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मंगलवार, अप्रैल 3

अरब इजरायली , विरोधाभाषी जीवन : डैनियल पाइप्स


क्या इजरायल की कुल जनसंख्या के 1\5 अरब यहूदी राज्य के प्रति स्वामिभक्त हो सकते हैं?

मस्तिष्क में इसी प्रश्न के साथ हाल में मैंने इजरायल के अरब निवासियों वाले क्षेत्र( जफा, बका अल गराबिया, उम्म अल फहम , हायफा , एकर, नजारेथ, गोलन पहाडियाँ , जेरूसलम) का दौरा किया और साथ ही मुख्यधारा के अरब और यहूदी इजरायलियों के साथ वार्ता की।
मुझे बहुत से अरब भाषी नागरिक मिले जो कि यहूदी राजनीति में जीवन व्यतीत करने को लेकर स्वयं में संघर्ष की स्थिति में हैं। एक ओर तो वे देश के विशेषाधिकार सम्पन्न धर्म के रूप में यहूदी धर्म का विरोध करते हैं , उस कानून का जो कि केवल यहूदियों को अपनी इच्छा के अनुसार आप्रवास का अधिकार वापस लौटने के कानून के अंतर्गत देता है, राज्य की मुख्य भाषा हिब्रू हो इसका विरोध करते हैं, ध्वज में डेविड के तारे को पसंद नहीं करते , राष्ट्रगान में " यहूदी आत्मा" उन्हें पसंद नहीं है। दूसरी ओर वे देश की आर्थिक सफलता की प्रशंसा करते हैं , स्वास्थ्य सुविधा के स्तर , कानून के शासन और चलायमान लोकतंत्रकी भी सराहना करते हैं।
इस संघर्ष की अनेक अभिव्यक्तियाँ भी हैं। छोटी, अशिक्षित और 1949 में पराजित अरब इजरायली जनसंख्या दस गुना अधिक बढी है , आधुनिक कुशलता प्राप्त कर ली है और अपने आत्मविश्वास को फिर से प्राप्त कर लिया है। इस समुदाय से कुछ लोगों ने अनेक उत्तरदायित्व और सम्मान के पद भी प्राप्त किये हैं, जिसमें सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश सलीम जोबरान, पूर्व राजदूत अली याह्या , सरकार के पूर्व मंत्री रालेब मजादेले और पत्रकार खालिद अबू तोमेह शामिल हैं।
लेकिन समाहित हुए ये कुछ लोग उस जनसमूह की तुलना में फीके हैं जो कि स्वयं को भूमि दिवस, नकबा दिवस और भविष्य दृष्टि रिपोर्ट के साथ जोड्ते हैं। रहस्योद्घाटन तो यह है कि अधिकतर अरब इजरायली सांसद जैसे कि अहमद तीबी और हनीन जुवाबी इजरायल विरोध या जायोनिज्म विरोध के मुखर वक्ता हैं। अरब इजरायली धीरे धीरे अपने यहूदी साथियों के विरुद्ध हिंसा में लिप्त हो रहे हैं।
निश्चित रूप से अरब इजरायली दो विरोधाभाष को जी रहे हैं। यद्यपि इजरायल में उनके साथ भेदभाव होता है पर साथ ही वे किसी सार्वभौम अरब देश( मिस्र या सीरिया) में जीवन व्यतीत कर रहे लोगों से कहीं अधिक अधिकार व स्थिरता का सुख भोग रहे हैं। दूसरा वे उस देश के नागरिक हैं जिसे कि उनके साथी अरब दूषित करते हैं और नष्ट करने की धमकी देते हैं।
इजरायल में मेरी बातचीत से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इन जटिलताओं के चलते यहूदियों और समान विचार के अरब में अरब इजरायली असंगत अस्तित्व के पूर्ण परिणामों पर चर्चा हो रही है। अतिवादी सांसद और हिंसक नवयुवकों को प्रतिनिधि न मानकर चंद कट्टरपंथी मान कर निरस्त कर दिया जाता है। इसके बजाय हमें सुनने में आता है कि यदि केवल अरब इजरायली ही अधिक सम्मान प्राप्त करें व केंद्रीय सरकार से अधिक नगर निकाय आर्थिक सहायता प्राप्त करें तो वर्तमान असंतोष कम हो सकता है, लोगों को इजरायल के अच्छे अरब तथा पश्चिमी तट और गाजा के अरब को बुरा अरब के रूप में विभाजित किया जाये साथ ही यह चेतावनी भी दी जा रही है कि यदि अरब इजरायलियों को आत्मसात नहीं किया गया तो वे फिलीस्तीनियों के साथ मिल जायेंगे।
