सिनेमा के स्वर्णिम युग में मूँगफली का अवदान : के के नायकर

सिनेमा के कलाकार तब देवतुल्य होते थे। उनका आभामंडल बहुत विशाल होता। प्रेमनाथ जबलपुर आते तो अक्सर चाहने वालों से घिरे होते। एक बार मानस भवन में उनसे भेंट हुई। गोपीकृष्ण के नृत्य का कार्यक्रम था। पद्मा खन्ना भी आई हुई थीं। कार्यक्रम के बाद औपचारिक भेंट हुई। मैंने उनसे पूछा, "आपकी अगली फिल्म कौन-सी आ रही है?" उन्होंने इनकार में सिर हिलाया और अपनी भारी- भरकम आवाज में कहा, " बाबू! उम्र हो गयी है। अब हीरो की मार खाने वाले सीन में उठने में बहुत देर लग जाती है। बहुत से शॉट खराब हो जाते हैं।" यह उनसे मेरी पहली और आखिरी मुलाकात थी। यों 'एम्पायर' में वे कभी-कभार दिख जाते थे। वहाँ क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में भी लगती थीं और तमिल फिल्में देखने अक्सर अम्मा जाया करती थीं।

अम्मा अड़ोस-पड़ोस की किसी महिला के साथ सिनेमा जाने की योजना बनातीं, तो अपन किसी कुशल जासूस की तरह समूची योजना के तह में पहुँच जाते। उन्हें योजना के 'लीक' हो जाने की भनक भी नहीं लग पाती। अपन बिल्कुल ठीक समय पर जाकर चुंगी चौकी में कहीं छिपकर खड़े हो जाते। जैसे ही अम्मा का रिक्शा गुजरता रिक्शे के पीछे-पीछे दौड़ लगाने लगते और सिनेमा हॉल पहुँचकर ऐन टिकिट लेने से पहले प्रकट हो जाते। अम्मा अचंभित हो जातीं। गुस्सा भी करतीं। कोई विकल्प लेकिन बाकी नहीं रह जाता था। इतनी दूर अकेले बच्चे को वापस भी नहीं भेजा जा सकता था। मजबूरी में उन्हें अपनी टिकिट भी खरीदनी पड़ती और सिनेमा देखने का सुख हासिल हो जाता। सिनेमा देखना उन दिनों सबसे बड़ा सुख हुआ करता था।

सिनेमा हॉल में काम करने वाले मैनेजर, ऑपरेटर, बुकिंग क्लर्क, गेट कीपर और यहाँ तक कि सायकिल स्टैंड और कैंटीन में काम करने वाले कर्मचारियों की भी तब समाज में बड़ी इज्जत होती थी। कोई बुकिंग क्लर्क या गेट कीपर किसी के घर आ जाएं तो शाम को पूरे मोहल्ले में यह खबर 'वायरल' हो जाती थी और मेजबान दो-चार दिनों तक सीना तानकर घूमता था। लोग इनसे जबरदस्ती ताल्लुक बनाने के फेर में होते। चलते-पुर्जे किस्म के इंसान मौका मिलने पर जबरदस्ती टिकिट  खिड़की  के पास पहुँच जाते और अपना चेहरा दिखाकर पूछते कि, " बड़े भाई! आपके लिए चाय भिजवा दें?" जवाब इनकार में मिलता तो भी वे हिम्मत नहीं हारते। कहते, "अच्छा तो पान ही खा लें..अब देखिए मना नहीं करना।"  वे उनकी खिदमत में चाय, पान, गुटखा, सिगरेट कुछ न कुछ पेश करके ही दम लेते। दो-चार बार यह सिलसिला दोहराने पर मेल-मुलाकात का कोई न कोई सिलसिला बन ही जाता था। सारी कवायद का एकमात्र उद्देश्य यह होता था कि जब कोई हिट सिनेमा लगे और उसकी टिकिट हासिल करने में पसीने छूट जाएँ तो उनकी थोड़ी-बहुत मदद ली जा सके। तब एमपी-एमएलए की टिकिट हासिल करने में भी वैसी मारामारी नहीं होती थी, जैसी सिनेमा की टिकिट हासिल करने में। 

