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मुस्काती अक्सर दिखती है – ज्यों पट सजतें हों स्वागत के

जब  माँ सोती तब अय पलको कुछ भी हो तुम झुंझलाना मत .   लब जैसे हो तुम वैसे ही रहना – अनजाने में इतराना मत –.. वो थक के चूर हुई जब भी सबकी चिंता से ताकत ले ।   मुस्काती अक्सर दिखती है – ज्यों द्वार  सजें हों स्वागत के   अय सपने मत जाना उन तक जो सबके सपने दिनभर लखती . वो देवी जो इस भोर से उस तक सबका हो भला – यही तकती . वो अनुभूति वो स्मृति से   जाए तो रोने लगता हूँ   उसकी गोदी में सर रखके   खुद को ही खोने लगता हूँ  । उसकी यादों में डूबा तो - नयनों से फिर माणिक छलके  अपनी बेटी को देख देख - मीत हुए फिर हम हलके !!   

घुमंतू भारतीयों को मिली थी 31 अगस्त को आज़ादी : फ़िरदौस ख़ान

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घुमंतू जातियां : आभार अभिव्यक्ति  देशभर में 15 अगस्त को जश्ने-आज़ादी के तौर पर मनाया जाता है , लेकिन घुमंतू जातियां के लोग 31 अगस्त को आज़ादी भी का जश्न मनाते हैं. ऑल इंडिया विमुक्त जाति मोर्चा के सदस्य भोला का कहना है कि ऐसा नहीं कि हम स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाते , लेकिन सच तो यही है कि हमारे लिए 15 अगस्त की बजाय 31 अगस्त का ज़्यादा महत्व है. वे बताते हैं कि 15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ था और लोग खुली फ़िज़ा में सांस ले रहे थे , तब भी घुमंतू जातियों के लोगों को दिन में तीन बार पुलिस थाने में हाज़िरी लगानी पड़ती थी. अगर कोई व्यक्ति बीमार होने पर या किसी दूसरी वजह से थाने में उपस्थित नहीं हो पाता , तो पुलिस द्वारा उसे प्रताड़ित किया जाता था. इतना ही नहीं चोरी या कोई अन्य अपराधिक घटना होने पर भी पुलिस क़हर उन पर टूटता था. यह सिलसिला लंबे अरसे तक चलता रहा. आख़िरकार तंग आकर प्रताड़ित लोगों ने इस प्रशासनिक कुप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की और फिर शुरू हुआ सिलसिला लोगों में जागरूकता लाने का. लोगों का संघर्ष रंग लाया और फिर वर्ष 1952 में अंग्रेज़ों द्वारा 1871 में बनाए गए एक्ट संशोधन किया गया.

वर्तमान की भौतिकवादी मीडिया -डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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मीडिया जगत से जुड़े लोग कुछ उस तरह के हो गए हैं जैसे पुराने समय में एक राज्य का महामंत्री। शायद इस कहानी को अधिकाँश लोग नहीं सुने होंगे। उस कहानी का सार यहाँ प्रस्तुत करना आवश्यक हो गया है। कहानी के अनुसार उक्त राज्य में अकाल पड़ गया था प्रजा में त्राहि-त्राहि मची थी। यह बात राजा के कानो तक नहीं पहुँची थी। राजा जब भीं भरी सभा में अपने खास महामंत्री से पूछता कि बताओ राज्य की प्रजा का क्या हाल है? तब महामंत्री उत्तर देता कि हे राजन, राज्य में दूध घी की नदियाँ बह रही हैं प्रजा खुशहाल है। इसके बावजूद राजा को गुप्तचरों ने राज्य में ‘अकाल‘ की जो विभीषिका प्रस्तुत किया उससे राजा का मन विचलित हो गया। मुलतः वह एक दिन अचानक अपने खास गुप्तचरों के साथ राज्य भ्रमण पर निकल पड़ा। हालात जो दिखाई दिए उससे ‘राजा‘ को अन्दर ही अन्दर महामंत्री के मिथ्या और भ्रामक संवाद से क्रोध भी आया। दूसरे दिन भरी सभा में राजा ने फरमान जारी कर दिया कि महामंत्री जो राजकीय सुख-सुविधाएँ प्रदान की गई हैं वह वापस ली जाएँ। राजा के हुक्म की तामील हुई और महामंत्री को प्रदत्त सभी राजकीय सुविधाएँ वापस ले ली गईं। दरबार बैठता है।

