सोमवार, जून 13

भारत में शिक्षा प्रोडक्ट है ?

         चित्र : गूगल से साभार
   महानगरों एवं मध्यम दर्जे के शहरों में शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब दृश्य देखने को मिल रहा है। स्कूलों में बच्चे नियमित विद्यार्थी के तौर पर केवल एडमिशन करा लेते हैं परंतु शिक्षा के लिए पूर्ण रूप से कोचिंग संस्थानों पर निर्भर करते हैं। कोचिंग संस्थानों की औसतन मासिक थी शिक्षण संस्थानों से दुगनी अथवा तीन गुनी भी होती है।
   शिक्षण संस्थानों ने भी परिस्थितियों से समझौता का कर लिया है। अभिभावक इस बात को लेकर कंफ्यूज रहते हैं कि - बच्चे को विद्यार्थी के रूप में शिक्षण संस्थानों पर निर्भर करना चाहिए अथवा कोचिंग क्लासेस पर...?
   यह एक अघोषित सा समझौता है इसमें कुछ विद्यालयों को डमी विद्यालय के रूप में चिन्हित किया जाता है। ऐसे विद्यालयों में बच्चे केवल एडमिशन लेते हैं परंतु नियमित शैक्षणिक गतिविधियों में भाग नहीं लेते।
   एक अभिभावक से पूछा गया कि भाई आप बच्चों की कोचिंग के लिए इतना अधीर क्यों है और किन कारणों से आप आवश्यकता से अधिक पैसा खर्च करने के लिए तैयार हैं? 
  *एक ओर आप* स्कूल की फीस भी दे रहे हैं दूसरी ओर आप नियमित शैक्षिक गतिविधि के लिए बच्चे को कोचिंग क्लास में भेज रहे हैं?
  अभिभावक ने पूरे कॉन्फिडेंस के साथ कहा कि-" जितनी अच्छी पढ़ाई कोचिंग क्लास में होती है उतनी बेहतर पढ़ाई स्कूलों में नहीं होती। '
  Socio-economic विचारक के रूप में मेरा सोचना उस अभिभावक से कुछ अलग है। वास्तव में अभिभावक पूरी तरह से सम्मोहित हैं। वे कोचिंग संस्थानों के मायाजाल में इस कदर फंसे हुए हैं कि उनका भरोसा शैक्षिक संस्थानों से  लगभग उठ गया है।
   कोचिंग संस्थानों की उपयोगिता को व्यक्तिगत तौर पर मैं नकार नहीं रहा हूं परंतु वह स्कूल का एकमात्र सटीक विकल्प है इस मुद्दे से फिलहाल मैं सहमत नहीं हूं।
  परंपरागत शिक्षा संस्थानों अर्थात स्कूलों को लेकर इन दिनों एक और जबरदस्त ओपिनियन सामने आता है। लोगों का यह मानना है कि सरकारी स्कूल अथवा हिंदी मीडियम से चलने वाले सरकारी और गैर सरकारी विद्यालय महत्वहीन है। महत्वपूर्ण विद्यालय तो केवल अंग्रेजी माध्यम से संचालित स्कूल ही होते हैं।
  ऐसी स्थिति को देखते हुए लगता है कि सामाजिक आर्थिक परिदृश्य में शिक्षा भी स्टेटस सिंबल का एक बिंदु है। बेहतर स्कूल उन्हें माना जाता है जहां अंग्रेजी में बात की जाती है अंग्रेजी में पढ़ाया जाता है और यह समस्त हिंदी माध्यम के स्कूल जो सरकार अथवा निजी प्रबंधन द्वारा चलाए जाते हैं हिंदी बच्चों का पढ़ना दोयम दर्जे का प्रतीक है। अक्सर हम सुनते हैं अंग्रेजी माध्यम के शिक्षा  स्कूलों की सर्वोत्तम होती है नव धनाढ्य उच्च मध्यम वर्ग यहां तक की मध्यम मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग भी येन केन प्रकारेण ऐसे स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिंबल के रूप में प्रदर्शित करते नजर आते हैं। कुल मिलाकर शैक्षणिक व्यवस्था में कोचिंग क्लास अति महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
    परंपरागत शैक्षणिक संस्थानों की भविष्य की स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा आप सहज ही लगा सकते हैं।
   बचपन में हम अपने पिता के साथ ट्रांसफर हुआ करते थे। एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होने वाले अभिभावकों के बच्चे भी उसी तरह से ट्रांसफर हो जाते थे । मुझे अच्छी तरह से याद है पिताजी का ट्रांसफर नई रेलवे प्रोजेक्ट सिंगरौली कटनी प्रोजेक्ट में हुआ था। सरई ग्राम रेलवे स्टेशन पर पदस्थ हुए मेरे पिताजी और हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसे स्कूल में हुई जहां शिक्षक के लिए कुर्सी  स्कूल के कमरे में मिट्टी के चबूतरे नुमा ठोस निर्माण कर बनाई गई थी। हम लकड़ी की तख्ती पर कलम से घुली हुई छुई मिट्टी लिखा करते थे। दफ्ती पर