14.1.24

राम राज्य की परिकल्पना परंतु राम के प्रतीकों से घृणा...?

(इस आर्टिकल में प्रस्तुत समस्त रेखाचित्र डा रेणु पांडे एवम् श्री अरुण कांत पांडे द्वारा बनाए गए हैं)
 आश्चर्य होता है जब कोई केवल राम राज्य की स्थापना चाहते हैं किंतु राम के प्रतीकों को स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोगों को राम के प्रति घृणा भी है।
   महात्मा गांधी ने रामराज्य की परिकल्पना की थी। रामराज्य का अभिप्राय *राज्य में संपूर्ण जड़ चेतन की शुचिता एवं जीवन दर्शन की पवित्रता* से है। 
  रामराज्य व्यापार, वाणिज्य, राजनीति, परिवार समाज और राष्ट्र के संपूर्ण स्वरूप में पवित्रता का समावेशन दृष्टि गोचर होता है।
 
   रामराज्य में किसी प्रकार की विषमता , भेद की दृष्टि से देखने एवं किसी भी प्रकार से वर्ण भेद को प्रश्रय देने की सुविधा नहीं होती है।
  कुछ दिन पूर्व सुप्रसिद्ध पत्रकार आशुतोष यह कह रहे थे कि- "मनुष्य को भगवान कैसे माना जा सकता है राम को या तो मानव कहो या भगवान।"
   शायद श्री आशुतोष ने अद्वैत को समझा ही नहीं। अद्वैत का प्रथम अक्षर *अ* भी आशुतोष को समझ में न आ सका। 
मेरी दृष्टि में यह आशुतोष जी के मानसिक पर्यावरण का विषय है उसे पर ज्यादा टिप्पणी करना ठीक नहीं।
 इस युग में तर्कवादी लोग एक मंतव्य की रचना करते हैं, फिर अपनी मंतव्य को जबरदस्ती स्थापित करने के लिए प्रयास किया करते हैं।
  जिसका दुष्परिणाम होता है कि साधारण लोग भ्रमित हो जाते हैं।    
 यह प्रक्रिया आज से नहीं बल्कि #बख्तियार_खिलजी और उसके बाद #विंस्टन_चर्चिल ने प्रारंभ कर दी थी ।
फिर इस प्रक्रिया को आज तक पश्चात कई विद्वानों ने आगे बढ़ाया और आज भी नकारात्मक मंतव्य अर्थात नैरेटिव स्थापित करने की प्रक्रिया जारी है। 
  इस युग के ऐसे विद्वानों पर एक कहावत -"बहुतै पंडित सत्यानाशी" सटीक बैठती है।
   आप सब जानिए कि -"अखंड भारत में एकात्मता के सिद्धांत को आत्मसात करने की क्षमता भारतीय जीवन दर्शन ने दी है।"
*मेरे मित्र श्री दीपक द्विवेदी जो पेशे से शिक्षाविद हैं कहते हैं कि - "महात्मा बुद्ध ने भारतीय जीवन दर्शन को पंख लगा कर विश्व में स्थापित कर दिया।"
  अर्थात सत्य अहिंसा और चैतन्य सामाजिक समरसता एकात्मता के मूल्य की वैश्विक रूप से स्थापना में योगदान महात्मा गौतम बुद्ध का ही रहा है।
 परिस्थितिवश भारतीय सामाजिक संरचना में - यवन कुशन हूण मुगल, पाश्चात्य संस्कृतियों का प्रवेश राजनीतिक क्रमश: होता रहा है।
 एक लंबी गुलामी के पश्चात उपनिवेशवाद के दौर में आम जनता के जीवन पर जितना नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, उससे यह साबित होता है कि औपनिवेशिक काल कष्टदाई समय था। 


