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रविवार, सितंबर 18

‎"बेटी-बचाओ अभियान" हमारे चिंतित मन को चिंतन की राह देगा


 


  
                                     


        


 चार्ट अ)                   
क्रम
भारत एवम मध्य-प्रदेश
1991
2001
2011
01
भारत
927
933
940
02
मध्य-प्रदेश
912
920
930

मध्य-प्रदेश में 05  अक्टूबर से बेटी बचाओ अभियान का शुभारम्भ जनचेतना को जगाने का एक महत्वपूर्ण कदम है. यह बेहद ज़रूरी भी है. कारण है पिछले दस वर्षों में सम्पूर्ण भारत का  लिंगानुपात 933 से बढ़कर 940 हो गया जो भले ही एक उत्तम स्थिति कही जा सकती है किंतु  बच्चो का लिंगानुपात स्वतंत्र भारत के सबसे निचले स्तर पर जो एक नकारात्मक  सूचना है. एक और ज़रूरी तथ्य जो समाज का बेटियों के बारे में दृष्टिकोण उज़ागर करता है वो है नवजात शिशुओं की मृत्यु दर  (भारत की स्थिति )  वर्ष 1990,1995,2000,2005 तथा  2009  तकहमेशा बालिकाओं की मृत्यु का आंकड़ा सदैव अधिक ही रहा. ये अलग बात है कि नवजात शिशु मृत्यु की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है. किंतु बालिका मृत्यु दर सदा ही कुल शिशु मृत्यु के प्रकरणों का तुलनात्मक परीक्षण पर ग्यात होता है कि बालकों के सापेक्ष बालिकाओं की मृत्यु प्रथम दो वर्षों क्रमश: 90,95 में तीन2000 में 2, 2005 में 5, तथा 2009 में पुन: 3 अधिक है. यानी प्रदेश की स्थिति देखें तो सकल शिशु मृत्यु दर 67 मध्य-प्रदेश में तथा 12 प्रति हज़ार केरल में आंकलित की गई. यानी प्रति हजार जीवित जन्मों में से 67 बच्चों का पहला जन्मदिन न मना पाना दु:खद स्थिति है. बालिकाओं के संदर्भ में सोचा जाए तो लगता है कि वास्तव में हम बेटियों के उपरांत उनकी बेहतर देखभाल के लिये  अभी भी उत्साहित नही हैं. सरकार ने प्रसव हेतु अब जननी एक्सप्रेस   लाड़ली लक्ष्मी योजनाकन्यादान योजना क्रियांवित कर पालने से पालकी तक” की ज़िम्मेदारी स्वीकार ली है तो फ़िर हम क्यों बालिकाओं के लिये नज़रिया बदलने में विलम्ब कर रहें है.  
   मध्य-प्रदेश सरकार  का "बेटी-बचाओ अभियान" पांच अक्टूबर से प्रारंभ होगा जो  हमारे चिंतित मन को चिंतन की राह देगा ये तय है.. बस एक समझदारी की ज़रूरत को दिशा देते इस अभियान में छिपे संदेशों को समझिये और समझाईये उनको जो यह नहीं जानते कि बेटी का होना कोई बोझ नहीं यदि हमारी सोच सकारात्मक है. नर्मदांचल में माएं अपनी बेटियों को ससुराल विदा करते वक़्त उसकी कोख की पूजन करतीं हैं. जो यह साबित करने के लिये पर्याप्त है कि देश की सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवस्था बेटी के लिये कदापि नकारात्मक नहीं किंतु काय-विज्ञान और परीक्षण तक़नीकी विकास ने भ्रूण परीक्षण को आकार दिया.और आम आदमी अजन्मी-बेटियों के अंत के लिये सक्षम हो गया. इस पाशविक सोच से मुक्ति का मार्ग है प्रशस्त करेगा  "बेटी बचाओ अभियान" .