मेरे मध्यस्थों ने इस्लाम के बारे में कोई प्रश्न नहीं किया । इसे अनुदार माना गया कि इस बात का उल्लेख किया जाये कि मुस्लिम ( जो कि अरब इजरायल का लगभग 84 प्रतिशत हैं) पूरी तरह इस्लाम से शासित हैं। इस्लामी कानून को लागू करने के अभियान पर कोई चर्चा ही नहीं हुई और लोग तत्काल दूसरे विषयों की ओर चले गये।
इस अवहेलना से मुझे 2002 से पूर्व के तुर्की की याद आती है जब मुख्यधारा के तुर्क यह मान बैठे थे अतातुर्क की क्रांति स्थायी है और यह अनुमान कर लिया था कि इस्लामवादी चंद कट्टरपंथी होकर रह जायेंगे। वे बहुत गलत सिद्ध हुए अब जबकि 2002 के अंत में लोकतांत्रिक ढंग से इस्लामवादियों के सत्ता में आने के एक दशक पश्चात निर्वाचित सरकार ने ठोस रूप से इस्लामी कानून को क्रियान्वित किया है और स्वयं को एक नवओटोमन क्षेत्रीय शक्ति बना लिया है।
मैं इजरायल में भी इसी प्रकार के विकास की भविष्यवाणी करता हूँ जैसे जैसे अरब इजरायल विरोधाभाष अधिक गम्भीर होगा , इजरायल के मुस्लिम नागरिक संख्या में अधिक होते जायेंगे , क्षमता और आत्मविश्वास में बढ्ने के साथ साथ देश के जीवन के साथ आत्मसात होते जायेंगे तथा यहूदी सार्वभौमिकता को उखाड फेंकने की मह्त्वाकाँक्षा भी अधिक जाग्रत होगी। इससे यही संकेत मिलता है कि जैसे जैसे इजरायल बाहरी खतरे से मुक्ति प्राप्त करता जायेगा अरब इजरायली कहीं अधिक बडा खतरा बनते जायेंगे। मेरी भविष्यवाणी है कि ये थियोडोर हर्ल्ज और लोर्ड बालफोर की दृष्टि के यहूदी गृहभूमि में आत्यंतिक बाधा हैं।
तो फिर क्या किया जा सकता है? लेबनान के ईसाई सत्ता से इस कारण बाहर हो गये क्योंकि उन्होंने बडी संख्या में मुसलमानों को शामिल कर लिया और आनुपातिक रूप से जनसंख्या में वे कम हो गये और देश का शासन नहीं कर सके। इस शिक्षा के आधार पर इजरायल की पहचान और सुरक्षा के लिये यह आवश्यक है कि वे अरब नागरिकों को कम करें इसके लिये उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को कम करने की आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें वापस भेजे जाने की आवश्यकता है केवल इजरायल की सीमा को समायोजित करने के लिये कदम उठाये जायें , सीमांत क्षेत्रों में घेरेबंदी की जाये ,पारिवारिक मिलन के लिये नीतियों को कठोर किया जाये , पूर्व नटाल नीतियों को बदला जाये तथा शरणार्थियों के प्रार्थनापत्रों की सावधानीपूर्वक जाँच की जाये।
बिडम्बना है कि इन कार्यों का सबसे बडा परिणाम यह होगा कि अधिकतर अरब इजरायली मुखर रूप से यहूदी राज्य के अस्वामिभक्त नागरिक बने रहेंगे ( फिलीस्तीनी राज्य के स्वामिभक्त नागरिक के विपरीत) । इससे आगे अनेक मध्य पूर्वी मुस्लिम इजरायली बनने की आकाँक्षा रखते हैं ( जिसे मैं मुस्लिम आलिया कहता हूँ) । मेरे अनुसार इन प्राथमिकताओं से इजरायल की सरकार कठिन स्थिति में आ जायेगी और इसके लिये पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं दे पायेगी जिसके चलते आज जो कुछ शांतिपूर्ण दिख रहा है वह कल के लिये समस्या बन जायेगा।