थर्ड क्लास की टिकिट सात-आठ आने में मिल जाया करती थी। इतने पैसों का जुगाड़ भी तब मुश्किल से होता था। सिनेमा जाना हो तो पैदल ही जाना पड़ता था। साइकिल लेने पर दोहरा खर्च था। एक तो साइकिल का किराया फिर साइकिल स्टैंड का। और कहीं सीट कवर वगैरह चोरी हो गया तो एक और मुसीबत अलग से। जिनकी साइकिल स्टैंड वालों से थोड़ी-बहुत जान पहचान होती, वे बड़े इसरार के साथ कहते कि "बड्डे, जरा सही जगह में लगवा दो।" सही जगह में लगवाने का मतलब यह होता कि एक तो कोई सामान चोरी न हो और दूसरे शो खत्म होने के बाद उसे निकालने में जरा आसानी रहे। सिनेमा छूटने के बाद स्टैंड से साइकिल निकालना तब बहुत बहादुरी का काम हुआ करता था।

सिनेमा देखने की कार्रवाई शो से डेढ़-दो घण्टे पहले ही शुरू हो जाती थी। थिएटर पहुँचने के बाद सबसे पहले पोस्टर देखने का चलन था। कभी-कभी पोस्टर देखना सिनेमा देखने से भी भला लगता था। जब सिनेमा में ठीक वही पोस्टर वाला दृश्य आता तो असीम आनन्द की अनुभूति होती। कोई सखा साथ होता तो दोनों बेसाख्ता कह उठते, "अबे! वोई वाला सीन है बे!" एक पोस्टर अलग बक्से में "आगामी आकर्षण" वाला होता था। बक्से के आगे काँच और उसके आगे अमूमन एक लोहे की जाली लगी होती थी। पोस्टर देखते-देखते नज़र मार ली जाती की कहीं टिकिट वाली लाइन लंबी तो नहीं हुई जा रही है। दो या अधिक लोग साथ होने पर एक व्यक्ति लाइन पर मुस्तैद खड़ा होता और बाकी पोस्टर देखते। लाइन पर लगे जवान को बाद में छोड़ा जाता। कभी-कभी जब उसकी पोस्टर देखने की बारी नहीं आ पाती तो वह आसमान सिर पर उठा लेता और कहता, "याद रखना! अगली दफे तुम लोग लाइन में लगोगे।"

