सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

नवंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ब्राह्मणों के विरुद्ध अभियान को उमेश सिंह का उत्तर

           मैं ब्राह्मण नही हूँ। कल एक वामी satya Raja मेरी पोस्ट पर ब्राह्मण के खिलाफ गालियां लिख रहा था। उस मनहूस को ये पोस्ट समर्पित करता हूँ। सवर्णों में एक जाति आती है ब्राह्मण, जिस पर सदियों से राक्षस, पिशाच, दैत्य, यवन, मुगल, अंग्रेज, कांग्रेस, सपा, बसपा, वामपंथी, भाजपा, सभी राजनीतिक पार्टियाँ, विभिन्न जातियाँ आक्रमण करते आ रहे हैं। आरोप ये लगे कि ~ब्राह्मणों ने जाति का बँटवारा किया। उत्तर - सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद जो अपौरुषेय है और जिसका संकलन वेद व्यास जी ने किया, जो मल्लाहिन के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। 18 पुराण, महाभारत, गीता सब व्यास जी रचित है जिसमें वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था दी गयी है। रचनाकार व्यास ब्राह्मण जाति से नही थे। ऐसे ही कालीदास आदि कई कवि जो वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था के पक्षधर थे जन्मजात ब्राह्मण नहीं थे। अब मेरा प्रश्न उस satya raja के लिए कोई एक भी ग्रन्थ का नाम बताओ जिसमें जाति व्यवस्था लिखी गयी हो और उसे ब्राह्मण ने लिखा हो? शायद एक भी नही मिलेगा। मुझे पता है तुम मनु स्मृति का ही नाम लोगे, जिसके लेखक मनु महाराज थे, जो कि क्षत्रिय थे।

हिंदी में ग़ज़ल

धुंध रोगन की पुती आकाश में और हम हैं रौशनी की आस में । एक अंगुल दुःख समीक्षा ग्रंथ सी चेतनाएँ है गुमशुदा संत्रास में । चार लोगों का कहा सच कहाँ ? मथनियाँ डालो ज़रा जिज्ञास में । ज़िंदगी जी लो अरु जीतो भी उसे रोए दुनियाँ रोती रहे संत्रास में । । ज़िन्दगी क्या है ? पूछा किसी ने पढ़ के देखो प्रथम अंतिम सांस में ।। *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

राष्ट्रीय बाल सभा एवं एकीकरण शिविर में भाग लेने बालभवन से सांस्कृतिक दल रवाना

                           राष्ट्रीय बाल सभा एवं एकीकरण शिविर में भाग लेने जबलपुर से 4 बच्चों सहित 6 सदस्यीय सांस्कृतिक दल को दिनांक 12 नवम्बर 17 को दिल्ली राष्ट्रीय बालभवन के लिए रवाना किया. ये बच्चे महाकौशल क्षेत्र की कला का प्रदर्शन करेंगें .                                        बुन्देली लोक नृत्य , लोक संगीत , गोंडी भित्ती चित्रकला , के अलावा बच्चे गिरीश बिल्लोरे द्वारा लिखे रानी दुर्गावती एवं दीवान आधारसिंह के बीच 16 वीं सदी की सामरिक परिस्थियों पर हुई चर्चा के विवरण एवं रानी दुर्गावती के बलिदान पर केन्द्रित विवरण का नाट्य रूपान्तारण , प्रस्तुत करेंगें.                      संभागीय बालभवन जबलपुर में इनको एक माह तक श्री इंद्र पाण्डेय , डा. शिप्रा सुल्लेरे , कुमारी रेशम ठाकुर ,  सुश्री रूचि केशरवानी , संजय गर्ग व मनीषा तिवारी ने विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया गया है. बाल कलाकार 14 से 16 नवम्बर तक एकल एवं सामूहिक प्रस्तुतियों में शामिल होंगे. बालकलाकारों को मिष्ठान एवं दिल्ली के प्रदूषण से बचाव के लिए मास्क देकर श्रीमती सुलभा बिल्लोरे , एवं कार्यालयीन अधिकारियों एवं कर्मचार

