बुधवार, अक्तूबर 27

हेनरी का हिस्सा

पिता की मौत के बाद अक्सर पारिवारिक सम्पदा के बंटवारे तक काफ़ी तनाव होता है उन सबसे हट के हैनरी  बैचेन और दु:खी था कि पिता के बाद उसका क्या होगा. पिता जो समझाते  वो पब में उनकी बात का माखौल उड़ाता उसे रोजिन्ना-की गई  हर उस बात की याद आई जो पिता के जीवित रहते वो किया करता था. जिसे पापा मना करते रहते थे.सबसे आवारा बदमाश हेनरी परिवार का सरदर्द ही तो था ही बस्ती के लिये उससे भी ज़्यादा सरदर्द था. पंद्रह साल की उम्र में शराब शबाब की आदत दिन भर सीधे साधे लोगों से मार पीट जाने कितनी बार किशोरों की अदालत ने उसे दण्डित किया. पर हेनरी के आपराधिक जीवन  में कोई परिवर्तन न आया. अंतत: उसे पिता ने बेदखल कर दिया कुछ दिनों के लिये अपने परिवार से. पिता तो पिता पुत्र के विछोह  की पीड़ा मन में इतने गहरे पहुंच गई कि बस खाट पकड़ ली पीटर ने. प्रभू से सदा एक याचना करता हेनरी को सही रास्ते पे लाना प्रभु..?
पीटर  ज़िंदगी के आखिरी सवालों को हल करने लगा. मरने से पहले मित्र जान को बुला सम्पदा की वसीयत लिखवा ली पीटर ने. और फ़िर अखबारों के ज़रिये हेनरी को एक खत लिखा.  
प्रिय हेनरी
अब तुम वापस आ जाओ, तुम्हारा निर्वासन समाप्त करता हूं. मेरे अंतिम समय में तुम्हारी ज़रूरत है मुझे .
तुम्हारा पिता 
पीटर
                      हेनरी निर्वासन के दौरान काफ़ी बदल चुका था. दिन भर चर्च के बाहर लोंगों की मदद करना, अंधे-अपहिजों को सड़क पार कराना उसका धंधा अपना लिया था. खबर पढ़ के भी हैनरी वापस तुरंत वापस न गया. जाता भी कैसे उसे जान के बूड़े बाप की मसाज़ करनी थी, सूज़न के बच्चे को हास्पिटल ले जाना था. कुल मिला के अपनी आत्मा को शांत करना और पापों को धोना था. सारे काम निपटा कर जब वो प्रेयर कर रहा था तब  उसे दिखाई दिया  ईशू की जगह क्रास पर पिता पीटर  हैं... और बस प्रभू का संदेश स्पष्ट होते ही तेज़ क़दमों से हेनरी  रेल्वे स्टेशन की तरफ़ भागा. पता नहीं दस मिनट में तीन किलोमीटर का रास्ता किस ताक़त ने तय किया खुद हतप्रभ था.  पिता को क्रास पर देख कितना डरा था उसका आभास बस उसे ही था. देर रात कड़ाके की ठण्ड भोगता अल्ल सुबह ट्रेन में बैठ रवाना हो गया. दोपहर पिता के पास पहुंचा तो देखा कि पिता अब आखिरी सांसें गिन रहे हैं पिता पीटर अपलक उसे निहारते और यक़ायक चीखे ..."हेनरी.........!" इस चीख के साथ पिता के प्राणांत हो चुके थे. 
___________________________________________        
http://top-10-list.org/wp-content/uploads/2009/08/The-Catholic-Church.jpgघर में पिता के अन्य सारे सफ़ल पुत्र बैंजामिन,स्टीफ़न,सभी बहनें धनवान बाप की सम्पत्ति के बंटवारे की राह देख रहे थे आशंकित संताने सोच रहीं थीं कि कहीं पिता की वसीयत में सबसे ज़्यादा हिस्सा नक़ारा हेनरी को न मिले. स्टीफ़न तो बीवी के साथ चर्च भी हो आया प्रेयर भी कर आया .गोया प्रभू वसीयत ही बदल देंगे .सभी औलादों के मन अपनी रुचि की सम्पदा मिलेगी या नहीं इस बात को लेकर काफ़ी तनाव था कईयों को इस बात का तनाव था :-"शायद उनको पिता हिस्सा दें भी न.
स्टीफ़न ने अपनी बीवी से कहा:-"पिता का मुझसे कोई लगाव न था रोज़ी पता नहीं क्यों वे मुझसे हमेशा अपमानित करते थे मुझे नहीं लगता कि मुझे मेरा मिलेनियर बाप कुछ दे जायेगा "
सारे कयास बेरिस्टर जान के आते ही खत्म हो गये वसीयत खोली गई , किसी को फ़ार्म हाउस, किसी को फ़ेक्ट्री, किसी को सोना बेटियों को बेंक में जमा रकम बराबर बराबर मिली आखिरी में लिखा था मैं अपनी सबसे प्यारी ज़मीन जो दस हेक्टर है हेनरी के नाम करता हूं. हेनरी ने खुशी खुशी उसे स्वीकारा. जान ने पूछा:-हेनरी , उस ज़मीन पर तो सांपों की बांबियां है..?
स्टीफ़न:- "भाई मुझे बहुत दु:ख है पिता ने न्याय नहीं किया !"
 बैंजामिन:- ”हेनरी, तुम चाहो तो मेरे साथ रह सकते हो ...?”
सारा:-"घोर अन्याय मैं तुम्हारी मदद करूं क्या...!"
    हैनरी ने कहा:- "पिता कभी ग़लत नही करते जो किया वो सही किया मैं खुश हूं तुम सब चिंता मत करो बस चिंतन करो मिलते रहना दु:ख दर्द आये तो एक दूसरे की मदद करना मैं एक बरस बाद वापस आऊंगा