 सिनेमा हॉल के मालिक के पास कुछ छँटे हुए दादा किस्म के लोग पाए जाते थे। इनके पास टिकिट की लाइन ठीक रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती थी। वे इस काम को इतनी गम्भीरता से अंजाम देते थे गोया विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उन्हें कोरोना की वैक्सीन बाँटने की जिम्मेदारी सौंप रखी हो। वे इतने गम्भीर होते थे कि उनके चेहरे तनाव से खिंचे होते थे, देह ऐंठी हुई होती थी और जरा-सी बात पर भी वे बिफर उठते थे। लेकिन जैसे उद्योग-धंधों में सेफ्टी- ऑर्गेनाइजेशन सिर्फ प्रवचन दे सकता है, कोई कार्रवाई नहीं कर सकता, वैसे ही इनके हाथ भी बंधे हुए होते। कोई नई और हिट फिल्म लगती तो पुलिस वालों को तलब किया जाता था। फ़िल्म "मुझे जीने दो" की याद मुझे बहुत अच्छे से है। अभी लाइन में लगे ही थे कि बारिश शुरू हो गई। उन दिनों आंधी-तूफान आने, बिजली गिर जाने या भूकम्प के झटके आने पर भी सिनेमा की लाइन से हट जाने का रिवाज नहीं था। अपन डटे हुए थे। एक रंगदार बार-बार आता और लाइन में लगे टिकिटार्थियों को चमका जाता। लोगों ने सोचा कि वह सिनेमा वालों का आदमी होगा। थोड़ी देर बाद वह नज़र बचाकर लाइन में घुस गया। पीछे किसी ने ताड़ लिया। उसने इतनी जोर से हल्ला मचाया गोया नई-नवेली दुल्हन के जेवरात लुटे जा रहे हों। बाकी लोग भी समर्थन में आ गए। पुलिस मौका-ए-वारदात पर मौजूद थी। बारिश बढ़ गयी थी। पुलिस वालों ने "निकल स्साले!" कहते हुए छाते से ही उसकी पिटाई कर दी। किसी ने पीछे से त्वरित टिप्पणी की, "और घुस ले बेट्टा!" वह खिसियाया हुआ बाहर निकला और फिर हँसने लगा। तब इस तरह की पिटाई का कोई बुरा नहीं मानता था। कब, कौन, किस बात पर पिट जाए; इसकी कोई गारंटी नहीं होती थी। कहते है कि एक बार तो एक महापौर ही सिनेमा की लाइन में पिट गए थे। पुराने साथी इस वाकये के बारे में जानते होंगे। वे पहलवान के नाम से मशहूर थे। एक तो नेताजी ऊपर से पहलवान। शहर में उनकी धाक थी। शहर के लोग उन्हें जानते थे और उनका रुआब सिनेमा की लाइन में भी चल जाता था। लेकिन सिनेमा सिर्फ शहर के लोग नहीं देखते! गाँव से कुछ नवयुवक आए हुए थे। नेताजी ने अपना रुआब दिखाया तो युवकों ने उन्हें ही तबीयत से कूट दिया। वे बेचारे क्या जानते थे कि कुटने वाला शख्स कौन है?

लाइन में सबसे पीछे खड़ा होने वाला शख्स, दुनिया का सबसे बदनसीब इंसान होता। एक-एक पल उसके लिए बहुत भारी होता था।  उसे लगता था कि वह एक जगह जम गया है, उसके पैरों तले जड़ें उग आई हैं और सामने वाले लोग हैं कि सरक ही नहीं रहे हैं। उजड्ड बारातियों वाली भीड़ में लड़की के बाप की तरह दयनीय होकर वह अपना मुँह लटकाए रखता। इस बीच कोई भला आदमी आता और उसे ढाढ़स बँधा जाता कि इंसान की तरह लाइन भी नश्वर है और उसे कभी न कभी खत्म होना ही है। कोई इंसान कुछ ज्यादा ही भला हुआ तो अपने ठोंगे से उसे एक-दो मूंगफलियां ऑफर कर देता। लाइन में लगा दुखियारा उससे पूछ बैठता, "भैया! आपकी टिकिट हो गयी है?" वह अपनी आँखों से 'हाँ' का इशारा करता और इस तरह गर्व के साथ सीना तानकर आगे बढ़ जाता जैसे कॉमन वेल्थ गेम्स में गोल्ड लेकर आ रहे हों। कभी-कभी जब लाइन अचानक बहुत तेजी से सरकने लगती तो दुखियारे इंसान की आँखों मे चमक आ जाती। उसे लगता कि दुनिया में देर है, पर अंधेर नहीं है। आँखों की यह चमक और चेहरे की मुस्कान बहुत थोड़ी देर रह पाती जब उसे पता चलता कि लाइन इसलिए जल्द सरक रही थी क्योंकि खिड़की बन्द हो गई। थोड़ा शोर होता। 'ब्लैक मार्केटिंग" के लिए सिनेमा वालों को गाली दी जाती। कुछ खिसियाए मुँह घर लौट जाते और कुछ 'ब्लैक' में टिकिट लेकर अंदर चले जाते। दुखियारा इंसान बुदबुदाता नज़र आता, "घोर कलजुग है भाई!"