रविवार, मार्च 11

50 वर्ष पूर्व अरबवासियों के प्रति दृष्टि :डैनियल पाइप्स


डैनियल
पाइप्स





1962 में अत्यंत आकर्षक, चिकने आवरण पर 160 पृष्ठों की The Arab World शीर्षक की पुस्तक में तात्कालिक रूप में कहा गया, "कभी अत्यन्त समृद्ध और फिर पराभव को प्राप्त विस्तृत अरब सभ्यता आज परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। कुछ फलदायक अव्यवस्था प्राचीन जीवन की निश्चित परिपाटी को बदल रही है" ।
इस संस्करण ने इस बात का दावा किया कि इसकी तीन विशेषतायें आधी शताब्दी के बाद भी इसे समीक्षा के लिये बाध्य करती हैं। पहला, उस समय की उच्चस्तरीय अमेरिकी साप्ताहिक पत्रिका लाइफ ने इसे प्रकाशित किया जिसमें कि सांस्कृतिक केंद्रीयता निहित थी । दूसरा, एक सेवा निवृत्त विदेश मंत्रालय के अधिकारी जार्ज वी एलेन ने इसकी प्रस्तावना लिखी थी जिससे कि पुस्तक के मह्त्व की ओर संकेत जाता था। तीसरा, एक ख्यातिलब्ध ब्रिटिश पत्रकार, इतिहासकार और उपन्यासकर्ता डेसमन्ड स्टीवर्ट ( 1924 – 1981) ने इस पुस्तक को लिखा ।
द अरब वर्ल्ड अत्यंत प्रभावी रूप से दूसरे काल के समय को प्रस्तुत करता है; वैसे तो पूरी तरह अपने विषय को बहुत मधुर बनाकर नहीं रखा है लेकिन स्टीवर्ट ने सहज और शालीन भाव से अपनी बात रखी है जो कि आज के सबसे मुखर लेखक को भी चुप कर देगा। उदाहरण के लिये वे कहते हैं कि जब पश्चिमी पर्यटक अरब भाषी देशों में प्रवेश करते ही " अलादीन और अली बाबा के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं जहाँ कि लोग उन्हें उनकी बाइबिल की व्याख्या की याद दिलाते हैं" अल कायदा के इस युग में उनकी भावना से किंचित मुठभेड की जा सकती है।
सबसे रोचक यह है कि इस पुस्तक से यह प्रदर्शित होता है कि किस प्रकार एक प्रमुख विश्लेषक भी बडे चित्र को पढने में गलती कर बैठता है।
जैसा कि इसके शीर्षक से स्पष्ट है कि पुस्तक की विषयवस्तु मोरक्को से इराक तक एक अरब जन का अस्तित्व है ऐसे लोग जो कि इस प्रकार परम्परा से आबद्ध हैं कि स्टीवर्ट ने पक्षी इसकी तुलना करते हुए लिखा है, " अरबवादियों की एक अलग सामान्य संस्कृति है जिसे वे इसे हमिंग पक्षी के घोंसले की भाँति चाह कर भी हर बार फेंक नहीं सकते" अरबवासियों द्वारा अपने देशों को एक रख पाने में असफल रहने के पिछले रिकार्ड की अवहेलना करते हुए स्टीवर्ट भविष्यवाणी करते हैं कि, " कुछ भी हो अरब संघ की शक्ति बनी रहेगी"। 1962 के बाद शायद ही ऐसा सम्भव रह सका कि अरबी भाषा ही केवल जन की परिभाषा कर सकी और इतिहास और भूगोल नकार दिये गये।
