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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गुमशुदा हैं हम, ख़ुद अपने बाज़ार में ।

ग़ज़ल  गुमशुदा हैं हम, ख़ुद अपने बाज़ार में । ये हादसा हुआ है, किसी ऐतबार में ।। कुछ मर्तबान हैं, तुम रखना सम्हाल के - पड़ जाए है फफूंद भी, खुले अचार में ।। रोटियों पे साग थी , खुश्बू थी हर तरफ - गूँथा है गोया आटा, तुमने अश्रुधार में ।। अय माँ तुम्हारे हाथ की रोटियाँ कमाल थीं- बिन घी की मगर तर थीं तुम्हारे ही प्यार में ।। हाथों पे हाथ, सर पे दूध की पट्टियाँ- जाती न थी माँ जो हम हों बुखार में ।।

चीन के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध एवम कारपोरेट सेक्टर

ताहिर गोरा के टैग टीवी पर आज पामपियो के हवाले से निक्सन के दौर से ओबामा तक जिस प्रकार चीन को बारास्ता पाकिस्तान सपोर्ट दिया वो चीन के पक्ष में रहा । अब उसका उसका दुष्परिणाम भी देखा भारतीय सन्दर्भ में एक  एक दम साफ है कि हमारे  विदेशी कारपोरेट केे लिए अधिक वफादार हैैं   चीन के सापेक्ष । अगर इम्पोर्टेड विचारों ने कोई हरकत न की और भारत में अस्थिरता पैदा न की । कास्टिज़्म को रीओपन करने वाली एकमात्र विचारधारा यही है । 

बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई..!

बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई..! इस शेर में ग़ालिब ने जो कहा है हुबहू ऐसा ही कुछ हो गया हूं। ना तो अदब की समझ से वाकिफ हूँ न ही कोई धीरज बचा है । उन दिनों का क्या जब रिसाले पढ़कर समझ लेता था कि वतन में खुशनुमा सदा बहती है । उस हिमालय से दक्कन तलक हिन्दुतान पूरब से मगरिब तलक कुछ भी जुड़ा नहीं । शायद यह सब कुछ किताबों में भी पढ़ाया था हमको और इसकी तस्दीक करते थे यह रिसाले हमें नहीं मालूम कि असलम मंदिर में क्यों नहीं जाता और ना ही असलम यह जानता था कि मैं मंदिर क्यों जाता हूं ? संग साथ पढ़े सुना था कुछ दिनों पहले वह स्कूल में मास्टर हो गया था । हमें हाकिम बनना था सो बन गए । अब वो कहां हम कहां मालूम नहीं किस हाल में होगा । पता नहीं जफर मुझे पहचानेगा कि नहीं । कभी-कभी अजय का पता मिल जाता है सुनते हैं वह भी टीचर है । जाने क्या शाम को हो जाता है दीवार पर टंगी टीवी में... गोया आग उगलती है यह टीवी । आठ-दस लोग बैठ कर लड़ा करते हैं । इतनी कहासुनी तो जुए के फड़ों में भी नहीं होती । अखबार ऐसी आग ना लगाया करते थे और अब तो हर शाम दीवार जला करती है । देखिए लपटें बहुत

लमटेरा : शिवाराधना का एक स्वरूप

सुधि जन आज कुछ कविताएं विभिन्न भावों पर आधारित हैं प्रस्तुत कर रहा हूँ । पसंद अवश्य ही आएगी । पहली कविता बुंदेलखंड की लोक गायकी लमटेरा पर केंद्रित है । इस कविता में शिव आराधना करते हुए नर्मदा यात्रा पर निकले यात्रियों का जत्था जिंदगी तो को गाता है वह ईश्वर एवं उसके मानने वालों के बीच एक अंतर्संबंध स्थापित करता है । कुल मिलाकर लमटेरा शिव आराधना का ही स्वरूप है ।  लमटेरा : - नर्मदा के किनारे ध्यान में बैठा योगी सुनता है अब रेवा की धार से उभरती हुई कलकल कलकल सुदूर घाट पर आते लमटेरा सुन भावविह्लल हो जाता अन्तस् की रेवा छलकाता छलछल....छलछल . हो जाता है निर्मल...! नदी जो जीवित है मां कभी मरती नहीं सरिता का सामवेदी प्रवाह ! खींच लाता है अमृतलाल वेगड़ की यादों को वाह ! सम्मोहित कर देता है ऐसा सरित प्रवाह..!! यह नदी नहीं बूंदों का संग्रह है..! यह आपसी अंतर्संबंध और प्रेम और सामंजस्य भरा अनुग्रह .. शंकर याचक से करबद्ध..! अंतत से निकली प्रार्थना गुरु को रक्षित करने का अनुरोध सच कहा मां है ना रुक जाती है बच्चे की करुण पुकार सुन पाती है मां कभी नहीं मरती मां अविरल

रूप ऐसा कि, दर्पन सह न सके

रूप ऐसा कि, दर्पन सह न सके 💐💐💐💐💐💐💐💐 दाम अपने न ऊंचे, बताया करो टाट तुम न ज़री से सजाया करो ! तन है भीगा हुआ, प्रीत-बौछार से छाछ से मन को, मत भिगाया करो । ताल स्वर लय, मौलिक न हो अगर गीत मेरे बेवज़ह तुम न गाया करो । रूप ऐसा कि, दर्पन सह न सके ऐसे दर्पन के सनमुख न जाया करो । ग़र भरोसा नहीं , मुकुल के प्यार पर प्रेम गीत मुझको न, सुनाया करो ।। *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*