सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

मार्च, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पांच साल तक उलटे लटके रहो फिर विक्रम आएगा..

 एक चैनल     ने कहा चीलों को बूचड़खानों में   खाने का इंतज़ार रहा. बूचड़खानों को बरसों से लायसेंस का इंतज़ार था. मिल जाते तो   ?   चील   भूखे न   रहते   अवैध बूचड़खाने बंद न होते  ...   बूचड़खानों को   वैध करने की ज़िम्मेदारी और गलती  किसकी थी.   शायद कुरैशी साहब की जो बेचारे सरकारी दफ्तर में बूचड़खाने को लायसेंस दिलाने चक्कर काट रहे थे... ?  और सरफिरी व्यवस्था ने उनको तब पराजित कर दिया होगा.. ? काम कराने के लिए हम क्यों आज भी नियमों से जकड़ दिए जातें हैं . कुछ दिनों से एक इंटरनेट के लल्लनटॉप चैनल के ज़रिये  न्यूज़ मिल रही है कि गरीबों के लिए  राशनकार्ड बनवा लेना उत्तर-प्रदेश में आसान नहीं है..! ......... दुःख होता है.. दोष इसे दें हम सब कितने खुद परस्त हैं कि अकिंचन के भी काम न आ पाते हैं ... दोष देते हैं.. सरकारों पर जो अफसर, क्लर्क, चपरासी के लिबास में हम ही चलातें हैं. क्यों हम इतने गैर ज़िम्मेदार हैं.     आप सब  तो जानतें ही हैं कि रागदरबारी समकालीन सिस्टम का अहम सबूती दस्तावेज है.. स्व. श्रीलाल शुक्ल जी ने खुद अफसर होने के बावजूद सिस्टम की विद्रूपता को सामने लाकर आत्मचिंतन

या जोगी पहचाने फ़ागुन, हर गोपी संग दिखते कान्हा

फ़ागुन के गुन प्रेमी जाने , बेसुध तन अरु मन बौराना या जोगी   पहचाने   फ़ागुन , हर गोपी संग दिखते कान्हा रात गये नज़दीक जुनहैया , दूर प्रिया इत मन अकुलाना सोचे जोगीरा शशिधर आए , भक्ति -  भांग पिये मस्ताना प्रेम रसीला, भक्ति अमिय सी , लख टेसू न फ़ूला समाना डाल झुकीं तरुणी के तन सी , आम का बाग गया बौराना   जीवन के दो पंथ निराले , कृष्ण की भक्ति अरु प्रिय को पाना   दौनों ही मस्ती के  पथ हैं   , नित होवे है आना जाना--..!! चैत की लम्बी दोपहरिया में– जीवन भी पलपल अनुमाना छोर मिले न ओर मिले, चिंतित मन किस पथ पे जाना ?

*अनकही* 🦋women's day special

🦋 *अनकही* 🦋 *वह कहता था* *वह सुनती थी*  *जारी था एक खेल*  *कहने सुनने का*   *खेल में थी दो पर्चियाँ* *एक में लिखा था ‘कहो’* *एक में लिखा था ‘सुनो’*   *अब यह नियति थी* शरद कोकास  *या महज़ संयोग* *उसके हाथ लगती रही*  *वही पर्ची* *जिस पर लिखा था ‘सुनो’* *वह सुनती रही*   *उसने  सुने आदेश* *उसने सुने उपदेश* *बन्दिशें उसके लिए थीं* *उसके लिए थीं वर्जनाए* *वह जानती थी*  *कहना सुनना नहीं हैं* *केवल हिंदी की क्रियाएं*   *राजा ने कहा ज़हर पियो* *वह मीरा हो गई* *ऋषि ने कहा पत्थर बनो* *वह अहिल्या हो गई* *प्रभु ने कहा घर से निकल जाओ* *वह सीता हो गई* *चिता से निकली चीख* *किन्हीं कानों ने नहीं सुनी* *वह सती हो गई*   *घुटती रही उसकी फरियाद* *अटके रहे उसके शब्द*  *सिले रहे उसके होंठ* *रुन्धा रहा उसका गला*   *उसके हाथ कभी नहीं लगी* *वह पर्ची* *जिस पर लिखा था - ‘ कहो* ’ ◆◆◆◆◆◆◆   More Poetry By Sharad Kokas