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अक्तूबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मृत्यु से बड़ी शांति कभी नही

जन्म से अद्भुत घटना कोई नहीं मृत्यु से बड़ी शांति कभी नही ।। माँ से महान कोई भी नहीं- पिता से बड़ी छाँह कहीं नहीं ।। ☺️☺️☺️☺️☺️☺️ मुझे शांति की तलाश है मुझे महानता की तलाश है  जो मां के पास है मुझे उस बोधि वृक्ष की तलाश है जो पिता  के अस्तित्व का एहसास कराती है  । मित्रों आप सब के विचार जाने आप की सहमति स्नेह से पगी  है । इस पोस्ट में जीवन का सत्य अनुभवों और विचार विमर्श से हासिल हुआ है । सच भी यही है जब मां की महानता की बात आती है तो पता चलता है की मां हाड़ मांस सब कुछ देख कर 9 महीने तक खुद तपस्विनी सी मुझे गलती है गर्भ एक आराधना स्थल है जहां छिपाकर मां ने मेरा निर्माण किया है । सोचो समझो तो पता चलता है कि मेरे अनुकूल माने आहार तैयार किया है जिसे अमृत से कम नहीं समझा जाना चाहिए । सारे माई के लाल ऐसे ही जन्म लेते हैं । हाल में आपको कसाब वाली घटना याद होगी जब आतंकियों से मां ने बात की थी तो पूछा था बेटा तुमने कुछ खाया कि नहीं यहां आतंकियों के पीछे की तारीफ नहीं कर रहा हूं पर उसकी मां ने जो उसकी भूखे रहने की चिंता की उस पर चकित हूं आप भी जब घर में नहीं होते अपनी मां को कॉल की

दुर्गा भैया और हम

बहुत दिनों से बार्बर शॉप पर नहीं जा पाया था । जाता भी कैसे वक्त नहीं मिला दाढ़ी पर रेजर चलाया और बाल सफाचट । इस तरह आधी अधूरी सभ्यता वाली छवि और फीलिंग लेकर अपने आप में खुश था किंतु आज तो तय ही कर लिया था कि हमें बाल कटाना ही है । बाल ना कटा था रामलीला वाले पक्के में रीछ वाला रोल दे देते और फिर आप तो जानते हैं कि अपन ठहरे आग्रह के कच्चे सच में बहुत कच्चे हैं हम आग्रह के कम अक्ल साहित्यकार ठहरे । रामलीला वाले बुलाते तुझे आना ही पड़ता ठीक वैसे ही जैसे घर के दरवाजे पर कोई मित्र आता है और पुकारता काय चल रहे हो का....? रसल चौक मुन्ना कने पान खाएंगे  ?अंदर से अपन लगाते आवाज काय नईं आ रये ज़रा रुको तौ । घर में कितना भी जरूरी काम हो निकल पड़ते थे ठीक उसी तरह रामलीला वाले अगर बुलाते काय रीछ का रोल करोगे ? पक्का हम चले जाते सो हमने सोचा चलो ऐंसो कोई ऑफर न आये कटिंग करा आंय । तो हम चुनावी ड्यूटी निपटा के सीधे जा पहुंचे सीधे दादा की दुकान पर यह तस्वीर में नजर आ रहे हैं अपने दुर्गा भैया हैं । मिलनसार व्यक्ति इस बार हमने है जाते ही कहा :- दुर्गा भैया आज तो चाय पिएंगे ! भैया ने बताया कि आसपास की

MeToo Vs To me By Girish Billore

मी टू बनाम टू मी मी टू कैंपेन से असहमत को बिल्कुल नहीं हूं असहमति की कोई वजह भी नहीं होनी चाहिए मी टू कैंपेन इन बरसों से दबी हुई एक आवाज है देर से ही सामने आ रही है जहां तक सवाल है इसके दुरुपयोग होने का तो मेरा कहना यह है यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया है कोई भी ऐसे अवसर नहीं छोड़ता अगर वह बुद्धिमान समझदार और पूर्वाग्रह ही ना हो । अगर कोई किसी को कमजोर महसूस करता है तो निश्चित तौर पर उसकी कोशिश होती है कि कभी ना कभी अपनी बात को अभिव्यक्त कर दी और उसे अवसर मिलना ही चाहिए । समाज की परिस्थितियां अगर बेहद आदर्श होती तो ऐसी स्थिति उत्पन्न ही ना होती लेकिन माया नगरी मुंबई की कहानी ही गजब है पेज 3 पर स्वयं को एक्स्पोज़र दिलाने वाली इस कम्युनिटी जिसे केवल और केवल अपनी सेलिब्रिटी इमेज को मेंटेन करने के लिए अनिच्छा से ही सही खूबसूरत दिखना होता है मुस्कुराना होता है और अपने आप को एंटरटेनमेंट प्रोडक्ट बनाए रखने की कोशिश सतत जारी रहती है । यह मीडिया ही है जो उनके कपड़े उन पर केंद्रित गाशिप को हवा देता है । और उसी से प्रेरित होकर लोग यह समझते हैं कि माया नगरी में सब कुछ आसान है वैसे होता भी है कास

