समाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, अप्रैल 16

जबलपुर में कायम रही पचहत्तर साल पुरानी परम्परा : प्रो. उपाध्याय अध्यक्ष सतीश बिल्लोरे उपाध्यक्ष मनोनीत.



प्रो. एस. डी. उपाध्याय

नवनिर्वाचित अध्यक्ष
श्री राजेश अमलाथे

सचिव 
श्री एस. के बिल्लोरे

नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष


             नार्मदीय ब्राह्मण समाज, जबलपुर के त्रिवार्षिक
चुनाव प्रो0 योगेश उपरीत की अध्यक्षता में स्थानीय हितकारिणी नर्सिगं कालेज, जबलपुर
में दिनांक 15.04.2012 को संपन्न हुये । विगत 75 वर्षो से अधिक अवधि से नार्मदीय ब्राह्मण
समाज, जबलपुर के पदाधिकारियों का चयन मनोनयन के आधार पर किया जाता है। इसी क्रम में
डा. मोतीलाल पारे, श्री एम.एल. जोशी, श्री चन्द्रशेखर पारे, श्री रमेश शुक्ला, श्री
महेन्द्र परसाई एवं श्रीमती पुष्पा जो्शी के सदस्यता वाली चुनाव समिति द्वारा सर्वसमिति
से प्रो0 एस.डी.उपाध्याय को अध्यक्ष मनोनीत करते हुये अपनी कार्यकारिणी के गठन के अधिकार
प्रदत्त किये । नवनिर्वाचित अध्यक्ष द्वारा अपनी कार्यकारिणी का गठन कर आम-सभा से अनुमोदन
प्राप्त किया।
संरक्षक मण्डल-श्री मांगीलाल गुहा, श्री
काशीनाथ अमलाथे, श्री काशीनाथ बिल्लौरे, श्री प्रो. योगेष उपरीत, श्री मोतीलाल पारे,
श्री उमेश बिल्लौरे, श्री मनोहरलाल जोशी, श्री चन्द्रशेखर पारे, श्री महेन्द्र परसाई,
श्रीमती पुष्पा जोशी, श्रीमती सुशीला चन्द्रायण, श्री रमेश शुक्ला।

अध्यक्ष                                                 डा. एस.डी. उपाध्याय
उपाध्यक्ष                                               श्री सतीष बिल्लौरे
सचिव                                                  श्री राजेश अमलाथे
उप-सचिव                                             श्री
आलोक जोशी
क्षेत्रीय सचिव (जोनल सेकेटरी):जोन-1
श्री विनोद पारे: अधारताल, जोन-2 श्री अरूण टेमले: रानीताल, जोन-3 श्री संजय पारे:
विजयनगर, जोन-4 श्री अतुल पारे: ग्वारीघाट, जोन-5 श्री मनोज काशिवः बाई का बगीचा,,
जोन-6 श्री ओमप्रकाश पगारे: संजीवनी नगर, जोन-7 श्री विनय अमलाथे: मदनमहल,  जोन-8 श्री उमेश पगारे: गढ़ा
कोषाध्यक्ष                                     श्री
शिव काशिव
उप कोषाध्यक्ष                                श्री योगेश चन्द्रायण
वित्त सचिव                                   श्री
राधेश्याम पारे
सांस्कृतिक सचिव                            श्री सुनिल पारे  
                                                  श्री सचिन बिल्लौरे
सूचना प्रकाशन एवं प्रचार सचिव:       श्री गिरीष बिल्लौरे 
                                                 श्री तरूणेष भट्ट
विधि सचिव    एड. श्री शेखर शर्मा  एड. श्री अनिल पारे
                          