लिखने से मेरी गंदी लिखावट अपेक्षाकृत आकर्षक हो गई। उन दिनों नीति शिक्षा या नैतिक शिक्षा फिजिकल एक्सरसाइज अर्थात व्यायाम स्वच्छता सभ्यता पूर्ण व्यवहार पर विशेष ध्यान दिया जाता था। हम लोग टाट पट्टी पर बैठा करते थे। हमारी टीचर बहुत सुंदर तरीके से लाल नीली और हरे रंग की स्याही से अपने रजिस्टर्स में जो भी लिखते मोतियों की तरह आज भी आंखों के सामने आते हैं। स्कूल में बागवानी रुई की पोनी तकली में फंसा कर सूत कातने की कला हमें ऐसे ही स्कूलों से हासिल हुई। स्कूलों में बागवानी के कालखंड में मैंने भी धनिया और मिर्च के पौधे लगाए थे। प्रकृति से बिल्कुल करीब रहने का अभ्यास स्कूलों में कराया जाता था। प्रकृति से प्रेम का संस्कार वर्तमान नजरिए से  पिछड़े स्कूलों से ही प्राप्त हुआ है।
  अभिभावकों का बदला हुआ चिंतन, इन दिनों बच्चों की अपरिमित चिंता करना एवं शिक्षा जैसे मुद्दे को स्टेटस सिंबल के रूप में चिन्हित करने पर केंद्रित हो गया है।
    कुछ वर्ष पूर्व  कटनी ई में पदस्थ आईएएस दंपत्ति ने अपनी बेटी को आंगनवाड़ी केंद्र में भेजना प्रारंभ किया। आईएएस दंपत्ति श्री पंकज जैन एवं श्रीमती जैन ने अपने इस कार्य के जरिए समाज को यह संदेश देने की कोशिश की थी कि शासकीय फॉर्मेट पर चलने वाले संस्थान विकास के मूल बिंदु हो सकते हैं। उनके इस प्रयास से संदेश स्पष्ट एवं समाज में प्रभाव छोड़ने वाला सिद्ध हुआ। कलेक्ट्रेट के नजदीक संचालित आंगनवाड़ी केंद्र में अभी भी अधिकारियों के बच्चे जाते हैं।
  बाल शिक्षा एवं उनका समग्र विकास के लिए किए गए प्रयास एवं उनके रास्ते बुनियादी तौर पर बेहद दबाव युक्त नहीं होना चाहिए। पिछले दिनों आपने प्रशासनिक सेवाओं के लिए चुने गए बच्चों का परिवारिक बैकग्राउंड देखा होगा। कई ऐसे बच्चे हैं जो निम्न मध्यम वर्ग से अथवा बहुत गरीब परिवार से भी है और उन्होंने आईएएस का एग्जाम क्रैक किया। परंतु कई ऐसे बच्चे भी हैं जो संपन्नता के बावजूद भी अपने लक्ष्य तक पहुंच ही नहीं पाते। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में व्यवसायिक रंग रोगन जिम्मेदार  है ही परंतु उससे ज्यादा जिम्मेदारी मेरी नजर में अभिभावकों की है।
   मुझे अच्छी तरह से याद है अपनी बेटी के लिए मैंने इंदौर महानगर के महाविद्यालयों में पतासाजी की। बेटी को कॉमर्स में ऑनर्स डिग्री लेनी थी यह उसका अपना फैसला था। एक  कॉलेज प्रबंधन द्वारा मुझे मुझे यह कहकर प्रभावित करने की कोशिश की गई कि हमारे महाविद्यालय में अमिताभ बच्चन के चिरंजीव अभिषेक बच्चन भी आते हैं । मैंने एडमिशन एग्जीक्यूटिव से प्रश्न किया कि आप शिक्षा के लिए विद्यार्थियों का चयन कर रहे हैं या अपने महाविद्यालय में किसी प्रोडक्ट की तरह शिक्षा को बेचना चाहते हैं? हम सपरिवार उस महाविद्यालय से बाहर आने लगे महाविद्यालय के प्रबंधक तथा एडमिशन एग्जीक्यूटिव ने बाहर आकर हमें मनाने की कोशिश की परंतु मेरा मन उनकी मान मनुहार से प्रभावित नहीं हुआ। एक अभिभावक के रूप में हो सकता है कि बहुत सारे लोग मुझे बैकवर्ड समझे परंतु मेरी दृष्टि में मेरा निर्णय सही था। क्योंकि अगले महाविद्यालय में हमने बच्चों से विश्व आर्थिक परिदृश्य पर चर्चा की। बहुत प्रभावित हुआ कि बच्चे अंतरराष्ट्रीय भुगतान संतुलन मौद्रिक प्रणाली जीडीपी,  विश्व अर्थशास्त्र में भारत की परिस्थिति जैसे मुद्दों की जानकारी रखते हैं। कुल मिलाकर अभिभावक किसी भी प्रकार की चकाचौंध से बचकर स्वयं रहें और किसी भी शैक्षणिक ऐन्द्रजाल में ना फंसे तब जाकर शैक्षिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आ सकता है। सरकार कितनी भी बेहतर व्यवस्था ला दे परंतु व्यवस्था के प्रति अभिभावकों की अरुचि शैक्षणिक व्यवस्था को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेंगी। मेरे इन विचारों से आप असहमत हो सकते हैं आपकी असहमति भी सहमति के बराबर महत्वपूर्ण है।

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