सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

अगस्त, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अचार की एक फांक : हरेश कुमार की वाल से

  गुरुकुल घरोंदा के एक आचार्य थे। वे जनसंघ के टिकट पर सांसद बन गए, तो उन्होंने सरकारी आवास नहीं लिया। वे दिल्ली के बाजार सीताराम, दिल्ली-6 के आर्य समाज मंदिर में ही रहते थे । वहां से संसद तक पैदल जाया करते थे कार्रवाई में भाग लेने। वे ऐसे पहले सांसद थे, जो हर सवाल पूछने से पहले संसद में एक वेद मंत्र बोला करते थे। वे सब वेदमंत्र संसद की कार्रवाई के रिकॉर्ड में देखे जा सकते हैं। उन्होंने एक बार संसद का घेराव भी किया था, गोहत्या पर बंदी के लिए । एक बार इंदिरा जी ने किसी मीटिंग में उन स्वामी जी को पांच सितारा होटल में बुलाया। वहां जब लंच चलने लगा तो सभी लोग बुफे काउंटर की ओर चल दिये। स्वामी ही वहां नहीं गए । उन्होंने अपनी जेब से लपेटी हुई बाजरे की सूखी दो रोटी निकाली और बुफे काउंटर से दूर जमीन पर बैठकर खाने लगे।  इंदिरा जी ने कहा - "आप क्या करते हैं ? क्या यहां खाना नहीं मिलता ? ये सभी पांच सितारा व्यवस्थाएं आप सांसदों के लिए ही तो की गई है।" तो वे बोले - "मैं संन्यासी हूं। सुबह भिक्षा में किसी ने यही रोटियां दी थी । मैं सरकारी धन से रोटी भला कैसे खा

स्वर्ग की बातें झूठी बातें

स्वर्ग की बातें झूठी बातें,इल्म तो है मस्ताने को हम क्यों जाएं पागलखाने पागल को समझाने को जब भी हम खुद से मिलते हैं,खुद को जाना करते हैं हम खुद से ही फिर सीखेंगे,क्यों आए समझाने को कितने पंथ कितनी राहें,कितने दर्शन कितनी सोच हम तो हैं कबीर के अनुचर,गीत हमें भी गाने दो अपनी गठरी खुद ही रख लो,हमको मत दो बोझा ये हम खुद अपना कमा ही लेंगे,खुद को भी अजमाने दो ईश्वर अल्लाह परमपिता सब से मिलना है हमको किसने सौंपा तुमको जिम्मा इन सब से मिलवाने को *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

अनकिया सभी पूरा हो : श्री अशोक चक्रधर

मॉरीशस में सम्पन्न विश्व हिंदी सम्मेलन पर चुटीली रिपोर्ट श्री एम एल गुप्ता आदित्य जी के ई-सन्देश से प्राप्त हुई ।  — चौं रे चंपू! लौटि आयौ मॉरीसस ते? — दिल्ली   लौट   आया   पर   सम्मेलन   से   नहीं   लौट पाया   हूं।   वहां   तीन-चार   दिन   इतना   काम   किया   कि अब   लौटकर   एक   ख़ालीपन   सा   लग   रहा   है।   करने को   कुछ   काम   चाहिए। — एक   काम   कर ,  पूरी   बात   बता ! उद्घाटन   सत्र ,  अटल   जी   की   स्मृति   में   दो   मिनिट के   मौन   से   प्रारंभ   हुआ।   दो   हज़ार   से   अधिक   प्रतिभागियों   के   साथ   दोनों   देशों   के   शीर्षस्थ   नेताओं की   उपस्थिति   श्रद्धावनत   थी   और   हिंदी   को आश्वस्त   कर   रही   थी।  ‘ डोडो   और   मोर ’  की   लघु एनीमेशन   फ़िल्म   को   ख़ूब   सराहना   मिली।   और फिर   अटल जी के   प्रति श्रद्धांजलि   का   एक   लंबा सत्र   हुआ।  ‘ हिंदी   विश्व   और   भारतीय   संस्कृति ’  से जुड़े   चार समानांतर सत्र   हुए।   चार सत्र   दूसरे   दिन हुए।  ‘ हिंदी   प्रौद्योगिकी   का   भविष्य ’  विषय   पर विचार - गोष्ठी   हुई।   प