  देश के समग्र विकास के साथ लिंगानुपात में कमी आना हमारे सर्वांगीण विकास की सूचना तो कदापि नहीं होगी . आकंड़े देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि हम किस कदर भयभीत हैं बेटी के जन्म से. 
              लिंगानुपात में नकारात्मक्ता प्रदर्शित करने वाले जिलों की स्थिति देखें जहां  एक  हजार पुरुषों  के सापेक्ष  महिलाओं का आंकड़ा कम है वे  जिले हैं भिंड  838,मुरैना  839, ग्वालियर  862, दतिया  875, शिवपुरी  877,छतरपुर  884, सागर  896, विदिशा  897, 
                      इसके  कारण में मूल रूप से बेटियों के लिये नकारात्मक सामाजिक-सोच के अलावा कुछ भी नज़र नहीं आता . इसी सोच को बदलने के लिये  मध्य-प्रदेश-सरकार ने लाड़ली-लक्ष्मी योजनाऔर मंगल दिवस कार्यक्रमों का संचालन बालिकाओं के प्रति  सामुदायिक सोच में बदलाव लाने के प्रारंभ किया. इतना ही नहीं सरकार की कन्या दान योजनानि:शुल्क गणवेश और सायकल वितरण,कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से लागू कर दिया. 
सम्पूर्ण भारत के सापेक्ष मध्यप्रदेश लिंगानुपात में 10प्रतिहज़ार का अंतर है. यानी प्रति हज़ार पुरुष के पीछे 930 महिलाएं हैं यानी 70 महिलाएं अभी भी कम हैं. जबकि भारतवर्ष में समग्र रूप 60 महिलाएं. प्रति हजार पुरुष के पीछे कम हैं. जिसका कारण कम लिंगानुपात वाले जिले है.    
                       मध्य-प्रदेश में यह अभियान उस दिन से ही शुरु माना जाएगा जिस दिन से सरकार ने लाडली लक्ष्मी जैसी जन हितैसी योजना को आकार दिया जिसका आधार ही लिंगानुपात में कमी लाना था. योजना के तहत बालिका को बालिका के लिये  6000/- के मान पोस्ट-आफ़िस में फ़िक्स बचत लिये जातें हैं इतना ही नहीं अध्ययन सहायता के लिये  6 वीं कक्षा में 2000रूपये, कक्षा वीं में  4000 रूपये, कक्षा 10 वीं में7500 और 11वीं कक्षा से 200 रूपये प्रतिमाह दो वर्ष तक दिये जाने का प्रावधान भी है। कुल मिला कर बालिकाओं के लिये पालने से पालकी तक” की चिंता करने वाली मध्य-प्रदेश सरकार ने बेटी बचाओ अभियान के  ज़रिये यह   संदेश दिया है कि समुदाय यानी हम-आपको बेटियों के प्रति सोच बदलनी ही होगी 
यानी सरकार की चिंता है आपकी बेटी आप बस चिंतन कीजिये .. खुद से पूछिये कि "बेटियों के बग़ैर आपको आपका घर" कैसा लगता है. कभी सोचा है आपने कि धीरे धीरे कम होती बेटियां देश को किस गर्त में ढकेलने जा रहीं हैं. यदि नहीं तो आज से अभी से सोचना शुरु कीजिये. तय है कि आप ज़ल्द ही इस नतीज़े पर पहुंच जाएंगे कि बेटी बचाना क्यों ज़रूरी है..?
     जी सही सोच रहे हैं आप बेटियों के अभाव में विकास का पहिया अपनी धुरी पर घूमता नज़र आएगा आपको.  एक सृजनिका को समाप्त होना जिन सामाजिक विकृतियों को आपको सौंपेगा उनमें से एक होगी "मानव-संसाधनों की कमीं" जिसकी भरपाई के लिये कोई सा विज्ञान सक्षम न होगा




शुक्रवार, मार्च 11

हिंदी ब्लागिंग पर प्रतिबंध और ब्लागर्स की ज़िम्मेदारी...!

