशक्कत लगती है अच्छी परंपराओं को बरकरार रखने और गलत परंपराओं को समाप्त करने में। एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग एक रामबाण इलाज है परंतु यह मुद्दा भी बड़ी मुश्किल से समझ में आने लगा है। शहरी दंपत्ति खास तौर पर महिलाएं यहां तक कि डॉक्टर्स भी कोलोस्ट्रम वाला दूध पिलवाने के संदेश को तेजी से प्रोत्साहित नहीं करते हैं , बताएगा इस मुद्दे पर झगड़े भी कर लेता था।
बदलाव के लिए केवल मैं ही जिम्मेदार हूं ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं बदलाव के लिए मेरे जैसे लाखों लोग इसमें शामिल है। जो यह जानते हैं कि मानव संसाधन का विकास बिना वाइटल स्टैटिसटिक्स के आंकड़ों में पॉजिटिव सुधार लाए संभव नहीं है। भारत की स्वास्थ्य सेवाओं में गुणवत्ता तभी से नजर आने लगी थी। कोविड-19 के दौरान जब लोग इस बात के लिए घबराए हुए थे कि हम 10 साल में भी टीका लगा पाएंगे या नहीं तब हम जैसे लोग इस मुद्दे पर किसी तरह का मानसिक टेंशन नहीं लेते थे। वजह थी हमारी मजबूत वर्किंग फोर्स।
और उससे भी बड़ी वजह थी व्यवस्था में आपसी तालमेल। स्वास्थ्य आंगनवाड़ी शिक्षा के साथ-साथ सामुदायिक सहयोग का सिंक्रोनाइजेशन कोविड-19 टीकाकरण की सफलता का प्रमुख रहस्य रहा है।
अब जब कुछ दिनों में मैं सरकार से रिटायर हो जाऊंगा तब भी इस परिवर्तन को देखकर अपने आप को सौभाग्यशाली मानूंगा की किस तरह से हमने एक युग को बदलते देखा है।
मेरी मैदानी वर्कर अक्सर दुखी रहा करती थी कि उनके केंद्र पर महिलाएं नहीं आती। हमने एक प्रयोग शुरु कर दिया और आपस में थोड़ा बहुत चंदा किया तथा हर गर्भवती महिला की गोद भरने की रस्म प्रारंभ की गई। हम महिला को यह बताने में सफल रही थे कि-" हमारा मैदानी केंद्र आपके लिए पिता का घर है।"
इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी तक महिलाओं को उनके ससुराल में बांध कर रखना मेरी कल्पना थी। और इस परिकल्पना को आकार देने में हमारे विभाग की कमिश्नर श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव एवं सबके लिए प्रिय एवं आदरणीय आईएएस अधिकारी श्री ने इस योजना को पूरे प्रदेश में लागू कर दिया।
यह एक निजी इनीशिएटिव था जो आगे चलकर विराट रूप लेने वाला था इसका मुझे और मेरी टीम को ज्ञान नहीं था। हमारी केंद्र एक सांस्कृतिक आकर्षण पैदा कर सके जिससे हम अपनी बात पुख्ता तौर पर कहने के लिए समर्थ हो चुके थे।
ऐसा मशीनें नहीं करती हैं मशीनें सटीक काम तो करती है लेकिन संवेदना एवं सुविधाओं के साथ नहीं।
हां मुझे याद आ रहा है जब बीसीजी की वाइल खोलने के लिए 4 बच्चों का होना जरूरी होता था। इस सिस्टम को खत्म करने के लिए जोरदार तरीके से हम लोगों ने अपनी बातें स्टेट सेमिनार में रखी। इससे यूनिफॉर्म इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम को ताकत मिली और उम्र के पहले वर्ष में लगने वाले टीके समय पर लगने लगे। पोलियो के मामलों पर भारत ने जिस तरह से चक्रव्यूह रच दिया है उसका तोड़ स्वयं विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास भी न होगा क्योंकि भारत के पास मानव संसाधन का एक विराट कोर्स उपलब्ध है।
इस आर्टिकल का उद्देश्य केवल यही है कि अगर आप भारत को विश्व गुरु के रूप में देखना चाहते हैं तो बारीकी से सामाजिक चिंतन की जरूरत है। यूं ही नहीं हो जाता है socio-economic डेवलपमेंट।
शनिवार, फ़रवरी 11, 2023
दक्षिण एशिया का बदनाम देश : पाकिस्तान
आर्थिक बदहाली, गिरते जीवन-समंक, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा , लोकशाही की दुर्दशा , बन्दूक की नोक पर चकाघिन्नी होती डेमोक्रेसी, आतंक का एपी-सेंटर, 14 अगस्त 1947 को ब्रिटिश-इंडिया से आज़ाद हुए जिन्ना के नापाक इरादों, एवं जयचंदों की मदद से पैदा पाकिस्तान अब दक्षिण एशिया का सबसे बदनाम देश हो चुका है.विश्व मानता है कि इस देश के नागरिकों की साख भी संदिग्ध हो गई है. किल मिलाकर पाकिस्तानी पासपोर्ट की इज्ज़त नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई है.