http://hindi.webdunia.com/samayik/bbchindi/bbchindi/1004/19/images/img1100419060_1_1.jpg एक साल बाद हेनरी वापस लौटा सबसे पहले उस ज़मीन पर गया जो उसे वसीयत में मिली थी उसके साथ में था बैग जिसमें सांप पकड़ कर रखे जाते हैं. और घर लौटा तो उसके बैग में पांच सांप थे. वो भी तेज़ ज़हरीले. घर आकर इन सांपों से  ज़हर निकाला.  और बाटल में भर के विष रोधी दवा कम्पनी को बेच आया. धीरे विषधरों से इतनी दोस्ती हो गई हर सांप उसे पहचानने लगा. सबको उसने नाम दिये उनसे बात करता घायल सांपों क इलाज़ करता . अब उसका नाम देश के सबसे प्रतिष्ठित विष उत्पादकों की सूची में था . उसका संदेश वाक्य था :-"पिता किसी से अन्याय नहीं करते "
_____________________________________________
पोस्ट एक कथानक मात्र है इसका नाट्य-रूपांतरण शीघ्र प्रकाशित करूंगा जो विक्रय हेतु होगा उपयोगकर्ता से प्राप्त राशी का प्रयोग एक नेत्र-हीन बालक मंगल के भविष्य के लिये किया जावेगा शायद सफ़ल हो सकूं इस संकल्प में 
छवियां:- गूगल से साभार
_____________________________________________

14 टिप्‍पणियां:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

abhibhoot kar diya ........

waah !

atyant maarmik post !

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप से सहमत हे जी पिता कभी अन्याय नही करता, सही रास्ता दिखाता हे बच्चो को, बहुत सुंदर कहानी

ajit gupta ने कहा…

कल तक मैं भी यही कहती कि पिता कभी अन्‍याय नहीं करता लेकिन आज ही एक पोस्‍ट लिखी है और उस घटना के बाद अब मन नहीं करता कुछ भी दावे के साथ कहने को। वैसे बहुत ही अच्‍छी प्रेरक कहानी है।

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

अजित जी
इस कहानी में मैने यही साबित किया है कि पिता कभी अन्याय नहीं करता. सापों वाली ज़मीन देने का अर्थ उस युवक के साथ न्याय करना ही तो है

जबलपुर न्यूज़ ने कहा…

भाई साहब
सच कहा
पिता सच न्याय ही करते हैं

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

प्रेरणादायक कहानी..

Udan Tashtari ने कहा…

"पिता किसी से अन्याय नहीं करते "

सत्य वचन!

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति

रानीविशाल ने कहा…

बहुत सही व सार्थक सन्देश निहित है कथा में ....आभार !

राजीव तनेजा ने कहा…

जो होता है अच्छे के लिए ही होता है....
हर इनसान अगर इस बात में विश्वास कर ले तो सभी सुखी हो जाएंगे...
प्रेरक कहानी

निर्मला कपिला ने कहा…

प्रेरक कहानी। सहमत हूँ पिता कभी किसी से अन्याय नही करता। बधाई।

ललित शर्मा ने कहा…

एक दम फ़िट है कहानी दादा
राम राम
और मिसिर जी कहां हैं आजकल दिख नही रहे।

Coral ने कहा…

बहुत अच्छा सन्देश देती कथा !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

उपयोगकर्ता से प्राप्त राशी का प्रयोग एक नेत्र-हीन बालक मंगल के भविष्य के लिये किया जावेगा शायद सफ़ल हो सकूं इस संकल्प में
हार्दिक मंगलकामनायें!