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शनिवार, मार्च 26

वर्ग संघर्ष : एक संक्रामक बीमारी है ?

साभार : समालोचना ब्लॉग 
  कहते हैं खाए बिना ज़िंदा रह सकता हूँ पर लिखे बिना नहीं . मानव की आदिम प्रवृत्ति है –“सिगमेंट-शिप” जिससे वो बंधा रहना चाहता है . जहां उसे आत्म सुरक्षा का आभास बना रहता है .मानव जन्मजात पशु है . वो गुर्राता है, डराता है, डरता भी  है, इस बीच उसे पावर चाहिए ......... पावर के लिए सबसे पहले अपनों को अधीन करना चाहता है करता भी है . फिर अपने अधिकारों का अधिरोपण शेष समूह पर करता है . केंद्र में सबके वही होता है जो सत्ता सियासती तरीके अख्तियार कर संचालित करता है . सत्ता को संचालित करने जो ज़रूरी है वो है संसाधन ....... अर्थात अधिकाँश भाग शीर्ष का . मैन-पावर, धन, भूमि, यानी नक़्शे के भीतर स्थित सब कुछ सत्ता में . पर कालान्तर में प्रजातांत्रिक व्यवस्थाएं प्रभावी हुईं  और राजशाही सामंताशाही ने प्रस्थान किया. और साथ ही साथ  शुरू होता है आदिम कबीलियाई प्रवृत्ति को उकसाने का खेल . कोई भी व्यक्ति अथवा समूह  सत्ता से अधिक दिन दूर नहीं रह पाता जो सत्ता का सुख भोग चुका है अथवा आकांक्षी है . उसके डी एन ए में राज करने की प्रवृत्ति ज़िंदा जो होती है .   
     समुदाय का समर्थन पाने वो सारे हुनर अपनाता है ........ उसमें एक है ......... “वर्गीकरण करना” जाति, धर्म, रंग, आदि आदि के आधार पर ........ फिर उनकी न दुखने वाली  रगों को दुखने वाली रग साबित कर देने का प्रयोग ठीक वैसे ही करता है जैसे कुछ अभिभावक अपने बच्चे को अपने वश में करने पूछते हैं – बेटा, पेट दुःख रहा है ...... यहाँ , न यहाँ ...... अरे हाँ लो फूंक मारता हूँ ........ ठीक हो जाएगा. बस फिर बज्जू चलेंगे टॉफी लायेंगे ...... बच्चा बहल जाता है .
                        लोग समुदाय को वर्गीकृत कर  उनको ध्रुवीकृत करते हैं फिर  उसे प्रोवोग कर खुद के लिए रास्ता बनाते हैं . वो रास्ता सत्ताभिमुख  होता है .  शायद बेजा न लगे तो सच में कहूं – “वर्ग संघर्ष : एक संक्रामक बीमारी है ?” जिसे बड़ी चतुराई से वायरल किया जा रहा है