मुगल साम्राज्य में विशेष रूप से बाबर  हुमायूँ,  अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब, के कार्यकाल में भारतीय सांस्कृतिक निरंतर को बेहद नुकसान पहुंचा था।
भले हम हारते रहे परंतु हमारी भावनाएं एवं रचना धर्मिता जैसे भक्ति आंदोलन रामचरितमानस का लेखन जैसे कार्य इसी दौर में हुए हैं।
  अंतिम मुगल बहादुर शाह ज़फ़र  के पश्चात भारत यूरोपीय उपनिवेश बन गया और इस दौर में भारत की एथेनिक पहचान समाप्त करने की कोशिश है । 
   खैर स्थिति भारतीय जन मन से, तथा संपूर्ण भारत से श्रीराम एवं श्रीकृष्ण को कोई भी पृथक नहीं कर सका ।
नव बौद्ध मतावलंबियों द्वारा भी बेहद प्रयास किए गए परंतु सांस्कृतिक विरासत पर बहुत अधिक नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा।
मित्रों मालूम पड़ता है कि -"भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता से भारत को अलग करने के उद्देश्य से राम और कृष्ण को इतिहास से गायब करने की भी कोशिश की गई है।" 
अगर आप प्राचीन इतिहास को तो आपको नजर आएगा कि - विश्व की कई सभ्यताएं समाप्त हो गई परंतु भारतीय एथेनिक कंटिन्यूटी अभी भी अस्तित्व में है..! है न..!
 इस कारण ही हमने  कल्चरल एवं एथेनिक कंटिन्यूटी को बचाए रख सके।
 वास्तव में  "हमारी सामाजिक व्यवस्था देशकाल स्थिति के साथ अनुकूलित हो जाती है।"
 अकबर के कालखंड में महात्मा तुलसी का जन्म हुआ, और उन्होंने रामचरितमानस की रचना भी की। कवि का उद्देश्य था भारतीय सामाजिक व्यवस्था को प्राचीनतम ऐतिहासिक विवरणों पर आधारित सामाजिक दर्शन अर्थात सोशल फिलासफी के मापदंडों के साथ बचाए रखा जाए।
    उदाहरण के तौर पर विश्व बंधुत्व की दृष्टिकोण की संपूर्ण व्याख्या रामचरित मानस में है। 
   भाइयों के बीच अथवा रक्त संबंधियों के बीच कैसा रिश्ता होगा ? 
  इसकी पुष्टि केवल रामायण करती है इसके अतिरिक्त विश्व में किसी भी साहित्य में राम के अनुज लक्ष्मण शत्रुघ्न एवं भरत जैसे कोई चरित्र नजर नहीं आते । यदि आप ऐसे किसी चरित्र को पहचानते हैं या आपने पढ़ा है तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए।
 यही प्रतीक है जिसे अतिवादी लोग अस्वीकृत करते हैं....अपने राजनैतिक लाभों के लिए राम राज्य की कल्पना और उसका सम्मान भी करते नजर आते हैं परंतु राम के प्रतीकों से घृणा करते हैं। है न कंट्रोवर्सीयल फैक्ट। 
राम राज्य में महर्षि जाबाली जो नास्तिक धर्म को मानते थे का भी सम्मान था।
   राम जननायक भी थे, 
 टीवी एंकर आशुतोष ने जो सवाल उठाया है कि उन्हें हम श्रीराम भगवान क्यों कहते हैं..?
आप समझ गए होंगे कि - उनने भारत की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि का अनुमान नहीं लगाया। 
हम उन सबको भगवान मानते हैं जो हमारे मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण है।
सनातन यह मानता है कि ब्रह्म कण-कण में व्याप्त है। जबकि आशुतोष जैसे व्यक्ति और कुछ विचारधाराए यह मानती हैं कि - "सब कुछ ब्रह्म के अधीन है"
  भारत कभी इस बात को स्वीकार नहीं करता कि वे लोग जो यह कहते हैं की सब कुछ ब्रह्म के अधीन है गलत कह रहे हैं। उन्हें भी पर्याप्त सम्मान के भाव से हम भारतीय देखते हैं।
यदि आशुतोष यह कह रहे हैं कि आदि और अंत जिसका निश्चित है वह ही पुरुष होता है यानि जीव होता है मैं सहमत हूं आप सब भी सहमत होंगे। 
  परंतु अगर हम बिंदु बिंदु को ब्रह्म मानते हैं तो आशुतोष तनाव किस कारण महसूस करते हैं?
कुल मिलाकर राजाधिराज श्री राम इतिहास पुरुष थे और श्री कृष्ण भी भारतीय इतिहास का अभिन्न भाग थे।
   अति विद्वान जनों से उम्मीद करता हूं कि अनावश्यक भारतीय एकात्मता को भंग करने की कोशिश न की जाए ।
  भारत विविधताओं में एकात्मकता का प्रमाण था है और रहेगा राम राज्य की कल्पना और गांधी के संकल्प के साथ थे है और रहेंगे तब फिर राम कृष्ण के प्रतीकों श्री दुराग्रह छोड़ दीजिए न..!
#भगवान #श्रीराम #राममंदिर #अयोध्या #रामराज #रामराज्य #भारतीय #सामाजिक_दर्शन 

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