उनकी विषयवस्तु की दूसरी महत्वपूर्ण चीज इस्लाम है। स्टीवर्ट लिखते हैं कि इस सामान्य आस्था ने मानवता को नयी ऊँचाइयों की ओर पहुचाया है और यह " शांतिवादी ना होकर भी इसका मुख्य शब्द सलाम या शांति है" वे इस्लाम को एक " सहिष्णु धर्म मानते हैं" और अरबवासियों को परम्परागत रूप से " सहिष्णु आक्रांता" और " सहिष्णु स्वामी मानते हैं"। मुसलमानों ने यहूदियों और ईसाइयों के साथ सहिष्णुता पूर्वक व्यवहार किया" । वास्तव में तो अरबवासियों की सहिष्णुता एक संस्कृति तक फैल गयी। सहिष्णुता के प्रति स्टीवर्ट की इस दृष्टि से वे आग्रहपूर्वक लेकिन अयुक्तिपूर्ण ढंग से इस्लामवाद की अभिव्यक्ति को नकार देते हैं, जो उनकी नजर में, " एक पुरानी पीढी की चीज है जिसके प्रति नयी पीढी में कोई आकर्षण नहीं है"। संक्षेप में स्टीवर्ट इस्लामवाद के आरम्भ से आधुनिक काल तक इसकी सर्वोच्चता को लेकर इसके बारे में कुछ भी नहीं जान सके।
तीसरी महत्वपूर्ण चीज अरबवासियों का आधुनिता के प्रति प्रतिबद्धता : " आश्चर्यों में से एक यह है कि बीसवीं शताब्दी के अरब मुस्लिमों ने आधुनिक विश्व के परिवर्तनों को स्वीकार किया है" । सउदी अरब और यमन को छोड्कर हर स्थान पर उन्हें मिला कि, " अरब आधुनिकता दिखाई देने वाली शक्ति है" (इसलिये परिवर्तन की हवा मेरा पहला शब्द है) । महिलाओं के प्रति उनकी एकांगी चिंता पढने वाले को सन्न कर देती है: " हरम और इसके मनोवैज्ञानिक स्तम्भ बीसवीं शताब्दी में आये हैं"। आर्थिक मामलों में महिलायें लगभग पुरुषों के बराबर हैं। वे वही देख रहे हैं जो वह चाहते हैं और वास्तविकता से उनके ऊपर कोई असर होता नहीं दिखता ।
अपनी व्यापक दृष्टि के आशावाद को जारी रखते हुए स्टीवर्ट को लगता है कि अरब भाषी अपने प्राचीन काल से बाहर आने को प्रतिबद्ध हैं। वह सातवीं शताब्दी के बारे में लिखते हैं जिस प्रकार कि अब कोई भी साहस नहीं कर सकेगा विशेष रूप से जार्ज ड्ब्ल्यू बुश की इराकी मह्त्वाकाँक्षा और बराक ओबामा के लीबिया के खतरनाक मिशन के बाद। "पहले चार खलीफा ब्रिटेन के विलियम ग्लैडस्टोन की भाँति लोकतांत्रिक थे यदि अमेरिका के थामस जेफरसन की भाँति नहीं तो," स्टीवर्ट तो यह भी दावा करते हैं कि " अरब सभ्यता पश्चिमी संस्कृति का भाग है न कि पूर्वी संस्कृति का" इसका अर्थ कुछ भी हो ।
पचास वर्ष पूर्व इस्लाम के सम्बंध में जानकारी कितनी कम थी कि लाइफ पत्रिका के दो दर्जन कर्मचारी पुस्तक के सम्पादकीय स्टाफ के रूप में एक चित्र पर इस गलत सूचना के साथ अंकित थे कि इस्लाम की तीर्थयात्रा " प्रत्येक वर्ष बसंत में होती है" ( हज प्रत्येक वर्ष के कैलेंडर के आरम्भ होने से 10 या 11 की तिथि को होता है)
किसी के पूर्वाधिकारी की भूलों का प्रभाव होता है। मेरे जैसे विश्लेषक को आशा करनी चाहिये कि डेसमन्ड स्टीवर्ट और लाइफ की भाँति अस्पष्टता ना हो ताकि समय व्यतीत होने के साथ बुरे रूप में न देखा जाये। इसलिये निश्चित रूप से मैं इतिहास इस भाव से पढता हूँ कि व्यापक दृष्टि बने और तात्कालिक अवधारणाओं तक सीमित न रहे । 2062 में यह बतायें कि मैं कैसा कर रहा हूँ ।

