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सोमवार, अक्तूबर 31

न्यू-मीडिया : नये दौर की ज़रूरत

                        अंतर्जाल पर भाषाई के विकास के साथ ही एक नये दौर में मीडिया ने अचानक राह का मिल जाना इस शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि है.विचारों का प्रस्फ़ुटन और उन  विचारों को प्रवाह का पथ मिलना जो शताब्दी के अंत तक एक कठिन सा कार्य लग रहा था अचानक तेजी से इतना सरल और सहज हुआ कि बस  सोचिये की बोर्ड पर टाइप कीजिये और एक क्लिक में मीलों दूरी तय करा दीजिये....प्रस्फ़ुटित विचारों की मंजूषा को. बेशक एक चमत्कार वरना अखबार का इंतज़ार,जिससे आधी अधूरी खबरें..मिला करतीं थीं श्रृव्य-माध्यम यानी  एकमात्र आकाशवाणी वो भी सरकार नियंत्रित यानी सब कुछ एक तरफ़ा और  तयशुदा कि देवकी नंदन पाण्डेय जी कितना पढ़ेगें आठ बजकर पैंतालीस मिनिट वाली न्यूज पर. यानी खुले पन का सर्वथा अभाव समाचार सम्पादकों की मर्ज़ी पर खबरों का प्रकाशन अथवा प्रसारण तय था .सरकारी रेडियो टीवी (दूरदर्शन) की स्वायत्तता तो आज़ भी परिसीमित है. 
      निजी चैनल्स एवम सूचना प्रसारण के निजी साधनों का आगमन कुछ दिनों तक तो आदर्श रहा है किंतु लगातार विचार प्रवाह में मीडिया घरानो संस्थानों का धनार्जन करने वाला दृष्टिकोण न तो समाचारों के साथ पूरा न्याय कर पा रहा है न ही समाचारों से इतर अन्य कार्यक्रमों में कोई मौलिकता दिखाई दे रही. जबकि लोग मीडिया की ओर मुंह कर अपनी अपनी अपेक्षाओं का एहसास दिला रहे हैं. यानी कुल मिला कर मीडिया संस्थानो की अपनी व्यावसायिक एवम नीतिगत मज़बूरियां "न्यू-मीडिया" के परिपोषण के लिये एक महत्व-पूर्ण कारक साबित हुईं हैं. 
न्यू-मीडिया   
  1. वेब-पोर्टल्स
  2. सोशल-साइट
  3. माईक्रो-ब्लागिंग/नैनो-ब्लागिंग
  4. ब्लागिंग
  5. पाडकास्टिंग
  6. वेबकास्टिंग
         न्यू-मीडिया के इस  बहुआयामी  स्वरूप ने आम आदमी को एक दिलचस्प और सतत वैश्विक-जुड़ाव का अवसर दिया जबकि आज़ से लगभग पच्चीस बरस पहले किसी को भी यह गलत फ़हमी सम्भव थी कि मीडिया के संस्थागत संगठनात्मक स्वरूप में कोई परिवर्तन सहज ही न आ सकेगा. रेडियो,सूचना का आगमन अखबार, टी. वी.टेलेक्स,टेली-प्रिंटर, फ़ैक्स,फ़ोन,तक सीमित था. संचार बहुत मंहगा भी था तब. एक एक ज़रूरी खबर को पाने-भेजने में किस कदर परेशानी होती थी उसका विवरण  आज की पीड़ी से शेयर करो तो वह आश्चर्य से मुंह ताक़ती कभी कह भी देती है –“ओह ! कितना कुछ अभाव था तब वाक़ई !!
    और अब उन्हीं ज़रूरतों की बेचैनीयों ने बहुत उम्दा तरीके से सबसे-तेज़” होने की होड़ लगा दी.इतना ही नहीं   “मीडिया के संस्थागत संगठनात्मक स्वरूप में बदलाव” एकदम क़रीब आ चुका है.ब्लागिंग के विभिन्न स्वरूपों जैसे टेक्स्टके साथ ही साथ नैनो और माइक्रो ब्लागिंग का ज़माना भी अब पुराना हो चला तो फ़िर नया क्या है.. नया कुछ भी नहीं बस एकाएक गति पकड़ ली है वेबकास्टिंग ने पाडकास्टिंग के बाद . और यही परम्परागत दृश्य मीडिया के संस्थागत आकार के लिये विकल्प बन चुका है. लोगों के हाथ में थ्री-जी तक़नीक़ी वाले सेलफोन हैं.जिसके परिणाम स्वरूप अन्ना के तिहाड़ जेल में जाने पर वहां जमा भीड़ का मंज़र लोग अपने घर-परिवार को दिखाते रहे. जबकि  न्यूज़ चैनल से खबर आने में देर लगी. ये तो भारत का मामला था मध्य-एशिया के देशों की हालिया क्रांति में भी न्यू-मीडिया की भागीदारी की पुष्टि हुई है. 