आज़ाद तमन्नाओं के पंख

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अपनी आज़ाद तमन्नाओं के पंख लिए उड़ चला मैं ......... उस उंचाई को छूने जिसे हिमालय कहते हैं ? न... तो आकाश कहते हैं ...?  न.... जिसे विश्वास कहते हैं .... हाँ .... आज़ादी उनके साहस का जो मर मिटे ... 47 से पहले ... जो हर पल मर मिटने पर आमादा हैं सहदों पर ... सरहदों के भीतर .... हर तरफ विकृतियों से जूझना सिखाते हैं हाँ वे रणबांकुरे ... जो आज़ादी की पल प्रति पल कीमत चुकाते हैं और मैं ..तुम ..हम सब जब ... अपना हक़ जताते हैं ... तब वे वीर बाँकुरे .... सीने पर गोलियां खाते हैं ... हिमगिरि की बर्फ में पैरों को गलाते हैं तब जब अपने स्वार्थ के लिए संसद तक रोकते हैं तब वे सीमा पर सांस रोककर सीने दुश्मन को छकाते हैं ... हाँ तब जब हम अपना ज़मीर बेचते हैं तब वो वहां सरहदों पर मर जाने की हद तक जाकर आज़ादी बचाते हैं ...

ज्योतिष की नींव पर विकसित हुआ है विज्ञान

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लेखक : श्री बी पी गौतम   ------------------------------ ------------------------ आईएएस संवर्ग में शीर्ष पर रहने वाली इरा सिंघल परिणाम घोषित होते ही देश भर में लोकप्रिय हो गईं। समाज का हर वर्ग न सिर्फ उन्हें जान गया, बल्कि इरा सिंघल को लेकर गर्वानुभूति करने लगा, इस बीच उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में यह कह दिया कि उन्हें ज्योतिष पर प्रचंड विश्वास है और उन्हें पहले से ज्ञात था कि उनका आईएएस में चयन होगा, इस के बाद वे सनातन विरोधियों और प्रगतिशीलों के निशाने पर आ गईं। कुछ लोग उनकी कड़ी आलोचना करने लगे, उन्हें पुरातन सोच का बताने लगे , साथ में ज्योतिष पर भी सवाल उठाने लगे। सवाल यह उठता है कि ज्योतिष में विश्वास करने वाला क्या पुरातन सोच का होता है? ज्योतिष विकास विरोधी है क्या ? आईएएस टॉप करने वाली इरा सिंघल और ज्योतिष की आलोचना करने वाले हाईस्कूल, इंटर , ग्रेजुएट पास और अशिक्षित लोग ज्यादा बुद्धिमान हैं क्या?, इन सब सवालों के पीछे मूल कारण ज्योतिष है, इसलिए ज्योतिष के संबंध में ही चर्चा करते हैं कि वास्तव में ज्योतिष है क्या। ज्योतिष शब्द दो शब्दों ज्योति और ईश से म

सुप्रसिद्ध सरोद वादक देबस्मिता बालभवन जबलपुर में

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देबस्मिता जी के ट्विटस बच्चों के लिए   सिटी भास्कर ने 5 अगस्त 2015 के अंक में छापी प्रमुखता से खबर     हितवाद भी पीछे न था  देबस्मिता मशहूर सरोद वादक दिनांक 5 अगस्त 2015 को   स्पिकमैके, जबलपुर चैप्टर के साथ   बालभवन के लिए किये गए साझा संकल्प के तहत बालभवन के बच्चों से मिलीं . बच्चों से मिलकर देबस्मिता का उत्साह बढ़ गया . बालभवन के बच्चों को ज़रुरत भी है ऐसे  कलाकारों से मिलने की जो ये बताएं कि उनकी कला साधना कैसे निखरी . ? मुझसे उनकी मुलाक़ात ट्वीटर पर हुई उन्हौने कहा प्रभावित हैं वे हमारे नन्हे कला साधकों से हम आभारी हैं   स्पिकमैके, जबलपुर चैप्टर  के youtube पर सुनिए देबस्मिता जी का सरोद वादन 