सोमवार, नवंबर 7

तेहरान के मुकाबले ईरानी लोगों को सशक्त करो : डैनियल पाइप्स


 डैनियल पाइप्स
नेशनल रिव्यू आनलाइन
19 जुलाई, 2011

पश्चिमी सरकारों को इस्लामिक रिपब्लिक आफ ईरान के साथ किस ढंग से कार्यव्यवहार करना चाहिये जिसे कि वाशिंगटन ने " आतंकवाद का सबसे सक्रिय राज्य प्रायोजक बताया है'?
ईरान की आक्रामकता 1979 में तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जे से आरम्भ हुई और इसके कुछ कर्मचारियों को कुल 444 दिनों तक बंधक बना कर रखा। इसके बाद हुए कुछ बडे आक्रमणों में 1983 में बेरूत में अमेरिकी दूतावास पर आक्रमण जिसमें 63 लोग मौत के घाट उतारे गये और अमेरिका की नौसेना बैरक पर आक्रमण जिसमें 241 लोग मारे गये।
अभी हाल में अमेरिका के रक्षा सचिव लिवोन पनेटा ने कहा, " हमें दिखाई दे रहा है कि इन हथियारों में से अधिकतर इराक के रास्ते ईरान को जा रहे हैं और यह निश्चित रूप से हमें क्षति पहुँचा रहा है" । संयुक्त चीफ आफ स्टाफ के अध्यक्ष माइक मुलेन ने इसमें और जोडा कि, " ईरान प्रत्यक्ष रूप से कट्टरपंथी शिया गुटों की सहायता कर रहा है जो कि हमारे सैनिकों को मार रहे हैं" ।
अमेरिका की प्रतिक्रिया मूल रूप से दो वर्ग में विभाजित है: कठोर और कूटनीतिक। पहले वर्ग का मानना है कि तेहरान अब सुधरने वाला नहीं है और टकराव तथा यहाँ तक कि बल प्रयोग की सलाह देता है; इसका अनुमान है कि कूटनीति, प्रतिबंध, कम्प्यूटर वाइरस और सैन्य आक्रमण की धमकी से मुल्लाओं को परमाणु शक्ति सम्पन्न होने से नहीं रोका जा सकता और इसका मानना है कि या तो शासन में परिवर्तन करवाया जाये या फिर ईरानी बम के विरुद्ध सैन्य विकल्प का प्रयोग किया जाये। दूसरी ओर कूटनीतिक वर्ग जो कि सामान्य तौर पर अमेरिका की नीतियों पर नियंत्रण रखती है इस्लामिक रिपब्लिक आफ ईरान के स्थायित्व को स्वीकार करता है और इस बात की अपेक्षा करता है कि तेहरान कूटनीतिक समझौते का समुचित उत्तर देगा।
इस पूरी बहस में सबसे बडा विवाद इस बात पर है कि ईरान के सबसे बडे विरोधी गुट मुजाहिदीने खल्क को अमेरिका सरकार की आतंकवादी सूची में रखा जाये या नहीं। कठोर वर्ग सामान्य रूप से 1965 में स्थापित एमईके को मुल्लाओं के विरुद्ध एक हथियार मानता है (हालाँकि कुछ थोडी संख्या विरोध में भी है) और इसे आतंकवादी सूची से ह्टाने का पक्षधर है। दूसरी ओर कूटनीतिक वर्ग का मानना है कि इसे सूची से हटाने से ईरानी नेता असंतुष्ट होंगे और कूटनीतिक प्रयासों को क्षति होगी साथ ही ईरानी लोगों तक पहुँच बनाने में कठिनाई होगी।
एमईके से सहानुभूति रखने वाले पक्ष का तर्क है कि एमईके का इतिहास वाशिंगटन के साथ सहयोग करने का, ईरानी परमाणु संयंत्र के सम्बंध में मह्त्वपूर्ण खुफिया सूचनायें प्रदान करने और इराक में ईरानी प्रयासों के सम्बंध में भी रणनीतिक खुफिया सूचनायें प्रदान करने का रहा है। इससे आगे जिस प्रकार इस संगठन और नेतृत्व की क्षमता की सहायता से 1979 में शाह के शासन को उलट दिया गया उसी प्रकार शासन में परिवर्तन के लिये इनकी क्षमताओं का उपयोग किया जा सकता है। सडक पर विरोध करने वालों को एमईके के साथ सहयोग के आरोप में गिरफ्तार किया जाना भी विरोध प्रदर्शन में इसकी भूमिका को सिद्ध करता है और साथ ही ये नारे भी कि सर्वोच्च नेता अली खोमैनी " अपराधी" हैं , राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद "तानाशाह" हैं और धार्मिक नेता के राज्य के प्रमुख होने के विरुद्ध नारे।