एक नज़र  वेबकास्टिंग के अचानक विस्तार पर 
            18 जनवरी 2011 को छपी इस खबर का स्मरण कीजिये जो नवभारत-टाइम्स ने छापी थी हुआ भी ऐसा ही ऐसे समारोह के प्रसारण के लिये स्थापित चैनल्स को उपयोग में लाना बेहद खर्चीला साबित होता और फ़िर दीक्षांत समारोह कोई क्रिकेट मैंच अथवा अमेरीकी राष्ट्राध्यक्ष की भारत यात्रा तो नहीं थी जिसके लिये सारे खबरिया संस्थान अपने कैमरे फ़िट करते .
              इसी क्रम  में आपको यह भी स्मरण होगा ही कि पटना- विधानसभा चुनाव में जिले के चौदह विधानसभा क्षेत्रों के 3872 बूथों में से 166 बूथों का लाइव वेब कास्टिंग किया गया । वेब कास्टिंग में बाधा उत्पन्न न हो इसके लिए जिला तथा अनुमंडल स्तर पर ट्रबुल शूटर टीम‘ का गठन किया गया है जो 30 अक्टूबर से काम करना शुरू कर देगी। चुनाव आयोग के निर्देशानुसार 31 अक्टूबर को लाइव वेब कास्टिंग का मॉक प्रस्तुतीकरण किया गया. वेब कास्टिंग के लिए उन्हीं बूथों का चयन किया गया है जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी और लीगल बिजली कनेक्शन उपलब्ध थे। नोडल पदाधिकारी विनोद आनंद ने बताया था कि 166 बूथों में से 159 पर लैडलाइन व बूथों पर वाइमेक्स की सुविधा उपलब्ध करायी है। मालूम हो कि एक लैडलाइन कनेक्शन का चार्ज 2700 रुपये व एक वाइमेक्स का चार्ज 4200 रुपये है। वेब कास्टिंग होने वाले हर बूथों पर एक कम्प्यूटर ऑपरेटर व एक बीएसएनएल के कर्मचारी मौजूदगी थी ।      
                जिस लैपटॉप से वेब कास्टिंग होना है उसमें 20 फीट की दूरी को कवर करने वाला वेव कैम और लगभग पचास तरह के सॉफ्ट वेयर का इस्तेमाल किया जाएगा। मतदान के दौरान निर्वाध वेब कास्टिंग के लिए जेनरेटर की व्यवस्था भी की गयी ।
हिन्दी ब्लागिंग में वेब कास्टिन्ग का प्रयोग उत्तराखण्ड के खटीमा शहर में दिनांक 09-01-2011 एवम 10-01-2011 को  साहित्य शारदा मंच के तत्वावधान में डारूपचन्द्र शास्त्री मयंक’ की  दो पुस्तकों क्रमशः सुख का सूरज” (कविता संग्रह) एवं नन्हें सुमन (बाल कविता का संग्रह) का लोकार्पण समारोह एवं ब्लॉगर्स मीट के सीधे प्रसारण से किया गया. जिसमें  किसी भी हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन और संगोष्ठी के लिए यह प्रथम अवसर था जिसका जीवंत प्रसारण अंतर्जाल के माध्यम से किया हो. समारोह का जीवंत प्रसारण पूरे समारोह के दौरान खटीमा से पद्मावलि ब्लॉग के पद्म सिंह और अविनाश वाचस्पति के साथ  जबलपुर से मिसफिट-सीधीबात  ब्लॉग के संचालक यानी  मैने किया . बस फ़िर क्या था सिलसिला जारी रहा बीसीयों टाक-शोसाक्षात्कार के साथ साथ दिल्ली से 30 अप्रैल 2011 के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया. यह प्रयोग सर्वथा प्रारम्भिक एकदम कौतुकपूर्ण  प्रदर्शन था लोग जो हिंदी ब्लागिंग के लिये समर्पित हैं उनको यह क़दम बेहद रुचिकर लगा.
    इस घटना ने प्रिंट मीडिया को भी आकृष्ट किया यशभारत जबलपुरकादम्बिनी और अमर-उजाला जैसे अखबारों  में पियूष पाण्डॆ जी एवम सुषांत दुबे के आलेख एवम समाचार आलेख बाक़ायदा छापे गए.