आज का मीडिया तेज़ और कटीला है किसी को नहीं छोड़ता

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खुद को आत्मिक संवाद के लिए अवसर देना ही चाहिए .... खुद को अगर आप ने खुद को ऐसा अवसर न दिया तो तय है कि आप स्वयं को शुचिता न दे पाएंगें .खुद को पावन करने का सबसे आसान तरीका है आत्म-विश्लेषण करने वालों को न तो किसी प्रीचर की ज़रुरत होती न ही आध्यात्म के नाम पर आडम्बर कर  रहे पाखण्ड के पुरोधाओं की .  आत्मअन्वेषण के लिए कोई चढ़ावा देना किसी का पिछलग्गू नहीं बना होता हम अगर ऐसा करते हैं तो पठित मूर्ख हैं . जन्म एक अदभुत घटना है तो तो मृत्यु उससे अनुपम उपहार . इन दौनों घटनाओं के बीच के " जीवन " को संवारने की कोशिश में हम फंस जाते हैं तिलिस्म फैलाने वालों के दुश्चक्र में . जहां धन,समय,श्रम, खर्च कर एक कल्ट में समा जाते हैं. बहुत देर बाद पता चलता है कि जिसे हमने अपने आप को शुचिता पूर्ण बनाने का दायित्व सौंपा था वो एक व्यापारी है . तो स्थिति भिन्न होती है . हम न किसी से कुछ कह पाते किसी की सुनने में भी हमको शर्मिन्दगी होती है. आज का मीडिया तेज़ और कटीला है किसी को नहीं छोड़ता न आसाराम को न राधे को सब कुछ शीघ्र साफ़ हो जाता है . तब आप जो किसी के अनुयाई होते हैं स्तब्ध और स्पीचलैस हो ज

वर्तमान की भौतिकवादी मीडिया -डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

[ इस आलेख में प्रस्तुत विचार लेखक के हैं जिसे बिना संपादित किये मूल-रूप से प्रस्तुत किया जा रहा है ]                               मीडिया जगत से जुड़े लोग कुछ उस तरह के हो गए हैं जैसे पुराने समय में एक राज्य का महामंत्री। शायद इस कहानी को अधिकाँश लोग नहीं सुने होंगे। उस कहानी का सार यहाँ प्रस्तुत करना आवश्यक हो गया है। कहानी के अनुसार उक्त राज्य में अकाल पड़ गया था प्रजा में त्राहि-त्राहि मची थी। यह बात राजा के कानो तक नहीं पहुँची थी। राजा जब भीं भरी सभा में अपने खास महामंत्री से पूछता कि बताओ राज्य की प्रजा का क्या हाल है ? तब महामंत्री उत्तर देता कि हे राजन , राज्य में दूध घी की नदियाँ बह रही हैं प्रजा खुशहाल है।                            इसके बावजूद राजा को गुप्तचरों ने राज्य में ‘ अकाल ‘ की जो विभीषिका प्रस्तुत किया उससे राजा का मन विचलित हो गया। मुलतः वह एक दिन अचानक अपने खास गुप्तचरों के साथ राज्य भ्रमण पर निकल पड़ा। हालात जो दिखाई दिए उससे ‘ राजा ‘ को अन्दर ही अन्दर महामंत्री के मिथ्या और भ्रामक संवाद से क्रोध भी आया। दूसरे दिन भरी सभा में राजा ने फरमान जारी कर दिया कि महामं

कुत्ता बन्दर से अलहदा है बॉस....!

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 कुत्ता  बन्दर  मेरी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं इन कुत्तों से न ही युधिष्टिर की तरह लगाव . कुत्ते कुत्ते हैं इंसान इंसान . बन्दर बन्दर होता है गदहा गदहा ... अब भला इन पर  अनावश्यक रूप चर्चा क्यों की जाए. पर जब बारबार ये दावे होते हैं कि कुत्ता स्वामी-भक्त होता है बात मेरे गले नहीं उतरती . इसके पीछे कई कारण हैं . उनमें से एक वाकया भी महत्वपूर्ण कारण है जो  मुझे याद आ रहा है हुआ यूं कि  .... एक बार डिंडोरी जाते वक्त शहर से निकलते ही आस्थावश मैंने नाश्ते के लिए रखे केले बंदरों को खिलाने की गरज से कार से बाहर फैंके संयोगवश एक छोटे बन्दर के हाथ केला लग गया. आसपास शक्तिशाली से दिखने वाले बंदरों नें मेरी तरफ देखा अवश्य किन्तु छोटे बन्दर के हाथ से किसी ने भी केला छीना नहीं. यात्रा जारी थी कुंडम  के पहले मेरे  मित्र साहू जी के ढाबे पर अपने घर का नाश्ता करने का मेरी नियमित अभ्यास था . साहूजी के ढाबाकर्मी ताज़ी सौंधी चाय ले आते साहूजी स्वयं मीठी बुन्देली में मुझसे बात करना नहीं चूकते . तभी दो कुत्ते नज़दीक आए बफादार सरकारी मुलाजिम की मानिद दम हिला रहे थे . हमने भी परांठे के