मीडिया-प्रभारी

गिरीश बिल्लोरे मुकुल
मीडिया प्रभारी श्री तरुणेश भट्ट
      निर्वाचन प्रक्रिया के प्रारंभ में निर्वतमान
कार्यसमिति के अध्यक्ष श्री गोविन्द गुहे, श्री एम.के.सराफ , श्री संतोष बिल्लौरे  द्वारा कार्यकारिणी द्वारा किये गये कार्यो को पुर्नावलोकन
प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। तदुपरांत संरक्षण मण्डल के सदस्यों, नवनिर्वाचित  अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं कार्यसमिति के सदस्यों,
महिला मण्डल के सदस्यों द्वारा नार्मदीय ब्राह्मण समाज, जबलपुर के वार्षिक तथा आगामी
लक्ष्यों के निर्धारण के लिये विचार रखते हुये नई कार्यकारिणी को समाज एवं नवनिर्वाचित
अध्यक्ष का विजन (दृष्टिकोण) निरूपित किया। नवीन कार्यकारिणी के सदस्यों ने भवन निर्माण
कार्यक्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता के क्रम रखते हुये सतत् संवाद, प्रतिभा विकास एवं
उनके प्रोत्साहन को प्राथमिकता के क्रम में रखकर प्रत्येक चुनौतियों को स्वीकाराने
पर सहमति व्यक्त की।
  समाज द्वारा सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कल्याणकारी
कार्यक्रमों को संचालित करने के लिये विस्तृत कार्ययोजना बनाने पर सहमति व्यक्त की
गई।


बुधवार, फ़रवरी 22

वर्जनाओं के विरुद्ध खड़े : सोच और शरीर

लाइफ़-स्टाइल में बदलाव से ज़िंदगियों में सबसे पहले आधार-भूत परिवर्तन की आहट के साथ कुछ ऐसे बदलावों की आहट सुनाई दे रही है जिससे सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन अवश्यंभावी है. कभी लगता था मुझे भी  कि सामाजिक-तानेबाने के परम्परागत स्वरूप को आसानी से बदल न सकेगा . किंतु पिछले दस बरसों में जिस तेजी से सामाजिक सोच में बदलाव आ रहे हैं उससे तो लग रहा कि बदलाव बेहद निकट हैं शायद अगले पांच बरस में... कदाचित उससे भी पहले .कारण यह कि अब "जीवन को कैसे जियें ?" सवाल नहीं हैं अब तो सवाल यह है कि जीवन का प्रबंधन कैसे किया जाए. कैसे जियें के सवाल का हल सामाजिक-वर्जनाओं को ध्यान रखते हुए खोजा जाता है जबकि जीवन के प्रबंधन के लिये वर्जनाओं का ध्यान रखा जाना तार्किक नज़रिये से आवश्यक नहीं की श्रेणी में रखा जाता है.जीवन के जीने के तौर तरीके में आ रहे बदलाव का सबसे पहला असर पारिवारिक व्यवस्था पर खास कर यौन संबंधों  पड़ता नज़र आ रहा है. बेशक विवाह नर-मादा के व्यक्तिगत अधिकार का विषय है पर अब  पुरुष अथवा महिला के जीवन की व्यस्तताओं के चलते उभरतीं  दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन का अधिकार भी मांगा जावेगा कहना कोई बड़ी बात नहीं. वास्तव में ऐसी स्थिति को मज़बूरी का नाम दिया जा रहा है.फ़िलहाल तो लव-स्टोरी को वियोग हेट स्टोरी में बदलते देर नहीं लगती पर अब  मुझे जहां तक आने वाले कल का आभास हो रहा है वो ऐसा समय होगा जो  " दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन" को एक अधिकार के रूप में स्वीकारेगा. दूसरा पक्ष ऐसे अधिकार की मांग के प्रति सकारात्मक रुख अपनाएगा. उसका मूल कारण "सर्वथा दूरियां एवम व्यस्तता जो अर्थोपार्जक कारण जनित होगी"