                                        
समीरलाल
 हिंदी ब्लाग जगत चिंतित है. समीरलाल चिंतित होकर बज़्ज़ पर पूछ रहे हैं:-"बेचारा निरीह हिन्दी ब्लॉगर- कानून के घेरे में लपेटा    जायेगा....अधिकतर तो आत्म समर्पण करके निकलना पसंद करेंगे." तो नुक्कड़ पर चिंतित हैं अपने ललित शर्मा जी कह रहे है मौलिक-अधिकार का हनन है यह..  संजीव शर्मा जी ने जुगाली पर  बताया कि:- क्या और कैसे होगा प्रतिबंध ब्लागिंग पर . कुल मिला कर सारे हिन्दी ब्लाग जगत में एक सनसनी अभिव्यक्ति पर  लगाम कसने की कयावद वह भी हिंदी ब्लागर्स की अभिव्यक्ति पर हिंदी-ब्लागर्स बकौल संजीव :-"हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओँ के ब्लॉग तो अभी मुक्त हवा में साँस लेना सीख रहे हैं और उन पर प्रतिबन्ध की तलवार लटकने लगी है.दरअसल बिजनेस अखबार ‘इकानॉमिक्स टाइम्स’ के हिंदी संस्करण में पहले पृष्ठ पर पहली खबर के रूप में छपे एक समाचार के मुताबिक सरकार ब्लाग पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास कर रही है.यह प्रतिबन्ध कुछ इस तरह का होगा कि आपके ब्लॉग के कंटेन्ट(विषय-वस्तु) पर आपकी मर्ज़ी नहीं चलेगी बल्कि सरकार यह तय करेगी कि आप क्या पोस्ट करें और क्या न करें.सरकार ने इसके लिए आईटी कानून में बदलाव जैसे कुछ कदम उठाये हैं. खबर के मुताबिक सरकारी विभाग सीधे ब्लॉग पर प्रतिबन्ध नहीं लगाएंगे बल्कि ब्लॉग बनाने और चलाने का अवसर देने वालों की नकेल कसी जायेगी. नए संशोधनों के बाद वेब- होस्टिंग सेवाएं उपलब्ध करने वालों,इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर और इसीतरह के अन्य मध्यस्थों को कानून के दायरे में लाया जा रहा है.प्रतिबंधों की यह सूची बीते माह जारी की गई थी और इसपर आम जनता,ब्लागरों और अन्य सम्बंधित पक्षों की राय मांगी गई थी."
             
 बिजनेस अखबार ‘इकानॉमिक्स टाइम्स’ के हिंदी संस्करण की यह खबर कितनी सही है इस पर सरकार की ओर पुष्टि ले लेना भी ज़रूरी है. अभी कुछ भी कयास लगाना ज़ल्दबाज़ी है पर इसका आशय यह नहीं कि हम सब कुछ भूल जाएं... हम ब्लागर्स को इसी आधार पर सरकार को रोज एक पोस्ट लिखकर , ब्लागर्स मीट के ज़रिये एवम प्रेस-विज्ञप्तियां जारी करके,अपने अपने शहर में जिला   कलैक्टरों को ज्ञापन सौंप कर अपना विरोध जता देना ज़रूरी है. 
                        यदि सरकार ऐसा करती है तो  सेवा-प्रदाता के ज़रिये नकेल कसी  जायेगी ब्लागर्स की.   तय यह पाया जाता है  क़ि सर्वसाधारण को बोलने की इजाज़त एवं  अभिव्यक्ति  के लिए   प्रयुक्त प्लेटफ़ार्म न मिले  . अब आप बताएं आम ब्लॉगर कोई विकीलीक्स तो   नहीं है जो क़ि उससे भयाक्रांत रहा जावे. सरकार के मानस में यह क्यों जबकि आम ब्लॉगर सिर्फ कविता कहानी आलेख जो अखबारों,पत्र-पत्रिकाओं में भेजते हैं उसे ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहे हैं . फिर किसके  इशारों पर हो रही है यह हरकत  . सरकार को इस मामले में खुलासा करना चाहिये कि किन परिस्थियों में सरकार यह क़दम उठा रही है . मुझे वर्धा सम्मेलन की रिकमंडेशन याद आ रहीं हैं कि हिंदी ब्लागिंग के लिये एक आदर्श आचार संहिता होनी चाहिये . यह बात वास्तव में ग़ैर ज़रूरी थी. ऐसा विचार व्यक्त करने वाले तथा सरकार  यह जान ले कि क्या मौज़ूदा क़ानून से अश्लील,उत्तेज़क,गुमराह करने वाले अराजक आलेखों, प्रस्तुतियों को प्रतिबंधित आसानी से किया जा सकता है.   
ललित शर्मा
एक ओर हम ब्लागर्स हिंदी से नेट को ढंक देना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर ऐसी खबर, जी हां यह खबर निश्चित ही  हमारे एक जुट होने के मार्ग तैयार कर रही है. समय आ गया है कि सारे ब्लागर्स एक जुट होकर पुरजोर विरोध करें. ... सरकार के ऐसे अलोकतांत्रिक-प्रयास का. इस हेतु हमें प्रिंट,इलैक्ट्रानिक मीडिया से सहयोग की अपेक्षा है.  


