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शनिवार, अप्रैल 21

हरि रैदास की रोटियां....

रोटीयों पर लिखी नजीर अकबराबादी की   नज़्म  तो याद है न आपको  नजीर साहेब  का नज़रिया साहित्य के हिसाब किताब से देखा जाए तो साफ़ तौर पर एक फ़िलासफ़ी है.. 
जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ ।
फूली नही बदन में समाती हैं रोटियाँ ।।
आँखें परीरुख़ों[1] से लड़ाती हैं रोटियाँ ।
सीने ऊपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँ ।।
         जितने मज़े हैं सब ये दिखाती हैं रोटियाँ ।।1।।
रोटी से जिनका नाक तलक पेट है भरा ।
करता फिरे है क्या वह उछल-कूद जा बजा ।।
दीवार फ़ाँद कर कोई कोठा उछल गया ।
ठट्ठा हँसी शराब, सनम साक़ी, उस सिवा ।।
         सौ-सौ तरह की धूम मचाती हैं रोटियाँ ।।2।।
                                      
                        अदभुत है.. सच मुझ से दूर नहीं हो पातीं वो यादें...  जब रेल की पटरियों  का काम करने वाली गैंग वाले मेहनत मज़दूरों के पास न चकला न बेलन बस हाथ से छोटी सी अल्यूमीनियम की छोटी सी परात में सने आटे के कान मरोड़ कर एक लोई निकाल लेते हाथ गोल-गोल रोटियां बना देते थे.उधर पतले से तवे पर रोटी गिरी और आवाज़ हुई छन्न से पलट देता मज़दूर रोटी को  खुशबू  बिखेरती रोटी ईंट के चूल्हे में जवां आग जो रेल पातों के स्लीपर  वाली लकड़ी या आसपास के पेढ़ से जुगाड़ी लकड़ी की वज़ह से इतराती थी से जा मिलती थी. रोटी के चेहरे पर काले दाग हो जाया करते पर मोटी ताज़ी रोटी दूसरी तीसरी चौथी... दसवीं तक बनाया करते मज़दूर ढांक लेते थे झक्क सफ़ेद कपड़े में और फ़िर आलू बैगन का रसीला साग मुझे लगातार वहीं रोक लेता था उधर मां बार बार पुक़ारती होगी इस बात से बेसुध होता था तब . फ़िर अचानक नौकर खोजने आता गोद में उठा कर वापस घर ले आता रास्ते में समझाना नहीं भूलता-"पप्पू भैया उनके पास काय जात हौ रोज.. कल जाहौ तो बाबूजी से बता दैहों.."
 बाबूजी के डर से एकाध दिन नहीं जाता पर फ़िर रोटियां खींच लेतीं थी मुझे उन तक उनके डेरे में जा बैठता. वे भी किस्से-कहानी सुनाते रोटी बनाते बनाते .एक बार मैने कहा-"हरि चाचा मुझे भी दो..रोटी.."
हरी हक्का बक्का मुझे एकटक देखता रहा फ़िर जाने क्या सोचा बोला-"ब्राह्मण के बेटे हो मैं अछूत हूं न भैया जे पाप न कराओ तुम..?"
   ये अछूत क्या होता है..? मेरे सवाल का ज़वाब न दिया हरि ने.. मुझे लगा ये मुझे रोटी नहीं खिलाने का कोई बहाना बना रहा है..
    पर मन में बसी मज़दूर की भीनी भीनी खुशबू वाली रोटियां खाने का मन था सो मैने कह दिया तुम हब्सी हो गंदे हो कट्टी तुमसे.. और लौट आया घर मन ही मन क़सम खा के कि अब न जाऊंगा उस गंदे आदमी के डेरे तक. बहुत दिनों तक गया भी नहीं. फ़िर जब सुना कि दफ़ाई वाले कुछ दिन बाद जाने वाले हैं मैं मिलने गया इस बार हरी के पास न बैठा उसके पास वाले साथी के पास जा बैठा वो भी रोटियां वैसी ही बनाता था खुशबू वाली . उसे सब महाराज कहते थे 
    महाराज ने भी किस्से कहानी सुनाए.. हरी देखता रहा मुझे हंसा भी मुस्कुराया भी .. और फ़िर बोला -’महाराज, पप्पू भैया को रोटी खिला दो..

  महाराज ने मुझे एक रोटी थोड़ा सा साग दिया मैने खाया भी.. वो अदभुत स्वाद आज तलक तलाशता हूं इन रोटियों में  . बहुत दिनौं के बाद पता चला कि हरि ने मुझे रोटियां क्यो नहीं खिलाईं थीं. हरि जाति से रैदास थे.. उफ़्फ़ क्या हुआ थी उनको जो अन देखे वाले भगवान को भोग लगाते थे एक टुकड़ा गाय को एक कुत्ते को खिलाते थे मुझे कान्हा बुलाते थे फ़िर क्यों उनने मुझे तृप्त न किया.. अब तो शायद वे होंगे भी कि नहीं इस दुनियां में कौन जाने कहां होंगे ? दिहाड़ी मज़दूर थे..रेल्वे के .
उनकी बनाई रोटी अभी भी जब याद आतीं हैं तब मैं घर में मोटी रोटीयां बनाने को कहता हूं रोटियां  बनती तो हैं पर वो  सौंधी सौंधी खुशबू.. वो स्वाद जो बज़रिये महाराज़ मुझे मिला था आज तक नहीं मिला.. !!