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मार्च, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

झल्ले की सतफ़ेरी ने खाई भांग

कार्टूनिष्ट: श्री राजेश दुबे                  होली   की रात जब झल्ले  होलिका दहन करवा के घर  लौटे तो गुलाल में इस क़दर पुते थे कि  उनकी सतफ़ेरी   तो घबरा  गईं कि जाने कौन आ घुसा घर में. फ़िर आवाज़ सुनी तब जाकर उनकी हार्ट-बीट नार्मल हुईं. नार्मल होते ही उनने सवाल किया-               खाना नै खाहौ का  .. ? न आज मेरो व्रत है.. काहे को.. ?  पूर्णिमा को ..! कौन है जा कलमुंही पूर्णिमा ज़रा हम भी तो जानें...! हमसैं जान के का करोगी मेरी जान..कैलेंडर उठाओ देख लो   वो तो देख लैहौं मनौ बताओ   व्रत पूर्णिमा को है ..!   झल्ले : हओ श्रीमति झल्ले : कर आप रये हौ..भला जा भी कौनऊ बात भई.. ?                 श्रीमति झल्ले उर्फ़ सतफ़ेरी बज़ा फ़रमा रहीं हैं. झल्ले निरुत्तर थे पर हिम्मत कर बोले -काय री भागवान तैने का भंग मसक लई.. ?                       नईं तो कल्लू तुमाए लाने पान लाए हथे आधौ हम खा गये ! बा में भांग हती का ? ओ मोरी माता अब जा होली गई होली में.         अच्छी भली छोड़ के गये थे झल्ले सतफ़ेरी को कल्लू के लाए पान ने लफ़ड़ा कर दिया   अब भांग के

" चम्मचों की वर्तमान दशा और उनकी भविष्य की दशा "

                                                                    राष्ट्रीय स्तर पर यशस्वियों की लम्बी फ़ेहरिश्त को देख कल्लू यश अर्जन के गुंताड़े में लग गये.एक दिन अल्ल सुबह कल्लू  आए बोले दादा-"नाम , नाम में का रखा है है इसे तो हम भी कमा सकते हैं..!"   हम- कमाओ नाम कमाओगे तो हम हमारा मुहल्ला , तुम्हारी चाय की दुकान , सब कछु फ़ेमस हो जाएगा कमाओ कमाओ नाम कमाओ..! कलू - दादा , एक ब्राह्मण का आशीर्वाद सुबह से मिला तो हम आज सेई काम शुरु कर देते हैं.           हम भी बुजुर्गियत भरे भाव से मुस्कुराये उधर कल्लू फ़ुर्र से गायब.                                 पता नहीं क्या हुआ कल्लू को. यूं तो आज़ कल आधे से ज़्यादा लोग खुद को सुर्खियों में देखना चाहते हैं. पर एक कल्लू ऐसा इंसान था जो वास्तव में इंसान था अब इसे कौन सा भूत सवार हुआ कि वो यशस्वी हो जाना चाहता है. हमने सोचा अब जब आएगा तो समझा देंगे कि यश अर्जित करने की लालसा को होली में डाल दो.. हमने अच्छे-अच्छों को यशासन से तिरोहित ही नहीं औंधे मुंह गिरते देखा है

मिस्टर लाल हर हाल में बेहाल

श्रीमान लाल                                 गिरीश बिल्लोरे “"मुकुल”                     मिस्टर लाल मेरे ज़ेहन में बसा वो चरित्र है जो न तो हटाए हटता न ही भगाए भागता.. हर हाल में बेहाल मिस्टर लाल   का ऐसा चरित्र था कि आप दूर से असहज हो जाएं पास आकर उनके आपको मानसिक दुबलापन महसूस होने लगता .. न न आप चिंता मत कीजिये मिस्टर लाल अब आपसे कभी न मिल पाएंगे क्योंकि वे इन दिनों लापतागंजवासी हो गये.            उफ़्फ़ ये क्या सोच लिया आपने  ? मैने कब कहा कि वो –परलोक सिधारें हैं ! अर्रे वो तो ऐसी जगह गये हैं जिसका हमको पताईच्च नईं है. जिस जगह का पता न हो वो लापतागंज ही तो कहायगा न भाई.. !      मिस्टर जाति से मानव जाति के थे जीव थे पेशे से सेवानिवृत्त अफ़सर, वृत्ति से आत्ममुग्ध, आर्थिक स्थिति वास्तव में अच्छी पर जनता के लिये दुनियां के टाप टेन ग़रीबों की सूची के पहले स्थान पर अंकित व्यक्ति थे. तो अब आप पूछेंगे कि क्या फ़ोर्ब्स की तरह ऐसी कोई किताब निकलती है जिसमें टाप- 10 ग़रीबों के नाम छपते हैं.. ? या कि फ़ोर्ब्स में ही ये नाम छापे जाते हैं..?       अब आप इस कथा को बांच रहे