वेबकास्टिंग किसी भी घटना का सीधा अथवा रिकार्डेड  प्रसारण है जो थ्री-जी तक़नीकी के आने के पूर्व यू-ट्यूबustream, अथवा बैमबसरजैसी साइट्स के ज़रिये सम्भव थी. आप इसके ज़रिये घटना को रिकार्ड कर लाईव अथवा रिकार्डेड रूप में अंतरजाल पर अप-लोड कर सकतें हैं.
  इसके लिये आप http://bambuser.com/  अथवा www.ustream.tv पर खाता खोल के जीवंत कर सकते हैं उन घटनाओं को आपके इर्द गिर्द घटित हो रहीं हों. इतना ही नहीं इस तक़नीकी के ज़रिये आप भारत में पारिवारिक एवम घरेलू आयोजनो को अपने उन नातेदारों तक भेज सकतें हैं जो कि विश्व के किसी भी कोने में हैं अपनी रोज़गारीय मज़बूरी की वज़ह से.

सोमवार, सितंबर 12

न्यू मीडिया में हिंदी की दशा और दिशा : कनिष्क कश्यप


           न्यू मीडिया , विशेष तौर पर हिंदी न्यू मीडिया जिसका सबसे लघु इकाई एक ब्लॉग को कहा जा सकते, अब तक का सर्वाधिक उपेक्षित और गैर-प्रभावी बता कर उपेक्षा की दृष्टि सहता रहा है. यह सत्य है कि न्यू मीडिया शब्द के मायने इतने संकीर्ण नहीं कि मात्र ब्लॉग लेखन ही उसकी परिधि में  आये. यह एक तकनिकी क्रांति के बाद और विशेष तौर पर डाटा ट्रान्सफर ओवर वर्ल्ड वाइड वेब के क्षेत्र में आये चमत्कारी परिवर्तन के कारण इतना आग्रही हो गया कि इसे समान्तर मीडिया की तरह देखने और आंकने की  बौद्धिक मजबूरी पैदा होती गयी.

आभार:ब्लॉग ठाले बैठे 
इसकी परिधि एक ब्लॉग , एक वेबसाईट से लेकर फेसबुक , ट्वीटर , विकिपीडिया और यु-ट्यूब के प्रभावी हस्तक्षेप से कहीं आगे कनवर्जेन्स तक को समेटे हुए है. कनवर्जेन्स का अर्थ है आपके मोबाइल फोन (आई-फोन), पॉम पैड में पुरे सुचना तंत्र का विलय हो जाना . अब चाहे वह टीवी हो , अखबार का ऑनलाइन संस्करण हो, रेडियो प्रसारण हो , फेसबुक हो या आपका ब्लॉगस्पोट का ब्लॉग. यह सब सिमट कर एक छोटे डिवाइस में आ जाना ही कनवर्जेन्स कहलाता है.
अब बुनियादी सवाल यह उठता है , कि आम आदमी को मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक चैलेन्ज के रूप में क्यूँ माना जा रहा है. जब सम्प्रेषण, प्रस्तुति, व्यापकता और विश्वसनीयता के आधार पर आज भी परंपरागत मीडिया ..छोटी मछलिओं के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रभावी हैं. आज भी इंटनेट पर टाइम्स , भाष्कर और गार्जियन वैसे ही काबिज हैं. सुचना प्रवाह के इस विशाल समंदर में आपकी आवाज तो है , मगर वह हाशिए पर है . वह उस रिक्त स्थान में हैं , जिसे ताक पर कहते हैं. यह दुर्दशा विशेष तौर पर भारत में हैं और उसमे भी हिंदी के इर्द-गिर्द.
