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जून, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हिंसा क्यों.....?

पोस्टर कविता : शशांक गर्ग  हिंसा के बारे में सामान्य सोच ये है कि – हिंसा में  किसी के खिलाफ शारीरिक मानसिक यंत्रणा के लिए शारीरिक बल प्रयोग निरायुध एवं सायुध अथवा  शाब्दिक बल प्रयोग किया जाता है . सत्य ही है ऐसा होता ही इस बिंदु पर किसी की असहमति नहीं यहाँ चिंतन का विषय है -  “हिंसा क्यों ?”       हिंसा कायिक एवं मानसिक विकृति है . जो भय के कारण जन्म लेती है . भय से असुरक्षा ... असुरक्षा से सुरक्षित होने के उपायों की तलाश की जाती है . तब व्यक्ति के मानस में तीन  बातें विकल्प के रूप में सामने आनी चाहिए – 1.     परिस्थिति से परे हटना 2.     सामने रहकर प्रतिरोध को जन्म देना 3.     आसन्न भय के स्रोत को क्षतिग्रस्त करना    प्रथम द्वितीय विकल्प समझदार एवं विचारक चिन्तक उठाते हैं किन्तु सहज आवेग में आने वाले  लोग तीसरे विकल्प को अपनाते हैं . विश्व मिथकों में , इतिहास में ऐसे लोगों की संख्या का विवरण मौजूद  है . इससे मनुष्य प्रजाति में पशुत्वगुण की मौजूदगी की भी पुष्टि होती है . पशु विशेष रूप से कुत्ता जिसे आप स्वामिभक्त मानते हैं महाभारत काल से  तो उसके स्वामिभक्ति के गुण

मत पालो किसी में ज़रा सा भी ज्वालामुखी

मैं अपराजित हूँ  वेदनाओं से  चेहरे पर चमक  लब पर मुस्कान  अश्रु सागर शुष्क  नयन मौन   पीढ़ा जो नित्याभ्यास है  पीढ़ा जो मेरा विश्वास है .  जागता हूँ  सोता हूँ  किन्तु खुद में  नहीं   खोता हूँ ! इस कारण  मैं अपराजित हूँ  जीता हूँ जिस्म की अधूरी  संरचना के साथ  जीतीं हैं कई  स्पर्धाएं और प्रतिघात  विस्मित हो मुझे क्यों देखते हो ? तुम क्या जानो  जब ज्वालामुखी सुप्त है  लेलो मेरी परीक्षा ...! याद रखो जब वो फटता है तो  .......... जला देता है जड़ चेतन सभी को  मत पालो किसी में ज़रा सा भी ज्वालामुखी     

मुझे चट्टानी साधना करने दो

 रेवा तुम ने जब भी तट सजाए होंगे अपने तब से नैष्ठिक ब्रह्मचारिणी चट्टाने मौन हैं कुछ भी नहीं बोलतीं हम रोज़ दिन दूना राज चौगुना बोलतें हैं अपनों की गिरह गाँठ खोलते हैं ! पर तुम्हारा सौन्दर्य बढातीं ये चट्टानें   हाँ रेवा माँ                                           ये चट्टानें  बोलतीं नहीं कुछ भी कभी भी कहीं भी बोलें भी क्यों ...! कोई सुनाता है क्या ? दृढ़ता अक्सर मौन रहती है मौन जो हमेशा समझाता है कभी उकसाता नहीं मैंने सीखा आज संग-ए-मरमर की वादियों में इन्ही मौन चट्टानों से ... "मौन" देखिये कब तक रह पाऊंगा "मौन" इसे चुप्पी साधने का आरोप मत देना मित्र मुझे चट्टानी साधना करने दो खुद को खुद से संवारने दो !!  

चार कविताएँ

(1)  ज़्यादातर मौलिक नहीं “सोच”   सोच रहा होता हूँ सोचता भी कैसे प्रगतिशीलता के खेत में मौलिक सोच की फसल उगती ही नहीं . (2) सोचता हूँ गालियाँ देकर उतार लूं भड़ास ..? पर रोज़िन्ना सुनता हूँ तुम गरियाते हो किसी को बदलाव फिर भी नज़र नहीं आता !! (3) जिस दूकान पर मैं बिका सुना है .. तुम भी उसी दूकान से बिके थे ? बिको जितना संभव हो वरना जब मरोगे तब कौन खरीदेगा सिर्फ जलाने दफनाने के लायक ही रहोगे आज बिको पैसा काम आएगा  ! (4) पापा आप जो रजिस्टर दफ्तर से लाए थे बहुत काम आया कल उसमें मैंने लिखी थी ईमानदारी पर एक कविता सबको बहुत अच्छी लगी मुझे एवार्ड भी मिला ये देखो ? मैं उसका एवार्ड   देख न पाया !!   

