मंगलवार, मार्च 7

*अनकही* 🦋women's day special


🦋 *अनकही* 🦋
*वह कहता था*
*वह सुनती थी* 
*जारी था एक खेल* 
*कहने सुनने का*
 
*खेल में थी दो पर्चियाँ*
*एक में लिखा था ‘कहो’*
*एक में लिखा था ‘सुनो’*
 
*अब यह नियति थी*
शरद कोकास 
*या महज़ संयोग*
*उसके हाथ लगती रही* 
*वही पर्ची*
*जिस पर लिखा था ‘सुनो’*
*वह सुनती रही*
 
*उसने  सुने आदेश*
*उसने सुने उपदेश*
*बन्दिशें उसके लिए थीं*
*उसके लिए थीं वर्जनाए*
*वह जानती थी* 
*कहना सुनना नहीं हैं*
*केवल हिंदी की क्रियाएं*
 
*राजा ने कहा ज़हर पियो*
*वह मीरा हो गई*
*ऋषि ने कहा पत्थर बनो*
*वह अहिल्या हो गई*
*प्रभु ने कहा घर से निकल जाओ*
*वह सीता हो गई*

*चिता से निकली चीख*
*किन्हीं कानों ने नहीं सुनी*
*वह सती हो गई*
 
*घुटती रही उसकी फरियाद*
*अटके रहे उसके शब्द* 
*सिले रहे उसके होंठ*
*रुन्धा रहा उसका गला*
 
*उसके हाथ कभी नहीं लगी*
*वह पर्ची*
*जिस पर लिखा था - ‘ कहो* ’

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2 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन - अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

Sudha Devrani ने कहा…

वाह !!!
लाजवाब..... बेहतरीन.....
हाँँ शायद उसके हाथ कहो वाली पर्ची नही लगी ।
हाँ वह आज्ञा का पालन करती रह गयी हमेशा अभी तक....
सार्थक प्रस्तुति।
http://eknayisochblog.blogspot.in