सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

स्त्री-विमर्श के लिए वास्तविक-विषय वस्तु को खोजें इस चर्चा में

[P7030130.JPG]
शिखा वार्ष्णेय जी से आज  भारतीय एवं पश्चिमी परिवेश में  हुई बातचीत से यह तय हो गया है की स्त्री-विमर्श की विषय वस्तु जो आजकल संचार माध्यमों पर हावी है वो कदापि उपयुक्त नहीं है. आज उनके ब्लॉग स्पंदन पर जो कविता है उसमें जो भी कुछ शामिल है वो है उंचाइयो की तलाश और खुली हवा की अपेक्षा.
बंद खिड़की के पीछे खड़ी वो,
सोच रही थी कि खोले पाट खिड़की के,
आने दे ताज़े हवा के झोंके को,
छूने दे अपना तन सुनहरी धूप को.
उसे भी हक़ है इस
आसमान की ऊँचाइयों को नापने का,
खुली राहों में अपने ,
अस्तित्व की राह तलाशने का,[आगे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये  ]
           शिखा वार्ष्णेय जी के अंतस में पल रही कवयत्री का दर्शन देखिये उनकी ही इन पंक्तियों  में
अपने लिए उठे ये हाथ , तो शिखा! क्या बात हुई
होगी दुआ कुबूल, जो कर किसी बेबस के वास्ते
आइये स्त्री-विमर्श के लिए वास्तविक-विषय वस्तु को खोजें इस चर्चा में 
 
इस तरह मनाया हमने गाँव में जाकर महिला दिवस

टिप्पणियां

Shikha se baat cheet bahut bahut acchi lagi..
shtri vimarsh ki sabhi baatein bahut hi pasand aayi..
jaankar accha laga ki stryon ke aarakshan ke khilaaf wo bhi hain...main bhi mahilaaon ke aarakshan ka virodh karti hun..agar aap qabil hain to fir aarakhshan kaisa ??
accha laga podcast..
रानीविशाल ने कहा…
Girishji Sabse pahale to apase kshama chahungi vystata ke chalate pichali kuch post dekh nahi pai lekin aapki bheji sari links maine bookmark kar li hai araam se sunugi aaj.
Shikhaji se charcha ka yah ank bahut rochak raha...Dhanywaad!
Udan Tashtari ने कहा…
सुन रहे हैं अभी.
shikha ji ek behad samvedansheel mahila aur utkrisht rachnakaar hain, unse mil bhi chuki hun aur unki rachnaaon se rubaru hoti rahti hun. bahut shubhkaamnyen.
apne vishwaas ko is baatchit se prabhawshali banaya hai......badhaai
बहुत सार्थक चर्चा....सुन कर बहुत अच्छा लगा..और कई जानकारियाँ मिलीं....बधाई
राज भाटिय़ा ने कहा…
अभी आधी सुनी है, आवाज बहुत धीमी है, दोवारा सुनेगे तब बतायेगे.
rashmi ravija ने कहा…
बहुत ही बढ़िया साक्षात्कार....शिखा ने बहुत ही अच्छी तरह,सवालों के जबाब दिए.कई सारी बातें भी पता चलीं ... बहुत अच्छी लगी ये बातचीत...
बहुत अच्‍छी लगी आपलोगों की बातचीत !!
अनूप शुक्ल ने कहा…
बहुत अच्छा लगा शिखा जी की बातचीत और विचार सुनकर!
नारी विमर्श पर आपका पॉडकास्ट बहुत ही ज्ञानवर्धक रहा!
शिखा जी के विचारों ने बहुत प्रभावित किया!
राजू मिश्र ने कहा…
सुन रहे हैं अभी... पूरी सुनकर ही बताऊंगा।
अनाम ने कहा…
shikha ji aapko pahali baar padha aur soch rahi hun ab tak kyun nahi padha?...stree man ke anterdvand ko bakhubi shabd diye aapne...wah.
dher saari shubhkamnaye..