टिकिट हासिल कर लेने के बाद हॉल के अंदर प्रवेश करने में बड़ी हड़बड़ी होती थी। अंधेरी जगह होने के कारण कुछ सूझता नहीं था। दर्शक नया हुआ तो थर्ड क्लास की टिकिट लेकर फर्स्ट क्लास के गेट में पहुँच जाता और गेट कीपर की डाँट खाता। हड़बड़ी एक तो इसलिए होती कि सीट ठीक-ठाक मिल जाए और दूसरे न्यूज रील भी छूटनी नहीं चाहिए। विज्ञापन भी नहीं। हालाँकि विज्ञापन तब कम ही होते थे। स्थानीय विज्ञापनों के लिए स्लाइड का इस्तेमाल किया जाता था, जो दो तरीकों से बनती थी। एक, फोटोग्राफी वाली तकनीक में नेगेटिव के इस्तेमाल से और दूसरी, खालिस देसी पद्धति से काँच के सहारे। काँच की एक प्लेट में चूना पोत दिया जाता और पेंटिंग के ब्रश की उल्टी तरफ से चूने को खुरचकर अक्षर लिखे जाते थे। रंगों के प्रभाव के लिए रंगीन पन्नियों का इस्तेमाल किया जाता था। ये स्लाइड अक्सर इंटरवेल के बाद फ़िल्म शुरू होने से पहले चलाए जाते थे। दर्शकगण इन्हें भी देखने से नहीं चूकना चाहते थे। तब चीजें दुर्लभ थीं, तो जिज्ञासाएं बहुत हुआ करती थीं। अब जिज्ञासाएं शांत करने की प्रवृत्ति पर तकनीक हावी है तो बच्चे खोज-बीन के स्वाभाविक लुत्फ से वंचित हो गए लगते हैं।अंदर हॉल में लगे पँखे हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट के साथ चलते थे। इस बात का पता इंटरवेल में चलता था। जैसे ही इंटरवेल होता, फेरीवाले खटाक से अंदर चले आते। उन्हें कोई रोक-टोक नहीं होती थी। समाज में अवसरों का सम्मानजनक बँटवारा था। अब इंटरवेल में चने बेचने का काम भी सिनेमा का मालिक ही करता है। हॉल के दरवाजे पर 'स्वागतम' की जगह वह निहायत ही बेशर्मी के साथ एक फूहड़ तख्ती लटकाए रखता है, जिसमें लिखा होता है, "आउटसाइड फुड इस नॉट अलाउड।" 

एसी वगैरह के चोचले तब नहीं थे। सिनेमा खत्म होता तो हॉल से निकलने वाले दर्शक भीड़ में भी अलग से पहचाने जा सकते थे। कपड़ों का बुरा हाल होता। गर्मियों के दिनों में लोग हाथों में रुमाल घुमाते हुए बाहर निकलते। फिर भी फ़िल्म अच्छी हुई तो चेहरे से नूर टपकता था। फ़िल्म अगर रोने-धोने वाली रही हो तो महिलाओं के चेहरे देखते ही बनते। रुमाल उनके भी हाथों में होते पर उसका प्रयोजन भिन्न होता। थर्ड क्लास में अक्सर कुर्सियों के बदले लम्बी बेंच होती थी तो कुछ लोग सोने के पाक इरादे से ही थिएटर चले आते थे। यह सुविधा फ़िल्म के उतरने से कुछ पहले हासिल होती थी। कटनी के एक सिनेमा हॉल में अपन कोई फ़िल्म देख रहे थे। सेकंड शो। फ़िल्म खत्म हो गई पर सामने की बेंच में एक सज्जन बदस्तूर सोए पड़े थे। मैंने झिंझोड़कर उठाना चाहा, पर कोई प्रतिक्रिया हासिल नहीं हुई। बगल में बैठे एक सज्जन ने उन्हें जोरों की लात लगाई। वे हड़बड़ाकर उठे और बड़ी मासूमियत से पूछा, "अच्छा! फ़िल्म खत्म हो गयी क्या?"

