गुरुवार, जून 2

मध्यमवर्गीय अभिभावक अब मुझे रेसकोर्स के जुआरी लगने लगे हैं..!


“मध्यमवर्गीय अभिभावक अब मुझे रेसकोर्स के जुआरी लगने लगे हैं..!”

गिरीश बिल्लोरे”मुकुल”

girishbillore@gmail.com

 

"भारत का मध्य वर्ग मध्यवर्ग के बच्चे बच्चों से मध्यवर्गीय माता पिता जी अंत ही उम्मीदें..!"- अब तक ना समझ में आने वाला प्रमेय यानी साध्य है। इस प्रमेय को हल करने के लिए बस बच्चों को पढ़ाने के पहले बच्चों को पढ़ लीजिए।

कोविड-19 के 2 साल पहले की बात है यानी 2017 की। एक मां इस समस्या से तनावग्रस्त स्थिति उनके बच्चे उनके अन्य रक्त संबंधियों के बच्चों के बराबर योग्यता नहीं रखते। और उन्हें यह भी तनाव था कि वे बच्चों पर जो इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं उस इन्वेस्टमेंट के अनुपात में उन्हें उपलब्धि कुछ हासिल नहीं हो रही। वह अपने दोनों बच्चों को मेरे द्वारा प्रबंधित संस्थान ने दाखिला कराने की गरज से आई। महिला ने बताया कि-" मेरे बच्चे अपने चचेरे भाई बहनों से कमजोर हैं, वे हर फील्ड में अव्वल हैं... पर हमारे बच्चे कभी एक भी मैडल या पुरस्कार तक नहीं जीत पाते.