वेब-दुनियां से साभार
  यह कोई भविष्यवक़्तव्य नहीं है न ही मैं भविष्य वक्ता हूं... वरन तेजी से आ रहे बदलाव से परिलक्षित हो रही स्थिति का अनुमान है. जिसे कोई बल-पूर्वक नहीं रोक सकता.
   सामाजिक व्यवस्था द्वारा जनित परम्परागत वर्जनाओं के विरुद्ध  सोच और शरीर का खड़ा होना भारतीय परिवेश में महानगरों, के बाद  नगरों से ग्राम्य जीवन तक असर डाल सकता है.  
     आप हम भौंचक इस विकास को देखते रह जाएंगें. सेक्स एक बायोलाजिकल ज़रूरत है उसी तरह अपने पारिवारिक "समुच्चय में रहना" सामाजिक ज़रूरत है. आर्थिक कार्य का दबाव सबसे पहले इन्ही बातों को प्रभावित करेगा. तब दम्पत्ति बायोलाजिकल ज़रूरत को पूरा करते हुए पारिवारिक समुच्चय को भी बनाए रखने के लिये एक समझौता वादी नीति अपनाएंगें. हमारा समाज संस्कृति की बलात रक्षा करते हुए भी असफ़ल हो सकता है ऐसा नहीं है कि इसके उदाहरण अभी मौज़ूद नहीं हैं.बस लोग इस से मुंह फ़ेर लेते हैं.
*ओशो का इस संबंध में एक अजीबोगरीब तर्क था कि - विवाह के पूर्व ही मानसिक शारिरिक सामंजस्य बने रहने की पुष्टि कर लेनी चाहिए तब विवाह बंधन में बंधना चाहिए । ओशो से इस मुद्दे पर मेरी पूर्णतया असहमति है । समाज ओशो का कम्यून नहीं है । उनसे न समाज शासित है न मैं ।*
                                      पाश्चात्य व्यवस्था इस क़दर हावी होती नज़र आ रही है कि किसी को भी इस आसन्न ब्लैक होल से बचा पाना सम्भव नज़र नहीं आ रहा. हो सकता है मेरा पूरा आलेख झूठा साबित हो जाए जी हां अवश्य किंतु तब जबकि जीवनों में स्थायित्व का प्रवेश हो तब ही यह सम्भव है . ट्रक ड्रायवरों सा यायावर जीवन जीते लोग (महिला-पुरुष) फ़्रायड को तभी झुठलाएंगे जबकि उनका आत्म-बल आध्यात्मिक चिंतन से परिपक्व हो पर ऐसा है ही नहीं. आध्यात्म एवम सामाजिक व्यवस्था के तहत बहुल सेक्स अवसरों के उपभोग को रोकने नैतिकता का ज्ञान कराते हुए संयम का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि एक और सामाजिक नैतिकता बनी रहे दूसरी ओर यौन जनित बीमारियों का संकट भी जीवनों से दूर रहे, जबकि विज्ञान केवल कंडोम के प्रयोग से एस.टी.डी.(सेक्सुअली-ट्रांसमीटेड-डिसीज़) को रोकने का परामर्श देता है. 
                 सामाजिक व्यवस्था पाप-पुण्य की स्थितियों का खुलासा करतीं हैं तथा एक भय का दर्शन कराती है तथा संयम का आदेश देतीं हैं वहीं दूसरी ओर अत्यधिक अधिकाराकांक्षा तर्क के आधार पर जीवन जीने वाले इस आदेश को पिछड़ेपन का सिंबाल मानते हुए नकार रहे हैं .. देखें क्या होता है वैसे सभी चिंतक मानस मेरी अनुभूति से अंशत: ही सही सहमत होंगे..........         
      