रमज़ान मुबारक हो : बहन फिरदौस की कलम से

खिल उठे मुरझाए दिल , ताज़ा हुआ ईमान है हम गुनाहगारों पे ये कितना बड़ा अहसान है या ख़ुदा तूने अता फिर कर दिया रमज़ान है... माहे-रमज़ान इबादत , नेकियों और रौनक़ का महीना है. यह हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना होता है. इस्लाम के मुताबिक़ अल्लाह ने अपने बंदों पर पांच चीज़ें फ़र्ज क़ी हैं , जिनमें कलमा , नमाज़ , रोज़ा , हज और ज़कात शामिल है. रोज़े का फ़र्ज़ अदा करने का मौक़ा रमज़ान में आता है. कहा जाता है कि रमज़ान में हर नेकी का सवाब 70 नेकियों के बराबर होता है और इस महीने में इबादत करने पर 70 गुना सवाब हासिल होता है. इसी मुबारक माह में अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. यह भी कहा जाता है कि इस महीने में अल्लाह शैतान को क़ैद कर देता है. इबादत रमज़ान से पहले मस्जिदों में रंग-रोग़न का काम पूरा कर लिया जाता है. मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं. रमज़ान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज़ के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. रमज़ान के महीने में जमात के साथ क़ियामुल्लैल (रात को नमाज़ पढ़ना) करने को ' तरावीह ' कहते हैं. इसका वक्त

प्राप्ति और प्रतीति : गिरीश बिल्लोरे मुकुल

परिंदों, तुम आज़ाद हो, उड़ो, ऊँचे और ऊँचे, जहाँ, सफलता का दृश्य, बाट जोहता है। जहाँ से कोई योगी, पहले पहल सोचता है ? इस आव्हान का असर, एक पाखी ने फड़फड़ाए पर, टकराकर, जाने किस से - गिर गया -विस्तृत बयाबान में, और तब से अब तक हम, आप और मैं. . . ताड़ के पत्तों से, किताबों के जंगल तक- अन्वेषणरत- खोजते- कराहों का कारण इसे सुनिए यहाँ :- प्राप्ति और प्रतीति 

दो दिन की लघुकथा

पहला-दिन रत्तू भिखारी बहुत देर तक चीखता चिल्लाता रहा .......... पॉश कालोनी में दो दिनों से मिला तो पर पेट भरने के लिए पानी अधिक पीना पड़ा था आज पॉश कालोनी में मिलने की उम्मीद जो थी . रंग बिरंगे परन्तु बड़े बड़े गेट थे कि खुलने का नाम न ले रहे थे . जिस  गेट के सामने पहुँचा किसी दरवाज़े से सफ़ेद झक्क वाला कुता भुक्क भुक्क कर भगाता नज़र आया तो किसी गेट पर बड़ी नस्ल वाले कुत्ते ने दुत्कारा ... पर भिखारी ने रटी-रटाई पुकार लगानी न छोड़ी . निरंतर पुकार रहा था सीता मैया राधा जी , देवकी मैया भूखे को भोजन दे दे माँ .. दो दिनों का भूखा हूँ माँ ....... सीता ........... देवकी दोरे खोल लो अब मैया जी ...... एक भी दरवाज़ा न खुला ...... थक हार कर बेचारा भिखारी मंदिर के आहाते में सो गया .... रात कोई आया सपने में . क्या समझाया रत्तू को मालूम होगा अपन को कुच्छ नई मालूम..     दूसरा-दिन आज भिखारी पूरे उत्साह से उठा मंदिर के पास वाले बंगले के पास चिल्लाया....... देवी श्री देवी भगवान तुम्हारा भला करेगा . भुक्क-भुक्क करने वाले कुत्ते को डपटते हुए प्रौढ़ा ने नौकर को आवाज़ लगाईं .... बहादुर एक पेपर प्लेट