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November, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सा'ब चौअन्नी मैको हम निकाल हैं...!!

संगमरमर की चट्टानों,को शिल्पी मूर्ती में बदल देता,सोचता शायद यही बदलाव उसकी जिन्दगी में बदलाव लाएगा. किन्तु रात दारू की दूकान उसे खींच लेती बिना किसी भूमिका के क़दम बढ जाते उसी दूकान की ओर  जिसे आम तौर पर कलारी कहा जाता है. कुछ हो न हो सुरूर राजा सा एहसास दिला ही देता है. ये वो जगह है जहाँ उन दिनों स्कूल कम ही जाते थे यहाँ के बच्चे . अब जाते हैं तो केवल मिड-डे-मील पाकर आपस आ जाते हैं . मास्टर जो पहले गुरु पदधारी होते थे जैसे माडल स्कूल वाले  बी०के0बाजपेई,श्रीयुत ईश्वरी प्रसाद तिवारी,मेरे निर्मल चंद जैन,मन्नू सिंह चौहान,आदि-आदि,अब गुरुपद किसी को भी नहीं मिलता बेचारे कर्मी हो गये हैं. शहपुरा स्कूल वाले  फतेचंद जैन  मास्साब,सुमन बहन जी रजक मास्साब,  सब ने खूब दुलारा,फटकारा और मारा भी पर सच कहूं इनमें गुरु पद का गांभीर्य थाअब जब में किसी स्कूल में जाता हूँ जीप देखकर वे बेचारे शिक्षा कर्मी टाइप के मास्साब  बेवज़ह अपनी गलती छिपाने की कवायद मी जुट जाते. जी हाँ वे ही अब रोटी दाल का हिसाब बनाने और सरपंच सचिव की गुलामी करते सहज ही नज़र आएँगे आपको,गाँव की सियासत यानी "मदारी" उनको बन्दर…

खन्नात की नरबदिया आर्मो

4 दिसम्बर 2012 को ब्रिसडन आस्ट्रेलिया में जन्में निक वुजिसिस  का जीवन सबसे सम्पन्न जीवन कहा जाए तो ग़लत नहीं है. निक वुजिसिस  विश्व का वो बेहतरीन हीरा है जिसे तराशने का काम ईश्वर ने खुद निक में आक़र किया. इस तथ्य की पुष्टि आपlife without limbs http://www.lifewithoutlimbs.org पर जाकर कर सकते हैं. करंजिया जनपद के ग्राम खन्नात की नरबदिया आर्मो का शरीर भी निक की तरह ही भगवान ने बनाया है. बाइस साल की नरबदिया को भी ईश्वर ने खुद ब खुद तिल खिसकने के क़ाबिल नहीं बनाया  जैसे के निक को न तो हाथ ही दिये हैं और न ही ऐसे पैर जो शरीरी-मशीन के लिये ज़रूरी हुआ करते हैं.    दौनों का जीवन प्रेरणाओं से अटा पड़ा है. सर्वांगयुक्त अच्छी कद-काठी, रंग-रूप, वाले किसी भी व्यक्ति को यदि उसका चाहा हुआ हासिल नहीं हो पाता फ़ौरन वो भगवान के सामने यही सवाल करता-"भगवान ये क्या किया तुमने ." पर ये दौनों अभाव के बाबज़ूद आत्मिक रूप से आस्था वान हैं ईश्वर के प्रति कृतग्यता व्यक्त करतें हैं. निक क्रिश्चियनीटी के प्रचारक एवम  प्रेरक वक्ता हैं. जब बोलतें हैं तो देवदूत से नज़र आते हैं. भावुक तो बरस पड़ते हैं.  जबकि कर…

मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे ..!!

     किश्तें कुतरतीं हैं हमारी जेबें लेकिन कभी भी हम ये सोच नहीं पाते कि काश कि हमारे पांव के बराबर हमारी चादर हो जाये जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल जिसका ये शेर सबकी अपनी कहानी है....  और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे ..!!
     पर क्या लुभावने इश्तहारों पर आश्रित बेतहाशा दिखा्वों के पीछे भागती दौड़ती हमारी ज़िंदगियां खुदा से इतनी सी दरकार कर पातीं हैं........ न शायद इससे उलट. जब भी खु़दा हमारी चादर हमारे पैरों के बराबर करता है फ़ौरन हमारा क़द बढ़ जाता है. यानी कि बस हम ये सिद्ध करने के गुंताड़े में लगे रहते हैं कि हम किसी से कमतर नहीं . बया बा-मशक्कत जब अपना घौंसला पूरा कर लेती है तो सुक़ून से निहारती है.. मुझे याद है उनकी हलचल घर के पीछे जब वो खुश होकर चहचहाती थी.  तेज़ हवाएं  भी उसके घौंसले को ज़ुदा न कर पाते थे आधार से... !  वो सुक़ून तलाशता हूं घर बनाने वालों में........ दिखाई नहीं देता. अपने चेहरों पर अपने मक़ान को घर बनाने वाला भाव आना चाहिये जो बया के चेहरे पर नज़र आता है हां वो भाव  जो दिखता नहीं हमारे चेहरों पर जो भी कुछ है सब आर्टिफ़ीशियल .. जैसे …