Me to Vs To me By Zaheer Ansari

बदनामी पर उतारु मुन्नियां............. कई साल पहले एक फ़िल्म का गाना बड़ा लोकप्रिय हुआ था। ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए’ तब मुन्नी बदनाम हुई थी अब मुन्नियाँ बदनाम कर रही हैं। मुन्नियों ने सालों बाद अपनी चिकनी चुपड़ी त्वचा से झुर्रियों की परत उकेर कर दिखाना शुरू कर दिया है कि किस-किस ने, कब-कब उनकी मलाई सी मख़मली चमड़ी का स्पर्शस्वाद लिया था। कमाल इस बात है कि मुन्नियों को बरसों पुरानी घटना अब याद आ रही है जब उनकी चमड़ी में भट्ट पड़ गई है। बड़ा ही अजीब दस्तूर निकाला है इन मुन्नियों ने। ख़ुद तो आउट आफ डेट हो चुकी हैं फिर भी एक्सपायरी डेट की बोर्डेर पर खड़े मुन्नाओं की चड्डी पब्लिकलि उतार रही हैं। ‘मी टू केम्पेन’ क्या चला मुन्नियाँ अपना नाम दैहिक शोषण की दौड़ में शामिल कराने दौड़ पड़ीं और मुन्नाओं का नाम उजागर करने लगी। दस, पंद्रह, बीस साल बाद इस तरह का पर्दाफाश होना आश्चर्यचकित करने वाला है। पब्लिक को इतने सालों के बाद यह बताया जा रहा है कि फ़लाँ मुन्ना ने दैहिक शोषण किया था। मुन्नियाँ यह नहीं बता रहीं कि दैहिक शोषण के ज़रिए उन्होंने क्या-क्या लाभ उस वक़्त उठाया था। मुन्नाओ

पीठासीन अधिकारी का दर्द

🙂🙂🙂🙂🙂🙂 बहुत दिनों पहले चुनाव की ड्यूटी में जब मैं एक गांव में पहुंचा तो वहां पीठासीन अधिकारी के रूप में तैनात व्यक्ति मुझे बहुत तनाव में दिखे । मेरे पहुंचते ही वे चुनाव आयोग का सारा गुस्सा मुझ पर उतारने लगे बतौर सेक्टर इंचार्ज की हैसियत से तो मैं उनके इस व्यवहार को कठोरता के साथ सही ठिकाने पर ले आता लेकिन मैंने सोचा कि जरा इन्हें सबक सिखाया जाए ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे . केवल प्रायोगिक तौर पर मैं उनसे बड़े संजीदा होकर बात करने लगा उनसे पूछा कि भाई साहब आप किस ओहदे पर हैं उन्होंने बताया कि वे केंद्र सरकार के "..." विभाग में सीनियर अकाउंट्स ऑफीसर हैं . अपनी तारीफों के पुल बांधते हुए प्रिसाइडिंग ऑफिसर श्री अमुक जी ने बताया - " कि उनका वेतनमान बहुत बड़ा है ये कलेक्टर कुछ समझते नहीं कहीं भी ड्यूटी लगा देते हैं । पीठासीन अधिकारी बताया कि उनके वेतनमान के अनुसार उन्हें काम देना चाहिए' निर्वाचन आयोग ने उन्हें पीठासीन अधिकारी बना दिया क्योंकि बहुत हल्का काम समझा गया उनके द्वारा . तभी उनके मुंह से यह बात भी निकली साहब कोटवार नहीं आया उन ने यह भी कह

