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जून, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पाकिस्तान आतंक का घोषित घोंसला है तो चीन वैचारिक उन्माद का होलसेल डीलर

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कश्मीर समस्या दो दुश्चरित्र राष्ट्रों पाकिस्तान  और चीन के बीच भारत का ऐसा सरदर्द है जिसकी पीड़ा का आधार भारत की समकालीन लापरवाही  है. भारत में लाल और हरी विचारधाराएं भारत के अस्तित्व को 1947 के बाद से ही समाप्त करने की कोशिशों में सक्रीय हैं. अक्सर ब्रिटिशर्स पर ये आरोप लगता है कि उसने मज़हबी आधार पर भारत को विखंडित किया यह अर्धसत्य हो सकता है पूर्ण सत्य तो ये है कि चीन की सरकार झूठ के विस्तार  और कुंठित मनोदशा को सफलता का आधार मानती है तो पाकिस्तान के फर्जी प्रजातंत्र के नेतृत्व का  चरित्र मूर्खताओं का विशाल भण्डार ही रहा है.  ऐसी कोशिश हो भी क्यों न भारत के मामले  चीन सदा से ही भयभीत रहा है. यहाँ चीन  का साथ हमारे विकास के लिए उतना कारगर कतई भारत के लिए सकारात्मक  नहीं माना जा सकता जितना हम सोच रहे थे. नारे तब भी थे जैसे हिन्दी-चीनी भाई भाई ... पंचशील-क्षरण के बाद हमारे हितों की रक्षा के लिए कोई ठोस पैरोकारी विश्व की ओर से नज़र न आ सकी . मैकमोहन लाइन  को मान्यता देने की 1956 में शपथ लेने वाले चीन ने 1962 में "हिन्दी-चीनी भाई भाई" के नारे को हमारी कमजोरी मानते हुए युद्ध

पूंजी निर्माण

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चलो अच्छा है जानी पहचानी नहीं थीं ये चीखें !!

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हां सदमा तो लगा है सुनकर  हादसा  देखा नहीं  है   न तो  साथ मेरे  जुड़ती है कोई भी  कहानी इस  हादसे जैसी......!! मग़र नि:शब्द क्यों हूं..? सोचता हूं  अपने चेहरे पे सहजता लांऊ   कैसे ? मैं जो महसूस करता हूं कहो बतलाऊं   कैसे..? वो जितना रोई होगी बस में दिल्ली वाली वो  लड़की मेरी आंखों के आंसू भी सुखाए उसी पगली ने न मैं  जानता उसे न पहचानता हूं मैं ? क्या पूछा -"कि रोया क्यूं मैं..?" निरे जाहिल हो किसी पीर तुम जानोगे कैसे ध्यान से सुनना उसी चीख सबों तक आ रही अब भी तुम्हारे तक नहीं आई तो क्या तुम भी सियासी हो..? सियासी भी कई भीगे थे सर-ओ-पा तब देखा तो होगा ? चलो छोड़ो न पूछो मुझसे वो कौन है क्या है तुम्हारी  ? तो सुन लो जानता नहीं में उसे रत्ती भर   खूब रोया जी भर के  दिन भर  ... हुक उठती थी मेरे मन में   मेरे माथे पे   बेचैनियां नाचतीं दिन भर  ! मेरा तो झुका है  क्या तुम्हारा  झुकता नहीं है सर..? सुनो तुम भी.. ध्यान  से  दिल्ली से देशभर में गूँजतीं चीखें  ज्योति सिंह : फोटो - विकीपीडिया से  हर तरफ़ से एक सी आतीं.. जब तब  तुम सुन नहीं पाते सुनते हो तो शायद  समझ में आतीं