सेंट्रल टॉकीज मिलौनीगंज में थी। सेंट्रल' और 'लक्ष्मी' टॉकीज को उन दिनों खटमल टॉकीज भी कहा जाता था। घरों में भी खटमलों की आपूर्ति यहीं से होती थी। घर मे कोई खटमल दिख जाए तो सिनेमा देखकर आने वाले को दोषी माना जाता। खटिया तब रस्सी वाली होती थी और वे उसमें आसानी से छुप जाते थे। कार्यक्रम के सिलसिले में जब कभी इंदौर जाना होता, अपना बड़ा बुरा हाल होता। वहाँ अपने मित्र हीरालाल जी के यहाँ ठहरना होता। वे श्वेताम्बर जैन हैं। उनके यहाँ जीव हत्या वर्जित है। खटमल उनके यहाँ टैंक की तरह धावा बोलते थे। एकाध बार जवाबी हमला करने की कोशिश की तो हीरालाल कहते, "जीव हैं। उनका राशन कार्ड नहीं बनता। रहने दो।"  इंदौर वाला इंतकाम मैं जबलपुर में लेता। 'खटमल टॉकीज' से लौटने के बाद अगले दिन खटिया बाहर निकाल दी जाती। उसे डंडों से पीटा जाता और गर्म पानी डाला जाता। उन दिनों एक गाना भी चलता था, "धीरे से जाना खटियन में, रे खटमल..।"

बहरहाल, 'सेंट्रल' में  एक बड़ा मजेदार वाकया हुआ। फ़िल्म में घोड़ों वाला एक दृश्य था। घोड़े साधारण नहीं थे। उनके पास पँख थे। वे उड़ने वाले सफेद घोड़े थे। जब वे उड़ने लगे तो दृश्य बड़ा मनोरम था। सफेद-सफेद रुई जैसे बादलों में सफेद घोड़े कभी गुम हो जाते, कभी नज़र आने लगते। ऐसा लग रहा था कि उनकी उड़ान से पर्दा भी हिल रहा है। अद्भुत समाँ बंध गया था। पर्दा सचमुच हिल रहा था। लेकिन वह तब भी हिलता रहा जब घोड़ों वाला दृश्य खत्म हो गया। यह करामात असली घोड़े की थी। टॉकीज के मालिक अपने घोड़े को पर्दे के पीछे बाँधकर रखते थे। उस दिन घोड़े का पैर फँस गया था और वह अपने पैर निकालने के लिए पर्दे को झटकार रहा था। दर्शकों ने सोचा, यह फ़िल्म का 'स्पेशल इफ़ेक्ट' है।

'मुग़ले-आजम' वाले एक दृश्य ने तो और भी गज़ब ढा दिया था। बादशाह 'अनारकली' से उसकी आखिरी ख्वाहिश पूछते हैं। 'अनारकली' एक दिन के लिए हिंदुस्तान की मलिका बनना चाहती है। बादशाह हिकारत से कहते हैं, "आखिर दिल की बात जुबान पर आ ही गई।" अनारकली कहती है, "वायदा शहजादे ने किया था। मैं नहीं चाहती कि हिंदुस्तान का होने वाला बादशाह झूठा कहलाए।" फिर वह मशहूर डायलॉग होता है, "अनारकली! सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे।" तो तय यह होता है कि अनारकली सलीम को रुखसत से पहले बेहोशी का लखलखा सुंघाएगी। गाना शुरू हो गया है-

 "जब  रात  है  ऐसी  मतवाली
तो सुब्ह का आलम क्या होगा।"