उपलब्धियों भरा रहा ये माह बालभवन जबलपुर के लिए

कला, नृत्य एवं आध्यात्म की त्रिवेणी बनारस के घाटों पर इन दिनों चर्चा का विषय है- एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा बनारस में 800 दिनों के लिए घाट संध्या कार्यक्रम का आयोजन तय किया है, जिसमें देश के महान कलाकार सुनाम धन्य प्रतिष्ठित कलाकार प्रस्तुति देते हैं . इस क्रम में बालभवन के दो बालकलाकार को आमत्रण मिला . हुआ यूँ कि  यूट्यूब मौजूद सन्मार्ग एवं संकल्प परांजपे के वीडियो से प्रभावित होकर आयोजन समिति द्वारा इन बाल कलाकारों को आमंत्रित किया तथा इन्हें 30 सितंबर एवं 1 अक्टूबर 2018 को प्रस्तुति देने का अवसर दिया गया. यह प्रस्तुतियां आयोजन के 605वें दिन हुई और 606वें दिन बनारस के अस्सी घाट पर संपन्न हुई. बाल भवन जबलपुर के दो बाल कलाकारों ने काशी के घाट पर होने वाली घाट संध्या में अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाना जबलपुर के लिए गौरव की बात है. गुरु मोती शिवहरे के मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त कर रहे कथक नृत्य साधक संकल्प और सन्मार्ग परांजपे के पिता संदीप परांजपे और माता श्रीमती किरण परांजपे ने इन दोनों बच्चों को कथक साधना में पारंगत करने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है. संकल्प परांजपे एवं

युवा भतीजे ने माना भारतीय प्रजातंत्र :सबसे आदर्श व्यवस्था ।

यूट्यूब लिंक :- https://youtu.be/6Koyg0Jubhg श्वेता सिंह से तारिक फतह की बातचीत सुनिए और देखिए पाकिस्तान की असली तस्वीर ।  यहां तारिक फतह की हर एक बात सच्ची और साफगोई से बयां हो रही है । कायदे आजम पर उनका कथन भारत में विविधताओं का सिंक्रोनाइजेशन भाषाई संस्कृति विविधता के बावजूद धार्मिक परिस्थितियों के अलग-अलग होने के बावजूद संपूर्ण भारत किस तरह से एकीकृत है । तारिक फतेह का इतिहास अगर आप जानते होंगे तो यह भी जानते होंगे कि यह एक ऐसा विचारक है जिसकी बुनियाद पवित्र वामपंथी रही है । युवावस्था में तारिक फतह ने अपने जीवन की चिंतन को समतामूलक समाज की विचारधारा से सिंक्रोनाइज किया । तारिक फतेह एक सतत अध्ययन शील व्यक्तित्व के धनी है उनको पसंद करने वालों की भारत में संख्या पाकिस्तान की आबादी से जाता है मैं खुद भी दक्षिण एशियाई मामलों के अध्ययन में पाता हूं कि तारिक फतेह एक ऐसी शख्सियत है अगर उन्हें सही अवसर मिली तो निश्चित तौर पर पाकिस्तान को अच्छा डेमोक्रेटिक राष्ट्र बनाने में सबसे बड़ा योगदान देंगे किंतु पाकिस्तान की डेमोक्रेसी प्रों मिलिट्री डेमोक्रेसी है आज ही मेरा भतीजा चिन्मय जो प

2018 में एक बार फिर मिसफिट ब्लॉग को मिला हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लॉग का दर्ज़ा ..!

2018 में एक बार फिर मिसफिट ब्लॉग को   मिला हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लॉग का दर्ज़ा ..! आप सब के आशीर्वाद से तथा विश्व की असीम अनुकंपा से भारतवर्ष के श्रेष्ठ 125 हिंदी चिट्ठाकारों में मेरा ब्लॉग शामिल है । स्नेही जन जाने के अंतरजाल पर मुझ तक पहुंचने वाली और मुझे पढ़ने वाली लोगों की संख्या 1000000 से भी अधिक हो चुकी है । जिनमें मेरा सबसे लोकप्रिय ब्लॉग है मिसफिट जिसकी रीडरशिप 470000 से अधिक है जो मुझे ब्लॉग सूची में शामिल कराता है इस ब्लॉग को भारत यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका तथा   वर्तमान में सिंगापुर में सबसे ज्यादा पढ़ा जा रहा है हिंदी चिट्ठाकारी का उद्देश्य गूगल अथवा अंतरजाल को हिंदी की शब्दावली वाक्य विन्यास से इतना परिचित करा देना है जिससे विश्व के किसी भी भाषा से हिंदी अथवा हिंदी से उस भाषा में अनुवाद सहजता से हो सके तथा अधिकतम कंटेंट हिंदी में अंतरजाल पर मौजूद रहे । मैं 2007 से हिंदी चिट्ठाकार कारिता से जुड़ा हुआ हूं तब हमें ब्लॉग लिखने की प्रक्रिया में बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था । तब यूनिकोड की आमद नहीं हुई थी । उस दौर से लगातार आज तक हम सभी अंतरजाल पर लिखन