ललित शर्मा के अनुसार :-"मध्यवर्ती संस्थाओं के टर्म का दायरा ब्लॉगर तक बढाने के पीछे तर्क यह है कि जिस तरह इंटरनेट प्रोवाईडर संस्थाएं पाठक को  इंटरनेट से जोड़ती  हैं उसी तरह ब्लॉग पर लिखे गए लेख भी पाठकों को अपने तक जोड़ते हैं। ब्लॉग स्वामी किसी के खिलाफ़ व्यक्तिगत आरोप आक्षेप वाली पोस्ट लगाता है और पाठक जब ब्लॉग पर अपमानजनक, अमर्यादित टिप्पणी करता है तो उसका जिम्मेदार ब्लॉग स्वामी ही होगा। इसके लिए ब्लॉग स्वामी को मध्यवर्ती संस्था मान कर कानून के दायरे में लाया जा रहा है।
(पूरा आलेख इधर देखिये)






कनिष्क कश्यप 
इस पोस्ट के तैयार करते समय न्यू-मीडिया-एक्सपर्ट कनिष्क कश्यप से बात हुई उनका कहना है :-"खबर ग़लत है, क्या मछलियों को समन्दर में कूदने से  रोकने का का़नून बन तो सकते है पर मछलियों को रोका नहीं जा सकता "








दिल्ली के ब्लागर खुशदीप सहगल ने अपनी दो टूक राय ज़ाहिर करते हुये कहा कि:-"जी, सायबर क़ानूनों की मज़बूती के लिये एक बिल पेश हो रहा है जिसके प्रावधानों की परिधि में ब्लाग को लाया जावेगा. जो धर्मोंमादक, भड़काऊ ब्लाग पोस्ट तथा उस पर आने वाली टिप्पणियों प्रतिबंधित करने हेतु ज़िम्मेदारी तय की जावेगी."
         सहगल जी ने आगे बताया:-"धर्माधारित विषयों पर विवादस्पद  आलेखन करने वाले ब्लागर्स तथा अभद्र टिप्पणीयों की ज़िम्मेदारी ब्लाग संचालक की ही होगी. "
        खुशदीप जी की बात से अधिक स्पष्टता मिली कि " उत्तेज़क ब्लागिंग प्रतिबंधित करने की कोशिश की जा रही है..? "
      किंतु मौज़ूदा क़ानूनों में प्रावधानों की उपलब्धता है.इन सबको रोकने के लिये. इससे सदाचारी ब्लागर्स के लेखन पर असर होगा. इस बात का विरोध होना ही चाहिये. 
इस बात पर खुशदीप जी का मत है कि :-"अवश्य होना चाहिये, किंतु हम ब्लागर्स को भी वर्जित विषयों पर लेखन गाली-गलौच भरी टिप्पणीयों से बचना ज़रूरी है."