सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जबलपुर लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

“बालभवन ने संस्कारधानी को गौरवान्वित किया है : मनीष शर्मा ”

“बालभवन ने संस्कारधानी को गौरवान्वित किया है : मनीष शर्मा ”
महिलाबालविकासविभाग द्वारा संचालित संभागीय बालभवन की उत्तरोत्तर बढ़ती गतिविधियों एवं टीम बालभवन के प्रयासों से बालभवन के प्रतिभाशालीबच्चों की संख्याअब प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय पर क्रमश: बढ़ रही है. विशाल भारत के प्रतिभाशाली बच्चों में देश भर के 700 बच्चों में बालभवन के 8 बच्चों एवं बालभवन से सम्बद्ध जबलपुर संभाग मंडला, नरसिंहपुर सिवनीएवं शहडोल संभाग के अनूपपुर एवं सिंगरौली जिलों के7 बच्चों को हार्दिक शुभकामनाएं . तदाशय के विचार श्री मनीष शर्मा ने बालभवन में आयोजित प्रोत्साहन समारोह में व्यक्त किये
अध्यक्षीय उदबोधन में श्री सुशील शुक्ला (अध्यक्षबालभवनसलाहकारएवंसहयोगीसमिति)ने कहा कि- बालभवन जिस प्रकार से सृजनशीलता को प्रोत्साहित कर रहा है उससे बिनोवाजी द्वारा जबलपुरको दिएनामकरणसंस्कारधानी की सार्थकता प्रमाणित हो रही है. बच्चों में सृजन की प्रवृत्ति का पोषण बिरले लोग एवं संस्थान करते हैं. बालभवन अब मिशन मोड में कार्य कर रहा है तभी तो राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों ने महाकौशल का नाम रौशन किया है.

रेड फिल्म की दादी पुष्पा जोशी की जिंदादिली से चमका उनका सितारा ....!!

किसी ख़ास मुकाम पर पहुँचने के लिए कोई ख़ास उम्र, रंग-रूप, लिंग, जाति, धर्म, वर्ग का होना ज़रूरी नहीं जिसके सितारे को जब बुलंदी हासिल होनी होती है तब यकबयक हासिल हो ही जाती है. ये बात साबित होती है जबलपुर निवासी होसंगाबाद में सामान्य से परिवार जन्मी  85 वर्षीय बेटी श्रीमती पुष्पा जोशी के जीवन से . हुआ यूं कि उनके मुंबई निवासी पुत्र रवीन्द्र जोशी { जो कवि संगीतकार, एवं कहानीकार हैं, तथा हाल ही में बैंक से अधिकारी के पद से रिटायर्ड हुए हैं}  की कहानी ज़ायका से . श्री जोशी की कहानी “ज़ायका” उनकी पुत्र वधु हर्षिता श्रेयस जोशी, ने निर्देशित कर तैयार की जिसे  आभास-श्रेयस  यूँ ही यूट्यूब पर पोस्ट कर  दी. एक ही दिन में ३००० से अधिक दर्शकों तक  यूट्यूब के ज़रिये पंहुची फिल्म को बेहतर प्रतिसाद मिला. उसी दौरान फिल्म रेड की निर्माता कम्पनी के सदस्यों ने देखी . और जोशी परिवार को खोज कर रेड में अम्मा के किरदार के निर्वहन की पेशकश की . दादी यानी श्रीमती जोशी जो जबलपुर से मायानगरी  बैकबोन में दर्द का इलाज़ कराने पहुँची थी ने साफ़ साफ़ इनकार कर दिया. निर्माता राजकुमार गुप्ता एवं परिवार के समझाने पर बमुश्किल राज…

जबलपुर स्टेशन पहुँचे जय-वीरू...... : ज़हीर अंसारी

. जय और वीरू आज अचानक जबलपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गए। दोनों को शायद राजधानी जाना था, कौन सी राजधानी की ट्रेन तत्काल मिलेगी, यह जानने के लिए वो सीधे प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर पहुँच गए। इनके पास कोई लगेज नहीं था, न ही साथ में कोई दो-पाया साथी। दोनों ने पहले इधर-उधर देखा फिर बेधड़क प्लेटफ़ार्म स्थित एकीकृत क्रू लॉबी में घुस गए। दोनों इतने हट्टे-कट्टे थे कि किसी की हिम्मत ही नहीं हुई उन्हें रोकने की। उलटे जो लोग लॉबी में काम कर रहे थे, उनमें कुछ डर के मारे बाहर भाग खड़े हुए। जय और वीरू शान से अंदर गए, चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। शायद जानना चाह रहे थी कौन सी ट्रेन राजधानी जाएगी। दोनों दो-तीन मिनिट वहीं खड़े रहे। भाषा प्रोब्लम होने की वजह से उनका किसी ने न तो अभिवादन किया, न किसी से उन्हें रिस्पांस दिया। वहाँ मौजूद कुछ कर्मचारी उनकी डील-डौल देखकर घबरा गए। ये दोनों मुस्तंडे 'खेलने दो वरना खेल बिगड़ेंगे' की तर्ज़ पर थोड़ी देर खड़े रहे, जब कोई रिस्पांस नहीं मिला तो उनमें एक ने गंदगी फैला दी। आप सोच रहे होंगे कि यहाँ शोले फ़िल्म के जय और वीरू की बात हो रही है मगर ऐसा नहीं है। यहाँ दो हष्ट-पुस्…

कलेक्टर श्री रूपला ने मुख्यमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार की राशि कैंसर ग्रस्त मरीजों की मदद के लिये दी