अमेरिका के अनेक उच्च अधिकरियों ने एमईके को आतंकवादी सूची से निकालने की बात की है इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ( जेम्स जोंस), संयुक्त चीफ आफ स्टाफ के तीन अध्यक्ष ( ह्यूज शेल्टन, रिचर्ड मेयर्स, पीटर पेस) , गृहभूमि सुरक्षा के सचिव ( टाम रिज) ,एक महान्यायवादी ( माइकल मुकासे) और आतंकवाद प्रतिरोध के राज्य समन्वयक ( डेल डेली) शामिल हैं। रिपब्लिक और डेमोक्रेट दोनों ही दलों के प्रभावी लोग इस पक्ष में हैं कि इस संगठन को आतंकवादी की सूची से निकाल दिया जाये और इस सूची में दलीय मर्यादा से परे कुल 80 कांग्रेस सदस्य शामिल हैं।
एमईके विरोधी वर्ग इस संगठन को सूची से निकाल दिये जाने के लाभ पर विचार किये बिना तर्क देता है कि अमेरिकी सरकार को आतंकवाद के आरोपों के आधार पर इसे सूची में बनाये रखना चाहिये। उनका इस संगठन को दोषी बनाने का आधार है कि 1970 में इस संगठन ने छ्ह अमेरिकी लोगों की हत्या की थी। वैसे ये आरोप सत्य हैं या नहीं लेकिन आतंकवादी सूची में शामिल करने के लिये आवश्यक है कि आतंकवादी घटना दो वर्ष से हो रही हो और इस आधार पर 1970 की बात करना अप्रासंगिक है।
पिछले दो वर्षों का क्या? एमईके का पक्ष लेने वालों का कहना है कि अमेरिका के आतंकवाद सम्बंधी तीन मुख्य डाटाबेस Rand Database of Worldwide Terrorism Incidents , the Global Terrorism Database और the Worldwide Incidents Tracking system के अनुसार एमईके वर्ष 2006 से पूरी तरह साफ सुथरा पाया गया है।
क्षमता और आशय की बात का क्या? राज्य विभाग की वर्ष 2006 की " Country Report on Terrorism" रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि यह संगठन आतंकवादी घटनाओं की " क्षमता और इच्छा" रखता है लेकिन वर्ष 2007, 2008 और वर्ष 2009 की रिपोर्ट में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। ब्रिटेन में कोर्ट आफ अपील ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया और इसे वर्ष 2008 में ब्रिटेन की आतंकवादी सूची से हटा दिया गया। यूरोपियन संघ ने वर्ष 2009 में इसे आतंकवाद के आरोप से मुक्तकर दिया। फ्रांस की न्यायपालिका ने भी इसके विरुद्ध आतंकवाद के आरोपों को मई 2011 में निरस्त कर दिया।
संक्षेप में, एमईके को आतंकवादी उपाधि देना आधारहीन है। अनेक न्यायालयों द्वारा एमईके की आतंकवादी उपाधि की पुनर्समीक्षा के बाद राज्य सचिव को अत्यंत शीघ्र ही यह सुनिश्चित करना चाहिये कि क्या इस सूची को आगे भी जारी रखना है? ओबामा प्रशासन एक सामान्य ह्स्ताक्षर से ईरानी लोगों को सशक्त कर सकता है कि वह अपने भाग्य पर बने नियंत्रण से बाहर आ सकें और शायद मुल्लाओं के परमाणु पागलपन से भी।
मौलिक अंग्रेजी सामग्री: Empower Iranians vs. Tehran
हिन्दी अनुवाद - अमिताभ त्रिपाठी