हिंदी के प्रति उदासीनता सबसे ज्यादा उनकी ही हैं , जिन्हें हिंदी आती है. मात्र  हिंदी के ज्ञान लिए और अंग्रेजी को टटोलने वाले लोग अंग्रेजियत के बड़े दीवाने दीखते हैं. इसका सीधा असर हिंदी ऑनलाइन मीडिया में बाजार के बेरुखी के रूप में सामने आता है. परन्तु इसे शिकायत के तौर पर नहीं लेकर हमें चुनौती के रूप में देखना पड़ेगा. चुनौती हिंदी के अस्तित्व को समृद्ध , सशक्त और सक्षम बनाये रखने की. क्योंकि आप किसी सहयोग , समर्थन की आस लिए इस क्षेत्र में उतरें हैं तो आपको निराशा ही मिलेगी . संवेदना के बर्बर मर्दन में यकीं रखने वाले ..बाजारवाद के अधीन इस न्यू मीडिया का प्रयोग-पटल भी अलग नहीं है . हाँ , इसमें आपको चूं -चूं करने भर के लिए जरूर आजाद छोड़ रखा है. क्योंकि इस बाज़ार के प्रभावी खिलाडिओं को यह अच्छी तरह पता है ..कि आपकी चूं-चूं उनके लिए बड़े बगीचे में चहचहाने वाले चिड़िया से ज्यादा कुछ और नहीं.  जिसे उतनी ही आजादी मिलती है कि वह मौसम पर अपना मिजाज चूं-चूं कर जाहिर कर सके. मौसम बदलने की ताकत उसमे नहीं.शायद यह ट्वीटर यहीं दर्शाता है.जहाँ अमिताभ बच्चन और राहुल गाँधी ने क्या कहा यह उल्लेखनीय अवश्य है , परन्तु वहीँ बात अगर आप उसी ट्वीटर पर चार साल से कह रहे तो भी आपको कोई नहीं पूछता. न्यू मीडिया में बड़े खिलाडिओं की उपलब्धि की कतार में अपने को खड़ा मानना आपका और हमारा दिवास्वपन है. मुझे याद याता है , पल्लू शॉट जी हाँ  ..दिलशान का पल्लू शॉट . आज जिसे दिलशान का पल्लू शॉट कहा जाता है ..उसे बिहार की गलिओं में हमने हजारों बार खेला . और हमने क्या बच्चा-बच्चा यह शॉट खेला करता है.  मुझे यह सारी स्थिति कुछ -कुछ ऐसा ही आभास दिलाती है, जैसे मोनियुल -हक स्टेडियम के बाहर के खाली फील्ड में खेलने का वक्त होता था. असल मैच तो स्टेडियम के अंदर चल रहा होता है. किन्तु बहार खेलने वाले भी यहीं कहते हैं कि मोनियुल-हक से खेल कर आ रहे हैं.
परन्तु इस कथन में मेरी कोई  दोष-दर्शिता को नहीं देखें . इसके अलग मायने हैं. परन्तु किसी भी तंत्र में कुछ तो फल को खाने वाले होते हैं, उन्हें यह फिक्र नहीं होती और न ही उनसे अपेक्षा की जाए कि वह फल खाने से पहले आम की नस्ल , उसकी लागत , उसकी पैदावार और उसके मालिक का पता लगा कर फल खायेंगे. और दूसरी जमात उन लोगों की होती है जो फल के पैदावार , उसके व्यापर और नस्ल , स्थानीय बाज़ार पर उसका प्रभाव, भविष्य के स्पंदन पर नज़र बनाये रखते हैं. ऐसे ही लोगों को आप कभी फेसबुक और ट्वीटर पर चिंतित होते हुए यत्र-तत्र पाते हैं. कई तो इनकी चिंता को इनकी अज्ञानता और कई इन्हें रुढिवादी बता कर उपहास करते हैं. परन्तु यह चिंता वाजिब है.
लेकिन सवाल कठिन तब हो जाता है , जब आप स्थानीय उपक्रम को राष्ट्र-प्रेम , भाषा-मोह में आकार अपना समर्थन और सहानुभूति देते हैं  और कल वहीँ तथाकथित देशी , विदेशी चोला पहनने लगता है . इसे अंग्रेजों से मिली मुक्ति के बाद के दिनों में बनी बॉलीवुड फिल्मों को देखर समझा जा सकता है. सब से सब अंग्रेजियत से सराबोर हैं . और तो और ..हिंदी भी अंग्रजी की तरह बोलते नज़र आते हैं . फिर चाहे वह भारतीय राजनीती ही क्यों न हो. शोषण तो अब भी बदस्तूर जारी है. नायक बदल गए हैं , अपर पटकथा वहीँ है , परिणति वहीँ है .
हिंदी को न्यू मीडिया में प्रभावी रखने के लिए वर्तमान  निकायों का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है.  अपनी कमजोरी को ही अपना हथियार बनाना होगा. इसमें हमारी कमजोरी और बौना होने का अहसास सिर्फ इसीलिए है कि ..एक ब्लॉग और एक वेबसाईट , बहुत ही कम लागत पर शुरू हो जाती है और संपादन सुख लेते हुए आप अपना हस्तक्षेप को तैयार हो जाते हैं. लेकिन गलती यहीं है कि हम किसी बड़े हाउस की तरह बर्ताव करने लगने हैं. आवश्यकता है अपनी खोज, उर्जा और आवाज को ग्रामीण स्तर पर ले जाने की . क्योंकि वह क्षेत्र आज मुख्यधारा द्वारा उपेक्षित हैं.आपकी सक्रियता वहाँ आपकी पैठ आसानी से बना देगी . फिर कल को कोई आपको चुनौती देने आये ..तब तक आप अपनी पहचान स्थानीय स्तर पर बना चुके होंगे.
(लेखक कनिष्क कश्यप  न्यू मीडिया विशेषज्ञ है )