कोलाहल

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कोलाहल कोलाहल हूँ  गूँज रहा हूँ  अंतस से चौराहे तक इकतारे के आसपास भी, नुक्कड़ से दोराहे तक भरी सभा में वक्ता से पहले मैं ही तो करता हूँ राज़ आपस का संवाद तुम्हारे , चिड़ियों के सो जाने तक कोलाहल हूँ    गूँज रहा हूँ   भय से भरा कोई सुनता है, कोई रचनाकार मेरा कोई लगा रहा अंदाजा कितना है आकार मेरा ? मुद्दे सारे कोलाहल हैं, साफ़ कहे जातें हैं क्या ..? मानस से बस्ती शहरों तक होता है विस्तार मेरा !! कोलाहल हूँ    गूँज रहा हूँ   सबका हूँ,  हूँ  पास तुम्हारे, चिंता के गलियारों में भोर जन्म ले लेता हूँ मैं, कभी रात- अंधियारों में . कभी अचानक मन के भीतर – उठता हूँ मैं देर सवेर रोज़ मिला करते हो मुझसे, भीड़ भरे बाज़ारों में !!   कोलाहल हूँ    गूँज रहा हूँ   धुआंधार की गिरती धारा, मुझको जना करे है रोज़ सन्नाटों के षडयंत्रों के बाद , मेरा बढ़ता है ओज . जनमन की प्रतिध्वनि हूँ , तुमने क्यों न पहचाना कोलाहल हूँ भरा ख़ुशी से, या फिर होता हूँ आक्रोश .!!                       गिरीश बिल्लोरे मुकुल         

पेरिस समझौता : ट्रंप की चिंता पर भारी भारतीय चिंतन

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            ग्राहम लुक्स  ट्रंप की वक्रोक्ति आनी तय  थी  पर्यावरण के मसले पर विकसित देशों को दीनो-ईमान के पासंग पर रखा जाना अब तो बहुत मुश्किल है. स्मरण हो कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर   30 नवंबर से 12 दिसंबर 2015. को एक महाविमर्श का आयोजन हुआ था.  उद्देश्य था ग्लोबल वार्मिंग के लिए उत्तरदायी कार्बन डाई आक्साइड गैस के विस्तार  को रोका जावे. समझौता भी ऐतिहासिक ही कहा जा सकता है .   2050 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 40 और 70 प्रतिशत के बीच कम किया जाने की और 2100 में शून्य के स्तर तक लाने के उद्देश्य की पूर्ती के लिए तक 2.7 डिग्री सेल्सियस तक ग्लोबल वार्मिंग में कमी लाने का लक्ष्य नियत करना भी दूसरा वैश्विक  कल्याण का संकल्प है. इस समझौते का मूलाधार रहा है . जो ट्रंप भाई जी के अजीब बयान से खंडित हुआ नज़र आ रहा है. साफ़ साफ़ न कहते हुए ट्रंप ने न केवल पेरिस समझौते से हटने की कोशिश की है वरन  चीन और भारत जैसे देशों के विकास के रथ को रोकने की छद्म रूप से कोशिश की है. जर्मनी के डायचे वैले  एक जर्नलिस्ट ग्राहम लुक्स  ने तो 177 देशों द्वारा दस्तावेज़ के  हस्ताक्षरित होने  के हफ्ते

जबलपुर स्टेशन पहुँचे जय-वीरू...... : ज़हीर अंसारी

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. जय और वीरू आज अचानक जबलपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गए। दोनों को शायद राजधानी जाना था, कौन सी राजधानी की ट्रेन तत्काल मिलेगी, यह जानने के लिए वो सीधे प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर पहुँच गए। इनके पास कोई लगेज नहीं था, न ही साथ में कोई दो-पाया साथी। दोनों ने पहले इधर-उधर देखा फिर बेधड़क प्लेटफ़ार्म स्थित एकीकृत क्रू लॉबी में घुस गए। दोनों इतने हट्टे-कट्टे थे कि किसी की हिम्मत ही नहीं हुई उन्हें रोकने की। उलटे जो लोग लॉबी में काम कर रहे थे, उनमें कुछ डर क े मारे बाहर भाग खड़े हुए। जय और वीरू शान से अंदर गए, चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। शायद जानना चाह रहे थी कौन सी ट्रेन राजधानी जाएगी। दोनों दो-तीन मिनिट वहीं खड़े रहे। भाषा प्रोब्लम होने की वजह से उनका किसी ने न तो अभिवादन किया, न किसी से उन्हें रिस्पांस दिया। वहाँ मौजूद कुछ कर्मचारी उनकी डील-डौल देखकर घबरा गए। ये दोनों मुस्तंडे 'खेलने दो वरना खेल बिगड़ेंगे' की तर्ज़ पर थोड़ी देर खड़े रहे, जब कोई रिस्पांस नहीं मिला तो उनमें एक ने गंदगी फैला दी। आप सोच रहे होंगे कि यहाँ शोले फ़िल्म के जय और वीरू की बात हो रही है मगर ऐसा नहीं है। यहाँ दो