प्रमुख सचिव श्री जे एन कंसौटिया का बालभवन का दौरा

     ` प्रमुख सचिव जी माननीय श्रीयुत जे एन कंसौटिया जी आदरणीया मनिषा लुम्बा जी ने संभागीय बालभवन जबलपुर का आज दिनाँक  9  नवम्बर  2017  को भ्रमण किया ।   भ्रमण के दौरान प्रमुख सचिव महोदय से भवन निर्माण हेतु भूमि  ,  वित्तीय मदद आदि स्थितियों पर विस्तृत चर्चा हुई । श्री कंसौटिया सर द्वारा आयुक्त नगर निगम से फोन पर चर्चा कर भूमि आवंटन अथवा स्मार्ट सिटी परियोजना में बालभवन को शामिल करने के लिए कहा गया । बालभवन की गतिविधियों को संप्रेक्षण ग्रह ,  बालगृह ,  दिव्यांग बच्चों के विशेष स्कूलों अजा जजा आवासीय स्कूलों तक गतिविधियों को जोड़ने के निर्देश संचालक को दिए । प्रमुख सचिव जी द्वारा बालिकाओं के लिए चलाए जा रहे * 30  शौर्या शक्ति आत्मरक्षा प्रशिक्षण* कार्यक्रम की तारीफ की ।   निरीक्षण के दौरान *चित्रकला एवम गायन वादन के दिव्यांग छात्र बालक मास्टर   गौतम सोनी* के बारे में जानकर बेहद प्रसन्नता व्यक्त की गई तथा यह निर्देश दिए कि दिव्यांगता से ग्रसित बच्चो की संस्थाओं के बच्चों के लिए बालभवन की सेवा देने के लिए संचालक बालभवन संस्थाओं के साथ संपर्क कर सेवाएँ विस्तारित करें ।   इ

पुश्तैनी मकान , मकान नहीं घर होते थे

पुश्तैनी मकान , मकान नहीं घर होते थे गोबर से लिपे सौंधी खुशबू वाले आधा फीट छुई की ढीग से सजे पुश्तैनी मकान ... दरवाजों पर खनकती कुण्डियाँ देर रात जब बजतीं  चर्र से खुलते दरवाजे दो घर दूर  वाले रामदीन के दादा खांसते खकारते पूछते – बहू कालू आया क्या .. हओ दद्दा हम आ गए ... पूरा मुहल्ला जो रात नौ बजे सोता था पर जागता एक साथ सामान्य दशा में सुबह चार बजे या रात को किसी अनियमित स्थिति में .,. सभी मकान सिर्फ मकान थे ..? न सभी मकान भर थे .. घरों का नाता थी कॉमन दीवार ... जो मुहल्ले को किले में बदल देती थी...! पुश्तैनी मकानों के वाशिंदे  प्रजा थे .. जिनपर राज  था ......... राजा  प्रेम और रानी स्नेह का .. किसी एक का शोक हर्ष सब पर लागू होता .. जब कालू हँसता तो सब हँसते जब दुर्गा रोती तो सब रोते तुलसी क्यारे में कभी हवा से तो कभी तेल चुकने तक दीपशिखा नाचती मोहल्ले वाले पटवारी को न बुलाते घरों को नापवाने .. पुश्तैनी घर ज़िंदा देह थे ज़िंदा देहों को कोई पटवारी मापता है क्या.. ? पुश्तैनी मकान अमर होते हमने मारा है उनको .. बिलखते होंगे पुरखे

तो फिर महिलाओं को मुफ़्त दो सेनेटरी नैप्किन.. ज़हीर अंसारी

ज़हीर भाई का यह आलेख उनकी सरोकारी पत्रकार होने का सजीव प्रमाण है । भाई साहब की चिंता अक्षरश: दे रहा हूँ पर आप सब ये जानिए कि मध्यप्रदेश सरकार ने उदिता प्रोजेक्ट के तहत नॉमिनल शुल्क पर सैनेटरी नैपकिन देने की व्यवस्था की है ।       इतने साल उतने साल सुनकर देश थक गया है। जिसे देखो अतीत के किससे कहानियां सुना जाता है। ये नहीं हुआ, वो नहीं हुआ। ऐसा होना चाहिए वैसा होना चाहिए। उन्होंने ये नहीं किया, उन्होनें वो नहीं किया। इसी में सब वक्त बर्बाद कर रहे हैं| किसी को भी मातृशक्ति की तरफ देखने-सोचने की फुर्सत नहीं है| सभी राजनैतिक दल सत्ता के हवन में जनता की भावनाओं का 'होम' लगा रहे हैं| हवन का सुफल सत्ता के रुप में जब मिल जाता है तो 'होम' के रुप में इस्तेमाल की गई जनता की अपेक्षाओं और भावनाओं को हवन की राख समझकर फेंक दिया जाता है| यह कितने अफसोस का विषय है कि आजादी के 70 साल बाद भी देश की मातृशक्ति को सैनेटरी नैप्किन उपलब्ध नहीं है| यह कितने शर्मसार करने वाली बात है कि लगभग 43 करोड़ महिलाएं सैनेटरी नैप्किन खरीदने के काबिल नहीं है| 23 फीसदी बेटियां माहवारी शुरु होने पर स्कूल ज