मिसेज़ गुप्ता मुहल्लेवालों के साथ दीपावली मनाती हैं या..?

बात पिछली दीपावली की है। भूल गया था,  पर इस बार दीपावली की धूमधाम शुरू होते ही याद आ गई।
त्योहार की धूमधाम भरी तैयारियों में पिछले साल श्रीमती गुप्ता ने ढेरों पकवान बनाए सोचा मोहल्ले में गज़ब का प्रभाव जमा देंगी।  बात ही बात में गुप्ता जी को ऐसा पटाया की यंत्रवत श्री गुप्ता ने हर वो सुविधा मुहैय्या कराई जो एक वैभवशाली दंपत्ति को को आत्म प्रदर्शन के लिए ज़रूरी थी। “माडल” जैसी दिखने के लिए श्रीमती गुप्ता ने साड़ी ख़रीदी और गुप्ता जी को कोई तकलीफ न हुई। घर को सजाया सँवारा गया,  बच्चों के लिए नए कपड़े बने। कुल मिलाकर यह कि दीपावली की रात पूरी सोसायटी में गुप्ता परिवार की रात होनी तय थी। चमकेंगी तो गुप्ता मैडम, घर सजेगा तो हमारे गुप्ता जी का, सलोने लगेंगे तो गुप्ता जी के बच्चे, यानी ये दीवाली केवल गुप्ता जी की होगी ये तय था।              समय घड़ी के काँटों पे सवार दिवाली की रात तक पहुँचा,  सभी ने तयशुदा मुहूर्त पर ही पूजा की गई। उधर सारे घरों में गुप्ता जी के बच्चे प्रसाद (आत्मप्रदर्शन)  पैकेट बांटने निकल पड़े । जहाँ भी वे गए सब जगह वाह वाह के सुर सुन कर बच्चे अभिभूत थे किंतु भोले बच्चे इन प…

शब्दों के हरकारे ने जिस जबलपुर को पढ़ाया उसी जबलपुर ने बिसराया : संदर्भ स्व. तिरलोक सिंह

    एक व्यक्तित्व जो अंतस तक छू गया है । उनसे मेरा कोई खून का नाता तो नहीं किंतु नाता ज़रूर था । कमबख्त डिबेटिंग गज़ब चीज है बोलने को मिलते थे पाँच मिनट पढ़ना खूब पड़ता था यही तो कहा करतीं थीं मेरी प्रोफ़ेसर राजमती दिवाकर  । लगातार बक-बकाने के लिए कुछ भी मत पढिए ,1 घंटे बोलने के लिए चार किताबें , चार दिन तक पढिए, 5 मिनट बोलने के लिए सदा ही पढिए, . सो मैं भी कभी जिज्ञासा बुक डिपो तो कभी पीपुल्स बुक सेंटर , जाया करता था। पीपुल्स बुक सेंटर में अक्सर तलाश ख़त्म हों जाती थी, वो दादा जो दूकान चलाते थे मेरी बात समझ झट ही किताब निकाल देते थे। मुझे नहीं पता था कि उन्होंनें जबलपुर को एक सूत्र में बाँध लिया है।आज़ के  नामचीन और गुमनाम  लेखकों को कच्चा माल वही सौंपते है इस बात का पता मुझे तब चला जब पोस्टिंग  वापस जबलपुर हुयी। दादा का अड्डा प्रोफेसर हनुमान वर्मा जी का बंगला था। वहीं से दादा का दिन शुरू होता सायकल,एक दो झोले किताबों से भरे , कैरियर में दबी कुछ पत्रिकाएँ , जेब में डायरी, अतरे दूसरे दिन आने लगे मलय जी के बेटे हिसाब बनवाने,आते या जाते समय मुझ से मिलना न भूलने वाले व्यक्तित्व ..... को…