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पड़ोसी के घर की गन्दगी

(फोटो:साभार गूगल )

(यह बोध कथा मेरी लिखी तो नहीं है पर जिसने भी लिखी है ज़बदस्त लिखी है कल ही मेरे घर सत्य साईं सेवा समिति के स्टडी-सर्कल में मेरे मित्र अविजय ने उदाहरण के तौर पर अपने वक्तव्य में कोड की जो आपके लिए सादर पोस्ट कर रहा हूँ रोचक बनाने के लिए कुछ हेरा फेरी कर रहा हूँ )
एक से दूसरे घर मुंबई में इतने करीब होते हैं कि उनमें तांक-झाँख को कोई रोके सम्भव नहीं . दीपाली के पति मुंबई में पोस्टेड हुए . पोस्टिंग क्या शादी के तुंरत बाद की ऐसी पोस्टिंग बहुधा लंबे हनीमून का रस देती है.फुर्सत में दीपाली को समझ नहीं आता कि वो करे तो करे क्या ? पति सुदेश के ऑफिस जाते ही फुल टाइम बोरियत से बचने थोडी देर टी वी देखना,फ़िल्म लगा लेना,अखबार पढ़ना, धीरे-धीरे उसे उबाऊ लगाने लगे ये काम . एक दिन रेशमी परदा खोलते ही पास वाली सोसायटी के उस फ्लेट पर नज़र टिक गई जिसमें सब कुछ गंदा दिखा दीपाली को . अब रोज़ गंदे से फ्लेट की तांक-झाँक का क्रम जारी हो गया उस फ्लैट में , इस रोजिया कारोबार से दीपाली को मज़ा आने लगा . फ़िर उस घर की गन्दगी को चटकारे लगा के शाम सुदेश को सुनाना उसका नियमित कारोबार हो गया !
महीनों बीत गए एक दिन अचानक दीपाली के चेहरे की उदासी देख कर सुदेश बोले-"क्यों क्या हुआ भई..? हमसे कौन सी गुस्ताखी हो गयी जो आज आप उखड़ी हुईं हैं हमसे ?
"सुदेश,तुम बड़े गंदे हो,जो मेरी बात गंदे फ्लेट वालों तक पहुंचा ही दी न ?
"मैंने ?"
"हाँ,सुदेश तुम नहीं तो और कौन होगा........?
"दीप,मैं तो उनको जानता भी नहीं ?
"झूठे हो तुम...!देखो आज कितना सुंदर लग रहा है वो घर जो कल तक बेहद गंदा दिख रहा था ज़रूर आपने उनको कहा होगा"
हाँ,प्रिये मुझसे एक गलती ज़रूर हुई है इस मामले में ...? आज मैंने आपकी मदद करने अपनी खिड़की के शीशे साफ़ करे हैं शायद उसके कारण तुमको ...............!
पति की बात सुनकर किंकर्तव्यविमूढ़ सी दीपाली उस खिड़की को अपलक निहारने लगी जिससे पूनम का चाँद पूरी रोशनी भेज रहा था ।
[इस लिंक पर भी कथा उपलब्ध है:-ह्त्त्प://सव्यसाची.म्य्वेब्दुनिया.कॉम/2008/१०/१९/१२२४४०४८८००००.हटमल ]

टिप्पणियाँ

sangeeta ने कहा…
sach hi kaha hai ki pahale apane ghar ki safai ki jani chaahiye. waise hi apane mann ki bhi to doosaron men kamiyan na nikaalen. bahut acchchhi lagi ye bodh - katha.
संगीता पुरी ने कहा…
खाली दिमाग होता ही है शैतान का....यदि व्यस्तता बनी होती है....तो एक धुन में लोग काम करते चले जाते हैं...अपनी कमजोरी दिखाई पड़ने लगती है...पर यदि बैठकर समय काटा जाए...तो ऐसा ही होता है....हमं दूसरे के घर की गंदगी ही दिखाई पड़ती है।
संगीता जी,एवं संगीता पुरी जी
सादर-अभिवादन
आपकी टिप्पणियों का आभारी हूँ
Rajesh Pathak"Pravin" ने कहा…
गिरीस भाई
आपका ब्लॉग पढा,अच्छा लगा
पहली बार साल भर पहले सुना था की जबलपुर में भी आप,पंकज जी,विजय जी,और भाई
महेंद्र मिश्रा इस काम में लगे हैं . आज सभी ब्लॉग'स देख कर लगा की सच में आप सभी
कल के जबलपुर की जमीन तैयार कर रहें हैं आपके सफर के लिए हमारी शुभ कामनाएं.
आज की बोध कथा भी ज़बरदस्त है बधाई हो
अंकुर भाई
राजेश भाई
शुक्रिया
sulabha ने कहा…
अब समझी कि आप विंडो के कांच क्यों साफ़ कर रहे थे
Udan Tashtari ने कहा…
वाह, क्या कथा सुनाई है. गंदे शीशे से देखोगे तो सब गंदा ही दिखेगा. बहुत सुन्दर.
Vivek Gupta ने कहा…
बहुत खूब | सब नज़रों का धोखा है | एक कहावत है कि "Rainbow is not in the sky; its in your own eye"
seema gupta ने कहा…
आज मैंने आपकी मदद करने अपनी खिड़की के शीशे साफ़ करे हैं शायद उसके कारण तुमको ...............!
पति की बात सुनकर किंकर्तव्यविमूढ़ सी दीपाली उस खिड़की को अपलक निहारने लगी जिससे पूनम का चाँद पूरी रोशनी भेज रहा था .

" m speechless, so impressive expression"

Regards
sameer ji.seema ji.vivek ji.kunnoo bhai sulabh ji sabhee kaa abhare hoon
बेनामी ने कहा…
bakwaas likhaten hain aap lagataa hai saai baba ke prachaarak hain

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