उस मां की अवसाद भरी अभिव्यक्ति के बाद मुझे स्वयं आश्चर्य हुआ कि इतने नन्हे मुन्ने बच्चों से सोचे-समझे ऐसी उम्मीदें रखी जा रही हैं , जिन पर बच्चे  खरे न उतरें ? तब ऐसी स्थिति में परिणाम बहुत सकारात्मक नहीं होंगे।
  एक अच्छे अभिभावक को चाहिए कि सबसे पहले बच्चे की योग्यता और क्षमताओं का अनुमान लगाएं। परंतु दुर्भाग्य है कि इन दिनों अभिभावक केवल सपना देखते हैं यथार्थ से शायद ही परिचित हों । विकास का एक सबसे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है प्रतिस्पर्धा। भारत में हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा श्रेष्ठ से श्रेष्ठ स्तर को प्राप्त करें। जब मेरे बच्चे छोटे थे तब कई बार मुझे पैरंट टीचर मीटिंग बुलाया गया।
मेरे मित्र परिवार भी अक्सर पूछा करते थे - "भाई आप क्यों नहीं जाते इस मीटिंग में?
  मैं जानता था कि रिपोर्ट कार्ड में क्या आना है ! बच्चों की क्षमता और इनकी योग्यता को भली प्रकार समझने की क्षमता मुझ में थी। बच्चों के कम अंक आने पर मुझे कोई एतराज ना था। हां यह अवश्य कहता था जो भी पढ़ो पूरी तन्मयता के साथ पढ़ो।
मुझे परिजनों से फटकार भी मिलती थी। परंतु मैं जानता था की अनावश्यक दबाव डालना बहुत घातक होगा। हां एक बार बच्चे की अनुपस्थिति में अपने मित्र और संस्थान के प्राचार्य एवं प्रशासक से मिला अवश्य था। उनसे मैंने साफगोई से कह दिया था -"मुझे बच्चों के भविष्य की चिंता है इसलिए मैं उन पर किसी भी तरह के मानसिक दबाव से परहेज करता हूं।"
   इससे पहले कि वे मेरे बच्चे की कमजोरियां गिनाते मैंने उनकी इस कोशिश के दरवाजे ही बंद कर दिया। पर चलते चलते यह अवश्य कहा था-"हां बेटियों को समझाने का प्रयास जरूर करूंगा कि वह अपने प्रयासों में कभी कमी ना छोड़ें।
हुआ भी है औसत विद्यार्थी के रूप में बच्चों का रिजल्ट देखना मुझे ना गवारा नहीं गुजरता। अपने मन में प्रतिस्पर्धा का भाव लाना एक बौद्धिक संघर्ष को जन्म देता। और उस संघर्ष से बचने के लिए मेरा प्रयास था कि बच्चों पर अनाधिकृत दबाव पैदा ना किया जाए।
मेरी बेटी ने मुझे नवमी क्लास में ही बता दिया था ..."मुझे साइंस नहीं पढ़ना है आप मुझे बातें तो नहीं करोगे?
मैंने प्रति प्रश्न किया-"क्या तुम महसूस करती हो कि मैं ऐसा करूंगा?"
    प्रश्न और प्रतिप्रश्न का परिणाम पारस्परिक विश्वास में परिणित हो गया। दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद मुझे भी यह समझाया गया-"बेटी को समझाओ, वह साइंस ले..!
   इस समझा इसको मैंने किसी भी प्रकार की बहस में ना बदल कर "जी अवश्य समझा लूंगा"जैसे वाक्य के जरिए समाप्त कर दिया।
   इससे पहले कि आप बच्चे क्या पढ़ें निर्धारित करने की कोशिश करते हैं पहले बच्चे को पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। वरना बदहवास मां की तरह आप स्वयं भी परेशान होंगे बच्चों को भी परेशान करेंगे ।
    बाल मन को टॉर्चर करना, उसे श्रेष्ठ होने के लिए बाध्य करना एक मनोरोग है। प्रत्येक प्राणी कुछ विशेषताओं के साथ जन्म लेता है।
अभिभावक के रूप में अगर जरूरत है तो उस बच्चे के विशेष गुण को पहचानने की । परंतु भारत का मध्यमवर्गीय अभिभावक समूह औसत रूप से ऐसा नहीं करता । बहुदा अभिभावक अपनी संतान को प्रतिस्पर्धी विजेता आना चाहता है।
मेरी दृष्टि में ऐसे अभिभावक रेस कोर्स में घोड़ों पर पैसा लगाने वाली जुआरी से अधिक कुछ भी नहीं आते।
   आप तो मैंने बात शुरू की थी उस मासूम और कन्फ्यूज्ड माता की जो अपने बच्चों से उम्मीद से ज्यादा उम्मीदें पाल कर रखती थी। बच्चों के लिए सपने जरूर अच्छे देख रही थी परंतु बच्चों का बचपन बुरी तरह छीनने पर आमदा थी। वह चाहती थी कि उनके बच्चे इसलिए श्रेष्ठ बने हर मोर्चे पर सफल हो ! ऐसा होने से उस मां और उसके पति का सम्मान बढ़ता सामाजिक पृष्ठभूमि में उन्हें रेखांकित किया जाता हताशा केवल इसी बात की थी। पर इसका परिणाम क्या होता है इस बात का अंदाज आप कोटा में घठित हाल की घटना लगा सकते हैं। कोटा में कोचिंग क्लास में पढ़ने वाली एक बालिका कृति ने अपने सुसाइड नोट में जो लिखा वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है-
"मैं भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से कहना चाहती हूं कि अगर वो चाहते हैं कि कोई बच्चा न मरे तो जितनी जल्दी हो सके इन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दें,
ये कोचिंग छात्रों को खोखला कर देते हैं।
पढ़ने का इतना दबाव होता है कि बच्चे बोझ तले दब जाते हैं।
कृति ने लिखा है कि वो कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाईड करने से रोकने में सफल हुई लेकिन खुद को नहीं रोक सकी।"
  अत्यधिक मानसिक दबाव बाल मन पर विपरीत प्रभाव डालता है। बच्चों की इच्छा के विरुद्ध कुछ भी करने से पहले हमें उसकी क्षमता का मूल्यांकन कर लेना चाहिए। वह बदहवास मां जो मेरे संस्थान में अपने बच्चों का दाखिला कराने आईं थी उनसे मैंने पूछा कभी आपने बच्चों की रुचि जानने की कोशिश की?
उस मां ने मुझे बैकवर्ड समझा और कहा क्या आप जानती नहीं दुनिया कहां जा रही है?
मैंने पूछा क्या आप जानती हैं दुनिया कहां तक चली गई है? और जहां तक चली गई है ?
    बातों बातों में पता चला कि बच्चे का सुबह से शाम 8:00 बजे तक का समय कोचिंग ट्यूशन स्कूल में खपता है। दोपहर बाद 3:00 से 4:00 का समय वे बच्चों को गीत संगीत चित्रकला इत्यादि में डालना चाहती थी। बच्चों के चेहरे पर भयानक किस्म का निस्तेज और मायूसी मुझे नज़र आ रही थी। मैंने खुलकर उनसे कहा-"मुझे लगता है कि मैं आपके बच्चों को आपसे ज्यादा प्यार करने लगा हूं, इसलिए चाहता हूं कि आप इनका बचपन वापस लौटाने की कोशिश करें। पहले इन बच्चों को पढ़ें की इनके अंदर कौन सी योग्यता है कौन सी विशेषता है जिसे हम उभार सकते हैं। अगर आप मुझे ऐसा करने में सहयोग देंगी तो आप का मैं स्वागत करता हूं। वरना कृपया अपने बच्चों को रोबोट ना बनने दें मैं उनको आराम करने के लिए अवसर देने की सलाह दूंगा। कुल-मिलाकर मुझे, बच्चों का कल दिख रहा था जो भयावह की तरफ मोड़ा जा रहा था।
  बच्चों की मां ने बताया कि वह प्रतिवर्ष दोनों बच्चों पर ₹200000 खर्च करती हैं। यह सुनते ही वह मां साथ ही उसका परिवार मुझे रेस कोर्स के घोड़े और जाॅकी पर पैसा लगाने वाले कुछ नजर नहीं आ रहे थे ।

 

  


 

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