सोमवार, सितंबर 22

आतंक वाद कबीलियाई सोच का परिणाम है

इस पोस्ट के लिखने के पूर्व मैंने यह समझने की कोशिश की है कि वास्तव में किसी धर्म में उसे लागू कराने के लिए कोई कठोर तरीके अपनाने की व्यवस्था तो नहीं है........?किंतु यह सत्य नहीं है अत: यह कह देना कि "अमुक-धर्म का आतंकवाद" ग़लत हो सकता है ! अत: आतंकवाद को परिभाषित कर उसका वर्गीकरण करने के पेश्तर हम उन वाक्यों और शब्दों को परख लें जो आतंकवाद के लिए प्रयोग में लाया जाना है.
इस्लामिक आंतकवाद , को समझने के लिए हाल में पाकिस्तान के इस्लामाबाद विस्फोट ,पर गौर फ़रमाएँ तो स्पष्ट हो जाता है की आतंक वाद न तो इस्लामिक है और न ही इसे इस्लाम से जोड़ना उचित होगा । वास्तव में संकीर्ण कबीलियाई मानसिकता का परिणाम है।


भारत का सिर ऊँचा करूँगा-कहने वाले आमिरखान,आल्लामा इकबाल,रफी अहमद किदवई,और न जाने कितनों को हम भुलाएं न बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे घटना क्रम को बारीकी से देखें तो स्पष्ट हो जाता है की कबीलियाई समाज व्यवस्था की पदचाप सुनाई दे रही थी जिसका पुरागमन अब हो चुका है, विश्व की के मानचित्र पर आतंक की बुनियाद रखने के लिए किसी धर्म को ग़लत ठहरा देना सरासर ग़लत है । हाँ यहाँ ये कहा जा सकता है की इस्लामिक-व्यवस्था में शिक्षा,को तरजीह ,देने,संतुलित चिंतन को स्थापित कराने में सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व असफल रहा है जिससे अच्छी एवं रचनात्मकता युक्त सोच का अभाव रहा इस्लामिक-देशों की आबादी के । डैनियल पाइप्स.की वेब साईट http://hi.danielpipes.org/ पर काफी हद तक स्पस्ट आलेख लिखे जा रहे हैं जिसका अनुवाद अमिताभ त्रिपाठी कर रहें हैं । अब भारत को ही लें तो भारत में पिछले दशकों में प्रांतीयता,भाषावाद,क्षेत्र-वाद की सोच को बढावा देने की कोशिश की जा रही है इस पर आज लगाम न लगाई गयी तो तय शुदा बात है भारतीय-परिदृश्य में भी ऐसी घटनाएं आम समाचार होंगी।


आतंक को रोकने किसी भी स्थिति में किसी साफ्ट सोच का सहारा लेने की कोई ज़रूरत नहीं,आतंक वाद को रोकने बिना किसी दुराग्रह के कठोरता ज़रूरी है चाहे जितनी बार भी सत्ताएं त्यागनी पड़ें , हिंसा को बल पूर्वक ही रोका जाए।


डेनियल की वेब साईट पर बेहद सूचना परक आलेख देखे जा सकतें है


मुस्लिम दृष्टि में बराक ओबामा25 अगस्त, 2008, FrontPageMagazine.com
इस्लामवादी वामपंथी गठबन्धन का खतरा14 जुलाई, 2008, नेशनल रिव्यू
इस्लामवादी आतंकवाद कहाँ अधिक है यूरोप में या अमेरिका में?3 जुलाई, 2008, जेरुसलम पोस्ट
शत्रु का एक नाम है19 जून, 2008, जेरुसलम पोस्ट
ईरान पर आक्रमण को तैयार रहो11 जून, 2008, यू.एस.ए.टुडे
मध्यपूर्व पर ओबामा बनाम मैक्केन
इधर हमारे अंतरजाल के साथी भी को इस प्रकार का माहौल बनाएं बार-बार ,बैठक कर ,
आतंक की , सही परिभाषा ,को आम आदमीं के सामने रखना ही होगा