रीवा जिले में कृषि उत्पादन में वृद्धि के प्रयासों में मिली जबरदस्त कामयाबी के लिए कलेक्टर शिवनारायण रूपला को आज भोपाल के लाल परेड ग्राउण्ड पर आयोजित मध्यप्रदेश स्थापना दिवस के राज्य स्तरीय समारोह में मुख्यमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार से नवाजा गया है । मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने इस समारोह में श्री रूपला को यह पुरस्कार प्रदान किया ।  पुरस्कार के रूप में उन्हें प्रशस्ति पत्र और पचास हजार रूपए की राशि का चेक प्रदान किया गया ।                 ज्ञात हो कि श्री रूपला ने रीवा जिले का कलेक्टर रहते हुए कृषि के क्षेत्र में कई ऐसे अनूठे प्रयोग किये थे जिनकी वजह से इस जिले के कृषि उत्पादन में महज तीन साल में साढ़े तीन गुना की वृद्धि दर्ज की गई । रीवा जिला जो खाद्यान्न की अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए दूसरे जिलों पर निर्भर रहा करता था वह महाराष्ट्र को भी गेहूं और चांवल की आपूर्ति करने लगा ।                 कृषि के क्षेत्र में रीवा जिले के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए श्री रूपला ने कृषि विभाग के अमले और कृषि वैज्ञानिकों को साथ लेकर अपने प्रयासों की शुरूआत वर्ष 2011-12 से की ।  उन्होंने पिछड़ेपन क…

त्रिपुरी के कलचुरि : ललित शर्मा

सहोदर प्रदेश छत्तीसगढ़ के मशहूर घुमक्कड़ ब्लागर श्री ललित शर्मा ( जो पुरातात्विक विषयों पर ब्लाग लिखतें है) का संक्षिप्त ट्रेवलाग  बिना कांट छांट के प्रस्तुत है -जो उनके ब्लाग ललित शर्मा . काम  से लिया गया है-  गिरीश बिल्लोरे मुकुल   )
          आज का दिन भी पूरा ही था हमारे पास। रात 9 बजे रायपुर के लिए मेरी ट्रेन थी। मोहर्रम के दौरान हुए हुड़दंग के कारण कुछ थाना क्षेत्रों में कर्फ़्यू लगा दिया गया था। आज कहीं जाने का मन नहीं था। गिरीश दादा को फ़ोन लगाए तो पता चला कि वे मोर  डूबलिया कार्यक्रम में डूबे हुए हैं। ना नुकर करते 11 बज गए। आखिर त्रिपुर सुंदरी दर्शन के लिए हम निकल पड़े। शर्मा जी नेविगेटर और हम ड्रायवर। दोनो ही एक जैसे थे, रास्ता पूछते पाछते भेड़ाघाट रोड़ पकड़ लिए। त्रिपुर सुंदरी मंदिर से पहले तेवर गाँव आता है। यही गाँव जबलपुर के ब्लाग-लेखक श्री विजय तिवारी जी का जन्म स्थान एवं पुरखौती है। हमने त्रिपुर सुंदरी देवी के दर्शन किए और कुछ चित्र भी लिए। मंदिर के पुजारी दुबे जी ने बढिया स्वागत किया। 
ससम्मान देवी दर्शन के पश्चात हम तेवर गाँव पहुंचे। राजा हमे सड़क पर खड़ा तैयार मिला। त…

कलेक्टर गुलशन बामरा ने बिना शर्त माफी मांगी

जबलपुर, 18 अप्रैल, 2012 पिछलेदोदिनसेसमाचारपत्रोंमें 16 अप्रैल 2012 कोगेहूँखरीदीकेसंबंधमेंलीगईमीटिंगतथाउसके बादमीडियाप्रतिनिधियोंकोदियेगयेवक्तव्यकेसंबंधमेंकलेक्टरगुलशनबामरानेअपनेजिलेकेकिसानों सेबिनाशर्तमाफीमांगीहै। इससंबंधमेंकलेक्टरनेकहाहैकिमेरीयाददाश्तऔरसमझकेअनुसारमेरेद्वाराजिलेकेकिसानोंके संबंधमेंकिसीप्रकारकेअपशब्दनहींकहेगयेहैं।

जितनी ज़ल्द हो सके मन से कुण्ठा को विदाई दिलाना ज़रूरी है.

                           उदास आंखों में सपनों ने जगह बना ही ली . अक्सर हम सोचा करतें हैं कि हम सबसे ज़्यादा दुखियारे अकिंचन हैं.हमारी आदत है ऊंचाईंयों तक निगाह करने की. और फ़िर खुद को देखने की. अब बताईये परबत देख कर आप खुद को देखेंते हैं तब  तो सामान्य सी बात है कि खुद को नन्हा महसूस करेंगे ही. बस यहीं कुंठाएं जन्म ले लेतीं हैं. हम खुद को असहज पाते हैं.    
दस बरस का था तब मुझे लगा कि मैं क्रिकेट खेल सकता हूं और फ़िर कोशिश की बैसाखियों के सहारे दो रन बनाए भी. दूसरी ही बाल पर क्लीन बोल्ड. बोल्ड होने से अधिक पीढा थी खेल न पाने की. बाल मन अवसाद से सराबोर हुआ . रोया भी ....खूब था तब
      रेल स्टेशन के क़रीब रेल्वे  क्वार्टर में  अक्सर दुख:द खबरें मिला करतीं थीं. उस दिन स्कूल से लौटते वक़्त देखता हूं कि एक इंसान जाने किस भ्रम के वशीभूत हुआ रेल पटरी पार करने के बाद वापस लौटा और यकायक रेलगाड़ी की चपेट में आ गया.. मेरी आंखों के सामने घटा ये सब ये क्या .. उफ़्फ़ दौनों टांगें .. खुद से खूब सवाल करता रहा -"बताओ, अब वो जी भी गया तो क्या सहजता से चल सकेगा..?        अर्र अब उस बेचारे के तो दौन…