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मई, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नाट्यलोक एवम बालभवन के नाटकों पोट्रेट्स एवम गणपति बप्पा का मंचन

संभागीय बालभवन जबलपुर एवम नाट्यलोक द्वारा तैयार नाटक *गणपति बप्पा मोरया*  एवम *पोट्रेट्स* नाटकों का मंचन दिनाँक 3 जून से 4 जून 2018 तक  नाट्य समारोह में किया जावेगा । सम्भागीय बालभवन जबलपुर द्वारा 1 अप्रैल 2018 से 30 मई 2018 तक बालभवन एवम जानकीरमण महाविद्यालय में निरंतर हुई कार्यशाला में इन नाटकों का निर्माण किया गया है । नाटकों में डॉ शिप्रा सुल्लेरे के निर्देशन में म्यूज़िक पिट द्वारा लाइव संगीत का अनूठा प्रयोग माना जा रहा है । श्री संजय गर्ग द्वारा निर्देशित दौनों नाटकों का लेखन क्रमशः संजय गर्ग एवम गिरीश बिल्लोरे मुकुल ने किया । जबकि सह निर्देशिकाओं कुमारी मनीषा तिवारी ( पूर्व छात्रा बालभवन ) एवम कु शालिनी अहिरवार ( पूर्व छात्रा बालभवन ), कलात्मक सपोर्ट सुश्री शैलजा सुल्लेरे  कुमारी रेशम ठाकुर ( पूर्व छात्रा बालभवन ) श्री दविंदर सिंह ग्रोवर , इंद्र कुमार पांडेय, रविंद्र मुरहार सहित बालभवन एवम नाट्यलोक के कलाकारों का विशेष एवम उल्लेखनीय योगदान रहा है *विस्तृत कार्यक्रम* *आयोजन स्थल :- श्री जानकीरमण महाविद्यालय जबलपुर* *दिनाँक 3 जून 2018 :- गणपति बप्पा मोरया लेखक / निर्देशक श्

यादों का कोई सिलेबस नहीं होता

यादों का कोई सिलेबस नहीं होता 😊😊😊😊😊😊😊😊 सच है यादें जीवन के अध्ययन के लिए ज़रूरी हैं पर इनका कोई पाठ्यक्रम तय नहीं होता । जब भी आतीं हैं कुछ न कुछ सिखा जनतीं हैं । कोई तयशुदा पाठ्यक्रम कहाँ है इनका । परीक्षाएं अवश्य ही होतीं हैं । पेपर भी हल करता हूँ । पास भी होता हूँ फेल भी । चलीं आतीं हैं पिछले दरवाज़ों से और कभी स्तब्ध करतीं हैं तो कभी हतप्रभ कब तक ज़ेहन में रुकतीं हैं किसी को मालूम नहीं होता । 1984 में डी एन जैन कॉलेज में स्व राजमती दिवाकर ऐसी प्राध्यापक थीं कि स्लीपर पहन के भी आ जातीं थीं कॉलेज में ..  साधारण से लिबास रहने वाली में  शारदा माँ मुझे वादविवाद प्रतियोगिताओं में बहस के मुद्दों को समझातीं और विपक्ष को कैसे नेस्तनाबूद करना चाहिए बतातीं भी थीं । उन दिनों कॉलेजों में जितनी भीड़ वाद विवाद प्रतियोगिताओं को सुनने जमा होती थीं आजकल उससे एक तिहाई बच्चे भी जमा नहीं हो पाते होंगे । अख़बार भी समाचार पूरे रिफरेंस के साथ छापा करते थे कुछ ऐसे - "लगातार तीसरी बार पन्नालाल बलदुआ ट्रॉफी डीएनजैन ने जीती" या अमुक के तर्क न काट पाने से फलाँ कॉलेज ने कब्जाई ट्रॉफी वक्

अच्छी काली नागिनें : सटायर

तुम थे तो कुछ बात थी नहीं हो तो अब बात कुछ और है । कोई हो न हो बात तो रहेगी । बात ही तो रहती है यादों के गलियारों में तस्वीरों की तरह चस्पा रहे भी क्यों न ? मरने के बाद में क़ीमत बताने का क्या कोई तरीका भी तो नहीं । इन दिनों जिस तरह का एनवायरमेंट इर्दगिर्द है उसमें कमीनगी का परसेंटेज अपेक्षाकृत ज़्यादा है । जबलपुर की ठेठ भाषा में बोलूं तो हरामी टाइप के जीवों की भरमार  चप्पे चप्पे पर रेंगते नज़र आएंगे । मित्रो मेरी अंतिम सलाह है कि बुद्ध की तरह माफ करना अब गैरज़रूरी है । अब चाणक्य की तरह गला काट के मंगवा लो तो आप सहजता से जी पाओगे । पर मुआ साहित्यकार जो बरसों से कुंडली मार कर बैठा है न मुझे ऐसा नहीं करने देगा । एक नागिन की कहानी याद आई सुनोगे तो सुनो एक नागिन थी अच्छी काली नागिन घर के एक हिस्से में फंस गई घर मालकिन ने उसे जतन से निकाला और हूत हूत करके डंडा बजा के भगा दिया । कुछ दिन बाद फिर चूहे खाने की गरज से उसी घर में घुसी नागिन ने एक बार भी मुरव्वत न की मालकिन के अनजाने में पैर पड़ते ही ज़हर उगलने लगी मित्रो आध्यात्मिक चिंतन के अभाव में यह सब हो रहा है अधिकतर आत्माऐं  नागिन ह