इधर हुआ यह कि अपन इंटरवल में एक किलो अँगूर खरीद लाए थे। बड़े-बड़े और रसीले। फ़िल्म का आनन्द लेते हुए इत्मीनान से एक-एक अँगूर आहिस्ता-आहिस्ता खाया जा रहा था। हॉल बाहर के मौसम की तुलना में जरा सुकूनदेह था। साथ में घना अंधकार। पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार और मधुबाला की लाजवाब अदाकारी। नौशाद साहब का मादक संगीत। माहौल का असर...!! उधर अनारकली ने सलीम को बेहोशी की दवा सुंघा दी है। होश खोने से पहले सलीम को नशा-सा आ रहा है। सीन इतना जबरदस्त है कि मुझे लगा कि मुझे भी नशा आ रहा है। सलीम के साथ -साथ मैं भी झूमने लगा हूँ। यह अद्भुत है! अपने तार शहजादे सलीम के साथ जुड़ गए हैं। क्या यह टेलीपैथी है? जब तक अनारकली को दीवार पर चुनवाया जाता, अपन को समझ में आ गया था कि सारी गड़बड़ किलो भर अँगूर भकोसने की वजह से हुई है। अँगूर ने अपना कमाल दिखा दिया था और उसी दिन अपन को समझ में आया कि शराब को "अँगूर की बेटी" क्यों कहा जाता है। फ़िल्म खत्म हो चुकी थी पर अपन से कुर्सी से उठा नहीं जा रहा था।

अंग्रेजी फिल्मों का जलवा भी कुछ कम न था। अंग्रेजी फिल्मों की एक खासियत यह होती थी कि उनके नाम हिंदी में होते थे। हिंदी में उनके नाम तय करने के लिए सिनेमा हॉल वालों के पास एक रिसर्च टीम हुआ करती थी जो बड़ी मेहनत के साथ इंग्लिश फ़िल्म के लिए हिंदी नाम ढूँढ कर लाती थी। अक्सर इस नाम का मूल नाम से कोई लेना -देना नहीं होता था पर वह हमेशा बड़ा फड़कता हुआ-सा होता था। अंग्रेजी फ़िल्म की दूसरी खासियत यह होती थी कि इसके हीरो-हीरोइन के नाम भी हिंदी में होते थे। सिनेमा देखकर लौटे नौजवान से जब पूछा जाता कि हीरोइन का नाम क्या था, तो जवाब इस तरह मिलता: "पहले भी तो आई है, बड्डे! अपन ने होली में देखी थी न! उसमें जो हीरोइन थी, वही है।" अंग्रेजी फ़िल्म की तीसरी खासियत यह होती थी कि इसकी समीक्षा या प्रशंसा भी हिंदी में की जाती थी। फ़िल्म देखने के बाद किसी के भी मुँह से "इट वाज अ नाइस मूवी ऑफकोर्स" नहीं फूटता था। हर कोई यही कहता, "गज़ब की फ़िल्म थी गुरु! एकदम धाँसू!" अंग्रेजी फ़िल्म देखकर आने वाले कभी भी उसे खराब नहीं कहते थे। यह ज्यादातर 'डिलाइट' में लगती थी या 'एम्पायर' में। 'डिलाइट' वाली फिल्में चालू किस्म की होती थीं और 'एम्पायर' वाली क्लासिक। मैंने अपने कार्यक्रम "इंग्लिश पिक्चर का ट्रेलर" इन्हीं दो सिनेमा हॉल में किए गए ऑब्जर्वेशन के आधार पर तैयार किया था। एक मिमिक्री आर्टिस्ट के रूप में अपना यह कार्यक्रम मुझे बेहद पसंद है। यह दुनिया भर की आवाजों का खेल है और ये बगैर किसी अंतराल के एक के बाद एक बदलती चली जाती हैं।