समाज
विज्ञानी एवं रक्षा क्षेत्र के विद्वानों का मानना है कि-“भारत के खिलाफ इस्लामिक कार्ड खेलने के किसी भी अवसर को नहीं चूकने
वाले इस देश ने अपनी नस्लों को जो इतिहास पढ़ाया जाता है कि –“हिन्दू, सिख, यहूदी और
हर गैर इस्लामिक एवं बुत-परस्त काफिर हैं वे हमारे दुश्मन हैं. !”.. इसके आगे क्या
क्या सिखातें हैं हम सब जानते हैं विश्व भी जानता है . आज हम इस मुल्क यानी
पाकिस्तान की एक और करतूत उजागर करते हैं , जिस पर विश्व खासतौर पर यूरोप 9/11 के
बावजूद खामोश है. जी हाँ हम बलोच सिन्धु, पश्तूनों की आज़ादी के दीवानों के
मानवाधिकारों की बात करतें हैं......
ऐसी स्थिति
में वहाँ की युवा जनसंख्या दिशा-भ्रमित है. किशोर अवस्था तक इस्लामिक जेहाद को
सर्वोपरी मान बैठता है. 1971 में आज़ाद हुए
बलूचिस्तान , पाकिस्तान का पश्चिमी प्रान्त है जिसकी
जनसंख्या 2 करोड़ के आसपास है.। बलूचिस्तान ईरान के “सिस्तान एवं बलूचिस्तान” तथा अफ़गानिस्तान के सटे हुए क्षेत्रों में बँटा हुआ है, बलोचिस्तान की राजधानी क्वेटा है । यहाँ
के लोगों की प्रमुख भाषा बलूच या बलूची है ।
1944 में बलूचिस्तान को
स्वतन्त्रता देने के लिए ब्रिटिश इंडिया के एक जनरल मनी ने किया था . पाकिस्तान
के संस्थापक और प्रथम गवर्नर-जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने अंतिम स्वाधीन बलूच शासक
मीर अहमद यार खान को पाकिस्तान में शामिल होने के समझौते पर कुरआन की
क़सम देकर समझौते दस्तखत करने के लिए मजबूर किया था ।
यह कार्य
11 अगस्त 1947 को ब्रिटिश एवं यूरोपीयन देशों के इशारे पर
इसे जिन्ना
ने पाकिस्तान में शामिल कर लिए गए
बलूचिस्तान में 1970 के दशक से प्रो-आर्मी
पाकिस्तानी डेमोक्रेसी एवं प्रशासनिक सामाजिक भेदभाव से दु:खी होकर
बलोच-राष्ट्रवाद का अभ्युदय हुआ.इस
प्रांत की जनसंख्या 78 लाख से अधिक एवं क्षेत्रफल 347190 वर्ग कि.मी. (1,34,050 वर्गमील) है. जो पाकिस्तान का 44% भू-भाग है.
पाकिस्तान
में बलूचिस्तान,सिंध,केपीके में मौजूद
प्राकृतिक-संपदा एवं व्यापारिक दृष्टि से अन्य प्रान्तों से अपेक्षाकृत अधिक है
परन्तु वहां की जनता की बदहाली (स्वास्थ्य,शिक्षा,
रोज़गार,) चिंताजनक है. सारी सुख-सुविधाएं
पाकिस्तानी पंजाब सूबे के पास जाती है. बलूचिस्तान,सिंध,केपीके की जनता बेहद गरीब हैं. उनका जिनोसाईट
किया जाता है. हाल ही में स्पेस में बलोचों नें बताया –“2
हज़ार महिलाओं को लापता कर दिया गया. ताहिर बलोच, हनी बलोच,
मिराब्ल बलोच ने बताया कि-“हमारे पढ़ने लिखने
वाले बच्चों, महिलाओं, तक को
कंसंट्रेशन-कैम्पस में रखा जा रहा है.”
2015 में जिनेवा
में आयोजित कांफ्रेंस जिसका विमर्श एजेंडा
था 'बलूचिस्तान इन द शैडोज' , कांफ्रेंस का सारांश , "बलूचिस्तान में
मानवाधिकारों की स्थिति बुरी तरह से खराब हो रही है। नागरिकों को सुरक्षा देने और
कानून का राज कायम रखने के बुनियादी कर्तव्य में क्षेत्र की प्रांतीय
एवं राष्ट्रीय सरकार नाकाम साबित हुई हैं वहां केवल सेना और उनकी बन्दूक वाला विधान चलता है.
1948-49
से अब तक पाकिस्तान के विरुद्ध अब तक ब्लोचों
द्वारा पांच बार सशस्त्र क्रांतिकारी
आन्दोलन की गई है. वर्तमान में बलोच-सिन्धुदेश-केपीके की आज़ादी के लिए सोशल-मीडिया
पर अंतर्राष्ट्रीय-नैरेटिव लगातार जारी है.
मशहूर
बलूच कार्यकर्ता नाएला कादरी ने एक प्रेस
मीटिंग में कहा था कि- 'राजनैतिक, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्रता संघर्ष को दबाने के लिए पाकिस्तान
नरंसहार कर रहा है।' यह भी उनके द्वारा ही कहा था-बीते
एक दशक में 2 लाख बलूचियों को मार डाला गया है। 25000 पुरुष एवं महिलाएं लापता
हुई हैं, जिनमें पाकिस्तान की सेना का हाथ रहा
है। वो लोग नरंसहार की पहचान के लिए निर्धारित संयुक्त राष्ट्र के सभी आठ संकेतों
पर अमल कर रहे हैं और इसमें अमानवीयकरण, ध्रुवीकरण, विनाश और अस्वीकार भी शामिल हैं ।
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