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दादा ईश्वरदास रोहाणी : कुछ संस्मरण...

दादा दादा दादा... आखिर क्या थे दादा जबलपुर वालों के लिये. सबके अपने अपने संस्मरण होंगे कुछ बयां होंगे कुछ बे बयां आंसुओं में घुल जाएंगें पर हर उस व्यक्ति के मानस  पटल से  दादा का व्यक्तित्व ओझल नहीं होगा जो दादा से पल भर भी मिला हो. सैकड़ों लोगों की तरह मेरा भी उनसे जुड़ाव रहा है. हितकारणी विधि महाविद्यालय के चुनावों में मेरा ज्वाइंट-सेक्रेटरी पोस्ट के लिये इलेक्शन लड़ना लगभग तय था. प्रेसिडेंट पद के प्रत्याशीकैलाश देवानीने कहा मैं दादा का आशीर्वाद लेने जांऊगा.. तुम भी चलो..गे..? मैं उनको जानता ही नहीं फ़िर वो क्या सोचेगें.. मेरी बात सुन मित्र कैलाश देवानी ने कहा- एक बार चलो तो सब समझ जाओगे..     मित्र की बात मुझसे काटी नहीं गई. हम रवाना हुए.. हमें आशीर्वाद के साथ मिली नसीहत - सार्वजनिक जीवन में धैर्य सबसे ज़रूरी मुद्दा है. आप को सदा धैर्यवान बनना होगा. मेरा आप के साथ सदा आशीर्वाद है. बात सामान्य थी पर व्यक्तित्व का ज़ादू दिलो-दिमाग़ पर इस कदर हावी हुआ कि साधारण किंतु सामयिक शिक्षा जो तब के  हम युवाओं के लिये ज़रूरी थी इतनी प्रभावी साबित हुई कि हम भूल नहीं पा रहे .
दादा से फ़िर मुलाक़ातें क…