आखिर में एक पुराने किस्म की कहानी, जो इतनी नई है कि आपने कभी भी नहीं सुनी होगी। हुआ यूँ कि 'भोलाराम का जीव' जब इस दुनिया से उस दुनिया की यात्रा में था तो अचानक दूतों की पकड़ से छूटकर भाग गया। दूतों ने उन्हें एक गठरी में बांध रखा था। जीव की तलाश में दूत मारे-मारे फिर रहे थे। जीव कहीं नहीं मिला तो वे समय काटने के लिए एक सिनेमा हॉल में घुस गए। हाथ में मूँगफली का एक ठोंगा भी था। दूत भले आदमी थे। अंधेरे में अगल-बगल के लोगों को भी मूँगफली के दाने खिलाए। लौटकर आए तो देखा भोलाराम का जीव गठरी में विराजमान है। दूतों को बहुत आश्चर्य हुआ। पूछने पर मालूम हुआ कि हॉल में जिन लोगों को उन्होंने मूँगफली की पेशकश की थी, उनमें से एक भोलाराम भी था। भोलाराम ने इससे पहले अपने जीवन में कभी भी मूँगफली खाते हुए सिनेमा नहीं देखा था।

मूँगफली नामक अन्न की उत्पत्ति हिंदी सिनेमा के चलते ही हुई होगी। हिंदी सिनेमा का रसपान मूँगफली की सहायक-सामग्री के बगैर मुमकिन नहीं था। सेकंड शो के बाद जब थर्ड-क्लास से बाहर निकलना होता था तो नीचे फर्श पर मूँगफली के छिलकों की कालीन बिछी होती थी। उन दिनों आजकल की तरह मैनेजमेंट के कोर्स नहीं होते थे, अन्यथा "सिनेमा हॉल में छिलका प्रबंधन" जैसा कोई शोध जरूर हुआ होता। यह भी पता लगाया जाता कि मूँगफली की सकल वार्षिक पैदावार का कितना हिस्सा सिनेमा हॉल में खपता है और मुल्क की जीडीपी में इसका क्या योगदान है। मूँगफली हमेशा टिकिट लेने के बाद या इंटरवेल में खरीदी जाती थी। अगर पहले से ले ली और टिकिट न मिले तो वह बेकाम, बेस्वाद होकर रह जाती। कुछ कमीने किस्म के दोस्त ऐसे भी होते जो मूँगफली का ठोंगा लाकर भी उसे छिपाए रखते थे। वे दायीं ओर होते तो उसे दायीं जेब में रखते और बायीं ओर होने पर बायीं जेब में। छिलका इतनी सफाई से उतारते कि जरा भी आवाज न हो। पकड़े जाने पर सफाई देते हुए कहते, "भाई खतम हो गयी थी, बस पचासई ग्राम मिली।" बाकी मौकों पर एक गुप्त समझौते के तहत मूँगफली के दाने टूँगने का अवसर उसे ही अधिक देने का चलन था, जो मूँगफली खरीद कर लाता था। इस समझौते का उल्लंघन करने वाले के हाथों में ठोंगे के साथ काले नमक की पुड़िया थमा दी जाती थी, जिससे उसकी गति स्वाभावतः भंग हो जाती। इनकार करने वाले को यह ताना सुनना पड़ता, "अब हम खरीद कर लाए हैं..तुम जरा सा पकड़ भी नहीं सकते!"

"हिंदी सिनेमा और मूँगफली" की कथा में बहुत से आयाम हैं। लोग अपने-अपने अनुभवों के आधार पर इस कथावली को समृद्ध कर सकते हैं। हालाँकि मुझे याद नहीं पड़ता कि हिंदी सिनेमा वालों ने कभी इनका नोटिस लिया हो। "द पीनट वेंडर" नामक एक क्यूबन गाना अलबत्ता पूरी दुनिया में बड़ा मशहूर हुआ जिसे कोई डेढ़ सौ से भी ज्यादा बार रेकॉर्ड किया जा चुका है। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दिनों के आनन्द में मूँगफली के अवदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन दिनों चार आने की मूँगफली के साथ सिनेमा देखने में जो आनन्द था, वह अब सौ रुपये के 'पॉपकॉर्न' में नहीं मिलता!

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