आभास को सुनिये नाटी एट 40 में

http://player.raag.fm/player/flash/albumtrack.php?artist=3&album=33965

शुक्रवार, अगस्त 29

भोला का गाँव : राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त गाँव.........!!

कलेक्टर साहब का गाँव में दौरा जान कर भोला खेत नहीं गया उसे देखना था की ये कलेक्टर साहब क्या....कौन .....कैसे होते हैं ?
दिन भर मेहनत मशक्कत कर के रोजी-रोटी कमाने वाला मज़दूर आज दिल पे पत्थर रख के रुका था , सिरपंच जी के आदेश को टालना भी उसकी सामर्थ्य से बाहर की बात थी सो बेचारा रुक गया , रात को गुलाब कुटवार [कोटवार ] की पुकार ने सारे पुरुषों को संकर-मन्दिर [शंकर ] खींच लिया बीडी जलाई गई.यहाँ सिरपंच ने तमाखू चूने,बीड़ी,का इंतज़ाम कर दिया था.
सरपंच:-"काय भूरे आओ कई नई...?"
"मरहई खौं जाएँ बे आएं तो आएं कक्का हम तो हैं जुबाब देबी"
"जब से भूरे आलू छाप पाल्टी को मेंबर हो गाओ है मिजाज...............कल्लू की बात अधूरी रह गई कि आ टपका भूरे.....तिरछी नज़र से कल्लू को देखा और निपट लेने की बात कहते कहते रुक गया कि झट कल्लू ने पाला बदला :"जय गोपाल भैया बड़ी देर कर दई........काय भौजी रोकत हथीं का"
"सुन कल्लू , चौपाल में बहू-बेटी की चर्चा मति करियो"
सरपंच ने मौके की नजाकत भांप बात बदली -''भैया,कल कलेक्टर साब आहैं सबरे गाँव वारे''
भूरे;'काय,कलेक्टर सा'ब का कर हैं इ तै आन खें'
सुन तो भूरे अपने गाँव में शौचालय बनने हैं , सबरे लोग लुगाई दिसा मैदान न जावें गाँव में साप-सपैयत की सुभीता हो जाए जेइ बात समझा हैं बे इतै आन खें
इधर सबके लिए बीडी जलाता भोला सरपंच की बात पे सर हिला हिला के समर्थन जता रहा था . तभी सरपंच बोला:हमाए गाँव में जित्ते बी पी एल बारे हैं सब के शौचालय पंचायत बनबाहे बाकी सब ख़ुद बनाने ?
"न सरपंच भैया ,जे नहीं चलेगा , अब भीख़म के घर है 10 एकड़ जिन्घा-जिमीन है,बहू आँगनबाड़ी की मेडम है बाको बी पी एल कारड बनाओ है, बाहे मुफत में बनी बनाई टट्टी मिल जै है और हम भीखम जित्ते बड़े अदमी नईं हमाओ नाम ........?तीरथ बोला
कल्लू ने अपना सुर तेज किया :- तुमाए दिमाक में भीखम के अलावे कोई बात नईं सूझती , अरे जब कारड बनत हटे तो तुम बड़े अपनी रहीसी झाडत रहे सब जानत हैं रेब्नू साब ने तुमाई रहीसी की बिबसता बना दइ अब रोजिन्ना तुमाओ रोबो गलत है
भीखम की साँस में साँस आई भीखम बोला:भैया तीरथ,अकल बड़ी होत है तैं भैंस को बड़ी बता राओ है.
देर रात तक सरपंच ने सारे गाँव को एक तरह से सेट कर लिया । तय हो गया किअगले दिन कोई भी गाँव की निंदा बनाम सरपंच की शिकायत नहीं करेगा । इसके बदले अगले दिन दौरे के बाद कच्ची-मुर्गा पार्टी होगी।
गाँव में अगले दिन शाम ५:०० बजे कलेक्टर साहब आए । गाँव की साफ़ सड़कें ,सुंदर स्कूल , देख के दंग रह गए गाँव वालों की स्वच्छता को लेकर समझ दारी को आई ए एस श्रेणी का अधिकारी भी चकित रह गया।
गाँव की खुल के सराहना हुई.......सरपंच ने बताया हजूर बाकी सब बी पी एल के कार्ड वाले हैं तीरथ को छोड़ के सर्वे के समय तीरथ बाहर गया था उसकी ओरत से पूछ के ग़लत जान कारी रेवेन्यू इंसपेक्टर ले गए उसका नाम नहीं जुड़ पाया । साहब हर कीमत पर जिले को निर्मल जिला बनाना चाहते थे सो एस डी एम् को हिदायत दी सुनिए इनका नाम आवेदन का परीक्षण कर जोड़ लें यदि पात्र हों तो ,अन्यथा इनका शौचालय मैं बनवा देता हूँ ।
***********************************
पूरे १४५ घर शौचालय युक्त हो गए। सरपंच के घर में पहले से ही था । टाट के परदे लगे थे इन शौचालयों में , निर्मल ग्राम की जांच करने आई टीम को सब कुछ सही मिला । सरपंच दिल्ली से इनाम पाकर लौटे । गाँव के दिन फ़िर गए , भोला ,तीरथ,कल्लू,सुंदर सबके घरों में शौचालय हैं । जिन पर ऊपर से छप्पर बना है..... इस बार बरसात में लकडी कंडे इन्हीं संडासों में रख के गाँव भर के लोगों ने पूरी बरसात सूखा इंधन पाया। भोला आज भी समझ नहीं पाया कि कलेक्टर साहब उसके गाँव में क्यों आए थे.......?
[यह पोस्ट सभी समझदार ग्राम्य जनों को सादर समर्पित है जो अपने घरों में बने शौचालयों का प्रयोग...........और पूरे गाँव को शौचालय बताते है,,,,,,,,,,,,,,]