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

क्यों लिखते हैं दीवारों पर - "आस्तिक मुनि की दुहाई है"

सांपों से बचने के लिए घर की दीवारों पर आस्तिक मुनि की दुहाई है क्यों लिखा जाता है घर की दीवारों पर....! आस्तिक मुनि वासुकी नाम के पौराणिक सर्प पात्र की पुत्री के पुत्र थे । एक बार तक्षक से नाराज जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया और इस यज्ञ में मंत्रों के कारण विभिन्न प्रजाति के सांप यज्ञ वेदी संविदा की तरह आ गिरे । तक्षक ने स्वयं को बचाने के लिए इंद्र का सहारा लिया तो वासुकी ने ऋषि जगतकारू की पत्नी यानी अपनी बहन से अनुरोध किया कि पृथ्वी पर रहने वाले सभी सांपों की रक्षा कीजिए और यह रक्षा का कार्य आपके पुत्र मुनि आस्तिक ही कर सकते हैं । अपने मामा के वंश को बचाने के लिए आस्तिक मुनि जो अतिशय विद्वान वेद मंत्रों के ज्ञाता थे जन्मेजय की यज्ञशाला की ओर जाते हैं । किंतु उन्हें सामान्य रूप से यज्ञशाला में प्रवेश का अवसर पहरेदार द्वारा नहीं दिया जाता । किंतु आस्तिक निराश नहीं होते और वे रिचाओं मंत्रों के द्वारा यज्ञ के सभी का सम्मान करते हैं । जिसे सुनकर जन्मेजय स्वयं यज्ञशाला में उन्हें बुलवा लेते हैं । जहां आस्तिक मुनि पूरे मनोयोग से यज्ञ एवं सभी की स्तुति की जैसे जन्मेजय ने उनसे वरदान मांगने की

स्व.श्री हरिशंकर परसाई का एक व्यंग्य: " अपनी-अपनी हैसियत "

परसाई जी का दुर्लभ छाया चित्र फ़ोटो : स्व०शशिन यादव  हरिशंकर परसाई  ( २२ अगस्त ,  १९२२  -  १० अगस्त ,  १९९५ ) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंग्यकार थे। उनका जन्म जमानी ,  होशंगाबाद ,  मध्य प्रदेश   में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के – फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने – सामने खड़ा करती है , जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असंभव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनॅतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन – मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान – सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा – शैली में खास किस्म का अपनापा है , जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है। ( साभार विकी )          परसाई जी की रचनावलियों

भारत रत्न पंडित बिस्मिल्लाह खान को नमन

        25-26 जून 2019 की रात मैं बिस्मिल्लाह खां के बारे में सोच रहा था....अचानक जाने कहां से मेरे  सामने बिस्मिल्ला खां साहब नमूदार हो गए मेरे ज़ेहन में...? मेरी दृष्टि में हर कलाकार गंधर्व होता है । जो कहीं भी कभी भी आ जा सकता है और इन गंधर्वों के बारे में कुछ भी कहना उस निरंकार सत्ता पर सवाल उठाना मेरे जैसे अदना लेखक के लिए तो ठीक वैसा ही है जैसे सूरज को लालटेन दिखाकर यह बताना कि तुम इस रास्ते से चलो...!    सुधि पाठक जानिए कि बिहार के किसी गांव में 21 मार्च 1913 को जन्मे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब के बारे में लिखने के बात मैंने  शीर्षक यानी आलेख टांगने की खूंटी खोजी ।   मैंने पंडित बिस्मिल्लाह खान लिखा है कट्टर पंथी मुझ पर निशाना साधेंगे  पर जानते हो आप हमने ऐसा क्यों किया उस्ताद को पंडित लिखा ? ऐसा इसलिए किया  क्योंकि जब मैं शीर्षक लिखने के बारे में सोच रहा था तो यह सोचा कि नहीं वे मज़हबी एकता यानी असली सेक्युलरिज्म के सबसे बड़े पैरोकार आईकॉन हैं । उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के गुरु उनके नाना अली बख्श साहब हुआ करते थे और भी गंगा के पंच घाट के पास बनी एक कोटरी में रियाज किया करते